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मीडिया में दफ़न हैं धधकते मणिपुर की ख़बरें

(उधार - इंडियन एक्सप्रेस)

(उधार - इंडियन एक्सप्रेस)

क्या मणिपुर भारत का हिस्सा नहीं है? अगर है तो फिर मीडिया में उसके साथ इतना सौतेला व्यवहार क्यों? बीते दो हफ्तों से मणिपुर सुलग रहा है। सोमवार और मंगलवार को वहां पर व्यापक बंद रहा। लेकिन मीडिया में ख़बरों के नाम पर सन्नाटा पसरा हुआ है। ऐसा लगता है कि मणिपुर किसी और मुल्क का हिस्सा है और वहां हो रही घटनाओं से इस देश का और इसके लोगों को कोई वास्ता नहीं।

23 जुलाई को मणिपुर पुलिस कमांडो के छह जवानों ने मिल कर संजीत चोंग्खम नाम के एक युवक की हत्या कर दी। उस युवक को इंफाल में भरे बाज़ार गोली मारी गई। पुलिस के मुताबिक संजीत चोंग्खम एक उग्रवादी था। उसे जब पुलिस ने घेरा तो उसने रिवॉल्वर से गोली दागी। जवाबी कार्रवाई में मारा गया। लेकिन बाज़ार में मौजूद लोग पुलिस का सच और झूठ जानते थे। उन्होंने देखा कैसे संजीत को जवान लेकर वहां पहुंचे और फिर कैसे एक दुकान के भीतर उसे गोली मारी गई। और कैसे उसके शव को टांग कर बाहर लाया गया।

लोगों ने पुलिस का ये ख़ौफ़नाक चेहरा आंख के सामने देखा था। एक कान से दूसरे कान बात इतनी फैली की हंगामा खड़ा हो गया। कार्रवाई की मांग उठने लगी। लेकिन राज्य के मुखिया पर कुछ फर्क ही नहीं पड़ा। ठोस कदम उठाने की जगह वो यही कहते रहे कि उनकी सरकार के पास उग्रवादियों को ठिकाने लगाने के अलावा कोई और रास्ता नहीं बचा है। इस बयान ने लोगों के गुस्से को और भड़का दिया। प्रदर्शन होने लगे। लेकिन दिल्ली के अख़बारों को पढ़ने पर ऐसा लगता है कि उत्तर पूर्व में राम राज स्थापित हो गया है। वहां चारों तरफ अमन चैन है। कभी कभार… एक दो महीने में एक-दो बार सुरक्षाबलों के जवान कुछ उग्रवादियों को मार दें या फिर कुछ उग्रवादी सुरक्षाबलों के जवानों को तो अख़बार के किसी पन्ने पर एक कॉलम की ख़बर चिपका कर सभी अपने कर्मों की पूर्ति कर लेते हैं।

ठीक वैसे ही, दैनिक भास्कर ने मंगलवार को आखिरी पन्ने पर एक फोटो चिपका दी। उसके ऊपर कैप्शन दिया – गुस्सा भड़का। नीचे लिखा मणिपुर बंद के दौरान भीड़ का उग्र प्रदर्शन। काम ख़त्म। पूरा अख़बार पलटने पर भी आपको यह पता नहीं चलेगा कि आखिर गुस्सा क्यों भड़का? आखिर ऐसा क्या हुआ कि इतनी बड़ी संख्या में लोग सड़कों पर उतर आए? बस एक फोटो चिपका देने और उसके ऊपर नीचे दस शब्द जड़ देने से ही पत्रकारिता का धर्म और कर्म दोनों निपट गया। बाकी अख़बार तो उससे भी अधिक समझदार निकले। उन्होंने किसी पन्ने पर मणिपुर की कोई ख़बर नहीं छापी। दैनिक जागरण, हिंदुस्तान, नई दुनिया समेत सभी अख़बार इसी समझदारी के दायरे में आते हैं।

पुलिस जवानों के साथ संजीत

पुलिस जवानों के साथ संजीत

ये हाल तब है जब तहलका ने संजीत चोंग्खम हत्याकांड में एक बड़ा खुलासा किया है। जिस समय मणिपुर पुलिस कमांडो के जवान संजीत को ठिकाने लगा रहे थे। कहीं दूर से एक फोटोग्राफर ने उनकी तमाम हरकतों को कैमरे में कैद कर लिया। उन तस्वीरों में देखा जा सकता है कि किस तरह गोली मारे जाने से पहले संजीत उन्हीं जवानों के साथ टहल रहा था। सारे जवान उस निहत्थे को घेरे हुए थे। फिर अचानक एक जवान रिवॉल्वर निकालता है। गोली चलती है और संजीत ढेर। फिर पुलिस के वो हैवान संजीत के शव को ऐसे घसीटते हैं जैसे कोई कसाई भेड़-बकरी घसीटता है।

तहलका पर छपी ये तस्वीरें चीख-चीख कर कह रही हैं कि संजीत को ठंडे दिमाग से… सोची समझी साजिश के तहत मारा गया है। लेकिन मुख्यधारा के सारे हिंदी अख़बार चुप हैं। कोई कुछ बोलता नहीं… कोई कुछ लिखता नहीं। अख़बार तो छोड़िए वहां तो सिर्फ़ 16 पन्ने होते हैं। इन अख़बारों की तो वेबसाइट भी है। वहां पर तो स्पेस की कोई दिक्कत नहीं। लेकिन आपको वहां भी कुछ नहीं मिलेगा। गूगल सर्च में कभी जाकर संजीत टाइप कीजिएगा। 6 अगस्त 2009 की सुबह तक इस हत्याकांड से जुड़ी सिर्फ़ 13 ख़बरें मिलेंगी। 15 दिन, सैकड़ों अख़बार, हज़ारों वेबसाइट और सिर्फ़ 13 ख़बरें। तीन-चार बीबीसी पर। दो-तीन वॉयस ऑफ अमेरिका पर और उतनी ही समय पर। बाकी सभी जगह के संपादकों के हिसाब से मणिपुर की ये ख़बर कोई ख़बर नहीं।

कभी-कभी तो लगता है कि यह एक बड़ी साज़िश का हिस्सा है। वरना ये कैसे हो सकता है कि सूचना क्रांति के इस दौर में आप अपने ही देश के एक बड़े हिस्से की गतिविधियों को पढ़ने के लिए तरस जाते हैं। ये कैसे हो सकता है कि आपके ही देश का कोई हिस्सा धधक रहा हो… वहां हजारों लोग सड़कों पर उतर कर इंसाफ़ मांग रहे हों… निहत्थे लोगों पर पुलिस आंसूगैस के गोले दाग रही हो… लाठियां बरसाई जा रही हों… और मुख्यधारा का मीडिया इससे बेख़बर राखी सावंत की सगाई कराने में जुटाने रहता हो। कोई यह नहीं कहता कि आप राखी सावंत की सगाई मत दिखाइए… सिर्फ़ सगाई ही क्यों… आपका मन करे तो किसी और का सुहागरात भी दिखाइए… लेकिन क्या उत्तर पूर्व की इतनी बड़ी घटना के लिए आपके पास चंद मिनट भी नहीं है। अगर नहीं है तो बताइए इसे साज़िश नहीं तो क्या कहा जाए?

ये सिर्फ़ और सिर्फ़ एक बड़ी साज़िश ही हो सकती है या फिर यह कि हमारे अख़बारों के संपादकों को ख़बर का ज्ञान नहीं। लेकिन ऐसा कहना उन सम्मानित लोगों का अपमान होगा। ख़बर का ज्ञान उनको बखूबी है। धंधे का भी ज्ञान है। फिर भी वो आंख बंद किए बैठे हैं तो ज़रूर कोई बात होगी। बात भी ऐसी कि वो बता नहीं सकें। वरना आपका एक राज्य की जनता आपकी तरफ़ बेबस निगाहों से देख रखी हो और वहां के हुक्मरान जनता का मजाक उड़ा रहे हों… और ये ख़बर नहीं छपे… ये कैसे हो सकता है?

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4 Responses to मीडिया में दफ़न हैं धधकते मणिपुर की ख़बरें

  1. संदीप Reply

    August 6, 2009 at 11:49 pm

    यह एक घिनौनी साजिश है; राज्‍य समर्थित हिंसा को जायज ठहराते हुए, उसके खिलाफ कुछ भी बाहर आने से रोकने के लिए

  2. रंगनाथ सिंह Reply

    August 7, 2009 at 12:35 am

    government of india shame shame !!

  3. रंगनाथ सिंह Reply

    August 7, 2009 at 12:38 am

    Indian media shame shame !!

  4. Archana Reply

    August 10, 2009 at 2:04 pm

    Jub logon ki raksha ke liye bani sarkar hi bhakshak ban jayega toh hum kiske paas jayenge?????????……..Media ka bhi ek bada tabka sarkar ke haathon ki kathputli ban gayi hai….media ko apni zimmedariyon ka ahsaas hona chahiye aur aise maamlon ko khulkar logon ke saamne lakar usaki alochna karni chahiye.

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