
आज का मीडिया
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नलिन वर्मा, वरिष्ठ पत्रकार (टेलीग्राफ)
सवाल - किसी अख़बार से अगर कोई भूल हो तो उसके लिए किसकी जिम्मेदारी बनती है।नलिन वर्मा – सीधे तौर पर संपादक की जिम्मेदारी बनती है। संपादक ही अख़बार निकालता है। इसलिए उसकी ही जिम्मेदारी बनेगी। मान लीजिए किसी रिपोर्टर ने कोई ख़बर दी। वो ख़बर स्टोरी डेस्क पर जाएगी। वहां से ठीक होने के बाद संपादक की नज़र से होते हुए छपने के लिए जाएगी। उसी के तहत आखिरी और सबसे बड़ी जिम्मेदारी तो संपादक की ही बनती है।
सवाल – ऐसे में सार्वजनिक तौर पर किसी ग़लती के लिए जिम्मेदारी लेने की नौबत आए तब किसको जिम्मेदारी लेनी चाहिए?
नलिन वर्मा – जिसने भी ग़लती की है संस्थान के भीतर अपने स्तर पर संपादक चाहे तो उस गुनहगार को सज़ा दे सकता है। लेकिन सार्वजनिक तौर पर जिम्मेदारी लेने की बात आएगी तो संपादक को ही आगे आने होगा।
सवाल – अभी दैनिक जागरण में पटना के एक रिपोर्टर की ब्लर की हुई तस्वीर छपी। हम मान लेते हैं कि ये एक भूल का नतीजा है। किसी ने जानबूझ कर ऐसा नहीं किया होगा। तो क्या इस ग़लती के लिए माफी मांगनी चाहिए या नहीं। और क्यों?
नलिन वर्मा – तकनीकी तौर माफ़ी नहीं मांगनी चाहिए। इसलिए कि जिसकी तस्वीर ब्लर की गई है। उसे उस तस्वीर का हिस्सा नहीं होना था। कोई भी कार्यक्रम हो या फिर कोई ख़बर हो। लोग उस कार्यक्रम, उस ख़बर, उस घटना और उसमें शामिल लोगों की तस्वीर देखना चाहते हैं। पेशेवर तकाजा यही कहता है कि अगर उस तस्वीर में कोई तीसरा शख़्स आ जाए तो संपादक को ये पूरा अधिकार है कि उसे हटा दे।
सवाल – आप जानते हैं कि इस चुनाव में अख़बारों ने किस तरह पैसे लेकर ख़बरें छापी। बिहार विधानसभा में भी इस पर चर्चा हुई है। इस काम में क्या अख़बारों के संपादकों को क्लीन चिट दिया जा सकता है? क्या उनकी कोई जवाबदेही नहीं बनती है?
नलिन वर्मा – देखिए, चुनाव के दौरान अख़बारों ने ख़बरों की शक्ल में जो विज्ञापन छापे हैं – ये एक बहस का मसला है। अख़बारों को ऐसे काम की छूट दी जाए या नहीं। इस पर बहस होनी चाहिए। यह भी देखना चाहिए कि पाठक कैसे रिएक्ट करता है। खुल कर बहस होगी तो हो सकता है कि कोई नई राह निकल आए।
सवाल – क्या आप नहीं मानते कि चुनाव के दौरान अख़बारों में विज्ञापन ख़बरों की तरह छापे गए?
नलिन वर्मा – हम मानते हैं कि ऐसा हुआ है और लोगों ने उसका विरोध भी किया है। लेकिन इस मसले पर किसी नतीजे पर पहुंचने के लिए एक बहस की जरूरत है। जल्दीबाजी में कोई निष्कर्ष निकालना सही नहीं होगा।
गंगा प्रसाद, वरिष्ठ पत्रकार (जनसत्ता)
सवाल – किसी अख़बार से अगर कोई भूल हो तो उसके लिए किसकी जिम्मेदारी बनती है।
गंगा प्रसाद - अखबार निकालना टीम वर्क है। टीम की अगुवाई संपादक करता है। लेकिन किसी भी ग़लती के लिए सिर्फ़ और सिर्फ़ संपादक को जिम्मेदार ठहराना ग़लत होगा। अख़बार में ग़लतियों को दुरुस्त करने की जिम्मेदारी कई लोगों पर होती है। मान लीजिए किसी रिपोर्टर ने कोई ग़लत जानकारी दी। तो ये उम्मीद की जाती है कि चीफ रिपोर्टर उस ग़लती को दूर कर देगा। अगर उसने भी ऐसा नहीं किया तो सब-एडिटर की जिम्मेदारी बनती है। फिर चीफ सब एडिटर की और अंतत: संपादक की जिम्मेदारी बनती है। भूल सुधार में तो उसी का नाम जाता है। अख़बार में जो कुछ भी ग़लत छपता है… सबको अपने स्तर पर अपनी भूल का अहसास रहता है।
सवाल – जिम्मेदारी लेने की नौबत आए तब किसको जिम्मेदारी लेनी होगी?
गंगा प्रसाद – मैंने कहा कि अंतत: संपादक को ही जिम्मेदारी लेनी पड़ती है। संपादक की तरफ से ही भूल सुधार छपता है। हमारे यह परंपरा रही है कि जब कभी ऐसी नौबत आती है तो सेनापति की तरह संपादक वो जिम्मेदारी लेता है। संपादक महज एक व्यक्ति नहीं बल्कि अपने आप में एक पूरी संस्था भी है।
सवाल – अभी दैनिक जागरण में पटना के एक रिपोर्टर की ब्लर की हुई तस्वीर छपी। हम मान लेते हैं कि ये एक भूल का नतीजा है। किसी ने इच्छा से ऐसा नहीं किया होगा। तो क्या इस ग़लती के लिए माफी मांगनी चाहिए या नहीं।
गंगा प्रसाद– यकीनन माफ़ी मांगनी चाहिए। अगर ब्लर की हुई तस्वीर इच्छा से नहीं छापी गई है और किसी भूल का नतीजा है तो सच्चे दिल से ये भूल कबूल करनी चाहिए। इस भूल के लिए माफी मांगनी चाहिए। इससे किसी का सम्मान घटेगा नहीं बल्कि बढ़ेगा। उनकी विश्वसनीयता भी बढ़ेगी।
सवाल – आप जानते हैं कि इस चुनाव में अख़बारों ने किस तरह पैसे लेकर विज्ञापनों को ख़बरों की तरह छापा। बिहार विधानसभा में भी इस पर चर्चा हुई है। इस काम में क्या अख़बारों के संपादकों को क्लीन चिट दिया जा सकता है? क्या उनकी कोई जवाबदेही नहीं बनती है?
गंगा प्रसाद – अगर कोई विज्ञापन को ख़बर की तरह छापा जाए तो यह एक बड़ी गड़बड़ी है। भारी भ्रष्टाचार है। इसके लिए अख़बार में सभी की जिम्मेदारी बनती है। मालिकों की भी।
सवाल – ऐसे में अगर मालिकों के साथ संपादकों की आलोचना की जाए तो क्या ये ग़लत होगा?
गंगा प्रसाद – आलोचना तो होनी ही चाहिए। आलोचना और बहस से ही एक व्यापक समझ बनती है। नए रास्ते खुलते हैं। स्वस्थ आलोचना, स्वस्थ लोकतंत्र की पहचान है।
रीतेश
August 7, 2009 at 4:03 pm
समरेंद्र जी,
आपने गंगा बाबू और नलिन जी से अमूमन एक ही सवाल किए हैं और उनके जवाब अलग-अलग छापे हैं.
आपका पहला सवाल (किसी अख़बार से अगर कोई भूल हो तो उसके लिए किसकी जिम्मेदारी बनती है) और दूसरा सवाल (जिम्मेदारी लेने की नौबत आए तब किसको जिम्मेदारी लेनी होगी) तो सामान्य सा सवाल है इसलिए उस सवाल के जवाब में गंगा बाबू या नलिन जी ने जो भी कहा, उसके जवाब से आप सीधे इस मामले को नहीं जोड़ सकते. मैं भी दोनों जवाब से सहमत हूं क्योंकि आपने उनके सामने सवाल में कोई संदर्भ नहीं दिया.
मुद्दे की बात आपने तीसरे सवाल से शुरू की है और संदर्भ भी दिया. मैं भी वहीं से शुरू करता हूं. आपका सवाल था, (अभी दैनिक जागरण में पटना के एक रिपोर्टर की ब्लर की हुई तस्वीर छपी। हम मान लेते हैं कि ये एक भूल का नतीजा है। किसी ने इच्छा से ऐसा नहीं किया होगा। तो क्या इस ग़लती के लिए माफी मांगनी चाहिए या नहीं).
आपका सवाल लोडेड है. आप भी वहीं पढ़े हैं जहां से कुछ साल बाद मैं पढ़ा हूं. सवालों को बनाना हमें और आपको एक ही गुरुजी ने सिखाया है. आपने पहले ही कह दिया कि … हम ये मान लेते हैं कि ये एक भूल का नतीजा है… आपसे किसने कहा कि ये भूल है. मैंने नहीं कहा, जागरण ने कोई बयान नहीं दिया. आप खुद कैसे तय कर सकते हैं कि ये भूल का नतीजा थी. और इस लोडेड सवाल जिसमें आपने भूल शब्द को अपने स्तर पर जोड़ दिया, उसके आधार पर बने सवाल का जवाब गंगा बाबू ने जो दिया वो ये कि ब्लर तस्वीर भूल का नतीजा है तो माफी मांगनी चाहिए. उनका पूरा जवाब, आपके स्तर पर जोड़े हुए भूल से बंधा हुआ है. आपने जवाब उनसे लिया नहीं, उनसे कहलवाया. ये अनुचित है. अपने सवाल से भूल शब्द को हटाकर आपने सवाल पूछा होता तो जवाब कुछ और आता.
आपके तीसरे सवाल का नलिन जी ने जो जवाब दिया है उसमें वहीं बात दोहराई जा रही है जो मैं पिछले कई पोस्टों से आपसे कह रहा हूं. नलिन जी के शब्दों में ही फिर से पढ़ें, “तकनीकी तौर माफ़ी नहीं मांगनी चाहिए। इसलिए कि जिसकी तस्वीर ब्लर की गई है। उसे उस तस्वीर का हिस्सा नहीं होना था। कोई भी कार्यक्रम हो या फिर कोई ख़बर हो। लोग उस कार्यक्रम, उस ख़बर, उस घटना और उसमें शामिल लोगों की तस्वीर देखना चाहते हैं। पेशेवर तकाजा यही कहता है कि अगर उस तस्वीर में कोई तीसरा शख़्स आ जाए तो संपादक को ये पूरा अधिकार है कि उसे हटा दे। … आप क्या कहेंगे इस जवाब पर.”
आपका चौथा सवाल, अखबारों के चुनावी कारोबार पर है. गंगा बाबू का जवाब है, अखबार में सबकी जिम्मेदारी बनती है, मालिकों की भी. मैं भी तो यही कह रहा हूं, दीक्षित जी को नाम लेकर अकेले क्यों कोस रहे हैं, मालिकों को भी कोसिए. सीधे जागरण को कोसिए. आदमी को क्यों.
आपके चौथे सवाल का जवाब नलिन जी ने दिया कि, “चुनाव के दौरान अख़बारों ने ख़बरों की शक्ल में जो विज्ञापन छापे हैं – ये एक बहस का मसला है। अख़बारों को ऐसे काम की छूट दी जाए या नहीं। इस पर बहस होनी चाहिए। यह भी देखना चाहिए कि पाठक कैसे रिएक्ट करता है। खुल कर बहस होगी तो हो सकता है कि कोई नई राह निकल आए।“. मैं भी यही कह रहा हूं. अखबार ने जो नीति बनाई, उस पर बहस कीजिए. हल तो वहां से निकलेगा.
आपका पांचवां सवाल, मालिकों के साथ संपादकों की आलोचना का है. गंगा बाबू का जवाब है होनी चाहिए. मैं भी कहता हूं अगर अखबार की नीति गलत है तो आलोचना होनी चाहिए लेकिन आप सिर्फ संपादक को कोसना चाहते हैं, उसके आगे-पीछे किसी को नहीं. नलिन जी से आपने पांचवां सवाल वो नहीं पूछा जो गंगा बाबू से पूछा बल्कि चौथे सवाल का विस्तार किया इसलिए उस पर कुछ कहने की जरूरत नहीं है.
समरेंद्र जी, आप अब अपने विचार के समर्थन में तर्क और बयान खोज रहे हैं. नतीजा आपने पहले तय कर लिया है और उसके पक्ष में तथ्य अब जुटा रहे हैं. पहले तथ्य जुटाकर आते तो ज्यादा गंभीर बात होती. मीडिया में हमारा-आपका एक-दूसरे से जला-भुना होना कोई अचंभा की बात नहीं है. मुझे कुछ लोग नापसंद है, कुछ को मैं नापसंद हूं. कुछ मेरे विरोधी हैं और कुछ का मैं भी हूं. आपके साथ भी ऐसा ही रहा होगा, जब आप किसी समाचार संगठन में काम कर रहे होंगे. आपको पटना में कई लोग मिल जाएंगे जो आपके हर सवाल का वही जवाब देंगे जो आप चाहते हैं और जिससे आपके विचार को संख्याबल की मजबूती मिलेगी. अगर ऐसे लोग पटना में न मिलें तो लखनऊ और कानपुर में भी मिल जाएंगे, जहां दीक्षित जी ने पटना से पहले काम किया है.
आपको आपके निरर्थक अभियान की शुभकामना. आप एक पठनीय और बेहतर वेबसाइट पर एक ऐसे मुद्दे पर बहस शुरू करने और उसे आगे बढ़ाने में अपना बहुमूल्य समय जाया कर रहे हैं जिसमें मेरे विचार से रत्ती भर भी दम नहीं है. फोटो का ब्लर होना तो तय था और वह तब भी तय ही होता जब पटना जागरण के संपादक समरेंद्र जी होते क्योंकि आप भी अखबार के संपादक होते, मालिक नहीं, नीति-निर्माता नहीं.
राजेश पांडे
August 7, 2009 at 9:54 pm
समरेंद्र,
ये रीतेश कौन है और कहां काम करता है ये साफ़ होना चाहिए? कहीं ये कोई छद्म नाम तो नहीं? कहीं ऐसा तो नहीं कि दैनिक जागरण का ही कोई शैलेंद्र भक्त अपना नाम बदल कर इस तरह से कुतर्क कर रहा है। तुम इसकी पहचान सार्वजनिक करो या फिर हम इसका भंडाफोड़ करेंगे। इसका खुद का ट्रैक रिकॉर्ड भी तो पता चलना चाहिए।
- राजेश पांडे
रीतेश
August 7, 2009 at 10:35 pm
राजेश पांडे जी,
मैं कौन हूं, ये लिख चुका हूं. आप अंतिम पोस्ट से शुरू कर रहे हैं तो एक बार पहली पोस्ट से फिर शुरू कीजिए. बेगूसराय में आपके जानने वाले कोई पत्रकार होंगे तो आपको पता चल जाएगा कि मैं कोई छद्म नाम धारक शैलेंद्र भक्त नहीं हूं. शैलेंद्र भक्त हूं और अपने असली नाम से ही सामने हूं.
और, आपको हमारी पहचान सार्वजनिक करने के लिए सीआईडी या सीबीआई जांच की जरूरत नहीं है. समरेंद्र जी से पूछ लीजिए, उन्हें पता है, उनके पास मेरा मेल आईडी है और उसकी सत्यता का प्रमाण भी. फिर भी न पता चले तो आप अपना मेल आईडी दीजिए, मैं सीधे आपको अपनी सीवी भेज देता हूं. पूरा ट्रैक रिकॉर्ड मिल जाएगा.
भंडाफोड़ करने में आपको कोई दुविधा या दिक्कत न हो इसके लिए मैं बिना मांगे अपना मेल आईडी दे रहा हूं
riteshiimc@gmail.com
आपका स्वागत है.
Sanjay Kumar Singh
August 9, 2009 at 12:04 pm
अखबार में छपी खबर के लिए सम्पादक ही जिम्मेदार होता है. इस पर बहस की न तो जरुरत है और ना गुंजाइश. यह तो कई बार स्थापित हो चुका है और अदालतों में हमेशा संपादक को ही बुलाया जाता रहा है. मेरे विचार से इसी से बचने के लिए पी आर बी एक्ट जैसी कोई चीज है जिसके तहत अखबारों को बताना होता है की गर्दन किसकी नपेगी और यह घोषणा गलती होने के बाद नहीं, पहले ही करनी होती है. गंगा बाबु अभी नौकरी में हैं तो कैसे कहेंगे की मेरी गलती के लिए मेरा संपादक जिम्मेदार है. गंगा बाबु की गलती के लिए दुनिया उनके सम्पादक को जिम्मेदार मानेगी और अगर वे संपादक के चम्पू हों तो सम्पादक कोई बलि का बकरा तलाश लेगा. नहीं तो उन्ही की छुट्टी करेगा.
इसी तरह, जागरण में फोटो blur करने के लिए किसी भी पाठक की नजर में सम्पादक जिम्मेदार है और अगर संपादक को लगता है की कोई और जिम्मेदार है तो वो बताएं की उन्हें वेतन किस बात का मिलता है.
Updesh Awasthee
August 26, 2009 at 2:07 pm
Samrendra ji
muje lgta hai ki aapko ptrkaron ki pol kholne ke bjaye ptrakah hiton me bahas ki suruaat karna chahia. ek prakar ki workshop start karna chahie taki des bhar ke yuva jantantra se juden. shelendra dixit ko apne hal per chod dena chahie. main shelendra ji kee tarafdari nahi kar rha. mein m.p. se hun aur bihar ke bare main keval etna janta hun ki yeh lalu ka pradesh hai. main jantantra ka ek hissa banna chahta hun. if posibal pls send me your email eddress.
thnx & regards
updesh Awasthee
DGM
Raj Express, Bhopal