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इंटरनेट पर भी ख़बरों के लिए चुकाने पड़ेंगे पैसे!

पैसा दो, ख़बर लो

फाइनेंशियल टाइम्स ने एलान किया है कि उसकी वेबसाइट पर अगले साल की गर्मियों तक पे-पर-व्यू (हर ख़बर के लिए कीमत) की योजना पूरी तरह से लागू हो जाएगी। कंपनी के मुताबिक इस पर विचार किया जा रहा है कि क्या ग्राहकों को कोई भी कंटेंट मुफ़्त दिया जाए या नहीं। अभी फाइनेंशियल टाइम्स के रजिस्टर्ड यूजर हर महीने 20 ख़बरों को मुफ़्त में हासिल कर सकते हैं। ऐसे रजिस्टर्ड यूजर्स की संख्या करीब 14 लाख है। अगर कोई बीस ख़बरों से अधिक जानकारी चाहता है तो उसके लिए उसे पैसे चुकाने पड़ते हैं। अभी अख़बार पर दो दरें लागू हैं। सालाना 150 डॉलर और 199 डॉलर। 199 डॉलर चुकाने वाले ग्राहकों को कुछ ऐसी एक्सक्लूसिव जानकारियां दी जाती हैं जो उनका निवेश और कारोबार बढ़ा सकें।

मर्डोक की योजना

मीडिया मुगल रुपर्ट मर्डोक कारोबार में हुए नुकसान से हिल गए हैं। इससे उबरने के लिए अब मर्डोक ने फाइनेंशियल टाइम्स जैसी कुछ वेबसाइटों की तर्ज पर अपने अख़बारों की वेबसाइटों के ग्राहकों से भी पैसे वसूलने का फ़ैसला लिया है। मर्डोक के मुताबिक अगले साल की गर्मियों तक उनके सभी अख़बारों की वेबसाइट पर कंटेंट के लिए लोगों को पैसे चुकाने पड़ेंगे। इनमें टाइम्स, द सन और द न्यूज़ ऑफ द वर्ल्ड शामिल हैं।

लगातार घाटे से जूझ रहे मर्डोक के मुताबिक “मुफ़्त ऑनलाइन ख़बरों का दौर समाप्त हो गया है। स्तरीय पत्रकारिता सस्ती नहीं है। डिजिटल क्रांति ने कई नए और कम खर्च वाले डिस्ट्रीब्यूशन चैनलों को जन्म दिया है। लेकिन कहीं भी कंटेंट मुफ़्त नहीं रहा। हम अपनी सभी नई वेबसाइटों के लिए पैसे वसूलेंगे।” मर्डोक की कंपनी न्यूज़ कॉरपोरेशन का पूरी दुनिया के मीडिया बाज़ार में दबदबा। प्रिंट, टेलीविजन और साइबर तीनों ही क्षेत्रों में उनका अच्छा दखल है। ऑस्ट्रेलिया से लेकर अमेरिका तक उनका कारोबार फैला हुआ है। लेकिन मंदी के इस दौर में न्यूज़ कॉरपोरेशन को 3.4 अरब डॉलर का नुकसान हुआ है।

इस बड़े घाटे ने मर्डोक को एक नए रेवेन्यू मॉडल पर सोचने के लिए मजबूर कर दिया है। उन्होंने दो महीने पहले गूगल पर कंटेंट चोरी का आरोप लगाया था और कहा था कि न्यूज़ कॉर्प जैसी कंपनियों के कंटेंट के बल पर गूगल मुनाफा कमा रहा है। कुछ ऐसी ही बात एसोसिएट प्रेस ने भी कही थी। तभी से ये उम्मीद की जा रही थी कि मर्डोक जल्दी ही पे-पर-व्यू (यानी इस्तेमाल के हिसाब से कीमत) के फलसफे को लागू करेंगे। अब उन्होंने इसकी औपचारिक घोषणा कर दी है। उन्होंने कहा है कि “वो इस मामले में इंडस्ट्री को एक दिशा देंगे। अगर वो कामयाब रहे तो बाकी मीडिया संस्थान भी उनके पीछे चल पड़ेंगे।”

पे-पर-व्यू कितना असरदार

रुपर्ट मर्डोक के इस एलान के साथ ही ये बहस छिड़ गई है कि क्या सच में इंटरनेट का ग्राहक कंटेंट के लिए पैसे चुकाएगा? मतलब उनकी इस योजना के कामयाब होने की उम्मीद कितनी है? जानकारों की माने तो पे-पर-व्यू के सिद्धांत पर अमल करते हुए इंटरनेट के ग्राहकों से पैसे वसूलना आसान नहीं है। गुंजाइश इसकी ज्यादा है कि यह योजना नाकाम हो जाए। जिस कंटेंट से ग्राहकों का सीधा हित जुड़ा है उसके लिए तो वो पैसे चुका भी देंगे। लेकिन बाकी कंटेंट के लिए कोई पैसे नहीं भरेगा। मतलब फाइनेंशियल टाइम्स जैसी बिजनेस वेबसाइट तो कामयाब हो सकती हैं, लेकिन दूसरी वेबसाइट कामयाब होंगी इसकी कोई गारंटी नहीं।

इस तर्क में दम लगता है। क्योंकि जैसे ही किसी बड़ी वेबसाइट पर ग्राहकों से पैसे वसूले जाने लगेंगे, वैसे ही उससे मुक़ाबला कर रही छोटी कंपनियों की वेबसाइट आगे बढ़ जाएंगी। उसके यूजर इन वेबसाइट्स की तरफ़ मुफ़्त कंटेंट के लिए मुड़ जाएंगे और गूगल के जरिए होने वाली आमदनी में छोटी कंपनियों की हिस्सेदारी बढ़ने और बड़ी कंपनियों की हिस्सेदारी घटने लगेगी। यही नहीं यूजर्स की संख्या घटने से बड़ी कंपनियों को विज्ञापन की दरों में भी कटौती करनी पड़ सकती है।

यही वजह है कि फाइनेंशियल टाइम्स ने भी कंटेंट का एक हिस्सा मुफ़्त रखा है। ताकि फ्लोटिंग यूजर और मुफ़्त समाचार पढ़ने वाले ग्राहकों को भी जोड़ा जा सके। इससे सबसे अधिक फायदा हिट्स पर पड़ता है और हिट्स ही विज्ञापन के जरिए पैसे कमाने का मुख्य आधार हैं।

भारतीय संदर्भ में तो इस फॉर्मूले पर अमल फिलहाल नामुमकिन सा लगता है। यहां आठ सौ रुपये इंटरनेट के लिए, उसके बाद तीन सौ रुपये केबल के लिए और फिर अख़बारों के लिए पैसे चुकाने के बाद साइबर दुनिया में चहलकदमी करने वाले बहुत कम यूजर ही ऐसे होंगे जो वेबसाइट को अलग से पैसा देने की हैसियत रखते हों।

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