दैनिक जागरण के वरिष्ठ फोटोग्राफर अजीत कुमार ने जनतंत्र को एक चिट्ठी भेजी है। इस चिट्ठी में भोले शंकर की तरह उन्होंने विष का प्याला पीते हुए कबूल किया है कि प्रकाश कुमार का फोटो उन्होंने ही जानबूझ कर ब्लर किया था और इसके लिए दैनिक जागरण के संपादक शैलेंद्र दीक्षित और ब्यूरो चीफ सुभाष पांडे को दोष देना सही नहीं है। उन्होंने ऐसा क्यों किया, इसके पीछे उनके अपने तर्क हैं। उन तर्कों से आप सहमत हो सकते हैं और असहमत भी। लेकिन हम उनके इस साहस का सम्मान करते हुए दैनिक जागरण के फोटो प्रकरण पर चली बहस को यहीं रोकना चाहते हैं। वैसे भी इस बहस में अब कुछ बचा नहीं है। बातचीत मुद्दे से भटक कर निजी आरोप-प्रत्यारोप की तरफ मुड़ चुकी है। इसलिए हम अजीत कुमार की इस स्वीकारोक्ति को आपने सामने रख रहे हैं… इस उम्मीद में कि आप भी इस बहस को यहीं ख़त्म समझेंगे और मामले को ज़्यादा तूल नहीं देंगे।
समरेन्द्र जी,
लगता है आपके पास भी इन दिनों कोई काम नहीं रह गया है, तभी तो एक फालतू मु़द़दे पर बहस छेडे हुये हैं। 29 जुलाई को जिस फोटो को ब्लर करने को ले जो इतना हंगामा है वह मेरी ही खींची गई तस्वीर है। अभी तक मैं चुप इसलिये था क्योंकि देखना चाहता था कि तस्वीर को लेकर कौन कौन से खेल होते हैं। आपने एक बार भी यह पता लगाने की कोशिश नहीं की कि यह तस्वीर आखिर किसने ली थी। कम से कम उस छायाकार से तो पूछ लिया होता कि ऐसा उसने क्यों किया। मैं कहूंगा तो आपको यकीन नहीं होगा। प्रकाश कुमार ने सुबह जब मेरे ब्यूरो चीफ को फोन किया तो उन्हें पता चला कि अखबार में स्टार न्यूज के प्रकाश कुमार की तस्वीर ब्लर की गई है। सुभाष पांडेय ने दोपहर करीब 12 बजे मुख्यमंत्री के कक्ष से अपने संपादक को इसकी जानकारी दी तब उन्हें इसकी जानकारी हुई। ऐसे में संपादक शैलेन्द्र दीक्षित या सुभाष पांडेय को इसके लिये जिम्मेदार ठहराना सरासर अन्याय होगा।
महोदय मैं पटना में पिछले पंद्रह साल से न्यूज फोटोग्राफी कर रहा हूं। तब प्रकाश शायद इस पेशे में नहीं आये थे। उनके पिता जब बासा के अध्यक्ष हुआ करते थे तो उनके प्रेस काफ्रेंस की तस्वीरें खींचा करता था। लेकिन मुझे आश्चर्य हो रहा है कि पंद्रह बीस साल के अपने कैरियर में राजनेताओं को अखबारों में तस्वीर खींचवाने की बेचैनी तो देखी थी पर किसी पत्रकार को अखबार में अपना नूरानी चेहरा दिखाने की बेचैनी मैंने पहली बार देखी है। कभी कभी सोचता हूं कि अब वह पत्रकारिता नहीं रही। अब तो यह पैसा कमाने का जरिया जो बनते जा रही है। प्रिंट के अभी भी मेरे कई साथी आज भी कैमरे की नजर से अपने को बचाने की कोशिश करते रहते हें। लेकिन इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के साथी इस लालच से अपने को बचा नहीं पाते। प्रिंट के साथी इस कोशिश में रहते हैं कि लोग जान न पायें कि अमुक राजनेता से उनके मुधुर संबंध है। इसके तह में जाइये तब आपको पता चलेगा कि इस चेहरा दिखाने की होड में ही इन पत्रकारों ने कैसी कैसी दुकान खोल रखी है। हंगामा इसलिये नहीं हैं कि मैंने चेहरा ब्लर क्यों किया। हंगामा इस बात को लेकर क्योंकि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इस पर टिप्प्णी कर दी। अगर मुख्यमंत्री ने टिप्प्णी नहीं की होती तो इसको लेकर इतना हंगामा नहीं होता।
महोदय चैनल पर चेहरा चमकाने से उतनी मार्केटिंग नहीं हो सकती जितनी दुनियां के सर्वाधिक बिकने वाले अखबार के प्रथम पृष्ट पर फाटो छपने से मिलती। पूरा मलाल मुख्यमंत्री के साथ नहीं छपने को लेकर हैं। मैंने उस दिन पूरी कोशिश की कि प्रकाश कुमार मेरे कैमेरा के एंगल में न आये। मैंने खुद उनसे आग्रह भी किया कि आप हट जायें लेकिन उन्होंने अनसुना कर दिया। बार बार प्रयास के बावजूद जब मैं उन्हें फ्रेम से हटाने में कामयाब नहीं हो सका तो मुझे उनका चेहरा ब्लर करना पडा।
अत: आपसे आग्रह होगा कि इसे यहीं बंद कर दें। मैंने जो कुछ भी किया, उस पर मुझे आज भी कोई अफसोस नहीं है। प्रताड़ना के रूप में मैं अपने संपादक से दंडित भी हो चुका हूं लेकिन प्रकाश जी ने फिर ऐसी कोशिश की तो फिर फोटो ब्लर करूंगा। अभी बस इतना ही।
धन्यवाद।
अजीत कुमार
वरिष्ठ फोटोग्राफर
दैनिक जागरण, पटना
ई-मेल – ajit@pat.jagran.com
ARUN PANDEY
August 9, 2009 at 9:08 pm
Bahas band kar dene ki aapki baat se main sahmat hoon, fir bhi main ajeet kumar ki betuki daleel ki wajah se ye baat likhne ko majboor ho raha hoon. Mr ajeet ki ne jis tareeke se pic ka sir udaya wo kisi professional photographer ka kaam nahi lagata. Koi bhi bina siir ki pic kaise bhej sakta hai aur agar chali gayi to publish kaise ho gayi ye behad sharmnak baat hai. Mere do point hain. first technical n authetic hai ki wo dekhane main kitni bhaddi aur behuda lag rahi thi aur ise kisi national newspaper ne kaise publish kar diya. Mera doosara point mr ajeet ki us bakwaas se hai jo kahati hai ki electronic media ke logon ko dikhne ka lalch hai. ye galat hai. Electronic media ki wahaj se patrakarita mein Imandaari lauti hai. Ab khastore par electronic media mein khabaro ke prati jyaada imandari hai aur unhone patrakaro ki kharab image ko kafi haad tak theek kia hai.
Aur ajeet ji agar blur karana hai ho achchhe se kariye maharaj, computer hai, photoshop hai aur agar koi doosra software chhahiye to wo bhi istemaal keejiye but jo bhi kariye safai se kariye. Electronic media ko dosh dena band kariye kyonki politican n corruption ko jitna is media ne expose kiya hai kisi ne nahi kia. dhanyabaad
Take is easy.
Sanjay Kumar Singh
August 9, 2009 at 11:51 pm
दुनियां के सर्वाधिक बिकने वाले अखबार के प्रथम पृष्ट पर अच्छी भली फोटो की ऐसी तैसी करके उसे छपवा लेने और अपने इस लल्लूपने को काबिलियत समझने वाले इस वरिष्ठ फोटोग्राफर को पत्रकारिता की तमीज तो नहीं ही है फोटोग्राफी की भी समझ है इसपर मुझे शक है.
उसपर नंगई ये की आगे भी करूँगा. महान हैं जागरण वाले जो ऐसे – ऐसे को रख लेते हैं और पूरी नंगई करने की छूट देते हैं. जब ऐसे पात्र हों तो समरेन्द्र जी आप और हम किसी भी विषय पर बहस चला कर और बंद करके क्या कर लेंगे.
मान्यवर ने खुद लिखा है, हंगामा इसलिये नहीं हैं कि मैंने चेहरा ब्लर क्यों किया। हंगामा इस बात को लेकर क्योंकि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इस पर टिप्प्णी कर दी। अगर मुख्यमंत्री ने टिप्प्णी नहीं की होती तो इसको लेकर इतना हंगामा नहीं होता। फिर भी भाई जी को ये नहीं समझ आ रहा है की उन्होंने क्या किया है. भगवान उन्हें वरिष्ट बनाये रखे.
प्रतीक
August 10, 2009 at 7:06 pm
samrendra ji
kya aap sirf prakash ke favour wala comment hi show kar rahe hain. ye apki neeyat ko saaf kar raha hai. maine 2 comment kiye the jisme prakash ki puri kahani thi. hairanee is baat ki hai ki aap us comment ko show nahi kar rahe. agar prakash kumar ka P R O hi banna hai to band kijiye tamasha.
समरेंद्र
August 10, 2009 at 7:25 pm
पहले तो आप नाम बदल बदल कर कमेंट करना बंद करें। आपने जिस ई-मेल आईडी से टिप्पणी की है उसमें आपका नाम लिखा है amitesh और आपने अपना नाम लिखा है प्रतीक। उसके बाद दूसरा काम यह करें कि गाली देना बंद करें। यहां गाली नहीं छापी जाएगी। चाहे वो गाली किसी के ख़िलाफ़ भी क्यों न हो। आप कमेंट बॉक्स में देखिए आपने जिस तरह प्रकाश की कमर के नीचे हमला किया है ठीक वैसे ही कुछ लोगों ने शैलेंद्र दीक्षित की कमर के नीचे हमला किया था… हमने उन्हें नहीं छापा तो आपकी ही तरह उन्होंने भी एतराज जताया है। अगर आप शालीन तरीके से अपनी बात कहेंगे तो हम उसे रोकेंगे नहीं।
प्रतीक
August 13, 2009 at 10:14 pm
ऐसा है..मेरा नाम सही है या गलत इसका फैसला 40 साल पहले मेरे मां बाप ने कर दिया था। हमारे नाम से हमारा इमेल आईडी मैच नहीं खा रहा ये ये कत्तई नहीं बताता कि मैं झूठे नाम से लिख रहा हूं। आप अपना ग्यान ऐसे ओछे मसलों पर ही बांटे तो बेहतर है। मैंने बस ब्लॉग पर देखा तो कमेंट कर दिया। मेंरा इस तुच्चे से प्रकरण से कोई लेना देना नहीं है। लेकिन ईश्वर से इतनी प्रार्थना जरूर कर रहा हूं कि आपके मकसद को नाकामयाब कर आपको कठोर दंड दे। कुछ इतना कि आप दूसरों पर बेवजह कीचड़ उछालने का पूरा मचा चख लें।
विनीत कुमार
August 9, 2009 at 11:59 pm
जो भी कीजिए सफाई से कीजिए,इस बात से सहमति है।..
राजेश पांडे
August 10, 2009 at 8:02 pm
समरेंद्र,
यह भी सही है। तुम जब चाहो बहस शुरू करो और जब चाहे ख़त्म कर दो। तुम्हारी साइट है और तुम्हारे जो मन में आए करो। लेकिन ऐसा होता नहीं है। कायदे से अभी तो बहस शुरू होनी चाहिए। अब तो जागरण के एक बंदे ने ये मान लिया है कि प्रकाश कुमार का फोटो गलती से नहीं बल्कि जानबूझ कर ब्लर किया गया है। फोटोग्राफर की इस पूरी चिच्ठी को पढ़ने के बाद एक सवाल उठ रहा है। अगर उस फोटोग्राफर की भाषा इतनी ही अच्छी है तो उसे दैनिक जागरण के संपादक ने अब तक वरिष्ठ संवाददाता क्यों नहीं बना दिया? मुझे तो ऐसा लगता है कि ये चिट्ठी उसने लिखी नहीं बल्कि उससे लिखवाई गई है। तभी तो वो इतने ठसक से यह कह रहा है कि आगे भी ऐसा ही करेगा। कोई भी शख़्स ऐसा तभी कह सकता है जब कंपनी उसकी हो या फिर कंपनी पर जिसका भी नियंत्रण हो वो उसका हो। इसलिए मुझे तो ऐसा लग रहा है कि फोटोग्राफर को बलि का बकरा बनाया गया है। इस चिट्ठी के पीछे “दिमाग” किसी और का है।
Shravan Kumar
August 10, 2009 at 9:36 pm
अजीत जी का यह पत्र उनका लिखा नहीं है औऱ फर्जी है। यह उनके नाम का बेजा इस्तेमाल है और किसी बड़े को बदनामी से बचाने के लिए इस सीधेसादे व्यक्ति को इस प्रकरण में बलि का बकरा बनाया गया है। अजीत तो फोटो खींचकर आते हैं तो चुपचाप किसी खाली कंप्यूटर टर्मिनल पर बैठकर सारे फोटो फाइल में डाउनलोड करते हैं और फिर अगले फोटो सेशन के लिए निकल पड़ते हैं। फोटो को कांट-छांट, एडिट आद् करने का काम तो जागरण में हमेशा स्कैनिंग विभाग के लोग करते हैं। अजीत फोटोशाप पर काम नहीं करते। अब जब संपादक शेलेंद्र दीक्षित अपना करना पर फंस रहे हैं और बाहर उनकी फजीहत हो रही है तो बेचारे अजीत को बलि का बकरा बना दिया गया. यहां भी राजनीति हुई है। संस्थान के एक दूसरे फोटोग्राफर श्याम जो अजीत से वरिष्ठ हैं, को बलि का बकरा नहीं बनाया गया क्योंकि वे संपादक और अखबार मालिक के शहर कानपुर के हैं। अजीत के नाम और इ-मेल आईडी का इस्तेमाल कर जनतंत्र को यह चिट्ठी लिखवाई गई ताकि शैलंद्र दीक्षित को साफ बचा लिया जाए। और अजीत के मुंह से कहलवाया जा रहा है कि वे तो अब तक चुपचाप देख रहे थे कि बहस किस दिशा में जा रही है। जो काम अजीत कभी भी नहीं करते वह उनके मत्थे डाल दिया गया और जिनने किया-काराया उनकी रक्षा की गई।