बाजार के पैरोकार प्रधानमंत्री शनिवार को सरोकार की बात कर रहे थे। सूखे से सूखते खेत पर राज्यों के मुख्य सचिवों के साथ घंटो माथापच्ची की। अब प्रधानमंत्री चिंतित हों तो अखबारों में उसे पहली खबर होनी ही चाहिए। कई अखबारों में हुई भी। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने आश्वस्त किया कि वह लोगों को भूखा नहीं मरने देंगे। इस साल मॉनसून की ममता नहीं बरसी तो क्या हुआ, बीते दो साल में इतना अनाज उपज चुका है कि कोई पेट अन्न के लिए तरसेगा नहीं। उन्होंने राज्यों को निर्देश दिया कि राशन प्रणाली दुरुस्त करो, कालाबाजारी और जमाखोरी पर नकेल कसो। प्रधानमंत्री एक बड़े अर्थशास्त्री भी हैं, लिहाजा आंकड़ेबाजी तो होनी ही थी। लेकिन सबसे बड़ी बात प्रधानमंत्री ने यह कहा कि आम आदमी को बाजार की दया पर नहीं छोड़ा जाएगा। क्या बाजार दया भी करता है?
बाजार मुनाफे के बल पर उछलता है और मुनाफा हर चीज की कीमत वसूल कर तैयार किया जाता है। अब वह बाजार आम आदमी को कहां छोड़ता है। मनमोहन सिंह की ही पिछली सरकार के दौरान मशहूर अर्थशास्त्री अर्जुन सेनगुप्ता की अगुवाई में बनी एक समिति ने ये आंकलन दिया था कि देश में करीब 84 करोड़ लोगों की रोजाना कमाई 20 रुपये है। अब सरकार लोगों को बाजार की दया से बचाने की बात भले करे लेकिन सवाल उठता है कि 20 रुपये रोज में कोई क्या कर सकता है? फिर उस 84 करोड़ अभागों में सबसे ज्यादा तादाद किसानों की है। अगर यही स्थिति रही तो फिर दिन पर दिन बदहाली की तरफ बढ़ रहे किसानों का क्या होगा? बाजार की मार से उन्हें कैसे बचाया जाएगा? जिन कृषि उत्पादों की कीमत आसमान छू रही है, उनपर भी किसानों को वाजिब दाम नहीं मिलता। बीच में दलाल और मुनाफाखोर कीमत की मलाई चाट जाते हैं। क्या सरकार इतनी मासूम है कि उसे यह सब पता नहीं होता? या फिर सरकार में बैठे लोगों की आंखों पर मुनाफे में हिस्सेदारी की जो पट्टी बंधी है, वह उन्हें कुछ और देखने नहीं देती?
प्रधानमंत्री का खेती से कोई वास्ता कभी रहा नहीं। गांव में जरूर पले बढ़े लेकिन मन-मस्तिष्क न्यूयॉर्क से नीचे उतरना नहीं चाहता। नहीं तो इस बात से उनकी रात की नींद उड़ जानी चाहिए कि किसान अब खेती करना नहीं चाहते। कोई अपने हाथों ही अपनी मौत का परवाना क्यों बोएगा? एक सरकारी सर्वे के मुताबिक ही देश में करीब चालीस फीसदी किसान खेती छोड़ना चाहते हैं। उसकी जगह शहर में किसी दफ्तर या किसी फैक्टरी का गार्ड बनना उन्हें मंजूर है।
ये सब अनायास नहीं हुआ है। अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री और उनके सहयोगी तो जीडीपी की ही बोली ज्यादा बोलते हैं। उसके आंकड़े ही यह खतरनाक गवाही देते हैं कि 1960 में जहां जीडीपी में खेती की हिस्सेदारी 46 फीसदी थी, वह आज घटकर 20 फीसदी हो गयी है। इसमें भी बीते बीस साल में सबसे ज्यादा गिरावट हुई है, जबसे बाजार ही इस देश का कर्णधार बन गया। अब उसी बाजार से प्रधानमंत्री आम लोगों को बचाने की बात करते हैं। वाह रे शब्दों की बाजीगरी!
इंद्र देवता नाराज हैं, सरकारें चिंता जताकर अपना कर्तव्य पूरा कर लेती हैं, बाजार का काला चेहरा किसी को दिखता नहीं कि कैसे कालाबाजारी चल रही है और महंगाई के मूल में उसका बड़ा हाथ है। ऐसे में किसानों के पास क्या उपाय बचता है? वो तो खेती से खुद को दूर करना ही चाहेंगे। ऐसे में याद आती है मुंशी प्रेमचंद की कहानी पूस की रात। कहानी का मूल भाव यह है कि पूस की कड़ाके की ठंड वाली रात में कर्ज से दबा एक किसान देखता है कि उसकी फसल में किसी ने आग लगा दी है। एक पल के लिए तो वह सहमता है, फिर खुश होता है कि चलो अब ठंड में खेत पर तो नहीं सोना पड़ेगा। थोड़ा बदलकर देखें तो आज का किसान भी ऐसे हालात में खेती से कतराता है तो इसलिए कि चलो, अपने हाथों ही अपनी मौत और बर्बादी की फसल तो नहीं उगानी पड़ेगी। किसान निराश होकर ऐसा सोचता है और सरकार बाजार की मुठ्ठी में कैद होकर सोचती है कि खेती, तेरा नाश हो!
विचित्र मणि टेलीविजन में वरिष्ठ पत्रकार हैं
Archana
August 10, 2009 at 1:09 pm
Insaan ki sabse badi jarurat Bhojan hai, isake bagair jeevan ki kalpana bhi nahin ki ja sakti…. yeh vidambana hi hai ki hamein bhojan dekar jeevan dene waale kisaan hi iss krishi pradhaan desh mein sabse jyada upekshit hai.Aapke iss lekh se shayad kuchh budhhijivion ki aankh khule aur woh kisanon ke kalyan ke liye bhi ek bahas chheden….. taaki kisan kheti se mooh na moden aur hamein do waqt ka anaaz milta rahe.
GOOGEL SPEEDY CASH
August 10, 2009 at 4:17 pm
hey bhut accha likah ha me kay kahu mere pass to sab bhi nahi
रंगनाथ सिंह
August 10, 2009 at 5:44 pm
अभी तक आपने जो भी खबरें लगाई हैं उससे पत्रकारों के प्रति एक विश्वास बढ़ता है।
अनिकेत
August 11, 2009 at 10:40 am
आपने अपने लेख में बेहद ज़रूरी मुद्दा उठाया है। आपका हस्तक्षेप इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि अब खेती और किसानों की बदहाली का मुद्दा मीडिया की बहसों से ग़ायब ही हो गया है, खासतौर पर हिंदी मीडिया में तो इस मसले पर कोई गंभीर बात नहीं होती। “जनतंत्र” ने एक अच्छा काम ये किया है कि राष्ट्रीय सहारा के परिशिष्ट “हस्तक्षेप” से जुड़े आप जैसे लेखक को फिर से सक्रिय कर दिया है। वरना टीवी की पत्रकारिता ने तो आपकी सारी प्रतिभा को जैसे लील लिया था। हिंदी को भी एक पी. साईनाथ की ज़रूरत है। देखें कौन बनता है?
लाल सन्त कुमार नाथ शाहदेव
August 31, 2009 at 5:24 pm
प्रधानमन्त्री जी को झारखण्ड आकर यहाँ भुख से मरते गरीबों को देखना चाहीए। जहाँ इन मौतों को बिमारी से हूई मौत साबित करने मे ही समय गँवाया जा रहा है, कोई सार्थक पहल नहीं हो रही है। और यह सब उस रज्य मे हो रहा है, जहाँ के भुतपूर्व मंत्रीयों के पास कडोडों रूपये अवैध कमाई के पाये गये हैं, जिसमे निश्चित रूप से उन मरने वालों का भी हिस्सा होगा।