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कोई अख़बार जवाब भी नहीं देता, बेशर्मी की हद है!

सियासतदानों और नौकरशाहों की बेशर्मी तो हमने और आपने बहुत देखी है। संसद से सड़क तक उनकी बेशर्मी के उदाहरण मिल जाएंगे। लेकिन अब मीडिया भी बेशर्मों की इस जमात में शामिल हो गया है। जनसत्ता में इस बार वरिष्ठ पत्रकार प्रभाष जोशी ने मीडिया की इसी बेशर्मी से पर्दा उठाया है। उन्होंने कहा है कि चुनाव के दौरान ख़बरों का सौदा करने वाले अख़बार अपने अपराधों पर कोई बहस भी नहीं करना चाहते। प्रभाष जी ने अख़बारों की आलोचना के साथ साइबर स्पेस पर सक्रिय पत्रकारों की तारीफ़ भी की है। उन सभी से प्रभाष जी की अपील है कि वो इस बहस को ज़िंदा रखें। बहस जारी रही तो नए रास्ते भी खुलेंगे। जनसत्ता से साभार हम प्रभाष जोशी जी का ये लेख आपके बीच रख रहे हैं। आप भी पढ़िये और अपनी प्रतिक्रिया दीजिए।


पटना में इस बार एक नए पाठक मिले। नए तो वे मेरे लिए हैं। नहीं तो उमर और अनुभव में तो वे मुझसे भी पुराने हैं। बिहार चैंबर्स ऑफ कॉमर्स के अध्यक्ष रह चुके हैं। युगेश्वर पांडेय। कहने आए थे कि पिछले लोकसभा चुनाव में अखबारों ने खबरें बेचने का जो काला धंधा किया उसका भंडाफोड़ कर के मैंने अपना पत्रकारीय धर्म निभाया है। जहां भी जाता हूं ऐसा कह कर हौसला बढ़ाने वाले आते हैं। लेकिन पांडेय जी जाते जाते कह गए- देखिए आपने नाम लेकर उदाहरण देकर इतना सीधा-सीधा और सख्त लिखा। लेकिन क्या बेशर्मी है कि किसी ने पलट कर कोई जवाब नहीं दिया। सब चुप्पी साध गए हैं।

वे गए और दूसरों से भी मिलना-जुलना पूरा हुआ तो यह जो बात अटकी हुई थी, उभर कर सामने आई। सच, किसी ने कोई जवाब नहीं दिया। ऐसा करना सही है या गलत इस पर तो कोई बहस नहीं हुई। किसी ने पलट कर जवाबी हमला भी नहीं किया। इसकी उम्मीद तो मैं भी कर रहा था कि कोई तो तिलमिला कर टूट पड़ेगा। लेकिन नहीं, एक भी बंपर पर किसी ने हुक या पुल नहीं मारा। सब डक कर गए। न बहस, न निंदा, न भर्त्सना, चारों तरफ चुप्पी।

लेकिन नेट पर कहते हैं बड़ी घमासान हुई। अपने जवान दोस्त जो नेट को अपनी अभिव्यक्ति का बड़ा पैशनेट माध्यम बनाए हुए हैं, बता रहे थे कि महीने भर वहां खूब गुत्थमगुत्था हुई। किसी ने पहला लेख उठा कर नेट पर डाल दिया था। उस पर पक्ष और विपक्ष में खूब लिखा गया। धीरे-धीरे चारों लेख नेट पर चढ़े और कहते हैं अब भी चढ़े हुए हैं, हालांकि बहस की सघनता कम हुई हैं। मैं तो आप जानते हैं कंपयूटर पर नहीं बैठता। नेट से अपने कामकाज करना तो दूर कोई साइट खोल कर देखता भी नहीं हूं। रोज ही कोई न कोई कहता है कि हमने ई-मेल पर आपको यह भेजा है। मैं बच्चों से नहीं कहता कि वे डाउनलोड करके प्रिंट आउट निकाल दें। सिर्फ यात्रा के टिकट निकलवाता हूं। उसमें भी माधव ने एक बार जाने के बजाय लौटने का टिकट थमा दिया। वह तो बोर्डिंग पास देने वाली कन्या ने मदद की और अपन विमान में बैठ सके।

अपनी कंप्यूटर निरक्षरता पर न मुझे शर्म है न गर्व। जिन औजारों का इस्तेमाल करते हुए मैंने पढ़ना-लिखना और सोच-विचार करना सीखा और उनसे जो हथियार विकसित किए उन्हीं का उपयोग मेरी आदत में है। मुझे जरूरी नहीं लगता कि उन्हें छोड़ कर या उनके साथ-साथ नए उपकरणों से काम करूं। जो जितनी सहजता से आपको सधता है उसी से काम करना चाहिए। इसलिए अपने जवान और नेट पारंगत दोस्तों से माफी मांग लेता हूं। ऐसा भी कभी लगा नहीं कि विज्ञापनों को खबरें बना कर बेचने के काले धंधे पर जो भी बहस हुई उसे छपवा कर पढ़ लूं। टीवी की बहस भी मुझे गंभीर नहीं लगती, हालांकि उसमें शामिल हो जाता हूं। यह शायद कोई साठ साल से अखबारों को पढ़ने की आदत के कारण हुआ है कि किसी भी बहस के लिए पहले अखबार देखता हूं। फिर पत्रिकाएं और फिर किताबें।

फिर यह बताइए कि किया यह अखबारों ने, जिनका काम था कि वे अपनी तरफ से और पूरी तैयारी और जिम्मेदारी के साथ लोकसभा चुनाव में अपने पाठकों/ ग्राहकों/ वोटरों को सच्ची जानकारी देते और उन्हें अपना ठीक फैसला करने में सभी तरह के अभिमतों से परिचित करवाते। किसी भी लोकतंत्र की स्वतंत्र प्रेस से यह पहली और अनिवार्य अपेक्षा होती है। लेकिन बिना स्वस्थ और जीवंत लोकतंत्र के टिक न सकने वाली स्वतंत्र प्रेस ने अपनी यह जिम्मेदारी छोड़ कर खबरों के भेस में उम्मीदवारों के प्रचार और विज्ञापनों को दो नंबर का पैसा लेकर छाप दिया। पाठकों को बताया तक नहीं कि ये हमारी खबरें नहीं उम्मीदवार का प्रचार है। इस धोखाधड़ी से अखबारों ने न सिर्फ अपने पाठकों के सूचना पाने के बुनियादी अधिकार को झुठलाया, लोकतंत्र के प्रति अपनी पहली जिम्मेदारी से भी मुंह मोड़ लिया। वे राजनीति के भ्रष्टाचार में खुद ही शामिल हो गए तो उस पर निगरानी क्या करेंगे? उसका भंड़ाफोड़ क्या करेंगे? और करेंगे भी तो उसका असर क्या होगा? उनकी विश्वसनीयता क्या रह गई है?

अखबार अगर लोकतंत्र में सार्वजनिक बहस के मंच हैं तो अपने ही किए-धरे पर बहस उन्हीं को करना चाहिए या नेट पर होनी चाहिए? सब अखबारों के नेट संस्करण हैं, लेकिन इस मामले पर बहस में तो उनने कोई शिरकत नहीं की। बहस पत्रकारों और नागरिकों ने की। कुछ पाठक भी शामिल हुए। लेकिन जिन अखबारों ने यह किया वे बहस से दूर चुप्पी साधे रहे। अब भी चुप हैं। क्या यह कोई निजी व्यावसायिक मामला है, जो सार्वजनिक बहस के लिए खुला नहीं है? क्या इस पर सिर्फ व्यावसायिक कसौटियां लागू की जा सकती हैं और वे भी किसी भी तरह से पैसा बनाने और लाभ कमाने के तौर तरीकों की? अखबारों के व्यवसाय में पत्रकारिता की कोई कसौटी ही न हो तो क्या उसे आप लोकतंत्र की जिम्मेदार लोकसेवा का दर्जा दे सकते हैं? और नहीं दे सकते तो यह स्वतंत्र, निष्पक्ष और जिम्मेदार प्रेस और उसके चौथे स्तंभ होने की लंबी चौड़ी बातें किसलिए हैं? गरिमामयी खानापूरी के लिए या अपने लोकतांत्रिक जीवन में उसका कोई वास्तविक स्थान और महत्त्व भी है?

जाहिर है कि अखबार इस पर कोई सार्वजनिक बहस नहीं करना चाहते कि उनने लोकसभा चुनाव जैसे अत्यंत महत्त्वपूर्ण और निर्णायक अवसर पर चुनाव की खबरों के नाम पर उम्मीदवारों और पार्टियों के प्रचार को खबर बना कर बेचा। और यह खरीद-बिक्री भी काले धन से की गई, ताकि न तो उम्मीदवार को उसे अपने चुनाव खर्च में डालना पड़े, न अखबारों को खबर की जगह बेचने का कोई हिसाब-किताब रखना पड़े। अखबारों का तो काम ही भ्रष्ट तौर-तरीकों की सही खबर लेकर उन्हें रोकने में चुनाव आयोग और इस तरह कुल लोकतंत्र की मदद करना है। वे इस भ्रष्ट आचार में राजनीतिकों के साथ शामिल कैसे हो सकते हैं? वे कोई सिर्फ छापाखाने तो नहीं हैं, जो पैसा देकर जो भी छपवाना चाहे छापते रहें। वे अखबार इसीलिए हैं कि लोकहित में अपने स्वतंत्र बुद्धि-विवेक का इस्तेमाल करते हैं।

चुनाव में उम्मीदवार के प्रचार को खबर बना कर और पैसे लेकर छापना अगर उचित पत्रकारीय काम है तो वे कहें कि हां है और उसे लोकहित और लोकतंत्र में सही बता कर साबित करें। उसकी जिम्मेदारी लें। आप पाएंगे कि लगभग सभी ने यह किया है और कोई भी छाती ठोंक कर कहने को तैयार नहीं है कि हमने ठीक किया है। इसलिए इस पर अपने खुले लोकतंत्र और स्वतंत्र प्रेस में कोई बहस नहीं है। खुले लोकतंत्र ही नहीं, सभ्य समाज में भी बिना विचार-विमर्श के न कोई आचार-सदाचार बनता है न भ्रष्टाचार बता कर खारिज किया जाता है। संसद से हम अपने लोकतंत्र का काम इसीलिए चलाते हैं कि वहां विचार और विमर्श होता है। लेकिन ऐसा हमारा हाल है कि न तो हमारे न्यायाधीश सूचना के जन अधिकार के तहत अपनी संपत्ति की जानकारी देना चाहते हैं न अपने अखबार विज्ञापन को खबर बना कर बेचने के काले धंधे की खबर छापने को राजी होते हैं।

जब से यह मामला सार्वजनिक बहस का मुद्दा बना है, सबसे सक्रिय पत्रकार रहे हैं ज्यादातर नए और जवान पत्रकार। पिछले चार महीनों में जहां भी मैं गया और इस मामले पर बोला सबसे उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया इन्हीं नए और जवान पत्रकारों की रही है। यह भी हुआ है कि हर सभा-सेमिनार और विमर्श में एकाध संपादक बोला है कि अब जमाना बदल गया है। अखबार मालिक का होता है। मालिक दूसरे अखबारों से होड़ में है। इसने पूंजी लगाई है। वह कमाई नहीं करेगा तो पत्रकारों को तनखा कहां से मिलेगी? कमाई कैसे करना है यह तो मालिक तय करेगा, जिसे अखबार में काम करना हो करे नहीं तो साधु हो जाए। अखबार तो एक प्रॉडक्ट है, उसी की तरह बने और बिकेगा। ऊंचे आर्दशों की बात करना पाखंड है। मालिक कमाएगा, आप भी कमाइए-खाइए। नौकरी करने आए हैं- समाज सेवा या धर्म प्रचार करने नहीं।

ऐसे संपादक प्रवक्ताओं को पत्रकार ही हल्ला करके चुप करा देते हैं। वे नाराज हो कर जाते हैं और बाद के वक्ताओं को सुनने का उनके पास न समय होता है न धीरज। बाद में पत्रकार ही आपको बताते हैं कि कौन अपने मालिक का प्रधान जनसंपर्क अधिकारी है। किन नेताओं और पार्टियों को पटा कर उनने अपने मालिक के क्या क्या काम करवाए हैं। कहां उनका खुद का फार्म हाउस है। कितनी कीमती कारें हैं। कितने शहरों में फ्लैट हैं। कितनी कंपनियों के शेयर हैं और बैंक में कितने खाते हैं। उनके पत्रकारीय कौशल और उपलब्धियों की बात कोई नहीं करता। ये लोग कमाने-धमाने और बेहतर जीवन शैली को ठीक बताएं यह तो समझ में आता है। लेकिन पत्रकारिता को सारे वैचारिक, नैतिक और सदाचारी सरोकारों से मुक्त करना नए और जवान पत्रकारों के भी गले नहीं उतरता, जो सधुक्कड़ी करने के लिए पत्रकारिता में नहीं आए हैं। कोई कहेगा कि अभी आए आए हैं, इसलिए ऐसी बात करते हैं। घिस घिस के सालिगराम हो जाएंगे। शायद हो जाएंगे। लेकिन क्या हमारे समाज का धर्म अपने जवान लोगों को आदर्शों से स्खलित और वंचित करना है? कौन समाज ऐसा करके अपने को उठाए रख सकता है?

खबरों के पैकेज के काले धंधे पर सार्वजनिक बहस न होने का एक कारण यह भी है कि हमारे राजनेता और जो लोग जनता के प्रतिनिधि बन कर आए हैं उनके भी पांव इसमें फंसे हुए हैं। नौकरशाहों, पूंजीपतियों और राजनेताओं की मिलीभगत की बातें बरसों से होती हैं। अब अगर मीडिया भी इसमें शामिल हो गया तो हानि लोकतंत्र की होगी। इसलिए बहस जारी रखिए!

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4 Responses to कोई अख़बार जवाब भी नहीं देता, बेशर्मी की हद है!

  1. रंगनाथ सिंह Reply

    August 11, 2009 at 3:29 am

    प्रभाष जोशी भी तो जवाब नहीं देते ?

    समरेन्द्र आप ने जब जनतंत्र पर प्रभाष जोशी का पहला लेख लगाया था तो कई ऐसी टिप्पणिपयां आई थी जिनमंे पाठकों ने प्रभाष जोशी से स्पष्टीकरण मांगा था। आप अपने उस वक्त के जवाब को देख लें मैं उन्हें कोट नहीं करना चाहता। प्रभाष जोशी के जनसत्ता में आए लेख से साफ जाहिर हो गया है कि उन्हें इंटरनेट की दुनिया में होने वाली बहसों की खबर है।

    जनतंत्र पर प्रभात खबर और हरिवंश पर जो लंबी बहस चली उस मुद्दे के मूल में प्रभाष जोशी का वही लेख है।

    अतः जनतंत्र को यह स्पष्ट करना चाहिए कि जनतंत्र पर प्रभाष जोशी के हरिवंश और प्रभात खबर को लेकर किए गए पक्षपात पर पाठकों की जो आपत्तियाँ थीं उस पर प्रभाष जोशी का क्या कहना है ?

    यदि जनतंत्र प्रभाष जोशी के विचार पाठकों तक पहुँचा सकता है तो उसे पाठकों को लोकतांत्रिक अधिकारों का खयाल रखना चाहिए। यदि यह संवाद एक तरफा है तो हमें पूरा अधिकार है कि हम जनतंत्र से अपनी आपत्ति दर्ज कराएं।

  2. समता भारती Reply

    August 11, 2009 at 2:03 pm

    रंगनाथ जी ने सही सवाल रखा है कि प्रभाष जी भी अपने लेख पर उठे सवालों का जवाब नहीं देते। लेकिन प्रभाष जी के लेख उपलब्ध कराने के लिए मैं ‘जनतंत्र’ को धन्यवाद देना चाहती हूं क्योंकि ‘जनसत्ता’ मैं नहीं मंगाती और मेरे जैसे सैकड़ों पाठकों के लिए प्रभाष जी के लेख ‘जनतंत्र’ पर उपलब्ध हों तो यह खुशी की बात है। इसलिए रंगनाथ जी द्वारा तथाकथित ‘एकतरफा संवाद’ के लिए जनतंत्र के प्रति आपत्ति दर्ज कराने के आह्वान से मैं सहमत नहीं हूं। इसके बदले मैं सुझाव देना चाहूंगी कि प्रभाष जी को पूरी बहस की जानकारी देते हुए उनसे जवाब लेने या दोतरफा संवाद के लिए ‘जनतंत्र’ के पाठकों की ओर से जनतंत्र के संपादक स्वयं पहल करें।
    जैसा कि प्रभाष जी ने अपनी टिप्पणी में लिखा है कि वह इंटरनेट नहीं देखते। हालांकि उन्हें इस पूरी बहस की जानकारी मिली है। प्रभाष जी के शब्दों में-
    ”………नेट पर कहते हैं बड़ी घमासान हुई। अपने जवान दोस्त जो नेट को अपनी अभिव्यक्ति का बड़ा पैशनेट माध्यम बनाए हुए हैं, बता रहे थे कि महीने भर वहां खूब गुत्थमगुत्था हुई। किसी ने पहला लेख उठा कर नेट पर डाल दिया था। उस पर पक्ष और विपक्ष में खूब लिखा गया। धीरे-धीरे चारों लेख नेट पर चढ़े और कहते हैं अब भी चढ़े हुए हैं, हालांकि बहस की सघनता कम हुई हैं। मैं तो आप जानते हैं कंपयूटर पर नहीं बैठता। नेट से अपने कामकाज करना तो दूर कोई साइट खोल कर देखता भी नहीं हूं।……
    ”…..अपनी कंप्यूटर निरक्षरता पर न मुझे शर्म है न गर्व। जिन औजारों का इस्तेमाल करते हुए मैंने पढ़ना-लिखना और सोच-विचार करना सीखा और उनसे जो हथियार विकसित किए उन्हीं का उपयोग मेरी आदत में है। ……. इसलिए अपने जवान और नेट पारंगत दोस्तों से माफी मांग लेता हूं। ऐसा भी कभी लगा नहीं कि विज्ञापनों को खबरें बना कर बेचने के काले धंधे पर जो भी बहस हुई उसे छपवा कर पढ़ लूं।……..”

    इससे यह स्पष्ट है कि प्रभाष जी को नेट पर या कहें तो जनतंत्र पर हुई बहस के बारे में पता तो चला है लेकिन अपनी कंप्यूटर निरक्षरता के कारण वह इसे पढ़ नहीं सके हैं। हालांकि यहां उनसे किसी ने यह मांग नहीं कि है कि वह कंप्यूटर या इंटरनेट पर खुद ही बैठें और कंप्यूटर साक्षर हों। वह अनावश्यक ही बहस को पत्रकारिता की गिरावट के बिंदु से भटकाकर इंटरनेट का उपयोग स्वयं करने या न करने पर केंद्रित करके उलझा रहे हैं। वह निरक्षर रहते हुए भी इंटरनेट पर हुई बहस के प्रिंटआउट लेकर उस पर अपनी प्रतिक्रिया की पांडुलिपि डाक द्वारा भेज सकते थे या किसी से टाइप कराकर जनतंत्र को मेल कर सकते थे। प्रभाष जी ने इंटरनेट पर हुई जिस घमासान को सुना] वह उनके लेख और उनके सरोकारों से जुड़े विषय पर ही हुई है। उन्हें यह भी मालूम है कि उनके चारों लेख अब भी नेट पर चढ़े हुए है।
    प्रभाष जी ने लिखा है कि नेट पर बहस की सघनता कम हुई है। इसका कारण तो यही है कि प्रभाष जी ने एकतरफा चुप्पी साध ली है। अगर वह दोतरफा संवाद को आगे बढ़ायें तो वह सघनता सार्थक रूप से आगे बढ़ सकती है। प्रभाष जी हिंदी पत्रकारिता में आधुनिक विचारों के प्रतिनिधि माने जाते हैं। उनके द्वारा इंटरनेट पर हुई बहस को इस कदर तिरस्कार के भाव से देखा जाना शोभा नहीं देता। उन्हें चाहिए कि किसी से प्रिंट आउट निकलवा कर पूरी बहस को पढ़ लें और जरूरी समझें तो उनके लेख पर उठे सवालों को जवाब दें।
    मैं जनतंत्र के संपादक से आग्रह करना चाहूंगी कि पहले और अब की पूरी बहस का प्रिंटआउट निकालकर प्रभाष जी पास भेजते हुए उन्हें कागज पर छपे हुए शब्दों के रूप में सारी चीजें उपलध कराने का कष्ट करें क्योंकि वह इसी के आदी है।
    इंटरनेट पर ब्लाग ने पहली बार पत्रकारिता पर खुली बहस का सार्थक माहौल उपलब्ध कराया है और जनतंत्र इतने कम समय में सार्थक संवाद का केंद्र बन गया है। आपसे आग्रह है कि ऐसी चीजें हमें उपलब्ध कराते रहें, भले ही रंगनाथ सिंह की नजर में यह एकतरफा संवाद हो, किसी की चुप्पी भी एक जवाब होती है। आप देखेंगे कि नयी टिप्पणी में प्रभाष जी ने अपनी गल्ती सुधार ली है। पिछली टिप्पणी में उन्होंने लिखा- ”……….हमारे मित्र हरिवंश ‘प्रभात खबर’ के प्रधान संपादक ही नहीं हैं, वे उसका पूरा प्रबंधन देखते हैं और वित्तीय व्यवस्था भी करते हैं। उनने पैसे लेकर खबरें छापने के काले धंधे के खिलाफ अपने अखबार में अभियान तो चलाया ही, पहले पेज पर ‘खबरों का धंधा’ शीर्षक से लेख भी लिखा…।”

    लेकिन इस बार प्रभाष जी की भाषा बदली हुई है। वह लिखते हैं- ”….. आप पाएंगे कि लगभग सभी ने यह किया है और कोई भी छाती ठोंक कर कहने को तैयार नहीं है कि हमने ठीक किया है। इसलिए इस पर अपने खुले लोकतंत्र और स्वतंत्र प्रेस में कोई बहस नहीं है।….”

    यानी इस बार उन्होंने एक मित्र को अपवाद बताने के बजाय लगभग लिखकर काम चला लिया है। यह भी दोतरफा संवाद ही है रंगनाथ जी। यह जनतंत्र की बहस के ही कारण संभव हुआ है।

  3. विद्रोही Reply

    August 13, 2009 at 4:08 pm

    इंटरनेट पर प्रभाष जी का ‘डेब्यू’ जरूर होना चाहिए। लेकिन जो लोग उनके लेख पढ़ना पसंद करते हैं, उन्हें जनसत्ता भी ज़रूर ख़रीदना चाहिए। और प्रभाष जी के लिखे पर अपनी प्रतिक्रियाएं वहां भी भेजनी चाहिए। दो-तरफा संवाद हो, नेटीजन और प्रिंटीजन के बीच।

  4. रंगनाथ सिंह Reply

    August 13, 2009 at 11:21 pm

    हम तो जनसत्ता ही पढ़ते हैं। जब से दिल्ली में हैं तभी से।

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