अगर एक अखबार किसी भी सरकारी नीति के खिलाफ आयोजित विरोध प्रदर्शन के प्रति इस हद तक आक्रामक हो जाए कि समाज से इसके विरुद्ध खड़ा होने का आह्वान करने लगे, तो अंदाजा लगाया जा सकता है कि उसके इस पक्ष के निहितार्थ क्या होंगे और एक अखबार जब खुलेआम एक पक्ष बन जाता है तो कितना बुरा हो सकता है। राजू रंजन जी ने अपने लेख में इस मसले पर काफी कुछ कह दिया है और वे ठीक कहते हैं कि दूसरों की अयोग्यता पर अंगुली उठाने वालों को पहले अपने गिरेबान में झांकना चाहिए।
उम्मीद की जानी चाहिए कि अपनी मांगों के लेकर नवनियुक्त शिक्षा मित्रों के आंदोलन के प्रति अपने घृणा-प्रदर्शन के बाद ‘प्रभात खबर’ को इस बात का अहसास हो कि उसने क्या किया है। ‘हे ईश्वर, इन्हें माफ करना, ये नहीं जानते कि ये क्या कर रहे हैं’- जैसा जुमला उछालने के तत्काल बाद इस अखबार में ‘दर्शक’ के नाम से प्रकाशित लंबे लेख में कहा जाता है कि इन शिक्षा मित्रों को नहीं पता कि बिहार का भविष्य इन्हें कभी माफ नहीं करेगा। जैसे कि ये बिहार के भविष्य के नियंता हों और उसमें इन्होंने शिक्षा मित्रों का प्रारब्ध तय कर दिया हो।
पिछले तीन सालों में बिहार में अपनी मांगों को लेकर आंदोलन करने वालों को क्या भुगतना पड़ रहा है, यह सभी जान और देख रहे हैं। किसी भी विरोध प्रदर्शन को लाठियों-फव्वारों या गोली के सहारे कुचल देना नीतीश सरकार की खासियत बन चुकी है। उसकी पुलिस शिक्षकों से लेकर ‘आशा’ कार्यकर्ताओं तक पर पूरी क्षमता से लाठियां बरसाती है। ऐसा कहने वालों से डरना चाहिए कि नीतीश कुमार और उनकी पुलिस बिल्कुल ठीक कर रही है।
यहीं एक और बात ध्यान में आती है कि नीतीश सरकार ने विरोध के दमन के लिए जरूरत के मुताबिक अगल-अलग तरीके या तो अख्तियार किए हैं या फिर ईजाद किए हैं। जहां लाठी-गोली से जरूरत हो, वहां बर्बरता की हद तक जाकर इनका इस्तेमाल, और जहां नीति-कूटनीति से काम चल जाए, वहां इसे मजबूरी के रूप में लाद दो। और बाजार के साथ चलने की मजबूरी का राग अलापने वाले बिहार के लगभग सभी अखबार और चैनलों ने सरकारी विज्ञापन के लिए नीतीश सरकार के सामने करीब-करीब समर्पण कर दिया है। हालांकि इसे केवल विज्ञापन और आर्थिक मुनाफे के लिए किए गए समर्पण के रूप में देखना कई और कड़वे सवालों को अनदेखा कर देना है। दरअसल, इसके गंभीर सामाजिक निहितार्थ हैं।
अगर केवल प्रभात खबर की बात की जाए तो नीतीश के ‘राग विकास’ में जुगलबंदी करते हुए इसने अपने मूल नारे ‘अखबार नहीं, आंदोलन’ को त्याग कर ‘बिहार जागे… देश आगे’ कर लिया है। हालांकि झारखंड में यह अब भी अपने पुराने नारे के साथ खड़ा है। क्या इसका मतलब यह है कि जहां की सत्ता और सरकार ‘कमजोर’ हो, वहां आंदोलन करो और जहां ‘प्रभुओं’ का शासन हो, वहां उसके साथ खड़े हो जाओ।
और इस हालत में अगर यह अखबार शिक्षा मित्रों को शिक्षा शत्रु कहते हुए घृणा से लिखता है कि ये शिक्षा मित्र गुटखा खाते हैं, पान खाते हैं, खैनी खाते हैं और फोकट का दारू पीते हैं, नकल करके परीक्षा पास की, आवारागर्दी करते रहे और अब जब नीतीश सरकार की मेहरबानी से टीचर की नौकरी मिल गई है तो एहसानफरामोशी करते हुए वेतन बढ़ाने की मांग कर रहे हैं और नीतीश कुमार को अपशब्द कह रहे हैं- तो आश्चर्य नहीं करना चाहिए। लेकिन इस वितंडे का क्या किया जाए कि किसी की नियुक्ति के बाद उसकी ‘योग्यता’ की परीक्षा लेने का पाखंड रचा जाता है। इसके लिए समाज को चुप्पी तोड़ने की गुहार लगाने वाले लोग क्या सभी सरकारी सेवकों की ‘योग्यता परीक्षा’ लेने का अभियान चलाएंगे? या फिर उनकी ‘स्वयंसिद्ध योग्यता’ बिहार या देश के लिए कोई समस्या नहीं है, जिसकी बुनियाद पर खड़ा बिहार प्रहसन के नए मानक गढ़ने में मशगूल है।
राजू रंजन ने सही पूछा है कि इस मानक से कितने पत्रकारों को देखा जाए। दारुबाजी तो पत्रकारों की एक विशेषता के रूप में देखा-माना जाता रहा है। पहले भी चलता था। लेकिन इन चुनावों में पतित पत्रकारिता के जो उदाहरण पेश किए गए, वे किस ‘योग्यता’ के नमूने थे? सफेद चादर के नीचे ‘सब कुछ’ करने वालों को किस नजरिए से देखा जाए?
याद रखा जाना चाहिए कि बिहार के मशहूर चारा घोटाले का खुलासा करने से लेकर बहुत सारे जनपक्षीय मुद्दों पर मुखर अभियान चलाने का श्रेय प्रभात खबर को मिलता रहा है। लालू-राबड़ी के ‘भ्रष्ट पंद्रह साल’ के दौरान भी इसने अपने ‘आंदोलन’ में कमी नहीं की। बिहार में यह उन ‘भ्रष्ट पंद्रह सालों’ से ‘मुक्ति’ का दौर है। स्वाभाविक रूप से नीतीश कुमार इस दौर के ‘नायक’ हैं। नीतीश से प्रभावित प्रभात खबर के संपादक आदरणीय हरिवंश जी एक साक्षात्कार में कहते हैं कि ‘पटेल के बाद एक और नेता जिनसे मैं प्रभावित हो रहा हूं, वह हैं नीतीश कुमार। उनको पसंद करने का पहला कारण, घर के किसी भी व्यक्ति का प्रशासन में हस्तक्षेप नहीं होने देना। …लालू प्रसाद, रामविलास पासवान का सारा खानदान और कुनबा की विधायक और सांसद था। … बिहार में पंद्रह सालों तक अपराधियों का आतंक था। …वह अपहरण की राजधानी था। …किसी को उम्मीद नहीं थी कि अपराधियों को नियंत्रित किया जा सकेगा। …कोई कॉन्ट्रैक्ट नहीं लेता था। बीस इंजीनियर्स, कॉन्ट्रैक्टर्स का अपहरण हो गया था और कितनों का मर्डर हो गया था। …आज किसी की हिम्मत नहीं पड़ती। आज एक अपराधी घबराता है, कोई हरकत करने से।’
‘ट्रांसफॉर्म्ड बिहार’ से अभिभूत दिल्ली में बैठे कुछ लोग कि बिहार की राजधानी पटना के सबसे व्यस्त एक्जीबीशन रोड पर सरेआम एक महिला को निर्वस्त्र कर भीड़ द्वारा नोचने-खसोटने या सीतामढ़ी में एक इंजीनियर योगेंद्र पांडेय की हत्या की कुछ ताजा खबरों को फिलहाल किनारे रख सकते हैं। जनता और मीडिया के बीच भ्रष्टाचार, अपराध और अपहरण के आतंक से मुक्ति की मुनादी करती नीतीश सरकार विधान सभा के ‘सुरक्षित’ हॉल में क्या कहती है, ये देखिए।
पिछले महीने के आखिर में विधान सभा में विपक्ष द्वारा घेरे जाने के बाद अपराध के आंकड़े सामने रखते हुए सरकार ने कहा कि अकेले 2008 में केवल महिलाओं के खिलाफ होने वाले अत्याचार के 4,415 मामले दर्ज किए गए, जिनमें 1,028 मामले बलात्कार और दुष्कर्म के थे और 902 मामले महिलाओं और लड़कियों के अपहरण के थे। इसके अलावा पिछले छह महीने में 1,571 हत्याएं, 37 फिरौती वसूलने, 346 डकैती, राहजनी की 80, लूट की 395 और बैंक लूट की एक घटना थाने में दर्ज की गई। ये सरकारी आंकड़े हैं। सबको मालूम है कि अत्याचार के कौन-कौन से रूप हमारे बीच मौजूद हैं और जितने होते हैं, उनमें के कितने मामले पुलिस थानों में दर्ज कराए जाते हैं। बहरहाल, राज्य के विपक्षी दल आरोप लगाते हैं कि ये आंकड़े पूरी तरह गलत हैं। विधायक गजेंद्र सिंह का कहना है कि सरकार कहती है कि बैंक लूट की केवल एक घटना हुई, जबकि सच्चाई यह है कि इस दौरान बैंक लूट की 84 वारदात हुई। इसके सबूत हैं।
अब बाकी आंकड़ों और इस तरह के प्रचार की सच्चाई का अंदाजा लगाया जा सकता है कि बिहार में आज अपराधी घबराता है कोई हरकत करने से। ‘विकास’ की नई ऊंचाइयों की ओर अग्रसर बिहार में अपराध के साथी के रूप में भ्रष्टाचार की कितनी नई परतें तैयार हुई हैं, इसके विश्लेषण के लिए इस सामाजिक व्यवस्था से अलग की ईमानदारी की जरूरत है।
रही बात परिवारवाद की, तो लालू प्रसाद या रामविलास पासवान जैसों का परिवारवाद तो सचमुच अनैतिक और समय और समाज के प्रति ऐतिहासिक बेईमानी है। लेकिन 2009 के आम चुनाव में कांग्रेस की जीत के बाद अखबारों ने कांग्रेस और राहुल गांधी की तारीफ में जिस तरह कसीदे काढ़े थे, सवाल है कि राहुल गांधी किस परंपरा से आते हैं? इस देश में नेहरू-इंदिरा के परिवारवाद या वंशवाद से बड़ा उदाहरण क्या कोई और होगा? लेकिन कांग्रेस के परिवारवाद से हमें अब तक कोई परेशानी क्यों नहीं होती और लालू या रामविलास का परिवारवाद से हम इतने असहज क्यों हो जाते हैं? क्या इसलिए कि लालू या रामविलास परिवारवाद निबाहते वक्त ब्राह्मणवादी ‘सॉफिस्टिकेटेड’ तरीके अपनाने के मामले में ‘पिछड़े’ हुए हैं, और हम इस परिवारवाद के न तो अभ्यस्त हैं और न यह हमारे सामाजिक सत्ता संतुलन के अनुकूल ठहरता है?
नीतीश कुमार परिवारवाद से दूर हैं। इससे अच्छी बात भारतीय समाज और राजनीति के लिए क्या हो सकती है? लेकिन यह कोई नए मानक गढ़ने जैसा नहीं है। असली परीक्षा वहां होनी चाहिए कि किसी व्यक्ति की राजनीति देश और समाज को किस दिशा में ले जा रही है। जिस ‘मित्र’ भाजपा की लाठी के सहारे नीतीश सत्ता में हैं, उसी के उनके ‘मित्र’ नेता नरेंद्र मोदी भी परिवारवाद से दूर हैं। (बिहार में चुनावों के दौरान नरेंद्र मोदी के साथ खड़े दिखने तक से बचने की सफल कोशिश के तुरंत बाद नीतीश लुधियाना में भाजपा की रैली में मंच पर नरेंद्र मोदी के हाथ से हाथ जोड़ कर ऊपर की उठा कर एकता दर्शा रहे थे) नरेंद्र मोदी की पार्टी भाजपा जिसके गर्भनाल से जुड़ी है, वह आरएसएस भी परिवारवाद के विरोधी सिद्धांतों पर चलता है। और मरते दम तक परिवारवाद से बचे रहने का एक और बड़ा उदाहरण है हिटलर…!!!
अनिकेत
August 11, 2009 at 12:27 pm
आपका लेख बिहार में नीतीश राज की चौतरफा तारीफों के बीच एक नई तस्वीर पेश करता है, सोचने के लिए विवश करता है।
सुधीर शर्मा
August 11, 2009 at 2:30 pm
भई जमाने बाद बिहार प्रगती की ओर अग्रसर है। आप लोगों को इस पर खुश होना चाहिए। नीतीश को श्रेय देना चाहिए। हरिवंश और प्रभात ख़बर सकारात्मक मीडिया की भूमिका निभा रहे हैं। उनको साधुवाद।
शशि सिंह
August 11, 2009 at 2:48 pm
माफी चाहूंगा, मगर शीर्षक पढ़ के जो उम्मीद जगी वो आलेख पढ़के पूरी नहीं हूई। आपके तर्क कमजोर और बातें लफ्फाजी लगी। एक बार फिर माफी चाहूंगा लेकिन एक पाठक के तौर पर मुझे यही महसूस हुआ कि आप सिर्फ विरोध के लिए विरोध कर रहे हैं।
aam admi
August 11, 2009 at 5:25 pm
कबीर जी,
जब नीतिश के ‘सुशासन’ का डंका चारो ओर जोर-शोर से बज रहा है, आपका यह लेख नए सिरे से सोचने को मजबूर करता है. सोचने की बात तो यह है कि क्या सिर्फ प्रचार के बूते ही विकास की धारा बहायी जायेगी बिहार में? आखिर कब तक यो ही छला जाता रहेगा बिहार?पहले, आज़ादी के बाद लगभग ४० बरसों तक कांग्रेस पार्टी के ‘सामंतों’ ने बिहार को बर्बाद किया. फिर,१५ बरसों तक एक ऐसे नेता द्वारा छला गया जिसके पास ऐतिहासिक मौका था इस गरीब राज्य को बदलने का. और अब, यह एक ऐसे नेता द्वारा ठगा जा रहा है जिसे जनता ने इस उम्मीद से सत्ता सौपी कि इस राज्य की तस्वीर और तकदीर, दोनों, बदले. मामले का सबसे दुखद पहलु तो यह है कि जिस मीडिया को इन सबके के खिलाफ आवाज़ उठानी थी वही अब ‘चारण’ बनकर इतरा रहा है और उपदेश झाड़ रहा है. कोई बात नहीं. उम्मीद करनी चाहिए कि जल्दी ही इन्ही ‘कारनामो’ के बोझ तले दबकर ऐसे ‘उपदेशक’ और ‘चारण’ टाइप मीडिया का अंत हो जायेगा.
RAHUL KUMAR SINGH
November 4, 2009 at 1:37 am
NITISH EK YUG PURUSH HAI ,LIKE MAHTMA GANDHI,ABRAHM LINKON,NELSON MANDELA.
BIHAR KE LIYE SILVER LINE HAI.
THANKS
RAHUL