
आंग सान सू ची
आंग सान सू ची 2003 से रंगून में झील किनारे बने अपने घर में नज़रबंद हैं। उनकी नज़रबंदी की मियाद इसी साल 27 मई को ख़त्म होने वाली थी। लेकिन उससे कुछ दिन पहले एक अमेरिकी नागरिक जॉन येताव तैर कर उनके घर पहुंच गया। आंग सान सू ची के घर से लौटने पर जब बर्मा की सेना ने येताव से पूछताछ की तो उसने सारी बात उगल दी। इससे सैन्य सरकार को आंग सान सू ची के ख़िलाफ़ मुक़दमा चलाने का बहाना मिल गया। उन पर नज़रबंदी की शर्तें तोड़ने का मुक़दमा चला गया। यूरोपीय देशों और अमेरिका के दबाव के बावजूद जुंटा सरकार ने अपना फ़ैसला नहीं बदला।
सू ची के ख़िलाफ़ मामले की पहली सुनवाई में अंतरराष्ट्रीय मीडिया को शिरकत करने की इजाज़त दी गई। लेकिन उसके बाद फिर से पहरा बिठा दिया गया। अदालत में सू ची ने बताया कि उन्हें नहीं मालूम था कि कोई झील तैर कर उनसे मिलने पहुंचा है। इसकी जानकारी अगले दिन उन्हें उनके सहयोगी ने दी थी। लेकिन अदालत ने सू ची के बयान को खारिज करते हुए उनकी नज़रबंदी तीन साल के लिए बढ़ा दी गई। हालांकि अब सैन्य अदालत ने सज़ा घटा कर डेढ़ साल कर दी है।
नोबल पुरस्कार विजेता सान सू ची पिछले 19 में 13 साल फौजी शासन की हिरासत में गुजार चुकी हैं। बर्मा में 1962 से ही फौजी तानाशाही है। सू ची वहां पर लोकतंत्र बहाली की मांग कर रही हैं। उनकी पार्टी नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी ने 1990 में चुनाव भी जीता था। लेकिन फौजी तानाशाही ने चुनाव के नतीजों को मानने से इनकार कर दिया।
आंग सान सू ची का सफ़र
सू ची का जन्म बर्मा की रंगून में 19 जून 1945 को हुआ था। उनके पिता जरनल आंग सान ने बर्मा सेना का गठन किया और दो साल बाद 1947 में ब्रिटेन से बर्मा को आज़ाद कराया। लेकिन उसी साल आंग सान के विरोधियों ने उनकी हत्या कर दी।
सू ची का बचपन बर्मा में बीता। उन्होंने इंग्लिश कैथोलिक स्कूल में पढ़ाई की। 1960 में उनकी मां खिन ली को भारत में बर्मा का राजदूत नियुक्त किया गया। चाल साल तक भारत में पढ़ने के बाद वो ब्रिटेन चली गईं। सू ची ने दर्शनशास्त्र, राजनीति और अर्थशास्त्र की पढ़ाई ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में की। 1972 में उन्होंने तिब्बती मामलों के स्कॉलर माइकल ऐरिस से शादी कर ली। उनके दो बच्चे हैं और वो ब्रिटेन में ही रहते हैं।
1988 में एक वाकये ने आंग सान सू ची की ज़िंदगी की दिशा बदल दी। बर्मा में उनकी मां खिन ली की तबीयत बिगड़ने लगी। उन्हें देखने के लिए आंग सान सू ची वतन लौटीं। उनके आने पर लोकतंत्र समर्थकों का हौसला बढ़ गया। उन्होंने सैन्य सरकार के ख़िलाफ़ बिगुल बजा दिया। सू ची भी घर-गृहस्थी की दहलीज लांघ कर सियासत में कूद पड़ी। देश को सेना के चंगुल से आज़ाद कराने के लिए लड़ने लगीं। सू ची समर्थकों को कुचलने के लिए जुंटा सरकार ने हजारों लोगों की हत्या करा दी। लेकिन सू ची ने घुटने नहीं टेके। उन्होंने अपनी पार्टी नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी की स्थापना की। 1989 में देश में बलवा फैलाने के आरोप में सू ची को गिरफ़्तार कर लिया गया और अदालत ने उन्हें छह साल तक नज़रबंदी में रखने का हुक्म दिया।
अगले साल 1990 में बर्मा में चुनाव हुए। उस आम चुनाव में सू ची की पार्टी को भारी जीत मिली। 495 सीटों में 392 सीटों पर उनके उम्मीदवार जीते। सू ची का प्रधानमंत्री बनना तय था, लेकिन जुंटा ने उन नतीजों को मानने से इनकार कर दिया। पूरी दुनिया में जुंटा सरकार की तानाशाही का जोरदार विरोध हुआ और सू ची की रिहाई के लिए प्रदर्शन किए गए। अब सू ची की पहचान दुनिया भर में एक बड़े लोकतांत्रिक नेता के तौर पर होने लगी। 1991 में उन्हें शांति का नोबल पुरस्कार दिया गया।
नज़रबंदी की सज़ा ख़त्म होने के बाद सू ची को 1995 में जेल से रिहा हुईं। लेकिन चारों तरफ सैन्य पहरा था। वो किससे, कब और कहां मुलाकात करती थी इस पर सेना के जवान नज़र रखते थे। उसी बीच ब्रिटेन ने उनके पति माइकल ऐरिस को कैंसर हो गया। ऐरिस दुनिया को अलविदा कहने से पहले सू ची से मिलना चाहते थे। लेकिन जुंटा सरकार ने उन्हें बर्मा आने की इजाजत नहीं दी। और सू ची ने यह सोच कर ब्रिटेन जाने से इनकार कर दिया कि वो एक बार बाहर गईं तो उन्हें वतन लौटने नहीं दिया जाएगा। ऐरिस ने 1999 में सू ची से मिलने की चाहत को पलकों में संजोए दम तोड़ दिया।
2000 में सू ची को फिर से गिरफ़्तार करके नज़रबंद कर दिया गया। दो साल बाद 2002 में उनकी रिहाई हुई लेकिन चंद महीनों बाद मई 2003 में उन्हें फिर से गिरफ़्तार कर लिया गया। इस बार छह साल के लिए। 27 मई 2009 को आंग सान सू ची की सज़ा पूरी हो रही थी। उन्हें आज़ाद किया जाना था। लेकिन उससे ठीक कुछ दिन पहले अमेरिकी नागरिक जॉन येताव गैरकानूनी तरीके से उनके घर पहुंच गया। उसकी इस ग़लती के कारण सू ची को और 18 महीने इसी तरह कैद में बिताने होंगे। मतलब 2010 में होने वाले चुनाव में वो पार्टी का प्रचार नहीं कर सकेंगी। जुंटा सरकार भी तो यही चाहती है।
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