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स्वाइन फ्लू से सरकार के बचाव में जुटा "हिंदुस्तान"

हिंदुस्तान में हर रोज फ्रंट पेज पर दो टूक छपता है। पहले पन्ने पर संपादकीय देने का ये तरीका हिंदुस्तान ने शुरू किया है। कई बार उसमें बहुत ही बेतुकी बातें लिखी होती हैं। बिना सिर पैर की बातें। उनका सिर्फ़ एक ही मक़सद होता है कि किसी भी तरह से सरकार का बचाव किया जाए। मेट्रो हादसा हो, एनसीआर में बढ़ते अपराध हों या फिर कोई ऐसा मामला जिसमें सरकार घिरती नज़र आती है तो दो टूक में उसका समर्थन किया जाता है।

अभी स्वाइन फ्लू पर सरकार घिरी है। स्वास्थ्य मंत्री गुलाम नबी आज़ाद बेतुके बयानों से उसकी फजीहत हो रही है। हिंदुस्तान को भी चाहिए कि उसके लिए सरकार को आड़े हाथों ले, लेकिन हिंदुस्तान में जनहित की पत्रकारिता को ताक पर रख कर सरकार का बचाव किया जा रहा है। आगे बढ़ने से पहले आप दो दिन के दो टूक पढ़िए।

10 अगस्त 2009
पिछले दो-तीन दिन स्वाइन फ्लू का ख़ौफ़ फैलाने वाले रहे। पर इतना तय है कि स्वाइन फ्लू जैसी बला से घबराकर तो मुकाबला नहीं ही किया जा सकता। इसके लिए जरूरी है हौसला, जागरूकता और तालमेल। प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री ने निगरानी की कमान खुद ले ली है तो लोगों में भरोसा बढ़ेगा ही। लोगों को इस रोग से बचने और हो जाने पर इलाज के बारे में जागरूक भी किया जा रहा है। लेकिन इस पूरी मुहिम का नतीजा तो स्वास्थ्य विभाग और अस्पतालों के बीच तालमेल ही तय करेगा। और फिलहाल अस्पतालों का जो हाल है वह लोगों को आश्वस्त नहीं करता। जरूरी है कि जिस शिद्दत से योजनाएं बनती हैं, उसी तत्परता से जमीन पर भी उतरें।
((इस दो टूक के बगल में पहली ख़बर छपी है … अब पीएमओ ने संभाला मोर्चा))

11 अगस्त 2009
अख़बारों में शोर है और टेलीविजन चैनलों पर तो बाकायदा हंगामा। हालांकि अभी तक तकरीबन एक हज़ार लोग स्वाइन फ्लू से संक्रमित हुए हैं और सात को छोड़कर बाकी सभी को बचा लिया गया है। लेकिन हंगामा थम नहीं रहा। स्वाइन फ्लू से घातक तो इस देश में मलेरिया, टीबी और यहां तक अतिसार साबित हुए हैं। पर एक ऐसा रोग जिसका इलाज पूरी तरह उपलब्ध है उसका हव्वा भी ऐसे खड़ा किया गया है कि उसके आगे तो आतंकवाद भी कम ख़तरनाक लगने लगे। यह ठीक है कि जब तक हल्ला-हंगामा न हो तब तक सरकार के कान पर जूं नहीं रेंगती, लेकिन ज़्यादा हंगामा कहीं भेड़िया आया वाली समस्या न पैदा करे, यह ध्यान रखना भी जरूरी है।

ऐसा लगता है कि हिंदुस्तान में दो टूक लिखने वाले अपना ही अख़बार नहीं पढ़ते। उनका बस एक ही एजेंडा है कि प्रधानमंत्री, दिल्ली की मुख्यमंत्री और दोनों सरकारों का जहां तक और जैसे भी हो सके बचाव करो। जैसे दो टूक में कह दिया कि एक हजार में सात लोगों को छोड़ कर बाकी को ठीक कर दिया गया, लेकिन वहीं बगल में छपी पहली ख़बर में लिखा है कि कुल 959 मरीजों में 563 मरीज ठीक हुए हैं। बाकी बचे चार सौ से ज़्यादा मरीजों में सात की मौत हो चुकी है। बाकी शहरों की बात छोड़ दें तो अकेले पुणे में नौ लोगों ज़िंदगी के लिए हर सांस संघर्ष कर रहे हैं। उनमें से चार की हालत बहुत ज़्यादा क्रिटिकल है। ये आंकड़ा सोमवार की रात का है। और मरीजों की संख्या के साथ मरने वालों की संख्या भी बढ़ती जा रही है। यही नहीं हिंदुस्तान में एक-दो रिपोर्ट ऐसी छपी हैं जो सरकारी तैयारी की पोल खोलती हैं। लेकिन फ्रंट पेज पर ऐसा दो टूक, जिसका कोई मतलब नहीं।

स्वाइन फ्लू से सिर्फ़ आम पब्लिक ही नहीं डॉक्टर भी डरे हुए हैं। ये बहुत ख़तरनाक बीमारी है। अप्रैल से लेकर 31 जुलाई तक इसने 1.62 लाख लोगों को अपनी चपेट में लिया। इनमें से करीब 1154 लोगों की मौत हो चुकी है। अगस्त में हुई मौत को जोड़ने पर यह संख्या और बढ़ जाएगी।

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