
उधार - स्टुपिडइंडियाटीवी.ब्लॉगस्पॉट.कॉम
बहुत पुरानी बात भी नहीं है। एक चैनल के दफ्तर में एक सेंटर से रॉ फुटेज आया कि एक दुकानदार ने किसी सरकारी विभाग से तंग आकर खुद को आग लगा ली और गंभीर रूप से घायल हो गया। बहुत असामान्य नहीं था ये। ऐसा अक्सर नहीं तो कभी-कभार होता ही रहता है।
पूरा का पूरा टेप ही ऑफिस में पहुंचा था। इसलिए मौका था कि उस फुटेज को पूरी तरह देखा जाए। लोकल रिपोर्टर को जल्द से जल्द टेप भेजने को कहा गया था, इसलिए वो फुटेज को एडिट नहीं कर पाया। अपनी तरफ से शहर की पत्रकार बिरादरी का ख्याल रखते हुए उसने टेप पर काउंटर नंबर लिख दिए थे ताकि फुटेज देखने वाला उतना हिस्सा ही देखे, जितना वो चाहता था।
मंगलवार की रात यह ख़बर आई कि ब्राजील में एक टीवी एंकर ने अपने कार्यक्रम की रेटिंग बढ़ाने के लिए पांच लोगों की हत्या की सुपारी दी। उन पांचों की हत्या अलग-अलग दिन और अलग-अलग जगहों पर हुई। वो एंकर अपनी टीम को इन वारदात के बारे में सबसे पहले ख़बर कर देता था ताकि ब्रेकिंग न्यूज़ उसके यहां सबसे पहले चले और उसके कार्यक्रम की रेटिंग बढ़ जाए। हमारे देश में भी न्यूज़ चैनलों के बीच मारकाट मची है। कुछ जगहों पर अति उत्साहित स्ट्रिंगरों ने लोगों को उकसा कर मौत के हवाले कर दिया है। इसी मसले पर हम एक बहस शुरू कर रहे हैं। ख़बरों को कंस्ट्रक करना कहना तक सही है? इस बहस की शुरुआत कर रहे हैं साथी चारवाक सत्य। हमें उम्मीद है कि आप भी इस बहस में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेंगे और उनकी बात को आगे बढ़ाएंगे।
लेकिन जब उस टेप को ऑफिस में पूरा देखा गया तो सब चौंक गए। उस दुकानदार ने किसी व्यापारी समिति के कहने पर ये सारा तमाशा रचा था। शहर के पत्रकार वहां बड़ी संख्या में मौजूद थे। तय ये हुआ था कि दुकानदार मिट्टी तेल खुद पर डालकर आग लगा लेगा। पीछे दो लोग कंबल लेकर खड़े रहेंगे। जैसे ही आग लगेगी, वो दोनों उस पर कंबल डालकर आग बुझा देंगे। ये सारा संवाद टेप में दर्ज था।
इस तरह पत्रकारों का फुटेज बन जाएगा, खबर लग जाएगी और व्यापारी संगठन की मांग आगे तक पहुंच जाएगी। लेकिन जब आग सचमुच लग गई तो कंबल वालों की कोशिश के बावजूद काफी समय तक उसे बुझाया नहीं जा सका और ये खेल जानलेवा हो गया।
ऊपर वाली घटना पंजाब की है। बिहार में संभवत: गया में ऐसा हो चुका है। मीडिया अब कई बार खबर रिपोर्ट नहीं करता, खबर कंसट्रक्ट भी करने लगता है। कभी नाम कमाने के लिए तो कभी चैनल का अंतहीन पेट भरने के लिए तो कभी टीआरपी के लिए। कभी फर्जी विरोध प्रदर्शन कर फिल्मों को हिट करने के खेल में मीडिया शामिल हो जाता है तो कभी किसी बच्चे को पेड़ में मचान बनाकर उसपर चढ़ा देता है। तमाशे के कई रंग हैं।
चैनल में काम करने वाले किस शख्स को पता नहीं है कि चैनलों पर दिखाई गई नाग नागिन की कहानी और भूत महल के सारे किस्से स्टेज किए जाते हैं यानी रचे जाते हैं। किसी नाटक या फिल्म की तरह उन्हें फिल्माया जाता है। पहले चैनलों के मुख्यालय में बॉसेस की इजाजत से ये सब होता था, अब रिपोर्टर और स्ट्रिंगर खुद ही ये सब कर देते हैं, ताकि सनसनी मीटर पर उनकी खबर पास हो जाए। बस चालाकी ये की जाती है कि उन्हें रिकंस्ट्रक्शन नहीं बताया जाता, बल्कि सच में हुई घटना की तरह परोस दिया जाता है। मीडिया की ये बेईमानी न नई है न ही कोई गुप्त रहस्य। भारत जैसे अनपढ़-कुपढ़ देश की जनता यही चाहती है, इस तर्क के साथ एक बड़ा छल मीडिया कर रहा है।
खबर गढ़ने से लेकर मीडिया के खुद खबर बन जाने के बीच फासला कितना कम होता है ये बात जनतंत्र में छपी खबर से पता चलता है। अगर ये सच है तो बेहद खतरनाक है। कल को भारत में भी ये संभव है। हमारे कदम उसी ओर तेजी से बढ़ रहे हैं। और जब हमारे चैनल इस खेल में कूदेंगे तो यकीन मानिए विदेशी पत्रकार कहीं टिक नहीं पाएंगे।
राजेश पांडे
August 13, 2009 at 2:33 pm
बहुत साल पहले एक फिल्म रिलीज हुई थी न्यू दिल्ली टाइम्स। शायद उसका भी थीम यही है। एक पत्रकार ख़बरों के लिए कैसे अपराध कराता है। ये चलन तो हमारे देश में भी रहा है। निचले स्तर पर अपराधियों से पत्रकारों के ताल्लुक रहे हैं। दोनों दुश्मनो को ख़त्म करने में एक दूसरे की मदद करते रहे हैं। ऊपरी स्तर पर यही गठजोड़ संपादकों और नेताओं में नज़र आता है। पूरे समाज की हत्या की जा रही है। कुछ लोगों की बात क्या करें।
विनीत कुमार
August 13, 2009 at 11:43 pm
एक बार हमें चैनल की कैंटीन के बाहर खाना खाने को कहा गया,अंदर..कैंटीन को पब में तब्दील किया गया था। गुडगांव से लड़कियां बुलवाकर उसे मुंबई के बार गर्ल पर स्टोरी बनायी जानी थी।.
रंगनाथ सिंह
August 14, 2009 at 4:01 am
i m shocked !!