अब ये बात तो लगभग साफ है कि जो संपादक जितना बड़ा लाइजनर होगा उसके राज्यसभा में जाने की संभावना उतनी ही अच्छी होगी। ऐसा नहीं है कि सिर्फ़ वर्तमान संपादकों की ही जमात ऐसी है, मेरे दादाजी के जमाने में भी ऐसा ही होता होगा इसका यकीन हो चला है। लेकिन कमाल का है अपना शासक वर्ग भी। इस तबके ने आजादी के वक्त ही भांफ लिया था कि घपला-घोटाला-तीन-पांच और व्यवस्था को नरक बनाना है तो संपादकों को पटा लो नहीं तो ये बड़बोला तबका जीने नहीं देगा। अगर सारी मलाई खुद खा गए तो गांधीजी की तरह ये ससुरा गांव-गांव तक पदयात्रा भी निकाल सकता है। इसीलिए राज्यसभा और तमाम तरह के संस्थान में नोमिनेटेड (मनोनीत) सीटों की व्यवस्था की गई। जो नोमिनेटेड में नहीं आ सके उनके लिए जीते हुए विधायकों का वोट हलाल किया जाता है और पार्टी के आजीवन वर्कर की सेवा को एक झटके में कुर्बान कर दिया जाता है। मजे की बात ये कि इसमें सिर्फ पत्रकार ही नहीं हैं जो वे तमाम बुद्धिजीवी हो सकते हैं जो जनता के सरोकारों पर कभी जुबान खोल सकते हैं- लेकिन राज्यसभा जाते ही उनके जुबान पर ताला लग जाता है।
दूसरी बात ये कि आजकल के जमाने में जब सांसद बनना इतना आकर्षक पेशा हो गया हो (5 साल में 10 करोड़ की सांसद निधि हाथी के दांत है- स्कोप तो 100 करोड़ के लाईजनिंग का बनता है) कि “अंबानी महाराज” भी इसका लोभ नहीं छोड़ पाते हैं तो कैसे कोई पार्टी किसी पत्रकार को सांसद बना देती है। उस पत्रकार को जिसे जवानी में उसका मकान मालिक रेंट देने के लिए आंखे दिखाता है जिसका जीवन 45 साल तक दस-बीस हजारी नौकरी में बीतती है (माफ कीजिए इसमें टीवी वाले शामिल नहीं हैं) वो ऐसी कौन सी सेवा पार्टी हाईकमान/सुप्रीमो या माननीय अध्यक्ष जी का कर देता है कि उसे एक अदद सांसद की सीट दे दी जाती है? जबतक मैं गांव से पटना और पटना से गांव करता रहा ये खेल समझ में नहीं आया। दिल्ली आकर ज्ञानचक्षु खुल गए।
अहम बात ये है कि मान लीजिए कि श्रीमान अ शुक्ला ने जीवन भर पत्रकारीय कर्म किया और निष्पक्षता से लिखा या दिखाया तो उनके सांसद बनते ही ये क्यों न मान लिया जाए कि उनके अतीत का सारा कर्म दरअसल उस खास पार्टी का प्रचार प्रसार था? एक बात और समझ में नहीं आई कि आजतक किसी पर्यावरण या समाजिक मुद्दे या महिला विषयों पर लिखने वालों को इस काबिल क्यों नहीं समझा गया कि उन्हे सांसद बनाया जाए। ऐसी काबिलियत सिर्फ राजनीतिक पत्रकारों में ही कैसे पाई जाती है।
मैं यहां सिर्फ पत्रकारों की बात करुंगा-बहस उसी तरफ जा रही हैं-यूं कुछ नियम सभी गैर-राजनीतिक लोगों के लिए बनाये जाने चाहिए जो राज्यसभा में जाना चाहते हैं। मसलन संविधान में ये नियम हो कि कोई भी पार्टी पत्रकार या किसी कलाविद को तबतक सांसद नहीं बनाएगी जबतक उसने घोषत रुप से एक खास समय सीमा तक-मसलन 5 या 10 साल तक उस पार्टी की सदस्यता न ली हो या सेवा न की हो। देखिए, फिर कैसे इनकी पोलपट्टी खुलती है। दूसरी बात ये कि नोमिनेटेड सीट को भरने का अधिकार सत्ताधारी पार्टी को नहीं मिलनी चाहिए – इसके लिए एक स्वतंत्र आयोग हो जिसमें समाज के सभी वर्गों के लोग हों।
अरविंद शेष
August 14, 2009 at 12:09 pm
ये “नोमिनेटेड” होकर “राजसभा” में जाते हैं और वहां जाते ही इनकी जुबान पर ताला लग जाता है क्योंकि राजसभा में प्रवेश करने से पहले ही ये “लेमिनेटेड” हो जाते हैं।
बहुत बढ़िया पोस्ट सुशांत जी…।
राजेश पांडे
August 14, 2009 at 2:18 pm
राजनीतिक पत्रकारों से ही तो राजनीतिक दलों के स्वार्थ सधते हैं। बहुत से राजनीतिक पत्रकार तो पार्टी के प्रवक्ता की तरह ख़बर देते हैं। पार्टियों के बचाव में लगे रहते हैं। कोई इनका बाबा है, कोई दीदी है, कोई मैया है तो कोई दादा है, भाईजी है, बहन जी है… कुछ पत्रकार तो नेताओं की चरण वंदना तक करते हैं। तो राज्यसभा ये नहीं जाएंगे तो कौन जाएगा?
- राजेश पांडे