परम आदरणीय चंदन मित्रा जी,

चंदन मित्रा, पूर्व सांसद
अपनी निष्पक्षता और ‘लचीलेपन’ का सबूत तो आपने मतगणना के दौरान एक न्यूज़ चैनल के स्टूडियो में बैठे-बैठे ही दे दिया था। मुझे अच्छी तरह याद है कि आप कैसे बढ़चढ़ कर बीजेपी की वकालत कर रहे थे, लेकिन जैसे ही नतीजों की तस्वीर साफ हुई, आपने किस फुर्ती से पलटी मारी थी और बीजेपी की बखिया उधेड़ने में जुट गए थे। क्या इस ‘निष्पक्षता’ और ‘लचीलेपन’ की कोई वक़त नहीं रह गयी, दिल्ली दरबार में? बंदा आपका बनने को तैयार है और आप अपना नहीं रहे हैं। ये भी कोई बात हुई भला?
क्या पता इन कलाबाजियों के चलते ही अब बीजेपी आपको घास नहीं डाल रही। लेकिन कांग्रेस को तो इस निष्पक्षता की कद्र करनी चाहिए थी। थोड़ी सी घास डाल ही देती तो क्या बिगड़ जाता? जब घोड़ा पूंछ डुलाने को तैयार हो और हांजी-हांजी की मुद्रा में गर्दन भी ऊपर-नीचे कर रहा हो, तो उसे चना-गुड़ नहीं, तो कम से कम थोड़ी घास तो डाल ही देनी चाहिए।
छी-छी…कितनी ओछी और संकीर्ण हृदय हो गई है आज की राजनीति। एक बिचारे संपादक के दुख की किसी को ज़रा भी परवाह नहीं है। कोई ये भी नहीं सोच रहा कि आखिर आपने पिछले 6 साल में देश की राजनीति में कितने सारे अहम योगदान किए हैं। मनमोहन सरकार को जिताने का सेहरा जिस ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना यानी नरेगा के सिर बांधा जा रहा है, उसकी समीक्षा का महत्वपूर्ण काम भी किया है। भले ही आपने आज तक देश के किसी गांव में एक रात भी नहीं गुज़ारी, फिर भी गांव के कितना काम आए। आप ही बताइए, आज के ज़माने में कौन किसी के लिए इतना कष्ट झेलता है? आप ठीक से समीक्षा न करते, तो क्या इतनी अच्छी योजना बनती? और न बनती, तो क्या मनमोहन फिर से गद्दी पर बैठते? नहीं ना! लेकिन क्या किया जाए। वक्त ही खराब है। कोई किसी का एहसान याद नहीं रखता।
मित्रा जी, कहीं ऐसा तो नहीं कि आपकी गांव में एक भी रात न गुज़ारने वाली बात ही ‘गांव में रात गुजारू युवराज’ को अखर गयी हो और इसीलिए आपका पत्ता साफ हो गया हो? अगर ऐसा है, तो हारिये न हिम्मत, बिसारिये ना गांव….फौरन झोला-शोला निकालिए और चल पड़िए किसी गांव में रात गुज़ारने….अपने अखबार के फोटोग्राफर को साथ ले जाना न भूलिएगा…भई, आप कोई युवराज तो हैं नहीं जो दूसरे अखबार और चैनल इसे खबर बना देंगे…तो फौरन निकल लीजिए…क्या पता किस्मत साथ दे जाए और गांव में रात गुजारने वाली आपकी तस्वीर देखकर युवराज का दिल पिघल जाए..
हमारी शुभकामनाएं आपके साथ हैं…
आपके दुख में दुखी एक पाठक
अनिकेत तिवारी
सुधीर शर्मा
August 15, 2009 at 11:38 pm
अब तो मैं भी चंदन मित्रा के दुख से विचलित हो गया हूं। सच में बहुत बड़ा दुख झेल रहे हैं चंदन मित्रा। हम सबको उनके इस दुख में शरीक होना चाहिए।
राजेश पांडे
August 15, 2009 at 11:40 pm
अनिकेत और सुधीर आपके साथ मैं भी चंदन मित्रा के दुख में शामिल हो रहा हूं।