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काबिलियत और ईमानदारी पर भारी “सियासी आस्था”

राज्यसभा की रेस में कई बड़े पत्रकारों के नामों की चर्चा चल रही है। जनतंत्र पर इसी से जुड़ी रिपोर्ट प्रकाशित होने के बाद बहुत से पाठकों ने अपनी प्रतिक्रिया दी है। उनमें से कुछ को हम खास तवज्जो देख कर छाप रहे हैं। इस उम्मीद में कि आप भी इन्हें पढ़ेंगे और अपनी प्रतिक्रिया देंगे। बिना किसी संकोच के बताइए कि आपके हिसाब से किस पत्रकार को और क्यों राज्यसभा में मनोनीत करना चाहिए? साथ ही यह भी बताइएगा कि क्या राज्यसभा के लिए मनोनीत होना इतनी बड़ी कामयाबी है कि उसके लिए पत्रकार अपने पेशे से समझौता करता फिरे?

आई एम नागार्जुन

काबिलियत, निष्पक्षता और ईमानदारी ही वो शर्तें हैं जिनके आधार पर किसी पत्रकार को राज्यसभा के लिए मनोनीत किया जा सकता है। लेकिन बीते कुछ साल में पत्रकारों को संसद भेजने की इकलौती शर्त हो गई है सियासी आस्था। जिस पत्रकार की सियासी आस्था सत्ताधारी पार्टी या गठबंधन से जुड़ी होती है उसे राज्यसभा के लिए मनोनित कर दिया जाता है। चंदन मित्रा भी लाख यह कहें कि उन्होंने कोई समझौता नहीं किया था, लेकिन ये तो सब जानते हैं कि वो भगवा रंग में रंगे हैं और इसलिए वाजपेयी सरकार के दौरान राज्यसभा के लिए मनोनीत किए गए। ऐसे में अब तो यही सवाल उठता है कि जब पत्रकारों को सियासी कार्यकर्ता और नेता की तरह ही व्यवहार करना है तो भी मनोनीत करके संसद भेजने की क्या जरूरत? उन्हें संसद में बैठने का इतना ही शौक है तो लोकसभा या राज्यसभा का चुनाव लड़वा कर संसद भेजिए।

यहां पर कुछ लोग हिंदी बेल्ट का हवाला दे रहे हैं। हिंदी बेल्ट क्या होता है और हिंदी पत्रकार क्या? पत्रकारिता को आप क्षेत्र, जाति, धर्म और भाषा के बंधन से मुक्त कीजिए। पत्रकार किस भाषा, क्षेत्र, धर्म और जाति से है इससे उसकी नागरिकता पर क्या फर्क पड़ता है? वो कोई भी और कहीं का भी हो अगर उसकी कलम में दम है, ईमानदार है और वरिष्ठ भी तो उसे संसद के लिए मनोनीत किया जा सकता है।

अगर पत्रकारिता के क्षेत्र
में काम को एक पैमाना बनाया जाए तो जितने भी पत्रकारों का नाम दिया गया है उनमें से शेखर गुप्ता, विनोद मेहता और वीर सांघवी की दावेदारी बनती है। रही बात प्रभाष जोशी जी की तो उन्हें बहुत पहले ही राज्यसभा के लिए मनोनित कर देना चाहिए था। लेकिन तब ऐसा नहीं हुआ और अब प्रभाष जोशी ऐसा कोई काम नहीं कर रहे हैं कि उन्हें संसद भेजा जाए

गणेश प्रसाद झा

किसी भी पत्रकार को लोकसभा या राज्यसभा या फिर राज्यों की विधानसभाओं में नहीं जाना चाहिए। पत्रकारों को तो राजनीति से हमेशा अलग रह कर पत्रकारिता के जरिए ही देश और समाज की सेवा करनी चाहिए। क्योंकि राजनीति में जाकर पत्रकार अपना धर्म और कर्म भूल जाता है। सांसद रहते हुए अखबारों में कुछेक लेख लिख देना पत्रकारीय दायित्वों का निर्वाह नहीं है। क्योंकि राजनीति में जाने के बाद कलम से निकलनेवाले अक्षर निष्पक्ष नहीं रह जाते। अव्वल तो पत्रकारों के लिए राजनीतिक महत्वाकांक्षा पालना ही सर्वथा अनुचित है। मेरा अपना अनुभव है कि मेरे जनसत्ताई मित्र संजय निरूपम जब से राजनीति में गए (पहले राज्यसभा में और अब लोकसभा में) हैं, बदल गए हैं। उनके सरोकार भी बदल गए हैं। पत्रकारिता से भी उनका अब कोई सरोकार नहीं रहा। साथी पत्रकारों को वे भूल चुके हैं। उनकी नई दुनिया है जो पत्रकार मित्रों की नहीं, राजनीतिक मित्रों की है। जाहिर है उनकी चिंतन की दिशा भी कब की करवट ले चुकी होगी। ऐसा भी इतने साल में अब तक कभी नहीं सुना कि उन्होंने संसद में कभी देश में पत्रकारों की दुर्दशा या फिर उनकी स्थितियों और मूलभूत समस्याओं पर कोई बहस छेड़ने की कोशिश की हो।

इस तरह तो यह बात भी नहीं हुई न कि अपना कोई पत्रकार साथी संसद जाएगा तो वहां हमारी समस्याओं को सरकार के सामने लाने की कोशिश करेगा। ऐसी कोशिश संसद गए कभी किसी पत्रकार ने आज तक नहीं की चाहे वो अपने लंगोटिया संजय निरूपम हों या फिर बड़े पत्रकार अरुण शौरी, चंदन मित्रा या कोई और।

संजय कुमार सिंह

वीर सांघवी मैदान में हैं तो पंकज वोहरा और मृणाल पांडे वैसे ही कमजोर हैं। सत्ता विरोधी माने जाने वाले प्रतिष्ठान -एक्सप्रेस समूह के कर्ता-धर्ता शेखर गुप्ता सफल रहे तो यह संस्थान की साख पर धब्बा ही होगा। उनकी साख चाहे जैसी हो एक्सप्रेस की साख उन्हें कामयाब होने देगी इस पर शक है। आउटलुक के संपादक चाहे जितने कांग्रेस भक्त हों, लगता नहीं है कि कांग्रेस की गलतियों को कुतर्कों के सहारे ठीक ठहराने का काम करेंगे या कर पाएंगे। ऐसे में बचते हैं आलोक मेहता और वीर सांघवी। देश की राजनीति हिन्दी पट्टी से चलती है। राज्य सभा के सदस्य सरकार की सिफारिश पर राष्ट्रपति मनोनित करेंगी और आलोक मेहता उनके करीबी है। सेटिंग-गेटिंग में भी आलोक मेहता के मुकाबले आपके कोई दावेदार कहीं नहीं टिकेंगे। मेरे हिसाब से आलोक मेहता। आपकी पूरी खबर का संक्षेपन (मैंने संपादन नहीं लिखा है) कर दिया जाए तो यही बचता है। बताइए आपकी राय क्या है।

सुधीर शर्मा

बेस्ट नाम तो रजत शर्मा हैं। अकेले उन्होंने ख़बरों की दिशा बदल दी। उनके फैशन को सब फॉलो कर रहे हैं। मुद्दों की बात कोई नहीं करता। सरकार के लिए इससे अधिक अच्छी बात क्या हो सकती है। मुद्दों की बात होती तो किरकिरी हो सकती थी। लेकिन सब भूतनाथ और अंधविश्वास में ऐसे उलझे हैं कि बाकी समस्याएं गौण हो गई हैं। जय बाबा भूत नाथ की… जय बाबा रजत शर्मा की… सरकार को चाहिए कि उन्हें राज्यसभा भेज कर उनके अहसानों का कर्ज चुकाए।

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2 Responses to काबिलियत और ईमानदारी पर भारी “सियासी आस्था”

  1. ARUN PANDEY Reply

    August 16, 2009 at 12:25 pm

    Mere khyal mein patrakaron ke rajya sabha mein jaane mein koi burai nahi hai. Jahir hai chunki nominate karne ka adhikar sarkar ke marfat rashtrapati ko hai to wo apne LOGON ko hi layegi. Aap ye kyon sochte hain ki tamam buraiyon se upar uthkar sarkar kaam karegi jabki hum aur aap sabhi APNE LOG ko hi har jagah dekhana chahte hain. Ab koi patrakaar sansad ban jaata hai to uski tarif bhale mat kariye but uspar vyang baan bhi mat chalaen. Ambition rakhane mein burai kyon honi chahiye. Hum patrakar log sadist kyon ho jate hain. Padosi ki uplabdhi par jalan kyon hoti hai. Chandan ji hon yaar koi aur sanvidhan ke mutabik hi unka selection hua hai. Parliment mein kai aaropi saansad baithe hain, but ek patrakaar agar apni kabiliyat se rajyasabhi pahunch gaya to sabke pet mein dard hone lagata hai. Sab use jugadu kahne lagte hain. Akhir hum logon ka dil bada kyon nahi ho paa raha hai. Haalanki MERA MANANA HAI ki bhale hi politician mein 100 buraienya ho but sabse badi baat ye hai ki wo dildaar hote hain. Kam se kam wo log khilaf khabare publish karne walon se itna khafa nahi hote jitne uske sathi patrakaar. Rajyasabha ke liye meri taraf se SHEKHAR GUPTA aur RAJAT SHARMA appropiate name hain.

  2. amit tyagi Reply

    August 19, 2009 at 9:55 pm

    eisa lagta hai ki jeevan bhar patrakarita ka aadambar odhe varisht rajyasabha jane ke liye kuchh bhee karne ko taiyaar rahte hain. kyon na patrakar ki shreni samapt hee kar dee jaye manoneet hone ke liye. waise bhee wahan jaakar sabko apna hee ullu seedha karna hai. patrakaron ke hit ki baaat kaun karta hai sabse bade shoshak mitra ya chapluson se bhare, ghire mehta sahab.

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