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यहां “शहाबुद्दीन”, “बजाज” और “ये पत्रकार” एक जैसे हैं!

राज्य (राज) सभा में जाने लायक जितने भी नाम आपने गिनाए हैं, वे सभी शायद एक “मनोनीत” पद के लिए हैं। विडंबना यह है कि इन सबके अलावा भी जो संभावित नाम हो सकते हैं, उनमें से कोई ऐसा नहीं, जो बिना सर्वश्रेष्ठ “भक्ति” साबित किए “राष्ट्रपति” की कृपा पा सकने में सक्षम हों। अपनी क्षमता भर सबने ऐसा किया ही है, या कर रहे हैं। हां, रूप-स्वरूप अलग-अलग हो सकते हैं। लेकिन “यह किए जाने” को हम इस तर्क से जस्टीफाई कर सकते हैं कि अगर हमारे “लोकतंत्र” के साठ से ज्यादा सालों का हासिल यही है कि देश के सबसे “पाक-साफ मंदिर” में जगह पाना है तो तमाम धतकर्मों में अपनी कुशलता दर्शानी होगी, तो वहां जाने की इच्छा रखने वालों का क्या गुनाह…!

रुकिए नहीं। लेकिन रुक कर थोड़ा देखना होगा। क्या आप शहाबुद्दीन, सूरजभान, राजा भैया, पप्पू यादव जैसे तमाम नामों के संसद या विधानसभाओं में पहुंचने से परेशान होते हैं? बंदूक की बदौलत अपनी सियासी हैसियत कायम करने वालों से निश्चित तौर पर हमारी पवित्र प्रतिनिधि संस्थाओं की पवित्रता भंग होती है। बंदूक की बुनियाद पर पले-बढ़े लोगों द्वारा इसका इस्तेमाल करके संसद या विधानसभाओं में पहुंचने पर हमें बहुत दुख होता है, लेकिन आश्चर्य नहीं।

यह दुख दरअसल इसी चिंता से उपजा दुख है कि जिस संसद में देश की तकदीर तय की जाती है, वहां पहुंचने वाले लोग ही अगर चापलूस, बेईमान, भ्रष्ट और अपराधी होंगे तो देश या समाज के भविष्य की दिशा क्या होगी। इस चिंता पर व्यावहारिक तकाजों से मुंह चुराने का आरोप लगाया जा सकता है। लेकिन तब हम किसी भी तरह की चोरी, बेईमानी, भ्रष्टाचार, आपराधिक कृत्यों में लगे लोगों पर उंगली उठाने का हक खो देते हैं, जो अब तक हमारे लिए “आंदोलन” का मुद्दा रहा होता है।

राज्यसभा में जाने वाले पत्रकारों पर बहस की शुरुआत करते हुए “जनतंत्र” ने एक बड़ा काम यह किया कि चंदन मित्रा के राज्यसभा से विदाई पर लिखे गए अनुभव को भी सामने रख दिया। चंदन मित्रा ने लिखा कि वे हमेशा शहर में रहे। लेकिन उन्हें रोजगार गारंटी योजना यानी नरेगा की समीक्षा से संबंधित एक समिति में शामिल होने का मौका मिला था। इसमें उन्होंने क्या भूमिका निबाही या क्या योगदान दिया, यह तो वही बेहतर जानते होंगे, लेकिन इस बहाने उन्होंने राज्यसभा से विदाई पर अपने अफसोस पत्र में अनजाने में एक महत्त्वपूर्ण पहलू की ओर ध्यान दिला दिया है। यानी किसी व्यक्ति का जिस मसले से कभी कोई सरोकार नहीं रहा, वह “पोजिशन” मिलते ही उस मसले का विशेषज्ञ बन जाता है।

इसे मानने में कोई उज्र नहीं होना चाहिए कि एक पत्रकार, और खासतौर पर एक संपादक की निगाह चूंकि लगभग सभी मसलों-घटनाओं पर होती है और वह एक अच्छा विश्लेषक भी हो सकता है, इसलिए समस्याओं के हल या स्थितियों को सही दिशा देने में वह एक अहम भूमिका निभा सकता है। बल्कि इससे आगे जाकर मेरा तो मानना यह है कि किसी राजनीतिक दल के टिकट पर चुनाव लड़ रहे किसी बड़े नेता के मुकाबले भी एक पत्रकार-संपादक आम जनता के सामने देश-समाज की समस्याओं और चुनौतियों की व्याख्या ज्यादा तर्कपूर्ण और ईमानदार तरीके से कर सकता है। वह किसी भी नेता से ज्यादा प्रभावपूर्ण तरीके से भाषण दे सकता है। ऐसा करते हुए अगर वह थोड़ी “कलाकारी” करता है, तो इसे जरूर व्यावहारिकता का तकाजा कह सकते हैं। लेकिन इस तकाजे के तर्क पर अगर वह “कलाकारी” उन्हीं धतकर्मों में तब्दील हो जाती है, तब हम किसी पप्पू यादव या शहाबुद्दीन और किसी ऐसे पत्रकार में क्यों फर्क करें?

जनता के समर्थन से मुद्दों की राजनीति करने वालों को अगर छोड़ दें तो पप्पू यादव, शहाबुद्दीन, राजा भैया या अरुण गवली जैसे लोग जिस जमीन पर तैयार होते हैं और खड़े होते हैं, वहां इस्तेमाल होने वाले हथियार ही उनके संसद या विधानसभाओं में पहुंचने की सीढ़ी होते हैं। तिस पर तुर्रा ये कि संसद और विधानसभाओं में पहुंच जाने के बाद वे केवल संवैधानिक तौर ही नहीं, जनता की निगाह में भी “जनप्रतिनिधि” का दर्जा पा जाते हैं। गनीमत है कि संविधान ने ऐसे प्रतिनिधियों के “मनोनयन” के लिए कोई व्यवस्था नहीं की है, वरना इस कोटि के “राजनेताओं” को अपराध की दुनिया में नाम कमा कर राजनीतिक दलों का प्रिय बनने का लंबा रास्ता अख्तियार करने की जरूरत नहीं पड़ती।

एक पत्रकार के हाथ में कलम की ताकत होती है (इसे कृपया अतिशय आदर्शवाद नहीं कहें क्योंकि ऐसा कहते ही हम शहाबुद्दीन या राजा भैयाओं को किसी न किसी मोर्चे पर जायज ठहराते हैं) और इस ताकत को वह व्यवस्था के बरक्स एक चुनौती के रूप में सामने खड़ा रखता है। लेकिन सांसद बनने के लिए महत्त्वाकांक्षाओं के घोड़े पर सवार होकर वह जनता के बीच जाकर लोकसभा के लिए चुनाव लड़ने के बजाय राज्यसभा को अपने लिए सुरक्षित जगह मान कर अपने कलम की दिशा अपनी पसंद और पहुंच के राजनीतिक दलों के नेताओं की अंध-वंदना की ओर मोड़ देता है, तो वह उन शहाबुद्दीनों या राजा भैयाओं से कहां अलग खड़ा होता है, जिन्हें जनता ने कभी भी अपना स्वाभाविक प्रतिनिधि नहीं माना होता है। नई दुनिया के रविवारी पत्रिका में आलोक मेहता के अरुंधति राय पर किया गया हमला एक उदाहरण भर है। हिंदी पट्टी में आंदोलन चलाने का दावा करने वाले अखबारों और उसके संपादकों की हालत कुछ अलग नहीं है।

हालांकि आज का सच भी यही है कि एक पत्रकार अपने सरोकारों की ईमानदारी के कारण राष्ट्रपति की पसंद बन ही नहीं सकता। लोकसभा चुनावों के लिए उम्मीदवारी का टिकट पाने के लिए राजनीतिक दलों ने कैसी शर्तों को अनिवार्य तकाजा बना दिया है, यह किसी से छिपा नहीं है। राज्यसभा में पहुंचने के लिए भी भ्रष्ट तरीकों को परंपरा के रूप में कायम करने में कोई कसर नहीं छोड़ी जा रही है। अफसोस तब होता है जब देश-समाज की समस्याओं के लिए राजनीति की दशा-दिशा को जिम्मेदार बता कर इसके खिलाफ कलम चलाने वाले लोगों ने जनता के बीच जिस जगह को हासिल किया होता है, उसे महज छह साल के सत्ता सुख के लिए तिलांजली देने में उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता।

इस पुनीत मकसद को हासिल करने की कवायद में वे तो लगे ही हैं जो पत्रकारिता को पूरी तरह मुनाफे के धंधे में कायांतरित कर देना चाहते हैं और वे भी, जो आज भी पत्रकारिता के आंदोलन होने की मुनादी कर रहे हैं। मजे की बात यह कि दोनों ही जिस मंजिल की ओर अग्रसर हैं, उनका रास्ता एक ही है। ये वही लोग हैं जो अपने छात्रों और मातहतों को पानी पी-पीकर यह उपदेश देते रहे हैं कि पत्रकारिता अगर जनपक्षीय नहीं है तो वह बेईमानी है। लेकिन पत्रकारिता अगर राजपक्षीय हो जाए तो वह क्या हो जाता है, यह वे नहीं बताते।

हमारे सामने सवाल मुश्किल है। अगर कोई उद्योगपति अपनी अकूत दौलत की बदौलत, कोई अपराधी अपने बाहुबल की बदौलत और कोई पत्रकार-लेखक अपनी कलम बेच कर संसद या विधानसभाओं में “जनप्रतिनिधि” का दर्जा पाने की कोशिश करता है, तो इनमें से हम किसे अलग और एक आदर्श के तौर पर देखें…?

(अरविंद शेष प्रिंट मीडिया के वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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4 Responses to यहां “शहाबुद्दीन”, “बजाज” और “ये पत्रकार” एक जैसे हैं!

  1. राजेश पांडे Reply

    August 15, 2009 at 11:36 pm

    अरविंद जी,
    आपका लेख इस पूरे मामले को नए नज़रिए से देखने के लिए मजबूर कर रहा है। ये बात बिल्कुल सही है कि जिसके बाद जो हथियार है उसी का इस्तेमाल सत्ता हथियाने के लिए कर रहा है। किसी के पास पैसा है, किसी के पास ताकत और किसी के पास कलम। फिर उन तीनों में अंतर क्यों? इस बेहतरीन लेख के लिए साधुवाद।

  2. कबीर Reply

    August 16, 2009 at 2:03 am

    चंदन मित्रा के लेख में बहुत अहंकार नज़र आता है। उन्होंने न केवल अपने लेख में बल्कि संसद में दिए अपने भाषण में भी इस अहंकार को जाहिर किया। उन्होंने सभी सांसदों के बीच कहा कि उन्हें बाकी पत्रकारों की तुलना में काफी कम उम्र में राज्यसभा के लिए मनोनीत किया गया। ये कहने का क्या तुक बनता है? कहीं ऐसा तो नहीं कि वो ये जतलाना चाहते हैं कि वो कुलदीप नैयर जैसे बाकी पत्रकारों की तुलना में श्रेष्ठ हैं। आप सब भी चंदन मित्रा के उस विदाई भाषण को एक बार पढ़ें।

    “Mr. Chairman, Sir, first and foremost, may I express my deep sense of gratitude to you, and through you, the Deputy Chairman, and all the Members of this House, especially the Leader of the House, the hon. Prime Minister, the Leader of the Opposition and Leaders of every political party from across the spectrum, for the enormous cooperation and support that I received during my six years in this House!

    Sir, I came here from above, I mean, from the Press Gallery there. I used to be there, taking down notes of proceedings. Then, I was deeply honoured when the former President of India, on the advice of the former Prime Minister, nominated me to the House. That time, many people told me that it was very unusual that a person without grey hair was coming in the nominated category. Sir, my beard, has, of course, greyed over the time. This is not anything meant to all my colleagues and friends who have grey hair; some day I will also get it. But, I must thank, particularly the former President, Dr. A.P.J. Abdul Kalam for having nominated me at a much younger age than my predecessors.”

  3. रंगनाथ सिंह Reply

    August 16, 2009 at 5:33 am

    अरविन्द जी

    लोकतंत्र की सबसे बड़ी खूबी यही है कि जिस देश मेे यह हो उस देश का सामाजिक-सांस्कृतिक-शैक्षणिक इत्यादि चरित्र अपने प्रतिनिधीत्व के साथ संसद में मौजूद रहता है। राजशाही के बारे में कहावत थी कि यथा राजा तथा प्रजा। लोकशाही के लिए भी दौ सौ प्रतिशत सत्य है। यथा प्रजा तथा राजा।

    संभवतः इसलिए बर्नार्ड शा ने कहा होगा कि लोकतंत्र की सबसे अच्छी बात यह है कि जनता जिस लायक होती है उसी तरह के लोग उस पर शासन करते हैं। ईमादारी,न्याय,जनपक्षधरता इत्यादि किसी भी मुद्दी की राह सड़क से संसद की ओर जाती है न कि संसद से सड़क की ओर।
    सीपीएम एण्ड कम्पनी के िसंगुरीकरण के बाद तो मैं पूरे दावे के साथ कहा सकता हूँ कि भारतीय संसदीय इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है कि भारतीय संसद में कोई विपक्ष है ही नहीं। चुनाव में दो-चार वोट कम या ज्यादा पाने से क्या फर्क पड़ता है। यह सभी लोग एक ही नीति-रीति के पक्षधर हैं।

    आलोक मेहता ने जो हरकत की उसका प्रतिरोध जरूरी था। लेकिन ससंद में मनोनित हो कर कौन जाए इस पर मुझे किसी तरह की बहस का ज्यादा अवसर नहीं दिखता। जिन संभावित छह का नाम जाहिर हुआ है उनमें से कोई सासंद बन जाए ज्यादा फर्क नहीं पड़ने वाला।

    मैं तो कहता हूँ कि ये सारे रंगे सियार संसद में एक साथ न पहुँचे तो इनको पहचानना मुश्किल हो जाएगा। संसद जाने का लालच न होता तो ये अपनी खाल कभी नहीं उतारते। और आराम से भीतरखाने मौज मारते जिंदगी गुजारते।

  4. sushant jha Reply

    August 16, 2009 at 1:32 pm

    अरविंदजी, अपने देश में ये मान के राज्यसभा बनाई गई थी कि काबिल, अनुभवी और विशेषज्ञ लोगों को जगह मिलेगी और देश इनके अनुभवों का फायदा उठाएगा। लेकिन काबिलियत के नाम पर दलाल, अनुभवी के नाम पर चमचे और चुनाव का सामना न करनेवाले राजनेता और विशेषज्ञ के नाम पर निजी कंपनियों के एजेंट राज्यसभा में घुस गए हैं। ये किसका हित साधेंगे और जनता के हित में कैसी आवाज बुलंद करेंगे-ये देखने की बात है। एक सुधार ये हो सकता है कि जो सुविधाएं लोकसभा के सांसद को मिलती है वो इनसे छीन ली जाए-मसलन सांसद निधि, हवाई भत्ता और दिल्ली में बेहतरीन आवास। फिर देखिए इन जनसेवकों की संख्या मे कितनी कमी आती है। मैं ये नहीं समझ पाता कि ग्लैमर से दूर रहनेवाले कई समाजसेवकों को तो कोई पार्टी घास नहीं देती-लेकिन ये संपादक महोदय कैसे इन मौकों को लपक लेते हैं। जाहिर है, ये व्यवस्था और इसके कथित वाचडाग एक दूसरे के पूरक बन गए हैं और घोड़े ने घास से दोस्ती कर ली है।

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