स्वाइन फ्लू पर सरकार ने न्यूज़ चैनलों को हिदायत दी है। सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने कहा है कि मीडिया संस्थान डर नहीं फैलाएं। सरकार ने कहा है कि हालात काबू में हैं। अब तक … “सिर्फ़ 24 लोग मारे गए हैं। ज़्यादातर पुणे से। घबराने की बात नहीं। मीडिया भी लोगों को डराए नहीं।”
ठीक ही है मीडिया को किसी भी सूरत में लोगों को डराना नहीं चाहिए। स्वाइन फ्लू हो या फिर कोई और मुद्दा। लोगों को डराने से बात नहीं बनती बल्कि उन्हें जागरूक बनाना चाहिए ताकि सामने खड़ी चुनौती का सामना किया जा सके। लेकिन यहां तो डर का माहौल अकेले मीडिया नहीं बना रहा। खुद सरकार और उसके मंत्री भी लोगों को डराने में जुटे हैं।
स्वाइन फ्लू की शुरुआत मैक्सिको में 17 मार्च को हुई। पांच महीने पहले। कुछ ही दिन में स्वाइन फ्लू ने अमेरिका के अलावा यूरोप के कई देशों को भी अपनी चपेट में ले लिया। सभी जगह युद्ध स्तर पर तैयारियां चल रही थीं। हमारे देश में भी विदेशी यात्रियों की स्क्रीनिंग शुरू हो गई। लेकिन जब तक एक शख़्स की मौत नहीं हुई तब तक इस बीमारी के बारे में लोगों को जागरुक बनाने की कोशिश नहीं हुई। कहीं किसी अख़बार में यह नहीं छपा कि स्वाइन फ्लू से कैसे बचा जा सकता है? किसी रेडियो और टीवी पर जनहित में जारी सरकारी विज्ञापन नहीं दिखा। किसी ने नहीं बताया कि स्वाइन फ्लू और साधारण फ्लू में कितना अंतर है।
आलम यह था कि एक शख़्स की मौत के बाद मीडिया के हो हल्ला मचाने पर तो केंद्र ने राज्यों के मुख्यमंत्रियों से इस चुनौती से निपटने की तैयारी करने का निर्देश दिया। अभी अब जाकर स्वास्थ्य सचिवों की बैठक बुलाई गई है। यही नहीं गुलाम नबी आज़ाद की तरफ से एक के बाद एक ऐसे बयान आए जिनसे भ्रामक स्थिति पैदा होती है।
अगर महामारी की आशंका नहीं थी तो उन्हें यह कहने की क्या जरूरत थी कि एक करोड़ लोगों के इलाज का बंदोबस्त है। कभी कहते हैं कि इसकी दवा टेमीफ्लू को खुदरा बाज़ार में बेचने की छूट नहीं दी जाएगी। कभी कहते हैं कि सरकार ये छूट देने के बारे में विचार कर रही है। कभी कहते हैं कि सरकारी इंतजाम काफी है। फिर कहते हैं कि निजी अस्पतालों से भी सहयोग के लिए बात की जा रही है। ये सब क्या है? जब भ्रामक बयान सरकार की तरफ से जारी होंगे तब मीडिया तो शोर मचाएगा ही।
यहां पर कुछ बड़े जानकार स्वाइन फ्लू की तुलना टीबी और दूसरी घातक बीमारियों से कर रहे हैं। उनके मुताबिक स्वाइन फ्लू से ज़्यादा लोग तो उन बीमारियों में मर जाते हैं। आज ही एक लेख पढ़ रहा था जिसमें किसी पत्रकार ने जन्म के वक़्त मृत्यु दर को इससे बड़ी समस्या बताया है। ये सारी तुलना यह साबित करने के लिए की जा रही है कि स्वाइन फ्लू से ज़्यादा ख़तरनाक बीमारियां इस देश में हैं और जब उनसे लोग नहीं डरते तो फिर स्वाइन फ्लू से क्यों डरते हैं?
बात सही है। हर किसी को हक़ है कि अपना तर्क रखे। लेकिन इन तर्कों में कुछ खास दम नहीं लगता। कोई यह बताए कि टीबी की बीमारी क्या उतनी ही तेजी से फैलती है जितनी तेजी से स्वाइन फ्लू ने लोगों को अपनी चपेट में लिया है? नहीं। ऐसा कतई नहीं है। मैंने अपने खानदान में टीबी के दो मरीजों को देखा है। उनका इलाज हुआ और वो ठीक भी हो गए। बीमारी के दौरान हम लोग न जाने कितने घंटों उनके साथ बैठे रहते थे। खेलते रहते थे। बतियाते रहते थे। लेकिन हमें तो टीबी नहीं हुआ। स्वाइन फ्लू के फैलने की गति काफी तेज़ है। इस रफ़्तार को ध्यान में रखें तो दो फ़ीसदी की मृत्यु दर काफी ज्यादा मानी जा सकती है। अगर स्वाइन फ्लू ने गांव देहात के लोगों को अपनी चपेट में ले लिया तो ख़तरा बढ़ जाएगा और हो सकता है कि तब सरकारी इंतजाम नाकाफी लगे। रही बात जन्म के वक़्त मृत्यु दर की तो वह मामला भी गंभीर है, लेकिन उसकी तुलना स्वाइन फ्लू से नहीं की जा सकती। आप उस पर अलग से मुहिम चलाइए। स्वास्थ्य का खर्च बढ़ाइए। कुपोषण को खत्म करने के लिए क्रांतिकारी बदलाव कीजिए… इससे आपको किसने रोका है?
आज ही बाबा रामदेव की एक आयुर्वेदिक दुकान पर गया था। वहां देखा कि हर कोई गिलोय और तुलसी मांग रहा है। सौ ग्राम गिलोय का पैकेट 130 रुपये में बिक रहा है। तुलसी का भी वही दाम है। मतलब दो सौ ग्राम 260 रुपये का। एक दुकान से हर रोज हजारों की संख्या में लोग गिलोय और तुलसी खरीद रहे हैं। मास्क की बिक्री भी तेज हो गई है। ख़बर आई की कई जगहों पर इसकी कमी है। डर काफ़ी ज़्यादा है और इस डर की वजह से कालाबाज़ारी भी हो रही है। टेमीफ्लू को भी खुदरा बाज़ार में बेचना शुरू किया गया तो उसकी भी कालाबाजारी शुरू हो जाएगी। कालाबाजारी रोकने के लिए सख़्ती की जरूरत है और नियंत्रण की भी। कालाबाजारी हो रही है कि ये सरकार की नाकामी है, इसके लिए मीडिया को जिम्मेदार नहीं ठहरा सकता। जब सरकार तीन महीने की नींद के बाद जागी है तो कार्रवाई में तेजी लाने के लिए माहौल तो बनाना ही होगा। वरना किसके घर का चिराग स्वाइन फ्लू की चपेट में आ जाए ये कौन जानता है?
यहां यह ख़बर भी आ रही है कि टेमी फ्लू बनाने वाली दवा कंपनियों ने ये डर फैलाया है। इस दवा को तैयार करने वाली कंपनियों के शेयर बेतहाशा चढ़ गए हैं। यहां तक कहा जा रहा है कि साज़िश की शुरुआत अमेरिका से हुई। एक कंपनी के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर में कई बड़े नेता और अधिकारी शामिल हैं। इस बात में दम है। लेकिन दवा कंपनियों का कारोबार ऐसे ही चलता है। एक मामूली से मामूली बीमारी का इलाज कराने जाइए तो हजारों रुपये खर्च हो जाते हैं। गांव देहात में तो इलाज के चक्कर में लोगों की जमीन तक बिक जाती है। दो रुपये की दवा दस रुपये में मिलती है तो आठ रुपये में से कंपनी का मुनाफा निकाल कर बाकी पैसा तो कमीशनखोरी में ही खर्च होता है।
आखिरी बात आप लोग ज़िंदगी को आंकड़ों में मत बदलिए। यह मत कहिए कि हज़ार लोगों में “सिर्फ़ 24” मरे हैं। वो “24” भी इसी देश के नागरिक थे। उन्हें अभी काफी हंसना खेलना था। ज़िंदगी के कई बसंत देखने थे। कई सपनों को पूरा करना था। उन इंसानों को आंकड़ों में तब्दील करके आप उन सभी लोगों का अपमान कर रहे हैं जिनके घरों में हंसी की जगह सन्नाटा पसर गया है। उस मासूम रिदा के बारे में सोचिए जिसकी जान सरकार की लापरवाही ने ले ली। अगर जागरूकता तीन महीने पहले से फैलाई गई होती तो क्या रिदा इस तरह दम तोड़ती? शायद नहीं।
Recent Comments