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हिंदुस्तान और नई दुनिया का "सरकार राग"

उधार - टीओआई

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शनिवार को “हिंदुस्तान” पर नज़र डालने से लगा कि “स्वाइन फ्लू” का असर ख़त्म हो गया है। स्वाइन फ्लू ने भारत से पलायन कर लिया है। क्योंकि हिंदी-अंग्रेजी के तमाम अख़बारों में “अकेला” हिंदुस्तान ही एक ऐसा अख़बार था जिसके “फ्रंट पेज” पर से स्वाइन फ्लू की ख़बर “गायब” थी। “दैनिक जागरण” ने स्वाइन फ्लू को पहली ख़बर के तौर पर पेश किया। “दैनिक भास्कर” की पहली ख़बर बीजेपी में वसुंधरा की बगावत रही। और दूसरी ख़बर प्रतिभा पाटिल का भाषण रहा। जिसमें उन्होंने देशवासियों से स्वाइन फ्लू और सूखे से निपटने के लिए सरकारी प्रयासों में सहयोग की अपील की। भास्कर में तीसरी ख़बर के तौर पर स्वाइन फ्लू है। हालांकि इन दिनों सरकार राग में “नई दुनिया” भी सराबोर है। लेकिन उसने भी स्वाइन फ्लू को पहले पन्ने पर जगह दी है। बस हिंदुस्तान ही इकलौता अख़बार है जिसके पहले पन्ने पर स्वाइन फ्लू की कोई गंभीर ख़बर नहीं है। बहुत छोटे में ये जरूर मिलेगा कि मुंबई में गोविंदा की टोलियों ने एहतियात के साथ मटकियां फोड़ीं। मास्क पहन कर। बाकी ख़बरों में सरकारी घोषणाओं और सदइच्छा के अलावा कुछ नहीं झलकता। मतलब आज़ादी का सरकारी गान जारी है।

जहां तक अंग्रेजी अख़बारों की बात है। टाइम्स ऑफ इंडिया ने स्वाइन फ्लू की ख़बर को खास ध्यान देकर छापा है। हिंदुस्तान टाइम्स में भी ये दूसरी बड़ी ख़बर है। लेकिन द हिंदू ने फ्रंट पेज पर स्वाइन फ्लू की सिंगल कॉलम ख़बर देकर उसे भीतरी पन्नों पर ठेल दिया है।

दैनिक जागरण ने स्वाइन फ्लू से जुड़ी अपनी ख़बर में सरकार पर सवाल उठाया है। दैनिक जागरण के मुताबिक स्वाइन फ्लू के मरीजों को बेतहाशा टैमीफ्लू देने से ये दवा अपना असर खो सकती है। अगर ऐसा हुआ तो स्थिति और बिगड़ेगी। कुछ दिन पहले ऐसी ही ख़बर गार्डियन में छपी थी। ब्रिटेन समेत यूरोप के कई देशों में बहस चल रही है कि अगर टैमी फ्लू का इस्तेमाल व्यापक स्तर पर किया गया तो स्वाइन फ्लू में वायरस में प्रतिरोधी (रजिस्टेंट) क्षमता का विकास हो सकता है। जिसके बाद टैमी फ्लू का असर ख़त्म हो जाएगा। अब यह बहस भारत में भी शुरू हो गई है। यही नहीं उस रिपोर्ट में सरकारी इंतजामों को बी नाकाफी बताया गया है। बॉक्स में एक ख़बर यह भी है कि शुक्रवार को मौत का आंकड़ा कम रहने से थोड़ी राहत महसूस की जा रही है।

दैनिक भास्कर ने भी स्वाइन फ्लू के इलाज और टैमी फ्लू को लेकर चल रही बहस पर रिपोर्ट छापी है। टैमी फ्लू के साइड इफेक्ट की भी चर्चा है। इसके अलावा एम्स में एक डॉक्टर के स्वाइन फ्लू की चपेट में आने की ख़बर भी है।

हिंदुस्तान में सिटी पेज पर बताया गया है कि नोएडा के एक छात्र को स्वाइन फ्लू हो गया है। उसके अलावा स्वाइन फ्लू से जुड़ी दो ख़बरें 16वें पन्ने पर हैं। उस पेज पर पहली ख़बर है “अधिक उम्र के लोगों को नहीं है फ्लू का ख़तरा।” इसे कहते हैं सकारात्मक रिपोर्टिंग। दूसरी ख़बर है “क्वारंटाइन से सरकार को लाभ, मरीज को नुकसान।” इसमें बताया गया है कि कैसे मरीजों का इलाज उनके घर पर करने की नीति से नुकसान हो सकता है। छह लाइन की एक और ख़बर है कि “दिल्ली में स्वाइन फ्लू के 13 और मामलों की पुष्टि।” सवाल उठता है कि नोएडा की ख़बर सिटी पेज पर है तो इसे देश वाले पन्ने पर क्यों छापा गया है। वैसे ये भी सोचने लायक बात है कि स्वाइन फ्लू की ख़बरों को क्या एक पन्ने पर जगह नहीं दी जा सकती? एक विषय से जुड़ी ख़बरों को छितरा कर परोसने में संपादकों को क्या मजा आता है? कोई राष्ट्रीय समस्या हो या फिर चुनौती तो उसे शहर, राज्य, देश और दुनिया के पन्नों पर अलग-अलग देने का क्या तुक?

छितरा कर ख़बर नई दुनिया में भी परोसी गई है। पहले पन्ने पर है कि “निजी अस्पतालों को जांच की छूट दी जाएगी।” पांचवे पन्ने पर है कि “दिल्ली में स्वाइन फ्लू के तेरह मामले।” छठे पन्ने पर है “गाजियाबाद में स्वाइन फ्लू का पांचवा संदिग्ध मरीज” और उसी पेज पर वॉक्स में ख़बर है – “दो छात्रों को स्वाइन फ्लू।” मतलब ख़बर कई पन्नों पर हैं लेकिन कहीं भी ढंग से नहीं। किसी भी ख़बर में कोई इनसाइट नहीं। बस सतही तौर पर सब उठा कर रख दिया गया है।

सरकार भी यही चाहती है। सूचना प्रसारण मंत्रालय ने मीडिया संस्थानों को हिदायत भी दी है कि वो लोगों को डराएं नहीं। ये बीमारी उतनी गंभीर नहीं है। लगता है हिंदुस्तान और नई दुनिया ने वो सरकारी लाइन खरीद ली है। तभी तो सरकार की नीतियों पर सवाल उठाना बंद कर दिया है। खामियों से ज़्यादा जोर अच्छी ख़बरों पर है। स्वाइन फ्लू पर हिंदुस्तान और नई दुनिया का “सरकार राग” जारी है।

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