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न अखबार, न आंदोलन, यह एक छल का उत्‍सव है

हरिवंश जी हमारे समय के उन आख़िरी संपादकों में से हैं, जिनके साथ सामाजिक आंदोलन की पृष्‍ठभूमि है, विचार का टैग और सफलता के जनपक्षधर मानक हैं। देश के बुद्धिजीवियों के बीच प्रभात खबर की आज जैसी जगह है, उसके पीछे हरिवंश जी का विजन है, उनकी अपनी धार है। 14 अगस्‍त 1984 को शुरू हुआ यह अखबार आज 25 साल का हो गया है। हम कह सकते हैं कि इन 25 सालों में ये झारखंड के लोगों की आवाज़ बना। ऐसी आवाज़ कि बड़ी पूंजी के दो अखबार मिलकर भी उसे खामोश नहीं कर सके। जाहिर है, 25 सालों में बने इस भरोसे और इस आत्‍मविश्‍वास को पाठकों के सामने एक ब्रांड के रूप में पेश करने का यही मौका है।

रांची में तीन दिनी उत्‍सव की कल शुरुआत हुई। झारखंड की धोनी धोनी करने वाली राजधानी की ज़्यादातर दीवारें पिछले कुछ दिनों से प्रभात खबर के स्‍लोगन से पटी है – अखबार नहीं आंदोलन। इस आंदोलनी अखबार के उत्‍सव में जो प्रमुख चेहरे मंच पर छाये रहे – उनमें मौजूदा राज्‍यपाल तो थे ही, झारखंड के दो पूर्व मुख्‍यमंत्री बाबूलाल मरांडी और अर्जुन मुंडा भी थे। पूर्व केंद्रीय मंत्री करिया मुंडा थे। मौजूदा केंद्रीय मंत्री सुबोधकांत सहाय थे। इन सबने प्रभात खबर को शुभकामना दी और पत्रकारिता पर बहस की।

मैं, क्‍योंकि बचपन से इस अखबार का पाठक रहा हूं – मेरे लिए यह एक दुखद प्रसंग इसलिए भी रहा – क्‍योंकि जन-सुशासन-आंदोलन की बात करने वाला ये अख़बार अपने 25 साल की कामयाबी को उन नेताओं के साथ क्‍यों बांट रहा है, जो झारखंड को गर्त में ले जाने के लिए ज़ि‍म्‍मेदार हैं। यह एक सवाल भी है कि अखबार के पन्‍नों पर दिखने वाले क्रांति के रंग समारोह स्‍थल रांची क्‍लब में स्‍याह क्‍यों पड़ गये? क्‍या ये कुछ वैसा ही नहीं है कि डोमा उस्‍ताद की रात्रि महफिल में वे भी नज़र आ रहे थे – जो दिन के उजाले में समाज को बदलने की बात करते थे।

बात तब समझ में आती है, जब हम देखते हैं कि झारखंड की पैदाइश के बाद सबसे अधिक समय मुख्‍यमंत्री रहे बाबूलाल मरांडी और अर्जुन मुंडा के खिलाफ़ अख़बार का स्‍वर कभी तीखा नहीं रहा। ग्रेटर रांची की आड़ में आदिवासियों के दमन की साज़िश रचने वाले बाबूलाल मरांडी के इस सपने को प्रभात खबर ने ही सराहा था। उन्‍हीं के वक्‍त में दीपांकर भट्टाचार्य को पकड़कर जेल में डाल दिया गया था। अलबर्ट एक्‍का चौक पर आदिवासी अधिकारों के लिए धरना दे रही दयामनी बरला पर मरांडी की पुलिस ने बेहिसाब लाठियां बरसायी थीं। इन्‍हीं मरांडी पर सीपीआईएमएल के जुझारू विधायक और झारखंड विधानसभा में विपक्ष की अकेली आवाज़ रहे कॉमरेड महेंद्र सिंह की हत्‍या करवाने का आरोप है। लेकिन प्रभात खबर मरांडी के सुर में आज इसलिए गाना चाहता है, क्‍योंकि वे झारखंड की सत्ता-राजनीति के कल (भविष्‍य) हैं – ये सब जानते हैं।

अर्जुन मुंडा के समय में भी आंदोलनकारियों का दमन किया गया। दफ्तरी भ्रष्‍टाचार की अति हो गयी। ऐसा नहीं था कि अखबार के पन्‍नों पर ये सब दर्ज नहीं होता था। मद्धिम स्‍वर में ही सही, खबर छपती ज़रूर थी – लेकिन इस छप-छुप का एक पहलू ये भी था कि अर्जुन मुंडा हरिवंश जी के घर जाकर नाश्‍ता कर आये। उनका पत्रकारीय विपक्षबोध इसी चालाकी से अर्जुन मुंडा ने हर लिया। ये वो समय था, जब प्रभात खबर ने बैजनाथ मिश्र नाम के एक आदमी को संपादक बनाया हुआ था, जो बीजेपी के लिए कभी बूथ मैनेजमेंट का काम किया करता था। अखबार को अपनी पार्टी और सरकार की भरपूर ढाल उसने बनायी, जिसका प्रसाद उसे मिला। झारखंड के पहले सूचना कमिश्‍नर बनाये गये। आज भी उनकी प्रभात खबर के मानद संपादकों की लिस्‍ट में बैजनाथ मिश्र को हरिवंश जी रखते हैं।

मैं परेशान इसलिए होता हूं क्‍योंकि इस अखबार से मैं प्‍यार करता हूं। मुझे लगता है कि मुझ जैसे पाठक से धोखा कैसे हो सकता है? सच ये है कि ये मोह झारखंड बनने के पहले पैदा हुआ मोह है – जब वाकई प्रभात खबर आंदोलनी तेवर के साथ निकलता था। भागलपुर दंगे से लेकर रांची के पागलखाना और अस्‍पताल की कुव्‍यवस्‍था के खिलाफ मुहिम से लोगों के दिल में जगह बनाने वाला प्रभात खबर झारखंड बनने के बाद बदल गया। हर साल 15 नवंबर को झारखंड की चिंता करने की नौटंकी के रूप में निकाले जाने वाले मोटे और भव्‍य विशेषांक के अलावा इस अखबार के सरोकार खत्‍म हो गये। इनके बुद्धिजीवियों की लिस्‍ट में उदारीकरण की मांद से दहाड़ने वाले अरुण शौरी, साम्राज्‍यवादी देशों के एजेंडे से अपनी पर्यावरणीय समझ को उगलने वाले भरत झुनझुनवाला, रिश्‍वत के आरोप में पदच्‍युत हुए झारखंड के पहले राज्‍यपाल प्रभात कुमार, उद्योगपति पवन मारू के लिए राज्‍यसभा की राजनीतिक गोटियां सेट करने वाले भगवा पत्रकार बलवीर दत्त जैसे नाम हैं – जो बताते हैं कि प्रभात खबर की असल विचारधारा क्‍या है?

ये अखबार अपनी
उस ब्रांडिंग की खा रहा है, जिसे उन पत्रकारों ने बनाया, जो वाकई समाज को समझना चाहते थे, उनसे जुड़ना चाहते थे। लेकिन हरिवंश जी ने उन सबको वक्‍त के साथ किनारे किया। ऐसे लोगों का गिरोह बनाया, जो सतही न्‍यूज सेंस को कॉरपोरेटी प्रजेंटेशन के कपड़ों में पहना कर दफ्तर पहुंचते थे। एक आरोप तो ये भी है कि राजपूतों को उन्‍होंने ज्‍यादा प्रश्रय दिया। पटना में लगभग सभी डिसिजनमेकर राजपूत हैं। संपादक उन्‍होंने श्रीश्री रविशंकर के एक राजपूत चेले को बनाया हुआ है।

बहरहाल, बातें बहुत हैं – ये सब दुख के बयान हैं – दुख के किस्‍से हैं। तथागत किस्‍तों में उसे रखेगा। अभी तो हम इतना ही चाहते हैं कि आंदोलन के नारे के साथ निकलने वाला ये अखबार पाठक-जन से छल न करे। 25 साल के लिए शुभकामनाएं।

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9 Responses to न अखबार, न आंदोलन, यह एक छल का उत्‍सव है

  1. शशि सिंह Reply

    August 16, 2009 at 2:42 pm

    तभागत भाई, झंडे के रंग का चश्मा लगाकर किसी के कार्य का मूल्यांकन करने में यही दिक्कत है। इतर रंग का एक आध छींटे दीखे नहीं कि अपने सारे अच्छे कर्मों के बावजुद भी मूल्यांकित व्यक्ति दुश्मन खेमे का लगने लगता है। अब देखिये न हरिवंश जी आपको भगवा चोले में दीख रहे हैं। भगवा वालों को वे लाल के लाल लगते हैं। कुछ को तो वे हाथ के साथ भी दीखते हैं। जब उनके गांव-जवार के चंद्रशेखर प्रधानमंत्री बने और इन्हें उनका प्रेस अटैची बनाया गया तब से ये बहुतों को आज तक राजपूतवादी लगते हैं।

  2. virendra jain Reply

    August 16, 2009 at 3:52 pm

    फिर भी औरों से बेहतर

  3. Kishore Kumar Reply

    August 16, 2009 at 9:35 pm

    मुझे पता नहीं कि हरिवंश कितने बड़े राजपूत हैं। लेकिन मैं यह जानता हूं कि उन्होंने प्रभात खबर के अनेक संस्करणों में अलग-अलग जातियों के पत्रकारों को संपादक बनाया और उन्हें काम करने का मौका दिया।
    क्या वैद्यनाथ मिश्र, सुशील भारती, अविनाश दास, अनुराग अन्वेषी, विष्णु राजगढ़िया, राघवेंद्र और न जाने और कितने ही लोग, जो प्रभात खबर के विभिन्न संस्करणों के स्थानीय संपादक हुए, वे क्या राजपूत थे? नहीं न। फिर यदि कभी कोई राजपूत जाति का पत्रकार किसी संस्करण का स्थानीय संपादक बन जाता है तो इस तरह लांक्षित करने का औचित्य क्या है? यह विकृत मानसिकता का परिचायक नहीं तो और क्या है?
    मधुकर जी प्रभात खबर में काम करते हैं। क्या इसके पीछे उनकी राजपूत पृष्ठभूमि काम कर रही है? योग्यता का कोई मतलब नहीं है? क्या हरिवंश जी को राजपूत पत्रकारों से इसलिए दूरी बना लेनी चाहिए कि उन पर जातिवादी होने का ठप्पा नहीं लगने पाए और अजदक जैसों को सुकून मिल सके।
    अजदक की कुछ बातों से सहमति की गुंजाइश है। लेकिन निचले स्तर पर जाकर आधारहीन बातें करना निंदनीय है।

  4. विनीत कुमार Reply

    August 16, 2009 at 10:11 pm

    बिल्कुल सहमत हूं।..

  5. अविनाश Reply

    August 17, 2009 at 1:21 am

    मुझे लगता है कि हरिवंश जी और उनके अख़बार प्रभात ख़बर को समझने में कुछ हड़बड़ी द‍िखायी गयी है।

  6. विद्रोही Reply

    August 17, 2009 at 11:20 am

    बाकी बातें तो मुझे मालूम नहीं, लेकिन तथागत जी ने 25 साला जश्न के बारे में जो बातें लिखी हैं, वो बिलकुल जायज़ लगती हैं। आंदोलनी अखबार के जश्न का जो चेहरा उन्होंने सामने रखा है, उसे किस तरह वाज़िब ठहराया जा सकता है? क्या किसी अख़बार के जरिये दाग़दार नेताओं और सत्ता की जोड़तोड़ में लगे लोगों को महिमामंडित किया जाना ठीक है?

    इस मुद्दे पर अविनाश जी, शशि जी या कोई और ज्ञानी सज्जन थोड़ा और प्रकाश डालें तो अच्छा होगा।

  7. विद्रोही Reply

    August 17, 2009 at 11:25 am

    किशोर कुमार जी ने प्रभात खबर के स्थानीय संपादकों की जो सूची गिनायी है, उसमें एक नाम अविनाश दास का भी है। क्या ये मोहल्ला लाइव वाले अविनाश ही हैं? अविनाश जी/ किशोर जी, कृपया स्पष्ट करें?

  8. अमित कुमार Reply

    August 18, 2009 at 6:51 pm

    इतनी जल्दी भी नहीं है यह. 25 साल तो हो गए अविनाश जी? क्या जब चीजें घट रही हों, तो उन्हें समझाने की कोशिश मूर्खता है? मुझे लगता है कि यह बहस अपने अंतिम नतीजे तक पहुचे ताकि आपका रंग भी लोगों को दिखे. आपकी क्रांतिकारिता का झूठ भी पता चले लोगों को.
    बेशक प्रभात खबर ने एक समय में बेहद उल्लेखनीय भूमिका निभाई, उसके तेवर जनपक्षी थे, लेकिन क्या इसका श्री सिर्फ हरिवंश जी को दिया जाये? इसमें उन लोगों का कोइ योगदान नहीं जो वास्तव में जनपक्षी थे, आन्दोलन की तरह पत्रकारिता करते थे न कि हरिबंश जी की तरह टेबल पर बैठ कर आन्दोलन का छद्म मायालोक रचते थे? सारा श्रेय हरिवंश का? और वह भी इस बेहया तर्क के आधार पर कि उन्होंने उन पत्रकारों को मौका दिया? क्या प्रभात खबर कि एक छवि बनाने के तहत ऐसा नहीं किया गया, जब वह छवि उपयोगी थी? अब जब वह ज़रूरी नहीं रही तो उन्हें किनारे कर दिया गया. पूछा जाना चाहिए कि पटना में एक गुमनाम से रहे अखबार को मुख्यधारा की पहचान-वैसी ही जनपक्षी तेवर के साथ-देनेवाले संपादक अजय कुमार को हाल ही में अख़बार क्यों छोड़ना पडा? श्रीनिवास, फैसल, रेयाज़ जैसे लोग संस्थान छोड़ते गए और अश्क, संतोष झा, स्वयं प्रकाश जैसे लोग अखबार में प्रमुखता पाते गए? अख़बार को अब उन विचारों कि ज़रुरत नहीं रही, जो जनता को दिशा देते हों. यह अब पूरी तरह सरकार कि दलाली पर उतर आया है, यह पिछले काफी समय से पटना-रांची में छप रहे इशान करन-दर्शक-हरिवंश नाम से छ्प रहे आलेखों और फिर खबरों से पता लगता है.

  9. किशोर कुमार Reply

    August 21, 2009 at 11:00 pm

    आप सही हैं विद्रोही जी, मुहल्लाkkumar लाइव वाले अविनाश दास ही हैं।

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