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मोहन से मनमोहन तक

अब यह कैसा संयोग है, इसका फैसला पाठक करेंगे। 14 अगस्त को पूरे देश ने जन्माष्टमी मनाया। कारागृह में जन्म लेने वाले कृष्ण ने कैसे कुरुक्षेत्र में महाभारत का महाविगुल फूंका, इस कथा से हर कोई वाकिफ है। ऐसे महानायक का जन्मदिन तो जश्न के साथ मनेगा ही। उस पर से गीता के कर्मयोग की बात करने वाले भगवान का ही दूसरा चेहरा रासरचैया वाला भी है। मुरली की धुन पर गोपियों को बेसुध कर देने का हुनर किशन कन्हैया के अलावा और किसके पास हो सकता है। मीरा ने तो गाकर कह दिया, नहीं तो परदे की ओट में ना जाने कितनी मीराएं अब भी गाती होंगी- मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो ना कोई, जाके सिर मोर मुकुट, मेरो पति सोई। भर मुंह मक्खन लपेटने वाले माखनचोर मोहन, मुरली बजाकर गोकुल को धन्य करने वाले यशोदानंदन, गोपियों संग रास रचाने वाले कन्हैया, कंस का वध करने वाले देवकीपुत्र, संदीपनी मुनी के आश्रम में दीक्षा लेने वाले वासुदेव, सुदामा को दो लोक का स्वामी बना देने वाले अद्भुत मित्र नंदकिशोर, द्रौपदी की लाज बचाने वाले माधव, अर्जुन के सखा, गुरु और सारथी केशव और महाभारत के महानायक भगवान कृष्ण। 14 अगस्त को जन्माष्टमी पड़ी, तो पूरे देश ने एक बार फिर भक्ति और अपनी शक्ति के साथ मोर मुकुट वाले को याद किया।

संयोग देखिए कि अगली सुबह ही 15 अगस्त था। देश की आजादी की 62वीं सालगिरह। और तब लाल किले के प्राचीर से मनमोहन सिंह ने देश के हालात का विवेचन किया। वे प्रधानमंत्री हैं और प्रधानमंत्री के चश्मे से देश जैसा दिखता है, उन्हें भी दिखा और उन्हें उसे पूरे देश को दिखाया। अर्थशास्त्री हैं, लिहाजा विकास दर पर सरपट भागते दिखे और 18 साल में इतनी सियासी बोल तो समझ ही गये हैं कि भूख और अन्नाभाव में किसी को मरने नहीं देंगे सरीखे जुमले बोल सकें। समाज के आखिरी आदमी को जेहन में रखकर राजनीति करने वाले मोहनदास करमचंद गांधी को भी एकाध बार याद कर लिया। रस्म अदायगी जो है। वैसे भी नेहरू-इंदिरा-राजीव के बखान में अगर गांधी को अपनी जुबान पर ना लाएं तो जगहंसाई नहीं होगी! इन सबके बीच लाल किले से प्रधानमंत्री ने एक महत्वपूर्ण सवाल उठाया पानी का। प्रधानमंत्री ने पानी बचाने की बात की। सवाल उठता है कि किससे वह पानी बचाने के लिए कह रहे हैं?

उन किसानों से, जिनके खेतों के लिए भरपूर पानी नहीं मिलता या महानगरों में रहने वाले उन निम्नवर्गीय लोगों से, जो पानी की दो चार बाल्टी के लिए कतार लगाए खड़े रहते हैं। पानी का निजीकरण तो मनमोहन सिंह की ही उदारवादी कही जाने वाली अनुदार नीतियों का नतीजा है। जब 12 रुपये में एक लीटर बोतलबंद पानी मिलेगा तो पानी के कारोबार करने वाले कृत्रिम संकट भी खड़ा करेंगे। मध्यप्रदेश की शिवनाथ नदी के निजीकरण का सवाल जब कुछ साल पहले उठा था, तब क्यों चुप्पी साध ली थी देश के रहनुमाओं ने? आखिर नदियों में गंदगी किनके कारखानों से उड़ेली जाती हैं? जिस पूंजी के तलवे पर देश को फिसलते देख प्रधानमंत्री विकास की रफ्तार मापते हैं, उस पूंजी के मालिकों और गुलामों ने ही पानी पर सबसे ज्यादा मनमानी की है। नतीजा यह निकला कि लालकिला से प्रधानमंत्री को पानी के प्रश्न पर पानी-पानी होना पड़ रहा है।

यह भी एक संयोग ही है कि जिस लाल किले से प्रधानमंत्री ने पानी का सवाल छेड़ा, उसी लाल किले से थोड़ी दूरी पर यमुना बहती है। बहती है कहने से ज्यादा अच्छा है कि यमुना अपने दुर्भाग्यपूर्ण वर्तमान पर सिसकती है। प्रधानमंत्री की पार्टी का ही दिल्ली में भी राज है। कोई दस साल पहले उनकी महाप्रतापी मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने यमुना को टेम्स बनाने का ऐलान किया था। दस साल में यमुना और अधोगति को प्राप्त हुई। मुख्यमंत्री के इस नाकारेपन को देखकर यह कहना गलत नहीं होगा कि गलती से टेम्स की साफ-सफाई का जिम्मा इनका होता, तो यह टेम्स को दस साल में यमुना जरूर बना देंती। क्या लाल किला से पानी पर आंखों से पानी बहाने वाले प्रधानमंत्री ने कभी शीला से पूछा कि कैसे सुधरेगी यमुना? क्यों नहीं राजधानी से ही पानी के सवाल पर मनमोहन ने कोई सार्थक कदम उठाया। प्रधानमंत्री जी चाहते तो अपने नाम को सार्थक कर देते। आखिर एक मोहन ने ही कालियानाग को कभी यमुना से भगाकर उसके पानी को विषैला होने से बचाया था। लेकिन आज के कालियानाग तो सरकारी अनुदान पर फलने-फूलने लगे हैं। न्याय के लिए उस मोहन ने महाभारत करा दिया था, अपने हक को भी हमारे मनमोहन अमेरिका और इंग्लैंड की जूती में डाल देते हैं। इंग्लैंड में जाकर भारत की अंग्रेजी राज की तारीफ और शर्म-अल-शेख में बलुचिस्तान का राग क्या कहता है? तो क्या मोहन से मनमोहन तक आते आते यमुना का सारा पानी बह चुका है?

ऐसा कहना ठीक नहीं होगा, क्योंकि बीसवीं सदी में भारत ही नहीं, दुनिया को हमारे एक मोहन ने मंत्रमुग्ध कर दिया था। वह हमारे लिए राष्ट्रपिता है तो दुनिया के लिए महात्मा गांधी। समाजवाद के हीरो डॉक्टर राम मनोहर लोहिया ने कृष्ण और गांधी में एक खूबसूरत तुलना की थी। कृष्ण यमुना के किनारे पैदा हुए और समुद्र के किनारे द्वारका में उन्होंने संसार का त्याग किया। गांधी द्वारका के पास ही पैदा हुए और यमुना के पास उनका देहांत हुआ। कह सकते हैं कि दोनों की हत्या हुई। एक को एक बहेलिये ने भूल से तीर मार दिया तो दूसरे को एक सड़ी गली मानसिकता की गोलियों का शिकार होना पड़ा।

विचित्र मणि

विचित्र मणि

लेकिन दोनों मोहन सच का सामना करना जानते थे। दोनों न्याय के लिए आखिरी दम तक लड़ना जानते थे। दोनों ही भारत के लिए महान विभूति बन गये। लेकिन अफसोस, दो-दो मोहन के बाद एक ऐसे मनमोहन को यह देश देख रहा है, जो शायद राष्ट्रीय स्वत्व को ठीक से नहीं जानते।

(विचित्र मणि टेलीविजन में वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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