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खबर की राजनीति का दूसरा नाम प्रभात खबर

मुद्दे प्रभात खबर के लिए जरूरत भर होते हैं। ये अखबार बड़ी पार्टियों के एजेंट की तरह काम करता है। कहा जा सकता है कि छोटी और अल्‍पकालिक पार्टियों की अराजकता के बहाने आक्रामक तेवर अख्तियार कर पाठकों को भरमाने वाले इस अखबार ने मधु कोड़ा के एक खास आदमी विनोद सिन्‍हा के बारे में दो साल पहले बैनर खबर छापी थी। मधु कोड़ा उस वक्‍त मुख्‍यमंत्री थे और और विनोद सिन्‍हा उनके निकट के आदमियों में से एक। विनोद सिन्‍हा को हम राष्‍ट्रीय राजनीति में उभरे अमर सिंह जैसों का झारखंडी संस्‍करण कह सकते हैं।

प्रभात खबर ने छापा था कि जिस विनोद सिन्‍हा के पास मधु कोड़ा के मुख्‍यमंत्री बनने से पहले महज एक स्‍कूटर था, उसके पास साल भर के भीतर कई-कई मोटरगाड़ियां कैसे आ गयीं? यानी विनोद सिन्‍हा के खाकपति से करोड़पति होने की इस कहानी ने उन दिनों झारखंड विधानसभा को हिला कर रख दिया था। जिस व्‍यवस्‍था में एक आदमी गरीब से और गरीब हो रहा हो, उसी व्‍यवस्‍था में एक चालू आदमी सत्ता संस्‍थानों की दलाली करते हुए कैसे अमीर हो जाता है – इसकी कहानी प्रभात खबर ने प्रमुखता से छापी थी। विपक्षी भाजपा और जदयू के विधायकों ने इसी मुद्दे पर विधानसभा नहीं चलने दी थी।

यह एक बड़ा मुद्दा था। इसे एक मुहिम की तरह चलाया जा सकता था। ऐसे लोगों की फेहरिस्‍त तैयार की जा सकती थी, जो अलग-अलग मुख्‍यमंत्रियों के समय में अप्राकृतिक और आश्‍चर्यजनक तरीके से अमीर हो गये। बाबूलाल मरांडी, अर्जुन मुंडा और शिबू सोरेन के समय में भी ऐसे लोग थे, लेकिन प्रभात खबर ने रहस्‍यमय तरीक़े से दो दिन छाप कर विनोद सिन्‍हा के मामले में भी खामोशी ओढ़ ली। उसके बाद उस वक्‍त के सिटी संपादक ने अंदर के पन्‍नों पर विनोद सिन्‍हा से जुड़ी एक खबर (फॉलोअप) लगाने की कोशिश की, जिसकी भनक हरिवंश जी को पड़ी। बताया जाता है कि हरिवंश जी उस वक्‍त रांची में नहीं थे, उन्‍होंने फोन पर जवाब तलब किया। सिटी संपादक ने उन्‍हें फोन पर पूरी खबर सुनायी और हरिवंश जी का जवाब था कि इसे रोक दो – मैं आता हूं फिर देखूंगा।

दो दिनों बाद वे आये और उन्‍होंने सिटी संपादक को बुला कर कहा कि “हम व्‍यक्तिवादी नहीं हैं।” हमारा काम था, व्‍यवस्‍था की एक कमज़ोरी को एक्‍सपोज़ करना, वो हमने कर दिया। अब हम आगे बढ़ें। बात हरिवंश जी ने सही कही थी और एक बौद्धिक के रूप में ये तर्क देकर उन्‍होंने सिटी संपादक को कन्विंस भी कर दिया। लेकिन सवाल ये है कि पाठक की जिज्ञासा के साथ किस किस्‍म का मज़ाक़ इस पूरे प्रकरण के पीछे उड़ाया गया। पाठक की जिज्ञासा हो सकती है कि विनोद सिन्‍हा पर मुख्‍यमंत्री ने क्‍या कार्रवाई की? क्‍या मुख्‍यमंत्री आवास और कार्यालय में विनोद सिन्‍हा के घुसने पर रोक लगायी गयी? या सत्ता की गली में दलालों पर निगरानी रखने के लिए कोई नियम बनाये गये? नहीं, अचानक इस पूरे प्रकरण को ब्‍लैक आउट कर दिया गया – मानो इस खबर को रोकने के लिए बड़ी डील हुई हो। हरिवंश जी चाहे जो तर्क दें, लेकिन पाठकों के बीच उन दिनों इस अघोषित डील की बड़ी चर्चा थी।

प्रभात खबर चाहे खबर के रूप में हो, चाहे कर्मचारी के रूप में, लोगों का इस्‍तेमाल करना जानता है। रामकुमार नाम के एक सज्‍जन को उन्‍होंने अपने यहां नौकरी दी, जो सीपीआई के पुराने कार्यकर्ता थे और अर्जुन मुंडा से उनकी पुरानी दोस्‍ती थी। अर्जुन मुंडा जब मुख्‍यमंत्री बने, तो रामकुमार ने ही हरिवंश जी के यहां नाश्‍ते के लिए अर्जुन मुंडा को ले गये। लेकिन जैसे ही अर्जुन मुंडा से हरिवंश जी के व्‍यक्तिगत संपर्क प्रगाढ़ हुए, रामकुमार को प्रभात खबर से अलग कर दिया गया। वजह बने बैजनाथ मिश्र, जो प्रभात खबर के भीतर बीजेपी के भोंपू थे और अखबार के लिए बड़े पैमाने पर सरकारी विज्ञापनों को मैनेज करते थे। रामकुमार पर आरोप था कि बैजनाथ मिश्र के साथ बदतमीजी से बात करते हैं।

अगली किस्‍त में देखेंगे, कैसे हरिनारायण सिंह जैसे लोग हरिवंश जी के साथ प्रभात खबर को खड़ा करने में दिन-रात लगे रहे और कैसे एक बार पैसों की सख़्त ज़रूरत होने पर उन्‍होंने हरिवंश जी (प्रभात खबर प्रबंधन) से मदद मांगी और आर्थिक स्थिति कमज़ोर होने का हवाला देकर प्रबंधन के मदद से इनकार करने पर वे टूट गये और हिंदुस्‍तान से ऑफर आने के बाद जब उन्‍होंने हिंदुस्‍तान ज्‍वाइन किया – उसके बाद हरिवंश जी का रुख हरिनारायण जी के प्रति क्‍या रहा। इंतज़ार कीजिए कल तक।

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2 Responses to खबर की राजनीति का दूसरा नाम प्रभात खबर

  1. शशि सिंह Reply

    August 18, 2009 at 4:47 pm

    ये हुई न बात! भीतरखाने की ये बातें रोचक भी लग रही हैं और प्रासांगिक भी। हरिनारायण सिंह वाले प्रकरण पर और जानने की इच्छा है… उम्मीद है आप विस्तार से रोशनी डालेंगे।

    आपकी ख़बरों के स्रोत क्या हैं ये तो नहीं पूछ नहीं सकता बस इतनी उम्मीद जरूर है कि अखबार से अपने रिश्तों का भी कभी जिक्र करेंगे। ऐसा करना जरूरी तो नहीं लेकिन इससे विश्वसनीयता में इज़ाफा होगा।

    जनतंत्र से आग्रह करूंगा कि इन मामलात पर प्रभात ख़बर का पक्ष भी जानने का प्रयास करे। इससे स्थापित मान्यताओं को एक नई रोशनी में देखा जा सकेगा।

  2. लाल सन्त कुमार नाथ शाहदेव Reply

    August 27, 2009 at 3:53 pm

    सबसे पहले मेरी तरफ से धन्यवाद पूरानी याद ताजा करने के लिये। मै प्रभात खबर का प्रथम अंक से पाठक रहा हूं। यही कारन है जो आपका आलेख दिल को छू गया। तथागत आप जो भी हैं,इसी तरह लिखते रहें,मेरी शुभकामनणा आपके साथ है।
    मधु कोडा प्रकरन में मूझे भी दाल में काला ही लग रहा था,क्योंकी अगर कुछ नहीं था तो इतनी दिनो की चूप्पी क्यों? जब 25वीं वर्षगाँठ पर अपनी उपलब्धियों का लेखा जोखा विज्ञापित किया गया तो कोडा़ आगबबुला हो गये। जो सर्वविदीत है।
    आपके अगले लेखका इन्तजार रहेगा। जल्दी करें।

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