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ब्रह्म से संवाद करते पंडित प्रभाष जोशी का विराट रूप

“सिलिकॉन वैली अमेरिका में नहीं होता, अगर दक्षिण भारत में आरक्षण नहीं लगा होता. दक्षिण के आरक्षण के कारण जितने भी ब्राह्मण लोग थे, ऊंची जातियों के, वो अमरीका गये और आज सिलिकॉन वेली की हर आईटी कंपनी का या तो प्रेसिडेंट इंडियन है या चेयरमेन इंडियन है या वाइस चेयरमेन इंडियन है या सेक्रेटरी इंडियन है. क्यों ? क्योंकि ब्राह्मण अपनी ट्रेनिंग से अवव्यक्त चीजों को हैंडल करना बेहतर जानता है. क्योंकि वह ब्रह्म से संवाद कर रहा है. तो जो वायवीय चीजें होती हैं, जो स्थूल, सामने शारीरिक रूप में नहीं खड़ी है, जो अमूर्तन में काम करते हैं, जो आकाश में काम करते हैं. यानी चीजों को इमेजीन करके काम करते हैं. सामने जो उपस्थित है, वो नहीं करते. ब्राह्मणों की बचपन से ट्रेनिंग वही है, इसलिए वो अव्यक्त चीजों को, अभौतिक चीजों को, अयथार्थ चीजों को यथार्थ करने की कूव्वत रखते है, कौशल रखते हैं. इसलिए आईटी वहां इतना सफल हुआ. आईटी में वो इतने सफल हुए.”

ये कौन बोल रहा है और इस समय ऐसा क्यों बोल रहा है। राज्यसभा के लिए राष्ट्रपति की तरफ से मनोनित लोगों की सूची जारी होने से ठीक पहले ये कौन है जो अपने ब्राह्मण रूप का सार्वजनिक प्रदर्शन कर रहा है। इस खास समय में एक साथ हिंदुत्ववादियों -आरएसएस और कम्युनिस्टों को आजादी की लड़ाई का गद्दार कहते हुए वो क्या हासिल करना चाहता है? राजीव गांधी को ब्राह्मण होने की वजह से सबसे अच्छा राजनेता बताने वाला और इंदिरा गांधी के नेतृत्व कौशल का कारण ब्राह्मण मूल को बताने वाला आखिर किसे खुश करने की कोशिश कर रहा है? ये हैं पत्रकारिता के शलाका पुरुष, शिखर व्यक्तित्व पंडित प्रभाष जोशी का विराट रूप। हे अर्जुन, अब भी क्या संदेह का कोई कारण बचा है? हे निपट अज्ञानी, अगर अब भी संशय है तो ले आगे पढ़-

“मान लीजिए कि सचिन तेंदुलकर और विनोद कांबली खेल रहे है. अगर सचिन आउट हो जाये तो कोई यह नहीं मानेगा कि कांबली मैच को ले जायेगा. क्योकि कांबली का खेल, कांबली का चरित्र, कांबली का एटीट्यूड चीजों को बनाकर रखने और लेकर जाने का नहीं है. वो कुछ करके दिखा देने का है. जिताने के लिए आप को ऐसा आदमी चाहिए, जो लंगर डालकर खड़ा हो जाये और आखिर तक उसको ले जा सके यानी धारण शक्ति वाला. अब धारण शक्ति उन लोगों में होती है, जो शुरू से जो धारण करने की प्रवृत्ति के कारण आगे बढ़ते है. अब आप देखो अपने समाज में, अपनी राजनीति में. अपने यहां सबसे अच्छे राजनेता कौन है ? आप देखोगे जवाहरलाल नेहरू ब्राह्मण, इंदिरा गांधी ब्राह्मण, अटल बिहारी वाजपेयी ब्राह्मण, नरसिंह राव ब्राह्मण, राजीव गांधी ब्राह्मण (पिता का नाम फिरोज गांधी हुआ तो क्या हुआ-चार्वाक सत्य). क्यों ? क्योंकि सब चीजों को संभालकर चलाना है इसलिए ये समझौता वो समझौता वो सब कर सकते है. बेचारे अटल बिहारी बाजपेयी ने तो इतने समझौते किये कि उनके घुटनों को ऑपरेशन हुआ तो मैंने लिखा कि इतनी बार झुके है कि उनके घुटने खत्म हो गये, इसलिए ऑपेरशन करना पड़ा.”

लेकिन ये सब कहने के बावजूद प्रभाष जोशी जातिवादी या ब्राह्मणवादी नहीं है। कम से कम उनका तो यही मानना है। आप भी पढ़ें-

ये मैं जातिवादिता के नाते नहीं कह रहा हूं. एक समाज में स्किल का लेवल होता है, कौशल का एक लेवल होता है, जो वो काम करते-करते प्राप्त करता है. उस कौशल का आप अपने क्षेत्र में कैसा इस्तमाल करते हैं, उस पर निर्भर करता है. इंदिरा गांधी बचपन में गूंगी गुड़ियाओं की सेना बना कर लड़ा करती थीं. जब वह प्रधानमंत्री बनीं तो उन्होंने अपने आसपास गूंगे लोगो की फौज खड़ी की. ऐसे लोग, जो उसके खिलाफ बोल नहीं सकते थे. या जो अपनी खुद की कैपासिटी में कुछ कर नहीं सकते है. वही एक सर्वोच्च नेता रहीं. बचपन के जो खिलौने होते हैं, वो बाद में हमारे औजार बनते है. जिससे हम चीजों को हैंडल करना सीखते है.”

तस्वीर कुछ और साफ हो गई या बताना होगा कि गीता के अठारहवें अध्याय में वर्ण व्यवस्था के मौजूदा स्वरूप की स्थापना करते समय भगवान (यादव नहीं) कृष्ण ने क्या कहा था। कृष्ण को अभी भूल जाओ अर्जुन, और प्रभाष जोशी को आगे पढ़ो-

क्रिकेट में भी आप देखेंगे, सभी क्रिकेटरों का एनॉलिसिस करके देखेंगे तो आप पाएंगे कि सबसे ज्यादा सस्टेन करने वाले, सबसे ज्यादा टिके रहने वाले कौन खिलाड़ी हैं ? सुनील गावस्कर सारस्वत ब्राह्मण, सचिन तेंदुलकर सारस्वत ब्राह्मण. ये जो टिके रहने की परंपरा है, वो जाति से नहीं आई. ये आपका लगातार उस काम को करते रहने के कारण है. इस कौशल का जिस भी क्षेत्र में बेहतर इस्तेमाल हो सके वहां आप सफल हो सकते हैं. अगर आज दुनिया के सर्वश्रेष्ठ 11 खिलाड़ियों में से 5 हिंदुस्तानी निकलेंगे तो उसका कारण यह है कि हमारे यहां वो कौशल विकसित है.”

प्रभाष जोशी का सारस्वत ब्राह्मण तेंडुलकर से प्रेम जगजाहिर है। कुछ लोगों तो भ्रम था कि प्रभाष जी क्रिकेटर तेंडुलकर के फैन हैं। लेकिन नहीं। देखिए पंडित जोशी के लिए पंडित तेंडुलकर क्यों महान हैं-

“मैं सभी विश्वकप में देखने जाता हूं, भारतीयों से अच्छी बल्लेबाजी कोई नहीं करता. सचिन तेंदुलकर को आगे-पीछे जाके बल्ला नहीं करना पड़ता है, जब वो गेंद को मारता है तो उसका पांव अपने आप गेंद के सामने होता है. यह कौशल है, जो अचानक नहीं आयी है. वो जो 130 मील प्रति घंटा की रफ्तार से आने वाली सर्विस को जब रिटर्न करते हैं टेनिस कोर्ट पर, तो सोच-समझ कर थोड़ी करते हैं. किसको बैकहैंड मारूंगा, किसको स्लाईस करूंगा, यह पहले से थोड़ी तय करते हैं. आपकी जो रिफ्लेक्सेस हैं, वो इतनी ट्यून्ड होते हैं कि जैसी गेंद आ रही है, आप उसे वैसा खेलते हैं. ये जो ट्रेंड करना है, यह आपके रिफ्लेक्सेस तो आपकी ट्रेनिंग से प्राप्त होती है. जिन लोगों को सदियों से जिस प्रकार के काम को करने की ट्रेनिंग मिली है, वे उस काम को अच्छा करते हैं. क्रिकेट चूंकि अपने यहां अब समाज के मध्य वर्ग का खेल हो गया है तो आप देखेंगे कि कौशल का स्तर और दूसरी जगहों के स्तर से बहुत उंचा है. आस्ट्रेलियन गेंद को मारता है तो ऐसा लगता है कि हथौड़ा मार रहा है लेकिन जब हिन्दूस्तानी मारता है तो ऐसा लगता है एक तरह की कला से उसने उसको मारा है. दुनिया के सबसे अच्छे बैट्समैन आपके पास हैं, इसलिए क्योंकि वो कला आपकी है.”

पंडित तेंडुलकर के बारे में बात करने के पंडित जोशी के अंदाज के बाद देखिए वो अवर्ण क्रिकेटरों के बारे में किस भाषा में बात करते हैं-

“अब ये विनोद कांबली… कांबली गाड़ी साफ करने वाले क्लीनर का बेटा है. वो अपने यहां विकेट कीपर था, वो किसका बेटा था? ढोली का. अभी भी उसके पिता हरियाणा में कहीं ढोल बजाते हैं. यह सब बहुत ही साधारण, बहुत ही साधारण परिवारों से आए हुए लोग हैं.”

लेकिन ये सब कहने वाले प्रभाष जोशी को कृपया जातिवादी या ब्राह्मणवादी न कहें। वो ये सब करके भी जातिवादी नहीं है-

नहीं-नहीं, मैं ब्राह्मणवाद की बात ही नहीं कर रहा हूं. मैं ब्राह्मण के उस कौशल की बात कर रहा हूं. वो सिलिकान वैली में, आईटी में जाकर सफल हुए, यहां सफल नहीं होते थे. क्योंकि आईटी में आपको जो अमूर्त है, उसको मूर्त करने की कला आनी चाहिए. क्योंकि ब्राह्मण का काम वही है. वो उससे पैदा हुआ है. मैं परंपरा से विभिन्न जातियों के काम के दौरान विकसित हुई कुशलता की बात कर रहा हूं. आप इसे ब्राह्मण जाति या ब्राह्मणवाद से मत जोड़िए.”

और जोशी जी सब कहते कहते आखिर में सती प्रथा पर अपने पुराने स्टैंड का भी समर्थन कर गए-

मैं यह मानता हूं कि सती प्रथा के प्रति जो कानूनी रवैया है, वो अंग्रेजों का चलाया हुआ है. अपने यहां सती पति की चिता पर जल के मरने को कभी नहीं माना गया. सबसे बड़ी सती कौन है आपके यहां ? सीता. सीता आदमी के लिए मरी नहीं. दूसरी सबसे बड़ी कौन है आपके यहां ? पार्वती. वो खुद जल गई लेकिन पति का जो गौरव है, सम्मान है वो बनाने के लिए. उसके लिए. सावित्री. सावित्री सबसे बड़ी सती मानी जाती है. सावित्री वो है, जिसने अपने पति को जिंदा किया, मृत पति को जिंदा किया. सती अपनी परंपरा में सत्व से जुड़ी हुई चीज है. मेरा सत्व, मेरा निजत्व जो है, उसका मैं एसर्ट करूं. अब वो अगर पतित होकर… बंगाल में जवान लड़कियों की क्योंकि आदमी कम होते थे, लड़कियां ज्यादा होती थीं, इसलिए ब्याह देने की परंपरा हुई. इसलिए कि वो रहेगी तो बंटवारा होगा संपत्ति में. इसलिए वह घर में रहे. जाट लोग तो चादर डाल देते हैं, घर से जाने नहीं देते. अपने यहां कुछ जगहों पर उसको सती कर देते हैं. आप अपने देश की एक प्रथा को, अपने देश की पंरपरा में देखेंगे या अंग्रेजों की नजर से देखेंगे, मेरा झगड़ा यह है. मेरा मूल झगड़ा ये है.”

और हे अर्जुन, अब इसे पढ़ और सोच कि तू जिन प्रभाष जोशी को वंदनीय समझता है, उनके विचार क्या हैं और क्यों हैं-

इसलिए अकबर, इसलिए जितने भी बड़े लोग हुए मुसलमान राजा, वो सब आपके धर्म का, आपकी जाति प्रथा का, आपकी पंरपरा का सम्मान करते थे. बल्कि उनसे ज्यादा सम्मान देने वाले और लोग नहीं थे. क्यों, क्योंकि आपने उनको पचा लिया था, उनको अपना बना लिया था. ये जो अपनी संस्कृति में सब चीजों को स्वीकार करके, उनका समन्वय बनाना है, ये अपनी सबसे बड़ी ताकत है. इसको छोड़ना नहीं चाहिए.”

पूरा इंटरव्यू आप रविवार डॉट कॉम पर पढ़ें। हमारी कामना है कि पंडित जोशी जी कह दें कि ये सब उन्होंने नहीं कहा है और ये सारी बातें संदर्भ से काटकर पेश की गई हैं। लेकिन असली प्रभाष जोशी से जन-जन के साक्षात्कार का समय, लगता है कि, आ गया है। जन-जन के साक्षात्कार का इसलिए, क्योंकि उनके असली रूप के बारे में कई लोगों पहले से मालूम हैं। प्रतिमाओं के विखंडन के इस कठिन दौर में जब लोगों की आस्थाएं डांवाडोल हों तो प्रभाष जी, आप अपने अब्राह्मण प्रशंसकों को निराश न करें। कह दीजिए कि वो सब जो छपा है, सब झूठ है।

((प्रभाष जोशी का पूरा इंटरव्यू पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें))

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7 Responses to ब्रह्म से संवाद करते पंडित प्रभाष जोशी का विराट रूप

  1. Govind Sah Reply

    August 19, 2009 at 4:50 pm

    शर्मनाक किंतु सत्य! जोशी जी को कोई जल्दी राज्यसभा भेजो,वरना पता नहीं अभी क्या-क्या लिखेंगे।

  2. aam admi Reply

    August 19, 2009 at 5:20 pm

    प्रभाष जी,

    क्या श्रेष्ठता पर सिर्फ ब्राहमणों की मोनोपोली है? मोनोपोली कुछ दे या न दे तानाशाही की मानसिकता जरूर देती है. और कुछ ख़ास जातियों और वर्गों की इसी तानाशाही की मानसिकता ने देश के विभिन्न इलाकों में एक बड़ी आबादी का जीना हराम किया हुआ है. ऐसी सोच की जितनी भी निंदा की जाये वह कम है.

  3. Kharibaat Reply

    August 20, 2009 at 12:00 pm

    प्रभाष जोशी ब्राह्मणवादी है, ये आप लोगों को आज पता चल रहा है? आपके इस भोलेपन के क्या कहने। अस्सी के दशक के अंत में जनसत्ता में में जब लगभग 400 संपादकीय कर्मी थे तो उनमें सिर्फ एक दलित और मुसलमान एक भी नहीं था। ये संयोग था या साजिश। प्रभाषजोशी के नायकों को देखें- विष्णु चिंचालकर, कुमार गंधर्व, तेंडुलकर, नरसिंह राव, अनुपम मिश्र, राहुल बारपुते। इन्हीं सब की तारीफ में तो वो कागद कारे करते हैं। प्रभाष जोशी के चेले बताएं कि उनके कितने हीरो अब्राह्मण, अवर्ण, मुसलमान और महिलाएं हैं? प्रभाष जोशी नाम की प्रतिमा अगर कुछ लोगों ने अपने मन में बसा रखी थी तो उसके खंडन-विखंडन का समय आ गया है।

  4. premranjan Reply

    August 20, 2009 at 1:07 pm

    प्रभाष जोशी को मूर्ति के रूप में प्रतिष्ठापित करने के अपराधी हम हैं। प्रभाष जोशी ने कुछ भी नया नहीं किया है। वे जन्मना, कर्मणा सब स्तर पर ब्राह्मण रहे हैं। जो बातें उन्होंने कही हैं, वह एक ऐसा व्यक्ति कह ही नहीं सकता, जो कहीं से खुद को इंसान समझता हो। प्रभाष जोशी ब्राह्मण हैं और इस नाते ही उन्होंने ये बातें कही हैं। उनकी इस घृणा को उनकी सच्चाई के रूप में स्वीकार कीजिए। और यह भी स्वीकार कीजिए कि अब तक की उनकी तथाकथित सांप्रदायिकता विरोध, तथाकथित जनपक्षधरता, तथाकथित आंदोलन या किसी भी बेईमानी के प्रच्छन्न विरोध के पीछे कौन-सी साजिश रही होगी।

  5. एकलव्‍य Reply

    August 20, 2009 at 3:11 pm

    अब देखते हैं कि उदय प्रकाश और राजेंद्र यादव की तरह प्रभाष जोशी का भी दाना-पानी बंद होता है कि नहीं? उन पर भी ‘कांव कांव’ करते दस्ते टूट पड़ते हैं कि नहीं? उन्हें भी मानसिक रोगी बताया जाता है कि नहीं? उनका भी बहिष्कार होता है की नहीं? उनके ख़‍िलाफ़ दस्तख़त अभियान चलता है कि नहीं?

    वक़्त है असलियतों और औकातों के सामने आने का। षड्यंत्रों के खुलने का।

    आइए, सांस रोक देखें प्रगतिशीलों की असलियत।

  6. एकलव्‍य Reply

    August 20, 2009 at 3:12 pm

    ये जो षड्यंत्र की परंपरा है, अपने विरोधियों में उन्हीं के जैसे बन कर घुस जाने और नष्ट कर देने का जो अपन का कौशल है, वह भी धारण करने की अपन की जो क्षमता है, हज़ार साल की अपन की जो ट्रेंनिंग है, उसी से आता है क्या? इतिहास में बहुत चर्चा है इसकी। खासकर बौद्धों, दलितों और नास्तिकों के संदर्भ में। अपन का मन से बनाकर नहीं बोल रहा हूं।

    ब्राहमण बाबू तो सिलीकोनिया जा सकते थे, क्योंकि हज़ार साल की ट्रेनिंग थी, साधन थे, दक्षिणा थी, सामाजिक रुतबा था। मगर जो दलित झोंपड़ी और पाखाने तक से भी वंचित है, वो सिलीकोनिया कैसे जाएंगे? ब्राहमण प्रभु तो कुछ भी कर लेता है। दूसरों से कहता है संस्कृत पढ़ो, अपने बच्चों को अंग्रेजी सिखाकर विदेश में फिट कर देता है। कहता है कि अमिताभ बच्चन अय्याश है और खुद एक अय्याश और लगभग सांप्रदायिक बन चुके खेल क्रिकेट पर एक राष्ट्रीय अखबार में अपने लिखे दो-दो, तीन-तीन इश्तिहार लगा देता है। एक मुखपृष्ठ पर, एक अंदर बकसिया में, कभी एक संपादकीय में तो कभी एक उसी के नीचे मुख्य लेख में। दूसरे के अखबार में अइसा रुतबा। अपनी लघुपत्रिका निकाले होते, तो साल में आठ तो क्रिकेट-विशेषांक निकालते होते।

    दो पेज होते हैं रविवारी जनसत्ता में। उसमें से एक का लगभग आधा आपके पास है। उसमें कभी-कभार साम्प्रदायिक ताकतों की जो खिंचाई आप करते हैं, अब तो उस पर भी शक होने लगा है। कागद कारे निकाल कर देख लेउ। आधा तो घटना का ब्यौरा देने में निकल जाया करे है। तब कहीं जाकर आया करे है विचार टाइप कोई चीज़। उसमा भी महीना में दुई बार अपन का बेनजी, अपन का माधो, अपन का लड्डू, अपन का ये, वो। ई जूनियर गोयनका बोल दिये हैं क्या गुरुदेव कि महीना का पंद्रह दिवस जनसत्ता अपन के रिश्तेदार और दोस्तन का वास्ते आरक्षित रहेगा। बाकी पंद्रह दिन अपन का लेखकन के वास्ते। पाठक ससुर कोई आता ही नहीं, तो ससुर उसका चिंता काहे करना। स्टाफ के ऊपर सारा शो चल रिया है, चलने दो। हां, बाकी जो डेढ़ पेजवा है, उसमा अपने हजारा साला टिरेनिंग वाला बिरादन का छपवाय का कोसिस करो जियादा से जियादा। कौन भकुआ पूछता है इहां।

    देखा नहीं, चार दिन हुआ रविवार मा साक्षात्कारवा छपे, कोई निकल के आ रहा है बोलने को। एक गांधीवादी, अहिंसावादी विद्वान संपादक से कैसा खौफ खाया बैठा है अपना शेर लोग। ई कौन सी ट्रेनिंग से आता है गुरुदेव? हमको भी सिखाइए ना। हमारा तो खुद अपना असली नाम से लिखने का हिम्मत नहीं पड़ रहा। कहीं सहिष्णुतावादी ट्रेनिंग से हमका मार दिया, तो हम तो ससुर ब्लाग लिखने के काबिल भी नहीं बचेगा।

  7. Pingback: Scores NOT Settled as Yet as Prbahash Joshi is NO MORE!We Loved him Most and We hated Him Most. Finally It Is Pack Up Time! « Palashbiswaskl’s Weblog

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