मुझे साइट मॉडरेटर ने बताया कि लोगों की दिलचस्पी इस बात में है कि तथागत कौन है। ये एक स्वाभाविक सवाल है। इसलिए भी, क्योंकि लोगों की दिलचस्पी इस बात में होगी कि जो प्रभात खबर के इतने सारे मसलों को व्यक्तिगत रूप से जानता है – वो जरूर निरपेक्ष आदमी नहीं होगा। इनके बीच का ही आदमी होगा। हां, मैं पत्रकारिता के झारखंडी (हरिवंश) स्कूल का ही छात्र हूं। अब भी उनके आसपास काम करता हूं। सच से प्यार है और सच कहना चाहता हूं। लेकिन कोई सज़ा पाना नहीं चाहता, इसलिए सच कहने के लिए अपना एक नाम रखा – तथागत। हो सकता है, मेरे सच में किसी तक़लीफ़ या पर्सनल खुन्नस की गंध आये – तो ये जायज़ है। लेकिन जहां तक कोशिश होगी, मैं ईमानदार बना रहूंगा। बहरहाल, वादे के मुताबिक मैं हरिनारायण सिंह की कहानी पर आता हूं।
सन 94 या 95 की बात है। मुझे हरिवंश जी ने एक तेज़-तर्रार युवक के रूप में हरिनारायण सिंह से परिचय कराया। ऐसे अवसरों पर हरिभाई (हां, इसी नाम से वो ज़्यादा जाने जाते हैं) के पास मुस्कराहट नहीं होती थी – वे गंभीर बने रहते थे – लगभग निरुत्साहित। मैं उनके साथ अटैच हो गया। एक दिन मैं एक पेज की खबरें टाइप कर रहा था। एक रेप की खबर थी, जिसे मैंने चार पंक्तियों में निपटाया और आगे बढ़ने लगा कि अचानक पीछे से किसी ने कंधे पर हाथ रखा। मैंने देखा, तो हड़बड़ा गया। हरिभाई थे। उन्होंने कहा कि इस खबर को दो कॉलम का बनाओ। मैंने कहा, लेकिन हरिभाई – इसमें दो कॉलम जैसी कोई बात नहीं है। कोई इनफॉर्मेशन भी नहीं है ज़्यादा। उन्होंने कहा कि ऐसी खबरों में ज़्यादा इनफॉर्मेशन की ज़रूरत नहीं होती। सोचो कि बलात्कार कैसे किया गया होगा। कपड़े कहां फटे होंगे। लड़की की उम्र लिखो। कहां से कहां जा रही थी। लड़कों ने कहां देखा होगा। इस तरह ख़बर रीडेबल बनेगी। ये हरिभाई का सिखाया पत्रकारिता का पहला पाठ था। मैंने नहीं सीखा, ये अलग बात है।
कहने का मतलब ये कि हरिभाई एक औसत पत्रकार थे और हैं। उनकी दूसरी क्वालिटी रही है। वे अपने सहकर्मियों के लिए हमेशा बड़े भाई की भूमिका में रहे हैं। कोई बीमार पड़ जाए, तो उसके घर जाकर तक़लीफ़ पूछने वाला। ज्यादा देर तक साथ रहने पर कुछ खिला-पिला देना आदि-आदि। वे खुद भी 16-16 घंटे काम करते रहे हैं और उनके साथ के पत्रकार भी। यानी हरिवंश जी को सिर्फ लाइन देनी होती थी कि इस खबर को ऐसे ट्रीट करना चाहिए और हरिभाई और उनकी टीम हरिवंश जी की उम्मीद से कई गुना ज़्यादा आउटपुट देने का काम करती। प्रभात खबर झारखंड में एक बड़ा और भरोसेमंद अखबार बना, तो हरिवंश जी और हरिभाई दोनों के श्रम और सृजन के नतीजे के रूप में बना।
हरिभाई चौथी दुनिया और रविवार होते हुए प्रभात खबर आये थे। काफी कठिनाइयों से इस अखबार को उन्होंने निकाला था। एक गुर्बत के दिन हरिवंश जी के यहां पहुंचे, तो 50 से ज़्यादा पूरियां खा गये। भाभीजी की ममता उमड़ आयी थी और उन्होंने हरिवंश जी को कहा भी था कि आप अपने साथ काम करने वालों का खयाल रखा कीजिए। उस वक्त तक प्रभात खबर एक परिवार था। सपने साझा थे। लेकिन वक्त के साथ कामयाबी के गुरूर ने खेल बिगाड़ना शुरू किया।
सन 2000 में रांची से हिंदुस्तान निकलना शुरू हुआ, तो एचटी प्रबंधन ने हरिभाई को ऑफर किया। हरिभाई ने मना कर दिया। उन्होंने कहा कि प्रभात खबर को उन्होंने खून-पसीने से सींचा है। उनका अपना अख़बार है – वे उसे कैसे छोड़ सकते हैं। फिर हरिवंश जी को छोड़ना भी नैतिक नहीं होगा। रविवार के मामूली उपसंपादक को उन्होंने झारखंड की राजधानी के एकमात्र लोकप्रिय अखबार का स्थानीय संपादक बना दिया। यह एक ऐसी भावना थी, जिसकी नींव पवित्र थी। जिसकी नींव भरोसा था। जिसकी नींव संघर्ष था।
कुछ दिनों बाद हरिनारायण सिंह के घर में कोई बीमार पड़ा, तो उन्होंने हरिवंश जी से कुछ एडवांस मांगे। कोई 40 हजार रुपये। उस वक्त तक हरिभाई का वेतन मुश्किल से 15000 के आसपास था। हरिवंश जी ने कहा कि प्रबंधन शायद ही इतने पैसों पर राजी हो। अभी संकट है, आपको ज्यादा से ज्यादा दो महीने का एडवांस मिल सकता है। वो भी बेसिक सैलरी का। (जबकि अखबार लगातार ग्रो कर रहा था और हिंदुस्तान दैनिक तमाम कोशिशों के बाद भी प्रभात खबर का कुछ नहीं बिगाड़ पाया था।) हरिभाई को इस जवाब की उम्मीद नहीं थी। वे निराश हो गये और सोचने लगे कि जिस अखबार के लिए परिवार को वक्त नहीं दिया – उसी अखबार ने ऐन वक्त पर मदद करने से इनक़ार कर दिया?
बहरहाल, थोड़े दिन बाद ही एचटी प्रबंधन ने हरिभाई पर फिर डोरे डाले और इस बार हरिभाई टूट गये। वे चुपके से हवाई जहाज़ से दिल्ली पहुंचे। बात पक्की की और पटना के चाणक्या होटल में आकर रुके। दूसरी सुबह पटना में ज्वाइन किया। ये खबर आग की तरह फैली। हम सब पत्रकार रांची में इस खबर से उत्साहित थे। यह उत्साह इस बात का था कि हरिभाई की वजह से अब हम जैसे लोगों को मौक़ा मिलेगा, जो पिछले छह-सात सालों से प्रभात खबर से जुड़े थे और डेढ़ हजार-दो हजार के वेतन पर अटके थे। अखबार को होने वाला मुनाफा कर्मचारियों तक पहुंचते-पहुंचते घाटे में बदल जाता था और इस घाटे को बढ़ा-चढ़ा कर हरिवंश जी मीटिंग में पेश किया करते थे। कुछ इस अंदाज़ में कि बहुत कठिन समय है साथी।
हरिभाई ने प्रभात खबर के अपने सहकर्मियों के सामने साफ किया (उनमें मैं भी शामिल था) कि आपमें से कोई प्रभात खबर नहीं छोड़ेगा। मैं नहीं हूं, लेकिन आप सब लोगों को हरिवंश जी का साथ देना होगा। लेकिन कोई तैयार नहीं था। प्रभात खबर के करीब 35-40 लोग हरिभाई के घर धरना देकर बैठ गये। हार कर हरिभाई ने सबका ज्वाइनिंग लेटर बनवा दिया और बारी-बारी से आने को कहा ताकि प्रभात खबर का काम हैंपर न हो। लेकिन लोग प्रभात खबर के घुटन भरे माहौल में एक मिनट भी रुकना नहीं चाहते थे। लिहाजा, 27 लोगों ने एक साथ प्रभात खबर छोड़ कर हिंदुस्तान ज्वाइन कर लिया। कुछ लोगों को रोकने में हरिवंश जी कामयाब रहे। सैलरी दुगनी कर दी। लेकिन एक हिदायत प्रभात खबर के गेटकीपर को दे दी कि जो भी प्रभात खबर छोड़ कर हिंदुस्तान गये हैं, उन्होंने प्रभात खबर के अंदर घुसने भी न दिया जाए।
हरिवंश जी की एकतरफा सोच हरिभाई के इस पूरे क़दम को साज़िश बताती रही। उन्हें लगा कि हरिभाई ने प्रभात खबर को बंद करने के उपक्रम के तहत उनके 27 लोगों को एक साथ तोड़ लिया है। उन्होंने हरिभाई से अपने सारे रिश्ते तोड़ लिये। फोन उठाना बंद कर दिया। किसी सार्वजनिक समारोह में नज़र आये हरिभाई को ऐसी उपेक्षा की नज़र से देखने लगे, जैसे कोई अछूत को देखता हो। जिमखाना क्लब के एक समारोह में हरिभाई अचानक हरिवंश जी के सामने पड़े। उन्होंने हरिवंश जी के पांव छूए, तो हरिवंश जी मुंह फेर कर चलते बने। ये हरिवंश जी की चर्चित और प्रचारित उदारता के पीछे छिपी घृणा का एक उदाहरण है। यही वजह है कि प्रभात खबर के 25 साल पूरे होने पर जब पुराने संपादकों और साथी पत्रकारों के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करने का समय आया, तो इस मौक़े पर भी हरिवंश जी ने नाम लेकर न सही, लेकिन हरिभाई को प्रभात खबर को बंद कराने की साज़िश का ज़िम्मेदार ठहराया और तीन सतही समझ वाले संपादकों को प्रभात खबर के संघर्ष में साझीदार होने का श्रेय थमा दिया।
अगली किस्त में देखिए कि कैसे जनपक्षीय पत्रकार हरिवंश जी की आंखों में चुभते रहे, आदिवासी हित की बात करने वाला उनका अखबार कैसे आदिवासी पत्रकारों को नौकरी देने से बचता रहा और कैसे सेटिंग-गेटिंग करने वालों को उन्होंने प्रभात खबर की सत्ता संरचना का अहम हिस्सा बनाया।
रंगनाथ सिंह
August 21, 2009 at 4:52 am
दुनिया जब सच छिपाने के लिए नकाब पहन सकती है तो कोई सच बताने के लिए नकाब पहने तो क्या बुराई है वो भी फोकट में जबकि महान लोगों को सिर्फ सच बोलने के करोड़ो मिल रहे हैं !!
जिस सच को स्टार टीवी को जरूरत है उसकी कीमत करोड़ और जिसकी जनता को जरूरत है उसकी….टांय टांय फुस्स….
क्या करिएगा भाई, स्टार के पास दौलत है,ताकत है, पैसा है…..और जनता के पास क्या है……. माँ ??
आपकी अगली पोस्ट का इंतजार रहेगा।
khderan
August 23, 2009 at 6:04 pm
kya tathagat bhai bhumigat ho gai kya?
लाल सन्त कुमार नाथ शाहदेव
August 27, 2009 at 3:22 pm
सबसे पहले मेरी तरफ से धन्यवाद पूरानी याद ताजा करनो के लिये। मै प्रभात खबर का प्रथम अंक से पाठक रहा हूं। यही कारन है जो आपका आलेख दिल को छू गया। तथागत आप जो भी हैं,इसी तरह लिखते रहें, हमारी शुभकामनणा आपके साथ है।