प्रभाष जोशी बड़े पत्रकार हैं। बहुत बड़े पत्रकार। इसलिए इतनी उम्मीद की जाती है कि उनके विचार चाहे जो भी हों, लेकिन उन्हें स्थापित करने के लिए वो सही तथ्य लेकर आएंगे। लेकिन रविवार डॉट कॉम में दिए इंटरव्यू में अपनी बातों को साबित करने के लिए वो बेहद बेतुकी बातें कर गए हैं। एक दो नहीं बल्कि कई ग़लत तथ्यों को प्रस्तुत किया। लगता है कि सुनी सुनाई बातों को वो सच मान बैठे हैं। फैक्ट्स के मामले में ऐसी असावधानी अक्षम्य है क्योंकि आप प्रभाष जोशी हैं, शलाका पुरुष।
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प्रभाष जोशी-क्रिकेट में भी आप देखेंगे, सभी क्रिकेटरों का एनॉलिसिस करके देखेंगे तो आप पाएंगे कि सबसे ज्यादा सस्टेन करने वाले, सबसे ज्यादा टिके रहने वाले कौन खिलाड़ी हैं ? सुनील गावस्कर सारस्वत ब्राह्मण, सचिन तेंदुलकर सारस्वत ब्राह्मण. ये जो टिके रहने की परंपरा है, वो जाति से नहीं आई. ये आपका लगातार उस काम को करते रहने के कारण है. इस कौशल का जिस भी क्षेत्र में बेहतर इस्तेमाल हो सके वहां आप सफल हो सकते हैं. अगर आज दुनिया के सर्वश्रेष्ठ 11 खिलाड़ियों में से 5 हिन्दूस्तानी निकालेंगे तो उसका कारण यह है कि हमारे यहां वो कौशल विकसित है.
तथ्य- दुनिया के सर्वेश्रेष्ठ खिलाड़ी कौन हैं ये जानने का एक ही पैमाना है आईसीसी वर्ल्ड रैंकिंग http://cricketratings.com/। टेस्ट रैंकिंग में टॉप 10 बैट्समैन में सिर्फ एक भारतीय है गौतम गंभीर, जो तीसरे नंबर पर हैं। बॉलर्स में हैं 5वें नंबर पर हरभजन सिंह और 9वें नंबर पर जहीर खान। वन डे टॉप 10 रैंकिंग में बैट्समैन में नंबर एक हैं धोनी, नंबर दो पर हैं युवराज और नंबर सात पर हैं वीरेंद्र सहवाग। जोशी जी, ये सिर्फ संयोग है (आपकी तरह इसकी कोई समाजशास्त्रीय, नृशास्त्रीय व्याख्या करने की जरूरत नहीं है) कि इनमें से कोई भी ब्राह्मण नहीं है, जिनके बारे में आप कहते हैं कि ब्राह्मणों में टिके रहने की क्षमता है। आपको ये दुनिया के 11 टॉपर में से पांच हिंदुस्तानी का आंकड़ा कहां से मिला, ये जानने में हर किसी की दिलचस्पी होगी।
प्रभाष जोशी-जैसे सिलिकॉन वैली अमेरिका में नहीं होता, अगर दक्षिण भारत में आरक्षण नहीं लगा होता. दक्षिण के आरक्षण के कारण जितने भी ब्राह्मण लोग थे, ऊंची जातियों के, वो अमरीका गये और आज सिलिकॉन वेली की हर आईटी कंपनी का या तो प्रेसिडेंट इंडियन है या चेयरमेन इंडियन है या वाइस चेयरमेन इंडियन है या सेक्रेटरी इंडियन है. क्यों ? क्योंकि ब्राह्मण अपनी ट्रेनिंग से अवव्यक्त चीजों को हैंडल करना बेहतर जानता है. क्योंकि वह ब्रह्म से संवाद कर रहा है. तो जो वायवीय चीजें होती हैं, जो स्थूल, सामने शारिरिक रूप में नहीं खड़ी है, जो अमूर्तन में काम करते हैं, जो आकाश में काम करते हैं. यानी चीजों को इमेजीन करके काम करते हैं. सामने जो उपस्थित है, वो नहीं करते. ब्राह्मणों की बचपन से ट्रेनिंग वही है, इसलिए वो अव्यक्त चीजों को, अभौतिक चीजों को, अयथार्थ चीजों को यथार्थ करने की कूव्वत रखते है, कौशल रखते हैं. इसलिए आईटी वहां इतना सफल हुआ. आईटी में वो इतने सफल हुए.
तथ्य – फॉर्च्यून 1000 में शामिल सिलिकॉन वैली की आईटी कंपनियों में गूगल, एचपी, एडोबी, एएमडी, एपल, इ-बे, ओरैकल, इंटेल, याहू, सन माइक्रोसिस्टम्स, सिस्को, नेटएप, सैमेंटेक प्रमुख हैं। कुछेक नाम आप भी चाहें तो जोड़ लें। इन कंपनियों में किसी एक भी कंपनी में प्रेसिडेंट, चेयरमैन या वाइस चेयरमैन ब्राह्मण नहीं है। इन में से हर कंपनी की साइट पर जाकर चेक करने के बाद ये बात लिखी जा रही है। “सिलिकॉन वैली की हर आईटी कंपनी में प्रेसिडेंट, चेयरमैन और वाइस चेयरमैन ब्राह्मण है”, जैसी बात जोशी जी ने किस आधार पर कह दी, ये आश्चर्यजनक है। ये असावधानी है या अपनी बात को साबित करने की जल्दबाजी। और प्रभाष जी, आईटी कंपनी में सेक्रेटरी कौन सा पद होता है, जिस पर ब्राह्मण-ही-ब्राह्मण बैठे हैं।
प्रभाष जोशी- मान लीजिए कि सचिन तेंदुलकर और विनोद कांबली खेल रहे है. अगर सचिन आउट हो जाये तो कोई यह नहीं मानेगा कि कांबली मैच को ले जायेगा. क्योकि कांबली का खेल, कांबली का चरित्र, कांबली का एटीट्यूड चीजों को बनाकर रखने और लेकर जाने का नहीं है. वो कुछ करके दिखा देने का है.
तथ्य – कांबली का कैरियर रिकॉर्ड देखिए। 17 टेस्ट मैच में 54.20 का एवरेज और 104 वनडे मैच में 32.59 का एवरेज। टेस्ट मैच में 227 और वन डे में 106 का अधिकतम स्कोर। टेस्ट मैच में 4 शतक और 3 अर्धशतक। वनडे में 2 शतक और 14 अर्धशतक। फर्स्ट क्लास क्रिकेट में कांबली का एवरेज रहा 59.67। सचिन का टेस्ट एवरेज है 54.58, वन डे एवरेज है 44.37 और फर्स्ट क्लास क्रिकेट में 58.70। औसत के मामले में टेस्ट में कंबली और सचिन लगभग बराबर हैं और फर्स्ट क्लास में कांबली आगे। वन डे में कांबली इसलिए पीछे हैं क्योंकि वनडे में हाईस्कोरिंग गेम का सिलसिला शुरू होने से पहले ही वो टीम से आउट किए जा चुके थे। कांबली और तेंडुलकर की जिस सबसे यादगार स्कूल मैच की 664 रनों की साझेदारी की बात दुनिया करती है, उसमें 349 रन कांबली के थे।
प्रभाष जोशी- अब आप देखो अपने समाज में, अपनी राजनीति में. अपने यहां सबसे अच्छे राजनेता कौन है ? आप देखोगे जवाहरलाल नेहरू ब्राह्मण, इंदिरा गांधी ब्राह्मण, अटल बिहारी वाजपेयी ब्राह्मण, नरसिंह राव ब्राह्मण, राजीव गांधी ब्राह्मण.
तथ्य- फिरोज गांधी की संतान को जोशी जी ब्राह्मण किस हिंदुवादी नियम से कह रहे हैं, ये तो वही जानते हैं। हिंदू स्मृतियों के हिसाब से तो अवर्ण पिता और ब्राह्मण मां की संतान को कुछ और कहा जाता है। क्या पंडित जोशी ये नहीं जानते। आश्चर्य है। और सबसे अच्छे राजनेता यानी क्या? कोई सर्वे है या मन में आया और लिख डाला, क्योंकि प्रभाष जोशी ने लिखा है तो सवाल कौन पूछेगा।
प्रभाष जोशी- इंदिरा गांधी बचपन में गूंगी गुड़ियाओं की सेना बना कर लड़ा करती थीं. जब वह प्रधानमंत्री बनीं तो उन्होंने अपने आसपास गूंगे लोगो की फौज खड़ी की. ऐसे लोग, जो उसके खिलाफ बोल नहीं सकते थे. या जो अपनी खुद की कैपासिटी में कुछ कर नहीं सकते है. वही एक सर्वोच्च नेता रहीं. बचपन के जो खिलौने होते हैं, वो बाद में हमारे औजार बनते है. जिससे हम चीजों को हैंडल करना सीखते है.
तथ्य- प्रभाष जी, इंदिरा गांधी गूंगी गुड़िया की सेना बनाकर नहीं लड़ती थी। वो संसद में वो कम बोलती थीं, इसलिए उन्हें गूंगी गुड़िया कहा जाता था। उन्हें पहली बार राममनोहर लोहिया ने गूंगी गुड़िया कहा। इसके सैकड़ों रेफरेंस हैं। देखिए –
http://hindi.webdunia.com/news/news/national/0811/19/1081119001_1.htm
http://prabhatkiran.com/webforms/Channel_News_Details.aspx?contentId=2217&masterId=3
http://www.businessbhaskar.com/article.php?id=13880
http://en.wikipedia.org/wiki/Indira_Gandhi
प्रभाष जोशी- अब वो अगर पतित होकर… बंगाल में जवान लड़कियों की क्योंकि आदमी कम होते थे, लड़कियां ज्यादा होती थीं, इसलिए ब्याह देने की परंपरा हुई. इसलिए कि वो रहेगी तो बंटवारा होगा संपत्ति में. इसलिए वह घर में रहे.
तथ्य- बंगाल में लड़कियां ज्यादा होती थीं और आदमी कम। ये तथ्य आपको कहां से मिला जोशी जी। देश में पहली जनगणना होने से काफी पहले 1829 में बंगाल में सती प्रथा पर कानूनी रोक लग चुकी थी। http://en.wikipedia.org/wiki/Sati_(practice)
प्रभाष जोशी- जब अंग्रेज आए थे तब दुनिया की जीडीपी में भारत का योगदान 21 प्रतिशत होता था. यानी इतना अपना व्यापार, इतनी अपनी धन-दौलत हुआ करती थी. अंग्रेज जब गए तो एक फीसदी जीडीपी थी….मनमोहन सिंह ने राज संभाला तब देश के उद्योग घरानों के पास देश की जीडीपी का 2 प्रतिशत था. 2008 में गिनती हुई तो 22 प्रतिशत जीडीपी इन घरानों के पास चली गई थी.
तथ्य- पहले आंकड़े का कोई आधार नहीं है और दूसरा आंकड़ा गलत है।
EKLAVYA
August 21, 2009 at 9:06 pm
Aapki mehnat ko salaam hai bhai.
विनीत कुमार
August 21, 2009 at 9:44 pm
प्रभाषजी ने अपनी गप्प को तथ्य का रुप देने का जो काम किया है,ये उनकी छवि के साथ-साथ पत्रकारीय स्तर को भी स्पष्ट करता है। भाषाई स्तर पर उनकी व्यक्तिवादिता तो हम पहले से ही जानते हैं। उनसे कौन सवाल करे औऱ कौन संपादन करे कि उनने,इनने औऱ अपन हिन्दी में कोई शब्द नहीं होते। अब जान लेने पर भी उसका इस्तेमाल करते हैं और कोई उसे संपादित करने की हिम्मत नहीं करता तो ये भाषाई स्तर पर हिंसक होने के अलावे औऱ क्या है।..
खरी बात
August 21, 2009 at 10:21 pm
इन आपत्तियों का जवाब चुप रहकर ही दिया जा सकता है। इसलिए जोशी जी और उनके चेले चुप रहेंगे। ऐसे गिरती है एक मूर्ति।
अफ़लातून
August 22, 2009 at 10:41 am
जेपी (जिनकी गिनती सबसे अच्छे नेताओं में जोशी नहीं कर रहे)द्वारा दिल्ली बुलाये जाने के पहले प्रभाष जोशी नई दुनिया के खेल संवाददाता थे । अपने बेटे की पैरवी खिलाड़ियों से करते थे – यह है ब्राह्मण होने की पकड़-पहुंच- कौशल । इस परम्परा से बना पत्रकारिता में स्थान ! इतिहास के कुड़ेदान में होंगे ।
Hemant
August 22, 2009 at 2:38 pm
Dear Jantantra Team…apko dhanyawad..Prabhash ji ki panditai ki tathyaon ki aisi-taisi kr apne Desh ki jati vyavastha ko lekr gahri khai ko patne ka kam kiya hai…Prabhash ji ki article me jati…khetriyata ki gahri chhap hoti hai…wo bade patrakar hain..aisa us jati ko pujne wale log mante honge..han kuch vishyon per unki patrikarita wakai ankhe kholnewali hoti hain..lekin unki sankhya lagbhak kafi kam hoti hai…
Prabhash Joshi- जैसे सिलिकॉन वैली अमेरिका में नहीं होता, अगर दक्षिण भारत में आरक्षण नहीं लगा होता. दक्षिण के आरक्षण के कारण जितने भी ब्राह्मण लोग थे, ऊंची जातियों के, वो अमरीका गये और आज सिलिकॉन वेली की हर आईटी कंपनी का या तो प्रेसिडेंट इंडियन है या चेयरमेन इंडियन है या वाइस चेयरमेन इंडियन है या सेक्रेटरी इंडियन है. क्यों ? क्योंकि ब्राह्मण अपनी ट्रेनिंग से अवव्यक्त चीजों को हैंडल करना बेहतर जानता है. क्योंकि वह ब्रह्म से संवाद कर रहा है. तो जो वायवीय चीजें होती हैं, जो स्थूल, सामने शारिरिक रूप में नहीं खड़ी है, जो अमूर्तन में काम करते हैं, जो आकाश में काम करते हैं. यानी चीजों को इमेजीन करके काम करते हैं. सामने जो उपस्थित है, वो नहीं करते. ब्राह्मणों की बचपन से ट्रेनिंग वही है, इसलिए वो अव्यक्त चीजों को, अभौतिक चीजों को, अयथार्थ चीजों को यथार्थ करने की कूव्वत रखते है, कौशल रखते हैं. इसलिए आईटी वहां इतना सफल हुआ. आईटी में वो इतने सफल हुए.
Brahm kya hai..ye likhne se pahle Lekhak ko ise paribhashit bhi karna chahiye tha…
क्योंकि ब्राह्मण अपनी ट्रेनिंग से अवव्यक्त चीजों को हैंडल करना बेहतर जानता है. क्योंकि वह ब्रह्म से संवाद कर रहा है. तो जो वायवीय चीजें होती हैं,
..Unhen kisne bata diya ki ब्राह्मण अपनी ट्रेनिंग से अवव्यक्त चीजों को हैंडल करना बेहतर जानता है…
ise Thik se paribhashit karein…
well, Jantantra team ko bahut-bahut badhai…age apki team se aisi hi ummid rahegi
Thanks.
sidharth
August 23, 2009 at 7:10 pm
I doubt you people hardly have the guts to publish if we speak our true mind… so why have a caption that says speak your mind..
चार्वाक सत्य
August 23, 2009 at 8:55 pm
आलोक तोमर आखिरकार गुरु के बचाव में उतर ही आए। कौन कहता है कि इंटरनेट पर लिखे से “महानायकों” को फर्क नहीं पड़ता। आलोक तोमर को पढ़िए भड़ास पर। यहां हैं उस लेख के तीन पैराग्राफ अविकल। आखिर लाइन में भाषा के लठैतपने पर गौर जरूर करें। प्रभाष जोशी के बचाव में हजारों साल की ट्रेनिंग और धारण क्षमता वाला कोई नहीं आया। पहला वार आया है एक ऐसे शख्स की ओर से जिसमें बकौल प्रभाष जी, धारण छमता नहीं है और जो ब्रह्म से संवाद भी नहीं करता है। गुड डिफेंस प्रभाषजी। टिके रहने के कौशल का अच्छा प्रदर्शन। लेकिन गेंद बाउंड्री के अंदर है अभी। -
“सुबह-सुबह हमारे गुरु और हिंदी के या शायद भारत के महान संपादक प्रभाष जोशी का फोन आया। पहले तो उन्होंने यही पूछा कि कहां गायब हो। लेकिन वे जल्दी ही मुद्दे पर आ गए। मुद्दा यह है कि अखबारों की ईमानदारी का क्या आलम है और लोकसभा चुनाव के दौरान खबरों को छापने के लिए अखबारों ने जो निर्लज्ज धंधा किया है, उसके लिए क्या उन्हें माफ कर देना चाहिए? प्रभाषजी हालांकि इंटरनेट पर बहुत नहीं जाते। उन्होंने कई बड़े अखबारों जैसे टाइम्स ऑफ इंडिया, अमर उजाला और दैनिक जागरण आदि के नाम ले कर खुलेआम लिखा और जगह-जगह बोला कि इन लोगों ने अपना ईमान बेचा है।
इन अखबारों ने अपने उस पाठक को मूर्ख बनाया है जो उनके पन्नों पर छपे हर शब्द पर भरोसा करते हैं और पैसा दे कर अखबार खरीदते हैं। प्रभाष जी को बताया गया था कि इंटरनेट पर बहुत धुआंधार बहस उनके बयानों को ले कर छिड़ गई थी और अब तक छिड़ी हुई है। उस बहस में मैं भी शामिल था इसलिए उन्होंने मुझसे बात की। गुस्से में लिखे हुए एक वाक्य के लिए झाड़ भी लगाई। फिर उन्होंने कहा कि नेट भारत में अभी दो प्रतिशत से ज्यादा लोगों के पास नहीं पहुंचा है और नेट का कोई समाज नहीं हैं इसलिए मुख्यधारा यानी अखबारों में यह बहस होनी चाहिए।
प्रभाष जी पूज्य हैं और सारा जीवन पत्रकारिता के ईमानदार और एक हद तक आत्मघाती सरोकारों से जुड़े रहे हैं इसलिए पत्रकारिता के साथ हो रहे द्रोह पर उनकी चिंता और आक्रोश में मैं उनके साथ हूं। लाखों और लोग भी हैं। लेकिन जहां तक भारत में नेट का समाज नहीं होने की बात है, वहां मैं अपने गुरु से विनम्रतापूर्वक असहमत होने की आज्ञा चाहता हूं। भारत में इंटरनेट का समाज आज लगभग उतना ही विकसित है जितना छपे हुए अखबारों और पत्रिकाओं का। प्रभाष जी ने अगर एक शब्द लिखा या बोला तो नेट के तमाम ब्लॉग और वेबसाइट पर हर शब्द के जवाब में हजारों लाखों शब्द लिखे गए। गुनाहगार अखबारों के भाड़ मीरासियों ने प्रभाष जी और उनके सरोकार के साथ जुड़ने वालों को कोसा और आरोप भी लगाया कि प्रभाष जी सठिया गए हैं और अपनी भड़ास निकाल रहे हैं। प्रभाष जी को इन अल्लू पल्लू लोगों के बयानों से कोई फर्क नहीं पड़ता। वे हिंदी पत्रकारिता के महानायक हैं।”
विद्रोही
August 24, 2009 at 11:00 am
चार्वाक सत्य जी,
आपकी टिप्पणी देखने के बाद भड़ास पर आलोक तोमर को पढ़ा। लेकिन उन्होंने प्रभाष जोशी के ब्राह्मणवादी साक्षात्कार से शुरू हुए विवाद पर कुछ नहीं लिखा है। हां, खबरों के धंधे वाले मुद्दे का ज़िक्र करते हुए अपने गुरुजी की तारीफों के पुल ज़रूर बांधे हैं। लेकिन जोशी जी के ‘ब्रह्म ज्ञान’ पर वो भी चुप्पी साधे हुए हैं।