पत्रकारिता में आने से पहले से प्रभाष जोशी को पढ़ रहा हूं। उनके लिखे ने उनका सम्मान इतना बढ़ाया है कि कई बार दूसरों से बहस में झगड़े की नौबत आ गई। प्रभाष जोशी के विरोधी उन पर दो ही आरोप लगाते रहे हैं एक कि भीतर से वो घोर संघी हैं और दूसरी घोर ब्राह्मणवादी। लेकिन जो भी मुझसे ये कहता था मैं उसे “हिंदू होने का धर्म” पढ़ने की सलाह दे देता। बीते 17 साल के लेखन में प्रभाष जी ने बीजेपी की जो खाट खड़ी की है उससे एक धारणा तो ऐसी बनती ही है कि वो संघ के मुरीद होंगे तो होंगे लेकिन उनकी कलम संघ के बंधन में नहीं है। केंद्र में जब एनडीए की सरकार थी तब मैंने कई बार जनसत्ता में प्रभाष जी के तीखे लेख पढ़े हैं। उन्होंने स्वयंसेवक प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की कई मुद्दों पर कड़ी आलोचना की है। वैसी आलोचना कोई खांटी पत्रकार ही कर सकता है।
ये सम्मान हाल-फिलहाल और बढ़ गया, जब प्रभाष जी ने समाचार पत्रों की दलाली के ख़िलाफ़ मोर्चा खोला। वैसे इस मसले को उठाने का श्रेय वॉल स्ट्रीट जरनल के पॉल बेकेट को दिया जाना चाहिए। उन्होंने ही मई की शुरुआत में अपनी रिपोर्ट में खुलासा किया था कि ख़बरों के पैकेज का कैसा गंदा खेल चल रहा है? लेकिन यह भी एक सत्य है कि प्रभाष जी के लेख के बाद इस मुद्दे पर जो बहस हुई है उससे थोड़ी हलचल जरूर हुई। प्रभाष जी ने दस मई को अपना पहला लेख लिखा “ख़बरों के पैकेज का काला धंधा।” अगले हफ़्ते 17 मई को दूसरा लेख लिखा “चौकीदार का चोर होना।” घूम घूम कर इस मुद्दे पर हवा बनाने लगे। लगा कि प्रभाष जी की अगुवाई में दलाली करने वालों को सज़ा भले ही नहीं मिले लेकिन दलालों की असलियत सामने ज़रूर आएगी। उस बहस से लोगों के दिलो दिमाग पर पड़ी धूल झड़ जाएगी। ठंडे पड़े लहू में हल्का ही सही उबाल आएगा। भविष्य में सकारात्मक बदलावों की नींव तैयार होगी। लेकिन ऐसा होता उससे पहले ही प्रभाष जी ने अपने विरोधियों को अपने ऊपर हमले का एक औजार थमा दिया है। सिर्फ़ विरोधियों को ही क्यों मुझ जैसे कई प्रशंसकों का मोह भी भंग हो गया है।
रविवार डॉट कॉम को दिए इंटरव्यू में प्रभाष जी ने जो कुछ भी कहा है उससे साफ होता है कि उनमें ब्राह्मण होने का अहंकार है। इंटरव्यू के हर शब्द एक ऐसे व्यक्ति के ही हो सकते हैं जिसमें जाति का दंभ कूट-कूट कर भरा हो। जिसके जेहन में ये बात कहीं गहरे बैठी हो कि वो ब्राह्मण है तो श्रेष्ठ है। जो हर चीज को जाति के चश्मे से देखता हो। वरना कोई भी व्यापक फलक पर सोचने वाला शख़्स इतने संकीर्ण नज़रिए से चीजों को विश्लेषण नहीं करता।
आमतौर पर किसी भी चीज को देखने के कई तरीके होते हैं। अलग परिवेश में पले-बढ़े लोगों का नज़रिया अलग होता है। जैसे प्रभाष जी ने कहा कि “देश के पांच सबसे अच्छे प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, नरसिह्म राव और अटल बिहारी वाजपेयी ब्राह्मण रहे हैं”। यहां उन्होंने “अच्छे” शब्द पर जोर दिया। ये एक ब्राह्मणवादी नजरिया है। जबकि दूसरा नजरिया यह भी हो सकता है कि आज देश में भूखमरी है, गरीबी है, लड़कियों की खरीद-फरोख़्त है, बच्चों का व्यापार होता है, किसानों की आत्महत्या है, दलितों का उत्पीड़न है, आदिवासियों का नरसंहार है तो उसके लिए हमारी सरकारें जिम्मेदार हैं। हमारी सरकार के मुखिया कौन रहे हैं? प्रभाष जोशी के वही “अच्छे” राजनेता। फिर इन सभी बुराइयों के लिए, अपराधों के लिए किसे जिम्मेदार ठहराना चाहिए? उन्हीं पांचों राजनेताओं को ठहारना चाहिए। इस लिहाज से जो लोग प्रभाष जी की नज़र में महान हैं… वही बहुतों की नज़र में बहुत बड़े अपराधी। इस संदर्भ में देखें तो प्रभाष जी का विश्लेषण एक ब्राह्मणवादी विश्लेषण है।
प्रभाष जी अपने इंटरव्यू में सचिन तेंदुलकर और विनोद कांबली का जिक्र करते हैं। उनके मुताबिक सचिन तेंदुलकर और सुनील गावस्कर टिक कर खेलना जानते हैं तो इसलिए क्योंकि वो सारस्वत ब्राह्मण हैं। सचिन के आउट होने के बाद लोगों को विनोद कांबली से मैच आगे ले जाने की उम्मीद नहीं होती क्योंकि वो क्लीनर का बेटा है। यह वक्तव्य न केवल एक खेल का ब्राह्मणवादी विश्लेषण है बल्कि पिछड़ी जातियों, दलितों और आदिवासियों के प्रति उनकी नफ़रत का प्रदर्शन भी है। यहां प्रभाष जी से सिर्फ़ एक ही सवाल पूछना चाहता हूं कि क्या कभी उन्होंने विनोद कांबली का खेल देखा था?
यह सवाल इसलिए क्योंकि खेल के कई जानकार बताते हैं कि कांबली के खेल में कलात्मकता की कोई कमी नहीं थी। कांबली टिक कर खेलना भी जानते थे और कांबली ने कई मैचों में भारत को जीत दिलाने में अहम भूमिका निभाई है। जानकार यह भी कहते हैं कि अगर उन्हें थोड़ा संभाला गया होता या वो खुद को थोड़ा संभाल लेते तो एक महान बल्लेबाज के करियर का ऐसा दुखद अंत नहीं होता। यह बात इसलिए क्योंकि आंकड़ों के लिहाज से कांबली कहीं भी गावस्कर और तेंदुलकर से कमजोर नहीं हैं। अपने छोटे करियर में ही उन्होंने अपने खेल से कई चाहने वालों को मुग्ध किया। विनोद कांबली ने कुल 104 वनडे खेले थे। जिनमें 32.59 की औसत से उन्होंने 2477 रन बनाए। इन 104 मैचों में भारत को कुल 58 में जीत मिली। और उनमें विनोद कांबली का औसत था 48.27… वनडे के अलावा कांबली ने कुल 17 टेस्ट मैच खेले और उनमें 54.20 की औसत से 1084 रन बनाए। इन 17 टेस्ट मैचों में भारत ने 10 में जीत हासिल की और उनमें विनोद कांबली का औसत रहा 73.66… टेस्ट मैचों में विनोद कांबली ने चार शतक जमाए जिनमें दो दोहरे शतक शामिल हैं।
अब बात गावस्कर के प्रदर्शन की वनडे में गावस्कर का औसत 35.13 है और टेस्ट में 51.12… जिन टेस्ट मैचो में भारत को जीत नसीब हुई है उनमें गावस्कर का औसत रहा 43.97 और जिन वनडे में भारत को जीत मिली उनमें गावस्कर का औसत है 41.81 .. रही बात सचिन तेंदुलकर की तो वनडे में वो कांबली से आगे हैं, लेकिन टेस्ट में उनके आंकड़े भी कांबली से बेहतर नहीं हैं। मैचों में जीत दिलाने के मामलों में भी नहीं। टेस्ट मैच में सचिन का औसत है 54.58 और जिन टेस्ट मैचों में भारत को जीत मिली है उनमें औसत है 65.17 … इस लिहाज से देखा जाए तो टिकने के मामले में और मैच जिताने के मामले में तेंदुलकर और गावस्कर से कांबली का प्रदर्शन खराब नहीं था।
तेंदुलकर और गावस्कर आज महान हैं तो इसलिए कि काबिल होने के साथ उनके समर्थन में एक बड़ी लॉबी खड़ी थी और प्रभावशाली शुभचिंतकों की एक पूरी फौज जिसने उनका हमेशा मार्गदर्शन किया वरना भटकाव किसकी ज़िंदगी में नहीं आता। फर्क वहीं पड़ जाता है कि भटकने के बाद संभलने का मौका किसे और कितनी बार मिलता है?
प्रभाष जी कहते हैं कि भारतीय परंपराओं को भारतीय नज़रिए से देखना चाहिए। उस नज़रिए के मुताबिक सती हमारी परंपरा है। वो आगे कहते हैं कि “सती प्रथा के प्रति जो कानूनी रवैया है, वो अंग्रेजों का चलाया हुआ है. अपने यहां सती पति की चिता पर जल के मरने को कभी नहीं माना गया.” इस मसले पर प्रभाष जी से चंद सवाल पूछना चाहता हूं। भारत में तो लोकतंत्र की अवधारणा ही नहीं रही है। तो क्या अपने देश से लोकतंत्र को उखाड़ कर फेंक दिया जाए? भारत की परंपरा तो राजशाही की रही है तो क्या एक बार फिर से यहां पर राजशाही स्थापित कर दी जाए?
ये प्रभाष जी को मालूम होना चाहिए कि हमारे धर्मग्रंथों में हर किसी के लिए कुछ न कुछ है… जिस तरह आप सीता, सावित्री और पार्वती का हवाला देकर अपने “सत्व” को प्रमाणित करने की कोशिश कर रहे हैं… ठीक उसी तरह उन्हीं धर्मग्रंथों से कई उदाहरण देकर कोई भी भारतीय संस्कृति और परंपराओं की धज्जियां उड़ा सकता है। इसलिए पौराणिक ग्रंथों से ऐसे उदाहरण देकर अपनी पोंगा पंडिताई का परिचय मत दीजिए। यहां बात सत्व और निजत्व की नहीं है। बात एक ऐसी कुप्रथा की है जिसने न जाने कितनी महिलाओं को पति की चिता पर जिंदा जलने के लिए मजबूर कर दिया। जब महिलाएं आग में लिपटी चीखती-चिल्लाती बाहर आती थी तो वहां मौजूद वहशी उसे उठा कर चिता में वापस फेंक देते थे। आप उसे महिमामंडित मत कीजिए। आप उसे महिमामंडित करेंगे तो वो जिन्न फिर से जाग जाएगा जिसे आपने बड़ी मुश्किल से रूपकंवर हत्याकांड के बाद सुलाया था। लोग तो दबी जुबां में आज भी यही कहते हैं कि वो “ख़तरनाक संपादकीय” बनवारी ने लिखा था लेकिन लाइन आपकी दी हुई थी। इसलिए नैतिक आधार पर आपने वो बात कबूल की।
कुल मिला कर कहें तो प्रभाष जोशी के तर्क बेहद बेतुके और बचकाने हैं। ये उनकी ब्राह्मणवादी सोच का नतीजा हैं और उससे अधिक कुछ नहीं। स्किल लेवल किसी जाति विशेष की बपौती नहीं होती। अगर आप ऐसा सोचते हैं तो इसका मतलब सिर्फ़ यही निकाला जाना चाहिए कि दलितों, आदिवासियों और पिछड़ों के ख़िलाफ़ सवर्णों की साज़िश में आप भी शामिल हैं। आपकी की भी यही कोशिश रही है कि अवर्णों को उनका जायज हक़ नहीं मिले। फिर आपका सम्मान क्यों?
((इस लेख में छपी तस्वीर रूप कंवर कांड से जुड़ी है। ये तस्वीर हमने द हिंदू से उधार ली है।))
रंगनाथ सिंह
August 21, 2009 at 4:38 am
समरेन्द्र
यह देखकर अच्छा लगा कि जनतंत्र के संचालक होने के नाते आपने खुद जनतंत्र का आधिकारिक स्टैण्ड स्पष्ट किया। संपादक (या अब संचालक) का स्पष्ट स्टैण्ड किसी भी मीडियम की विश्वसनियता को बढ़ाता है। गर आपका यह जज्बा बना रहा तो मुझे पूरा विश्वास है कि जनतंत्र वेब पत्रकारिता में इतिहास बनाएगा।
Girijesh Mishra
August 21, 2009 at 6:24 am
भाई समरेंद्र जी,
विनोद कांबली, सुनील गावस्कर और सचिन तेंदुलकर में कौन महान है, इस विवाद में पड़ने का कोई इरादा नहीं है। बस एक छोटा सा संशोधन कराना चाहता हूं। सचिन तेंदुलकर ने अपने 159 टेस्ट मैच लंबे मैराथन करियर में सिर्फ एक नहीं, बल्कि चार बार दोहरा शतक बनाया है। ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ 241 नाबाद, बांग्लादेश के खिलाफ 248 नाबाद, न्यूज़ीलैंड के खिलाफ 217 और ज़िम्बाब्वे के खिलाफ़ 201 नाबाद..।
गिरिजेश मिश्र
समरेंद्र
August 21, 2009 at 12:33 pm
गिरिजेश जी,
आंकड़ा दुरुस्त कर दिया। धन्यवाद।
समरेंद्र
August 21, 2009 at 12:49 pm
यहां सचिन की महानता को कम करना नहीं है। यकीनन वो महान हैं। मैं भी उनका फैन रहा हूं। मेरे दोस्त इस बात को जानते हैं। लेकिन कांबली जैसे किसी “अच्छे” खिलाड़ी को जाति के आधार पर इस तरह खारिज करना सही नहीं है। यह कहना कि उनसे किसी को मैच जिताने की उम्मीद नहीं थी। ये एक अन्याय है।
शशि सिंह
August 21, 2009 at 10:39 am
समरेंद्र की बातों से सहमति है। भारतीय होने पर गर्व है मुझे, लिहाजा भारतीय सभ्यता और संस्कृति की भी वकालत करता हूं। उसकी तुलना एक सुंदर उपवन से करता हूं जहां का सौंदर्य देखते बनता है। लेकिन कभी भी इस उपवन में उग आये खर-पतवारों को उस सौंदर्य का हिस्सा मानने की वकालत नहीं कर सकता। ये तो माली की अकर्मण्यता की निशानी होती है। भारतीय सभ्यता और संस्कृति में व्याप्त कुप्रथाओं के खर-पतवारों को साफ नहीं कर सकते तो कम-से-कम रोपिये तो मत प्रभाष जी।
aam admi
August 21, 2009 at 3:56 pm
समरेन्द्र जी,
सचिन तेंदुलकर के रिकार्ड के बारे में लिखने के दौरान हुई छोटी से छोटी त्रुटि को दुरुस्त करने में हम पूरी तत्परता दिखाते हैं. लेकिन ब्राह्मणवाद के कारण उपजी सामाजिक विसंगतियों को दूर करने में भी हम इतनी तत्परता क्यों नहीं दिखाते, असली सवाल यह है. खैरलांजी, गोहाना कांड और जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में मौजूद सामाजिक असंतुलन और गैरबराबरी की असलियत पर बात करने से आखिर कब तक मुंह चुराते रहेंगे हम?
संजय ग्रोवर
August 21, 2009 at 5:38 pm
आंकड़े अपनी जगह हैं पर मौका और माहौल भी कोई चीज़ होती है।
एक वक्त था, जब बंबई फिल्म इंडस्ट्री में लता, आशा, रफी, किशोर, महेंद्र, मन्ना के अलावा कोई घुस नहीं सकता था। आज देखिए हर महीने एक नया गायक आ रहा है। एक से एक टैलेंटेड।
ये महेंद्र धोनी कौन जात है भाई ! इसमें इतनी धारण, मारक और जितावक क्षमता कहां से आयी !
(puchh raha huN kyoNki mujhe waqai nahiN pata)
अगर प्रभाषजी के ही एंगल से सोचें तो, धारण-क्षमता क्या सचिन तेंदुलकर से ज़्यादा राहुल द्रविड़ में नहीं थी ! और सौरभ गांगुली से तो निश्चय ही कई गुना ज़्यादा थी। द्रविड़ और ग्रेग मिलकर शुरु में अच्छे-खासे परिणाम भी दे रहे थे कि एकाएक जाने क्या हुआ कि ‘लुट गया सिंगार तार-तार हुई चूनरी’ !
उम्मीद है कि कोई मानवीय संवेदना रखने वाला आंकड़ा-विशेषज्ञ इस कहानी के भी नए आयाम दिखाएगा।
ratnesh tripathi
August 21, 2009 at 8:56 pm
भाई जी
सादर वन्दे!
आपका लेख, चिंता, समझदारी व विद्वान लोंगों की टिपण्णी बहुत ही अच्छी है किन्तु आप सभी एक बात का जबाब दे दें तो मुझे अति प्रशन्नता होगी कि कुछ लोगों के लेखों के आधार पर आप लोग पूरे ब्राह्मण समाज को गाली दे देते हैं, क्या वे इस देश के अपराधी हैं? आप लोगों ने कितना इतिहास पढ़ा है ये मै नहीं जानता किन्तु मै भी इतिहास का छात्र हूँ इस लिए कह रहा हूँ, अपनी वैमनष्यता को किसी भी व्यक्ति को आधार न बनावें, उसकी गलती कि सजा उसी को दें, शायद मेरी नजर में ( जरुरी नहीं सभी इससे सहमत हों) विद्वता यही कहती है,
रत्नेश त्रिपाठी
समरेंद्र
August 21, 2009 at 9:59 pm
रत्नेश जी,
अगर आपको ऐसा लगा कि हम ब्राह्मणों को गाली दे रहे हैं तो ये गलत है। यकीन मानिए हमारा यह मकसद कतई नहीं। अगर हम ऐसा करने लगेंगे तो हम भी उन्हीं फासीवादी लोगों के बीच में खड़े होंगे जिनकी हम आलोचना कर रहे हैं। दरअसल यहां बहस उस प्रवृति को लेकर हो रही है जिसमें किसी को जाति, धर्म और नस्ल के आधार पर श्रेष्ठ और छोटा साबित किया जाता है। यह प्रवृति बहुत ख़तरनाक होती है और इसके नतीजे बहुत ही घातक। इस सोच की आलोचना होनी ही चाहिए। इस वक़्त प्रभाष जी उसी सोच का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। इसलिए उनकी आलोचना हो रही है।
समरेंद्र
भारत अनजान
August 23, 2009 at 5:25 am
प्रभाषजी की इज़्ज़त करता हूं (था) और क्रिकेट का रसिया हूं, इसलिए लेख को बड़ी तन्मयता से पढ़ा. मैं समरेंद्रजी की बातों से सहमत हूं. लेकिन प्रभाषजी से ऐसी उम्मीद वाक़ई नहीं थी. किसी दिन बाबा साहेब अंबेडकर, मार्टिन लूथर किंग और गांधीजी (जो प्रभाषजी की भाषा में कहें तो ब्राह्मण नहीं थे) पर भी प्रभाषजी कुछ लिख दें तो अच्छा रहेगा. उनके विचार जानने को मिलेंगे. वैसे गांधीजी के हत्यारे (ब्राह्मण नाथूराम गोडसे)के बारे में उनका क्या विचार हैं, यह भी जान लिया जाए तो अच्छा होगा. अब समझ में आया कि दरअसल नेताओं से कहीं ज़्यादा क़लम के ठेकेदारों में जाति की भावना भरी पड़ी है, जो दूसरों को प्रभावित करने की कोशिश करते हैं. वैसे रविवार में दिए साक्षात्कार में प्रभाषजी यह भी कह गए हैं कि शिव सैनिकों ने बाबरी मस्जिद गिरने से पहले क्रिकेट पिच खोदी. भई, ये तो अभी अभी की बातें हैं.. बाबरी मस्जिद 1992 में ढही, जबकि दिल्ली का कोटला ग्राउंड 1999 में खोदा गया, जब वहां पाकिस्तान को खेलना था. तो थोड़ा तथ्यों का भी ध्यान रख लेते प्रभाषजी.
Shambhunath Shukla
August 24, 2009 at 6:56 pm
I was associated with Prabhashji’s 1st team. Prabhashji never been castiest. in his 1st team there were many brahimans but they get job by their ability & skill. though many non brahimans journolist were also got the job like Banwari, RB Ray,
Alok Tomar, Mahadev Chauhan, Rakesh Koharwal, AL Prajapati, Chamanlal, JP Shahi, Riazuddin Sheikh, Surendra Kishore, AP Singh, BS Giri, Ashok Kumar, one female jourlist was also appointed Parul Sharma. How can you PJ was castiest? First know PJ well and then comment.
चार्वाक सत्य
August 24, 2009 at 7:54 pm
one woman journalist!!! great! I am still in search of a dalit/muslim journalist in the dream team of PJ. What was the percentage of non upper caste journalists in that team. Uncomfortable questions? is not it? You have named a few non brahmins, but almost all of them are upper caste. I am still trying to know the PJ.
Shambhunath Shukla
September 2, 2009 at 7:43 pm
i am sorry mr. charvak satya but in 80s non brahimans didnt prefer this job, b’coz that time they prefers govt. services, business & teaching job only few non brahimans (specially gair savarn people)liked to join journolism. remember before coming electronic media we journolist were very low paid worker. i had joined jansatta as full fledged sub editor with three increments but was getting only 1463/- only. so many people not prefer to joined this job
premranjan
September 3, 2009 at 12:27 pm
“सिलिकॉन वैली अमेरिका में नहीं होता, अगर दक्षिण भारत में आरक्षण नहीं लगा होता. दक्षिण के आरक्षण के कारण जितने भी ब्राह्मण लोग थे, ऊंची जातियों के, वो अमरीका गये और आज सिलिकॉन वेली की हर आईटी कंपनी का या तो प्रेसिडेंट इंडियन है या चेयरमेन इंडियन है या वाइस चेयरमेन इंडियन है या सेक्रेटरी इंडियन है. क्यों ? क्योंकि ब्राह्मण अपनी ट्रेनिंग से अवव्यक्त चीजों को हैंडल करना बेहतर जानता है. क्योंकि वह ब्रह्म से संवाद कर रहा है. तो जो वायवीय चीजें होती हैं, जो स्थूल, सामने शारीरिक रूप में नहीं खड़ी है, जो अमूर्तन में काम करते हैं, जो आकाश में काम करते हैं. यानी चीजों को इमेजीन करके काम करते हैं. सामने जो उपस्थित है, वो नहीं करते. ब्राह्मणों की बचपन से ट्रेनिंग वही है, इसलिए वो अव्यक्त चीजों को, अभौतिक चीजों को, अयथार्थ चीजों को यथार्थ करने की कूव्वत रखते है, कौशल रखते हैं. इसलिए आईटी वहां इतना सफल हुआ. आईटी में वो इतने सफल हुए.”
जिताने के लिए आप को ऐसा आदमी चाहिए, जो लंगर डालकर खड़ा हो जाये और आखिर तक उसको ले जा सके यानी धारण शक्ति वाला. अब धारण शक्ति उन लोगों में होती है, जो शुरू से जो धारण करने की प्रवृत्ति के कारण आगे बढ़ते है. अब आप देखो अपने समाज में, अपनी राजनीति में. अपने यहां सबसे अच्छे राजनेता कौन है ? आप देखोगे जवाहरलाल नेहरू ब्राह्मण, इंदिरा गांधी ब्राह्मण, अटल बिहारी वाजपेयी ब्राह्मण, नरसिंह राव ब्राह्मण, राजीव गांधी ब्राह्मण (पिता का नाम फिरोज गांधी हुआ तो क्या हुआ-चार्वाक सत्य). क्यों ? ”
“क्रिकेट में भी आप देखेंगे, सभी क्रिकेटरों का एनॉलिसिस करके देखेंगे तो आप पाएंगे कि सबसे ज्यादा सस्टेन करने वाले, सबसे ज्यादा टिके रहने वाले कौन खिलाड़ी हैं ? सुनील गावस्कर सारस्वत ब्राह्मण, सचिन तेंदुलकर सारस्वत ब्राह्मण. ”
“अब ये विनोद कांबली… कांबली गाड़ी साफ करने वाले क्लीनर का बेटा है. वो अपने यहां विकेट कीपर था, वो किसका बेटा था? ढोली का. अभी भी उसके पिता हरियाणा में कहीं ढोल बजाते हैं. यह सब बहुत ही साधारण, बहुत ही साधारण परिवारों से आए हुए लोग हैं.”
मैं ब्राह्मण के उस कौशल की बात कर रहा हूं. वो सिलिकान वैली में, आईटी में जाकर सफल हुए, यहां सफल नहीं होते थे. क्योंकि आईटी में आपको जो अमूर्त है, उसको मूर्त करने की कला आनी चाहिए. क्योंकि ब्राह्मण का काम वही है. वो उससे पैदा हुआ है. मैं परंपरा से विभिन्न जातियों के काम के दौरान विकसित हुई कुशलता की बात कर रहा हूं.”
“मैं यह मानता हूं कि सती प्रथा के प्रति जो कानूनी रवैया है, वो अंग्रेजों का चलाया हुआ है. अपने यहां सती पति की चिता पर जल के मरने को कभी नहीं माना गया. सबसे बड़ी सती कौन है आपके यहां ? सीता. सीता आदमी के लिए मरी नहीं. दूसरी सबसे बड़ी कौन है आपके यहां ? पार्वती. वो खुद जल गई लेकिन पति का जो गौरव है, सम्मान है वो बनाने के लिए. उसके लिए. सावित्री. सावित्री सबसे बड़ी सती मानी जाती है. सावित्री वो है, जिसने अपने पति को जिंदा किया, मृत पति को जिंदा किया. सती अपनी परंपरा में सत्व से जुड़ी हुई चीज है. मेरा सत्व, मेरा निजत्व जो है, उसका मैं एसर्ट करूं. अब वो अगर पतित होकर… बंगाल में जवान लड़कियों की क्योंकि आदमी कम होते थे, लड़कियां ज्यादा होती थीं, इसलिए ब्याह देने की परंपरा हुई. इसलिए कि वो रहेगी तो बंटवारा होगा संपत्ति में. इसलिए वह घर में रहे. जाट लोग तो चादर डाल देते हैं, घर से जाने नहीं देते. अपने यहां कुछ जगहों पर उसको सती कर देते हैं. आप अपने देश की एक प्रथा को, अपने देश की पंरपरा में देखेंगे या अंग्रेजों की नजर से देखेंगे, मेरा झगड़ा यह है. मेरा मूल झगड़ा ये है.”
-This is for you Mr. Shambhunath Shukla. This is the “pavitra pravachana” of your “icon” and “non-castiest” PJ…!
ashutosh
September 8, 2009 at 10:18 am
शम्भूनाथजी, बड़ी लम्बी लिस्ट दी है आपने परन्तु ब्राहमणों की लिस्ट और बड़ी निकलेगी. फिलहाल इतना ही देख लीजिये की बड़े बड़े सभी की पदों पर ब्राह्मण तैनात थे जैसे कि प्रभात खबर में राजपूत हैं. जनसत्ता के प्रधान सम्पादक प्रभाष जोशी और दिल्ली से बाहर के शेष सभी संस्करणों के संपादक सभी ब्राह्मण_ मुंबई में राहुल देव, चंडीगढ़ में ओम थानवी, कोलकाता में श्याम आचार्य. और देखो_ सहायक संपादक जवाहरलाल कोल, सतीश झा, हरी शंकर व्यास, राजेन्द्र घोड्पकर, मैगजीन हैड मंगलेश डबराल, उनके साथ रवीन्द्र त्रिपाठी व पारुल शर्मा, समाचार संपादक ए एन मिश्र, उनके नीचे शिरीष मिश्र (बाद में समाचार संपादक) एवं एस पी त्रिपाठी (बाद में प्रोडक्शन एडिटर), उप समाचार सम्पादक शम्भुनाथ शुक्ला, अभय कुमार दुबे, मुख्य संवाददाता सुमंत मिश्र ( अब मनोज मिश्र)….आलोक तोमर जैसे दो-चार चमचों को मत्त्वपूर्ण पद दे देने से कुछ साबित नहीं होगा. की पदों पर सब जगह ब्राह्मण रखे गए शुक्लाजी अब जो सूची बनाते रहे. वे तो बनायेंगे ही.