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"वॉयस ऑफ इंडिया" ख़ामोश

वॉयस ऑफ इंडिया का प्रसारण बंद हो गया है। सूत्रों के मुताबिक कर्मचारियों के विद्रोह के बाद वहां पर पुलिस बुलानी पड़ी। वॉयस ऑफ इंडिया का दफ़्तर दिल्ली से सटे नोएडा में है और आज शाम न्यूज़ चैनल के कर्मचारियों ने उसका प्रसारण रोक दिया। उन कर्मचारियों को बीते तीन महीने से तनख्वाह नहीं मिली है और मैनेजमेंट के रवैये से वो बेहद भड़के हुए हैं।

वॉयस ऑफ इंडिया त्रिवेणी ग्रुप का न्यूज़ चैनल है। उसमें करीब दो सौ कर्मचारी काम करते हैं। उन सभी को पिछले साल दिसंबर में भी तनख्वाह नहीं मिली थी। वो विवाद पहले से था। उसके अलावा मई से उन्हें तनख्वाह नहीं दी गई है। इसी बीच कहीं से एक ख़बर आई कि आज रात कंपनी चैनल को बंद कर सकती है। जिसके बाद कर्मचारियों के सब्र का बंध टूट गया। उन्होंने तुरंत प्रसारण रोक दिया और धरने पर बैठ गए। कर्मचारियों के उग्र तेवर को देखते हुए वहां पर पुलिस बुलानी पड़ी है। उसके बाद जाकर मामला कुछ शांत हुआ।

इस मामले में जनतंत्र ने वॉयस ऑफ इंडिया के अधिकारियों से बात करने की पूरी कोशिश की। उनके फोन की घंटी बजती रही मगर किसी ने फोन नहीं उठाया।

दरअसल, त्रिवेणी ग्रुप ने वॉयस ऑफ इंडिया को बीते साल एक जून को लॉन्च किया था। तब कंपनी की योजना सात रीजनल चैनल भी लॉन्च करने की थी। कुछ समय बाद उसने मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के लिए एक क्षेत्रीय चैनल और राजस्थान के लिए दूसरा क्षेत्रीय चैनल लॉन्च कर दिया। लेकिन उसी बीच मंदी के काले बादल गहराने लगे और कंपनी को यह अहसास हो गया कि न्यूज़ चैनल चलाना उसके बस की बात नहीं। उसके बाद त्रिवेणी ग्रुप ने कई प्रयोग किये। लेकिन सारे प्रयोग नाकाम रहे।

उसके बाद नवंबर 2008 में कंपनी ने करीब 250 लोगों की छंटनी कर दी। कर्मचारियों की संख्या 900 से घट कर 650 रह गई। तब कंपनी के सीएमडी मधुर मित्तल ने बताया था कि इतने कर्मचारियों के साथ उनकी कंपनी पांच न्यूज़ चैनल चलाएगी। जिनमें से तीन पहले से ही ऑनएयर थे। लेकिन उस छंटनी से भी बात नहीं बनी। घाटा बढ़ता गया और दिसंबर में कर्मचारियों को तनख्वाह नहीं दी गई।

फिर स्थितियां संभालने की कोशिश शुरू हुई। लेकिन हालात काबू में नहीं हुए। कई घटनाएं बहुत तेजी से हुईं। इसी साल फरवरी में किशोर मालवीय को संपादक बनाया गया। जून में कंपनी के सीईओ राहुल कुलश्रेष्ठ ने इस्तीफा दिया। उसी महीने त्रिवेणी मीडिया के सीएमडी ने अमित सिन्हा के साथ करार किया। उन्हें निवेश के नाम पर कंपनी की पचास फीसदी हिस्सेदारी देने का वादा किया। इस समझौते के बाद अमित सिन्हा ने सीईओ का कार्यभार संभाल लिया। लेकिन इसी समझौते के साथ एक विवाद भी शुरू हो गया।

सूत्रों के मुताबिक मधुर मित्तल ने कंपनी की पचास फीसदी हिस्सेदारी अमित सिन्हा के नाम ट्रांसफर नहीं की। जिसकी वजह से अमित सिन्हा ने कंपनी में पैसा लगाने का फैसला टाल दिया। कर्मचारियों को वेतन नहीं दिया गया। वो वादे और उम्मीद के सहारे काम करते रहे। आज जब सबकुछ टूटने लगा तो उनका गुस्सा भड़क गया।

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