प्रभाष जोशी के विचार न किसी बुढ़भस का नतीजा हैं, न बुढ़ापे का विचलन। उन्होंने जो कुछ भी कहा है, बहुत सोच-समझ कर कहा है और अब भी यह मानते रहने की कोई वजह नहीं कि वे इससे इतर भी कुछ सोचते-समझते रहे हैं। जब से देख रहा हूं, उनकी भाषा और उसकी आवाज से लेकर उसमें जाहिर किए गए विचारों की कई-कई परतों के भीतर मुझे कहीं न कहीं एक महंथ, एक ब्राह्मण कुटिल मुस्कुराहट बिखेरता हुआ दिखता रहा है। और हां, अपनी इसी कुटिल भाषा की बदौलत उन्हें “आंदोलनकारी पत्रकार” और पत्रकारिता के “भीष्म पितामह” का दर्जा भी हासिल करते देखा है। वे ठीक कहते हैं कि आज अगर हर जगह किसी न किसी रूप में ब्राह्मण राज कर रहा है, या एक तरह से वे कहते हैं कि वही राज करने लायक है तो यह सदियों, बल्कि मैं तो कहूंगा कि हजारों साल की ट्रेनिंग का नतीजा है। उसी ट्रेनिंग का नतीजा, जिसमें पैदा होने के बाद जैसे ही कोई बच्चा कुछ देखने-सीखने लायक होश संभालता है, उसे दिखाया-सिखाया जाता है कि देखो, तुम कैसे जन्मना श्रेष्ट! सीखो, सीखो मुझसे कि कैसे जन्मना श्रेष्ठ…!
अफ़लातून
जेपी (जिनकी गिनती सबसे अच्छे नेताओं में जोशी नहीं कर रहे) द्वारा दिल्ली बुलाये जाने के पहले प्रभाष जोशी नई दुनिया के खेल संवाददाता थे। अपने बेटे की पैरवी खिलाड़ियों से करते थे – यह है ब्राह्मण होने का पकड़-पहुंच- कौशल। इस परम्परा से बना पत्रकारिता में स्थान! इतिहास के कूड़ेदान में होंगे।
और दुनिया का कौन-सा मनोविज्ञान इससे इनकार करेगा कि अगर जन्म से किसी के भीतर श्रेष्ठताबोध ठूंस-ठूंस कर भरा जाता है, तो दरअसल वह एक तरह का सामाजिक-सांस्कृतिक “इंपावरमेंट” होता है। लेकिन हमारे यहां ब्राह्मणों और सवर्णों का यह श्रेष्ठताबोध समाज की निचली कही जाने वाली जातियों के हीनताबोध की कीमत पर खड़ा होता है। जिस ट्रेनिंग की बात प्रभाष जोशी ने की है, वह केवल ब्राह्मणों के ब्राह्मण होने की ट्रेनिंग नहीं रही है बंधुओं। उस ट्रेनिंग ने एक ही समय में अगर एक “ब्राह्मण” तैयार किया तो लाखों “शूद्र” तैयार किए।
और इस ट्रेनिंग का प्रोसेस जानना चाहेंगे आप? प्रभाष जोशी से पूछिए कि जब से सचिंन तेंदुलकर पैदा हुआ, तब से प्रभाष जोशी से लेकर कितने लोगों ने कितनी बार कितनी तादाद में तेंदुलकर चालीसा का निर्माण किया है। कांबली के प्रति नफरत का इजहार करने या हरियाणा के एक खिलाड़ी की जाति ढोली और उसके पिता के बारे में यह टिप्पणी कि वह ढोल बजाता फिरता था…! – क्या अब भी समझना मुश्किल बना रहेगा कि जिस वक्त आप एक बच्चे को “ब्राह्मण” बना रहे होते हैं, ठीक उसी वक्त कई-कई बच्चों को “शूद्र” बनाते रहते हैं? “मूस मोटाएगा त लोढ़ा होगा…” जैसी पावन उक्तियों के प्रणेता कौन रहे हैं- यह प्रभाष जोशी से ज्यादा जानता होगा कोई?
विनीत कुमार
प्रभाषजी ने अपनी गप्प को तथ्य का रुप देने का जो काम किया है,ये उनकी छवि के साथ-साथ पत्रकारीय स्तर को भी स्पष्ट करता है। भाषाई स्तर पर उनकी व्यक्तिवादिता तो हम पहले से ही जानते हैं। उनसे कौन सवाल करे औऱ कौन संपादन करे कि उनने,इनने औऱ अपन हिन्दी में कोई शब्द नहीं होते। अब जान लेने पर भी उसका इस्तेमाल करते हैं और कोई उसे संपादित करने की हिम्मत नहीं करता तो ये भाषाई स्तर पर हिंसक होने के अलावे औऱ क्या है।..
“पूजिए विप्र शील गुन हीना, शूद्र न गुन गन ग्यान प्रबीना…” क्या इससे अलग कुछ कहा है प्रभाष जोशी उर्फ भीष्म पितामह उर्फ तुलसीदास उर्फ मनु महाराज ने?
बहुत गर्व होता है प्रभाष जोशी को यह कहते हुए कि सिलिकॉन वैली या अमेरिका में भारत अगर जगमगा रहा है तो वह सिर्फ ब्राह्मण प्रकाश से…। यह प्रकाश कितनों की रोशनी छीन कर अपनी रोशनी बिखेर रहा है प्रभाष जी, क्या यह बताएंगे आप? एक जरा आरक्षण की कहीं चर्चा नहीं चली कि लोग मिट्टी तेल या पेट्रोल खुद पर छिड़क कर आग लगाने लगते हैं। यानी मर जाएंगे, लेकिन शूद्रों को रोशनी में नहाते हुए नहीं देखेंगे।
कोई अपने दुख से दुखी है तो उसका तो इलाज है। लेकिन अगर कोई दूसरों के सुख से दुखी है, तो उसका क्या इलाज होगा प्रभाष जोशी जी?
आप ठीक कहते हैं कि अंग्रेजी कानूनों के बरक्स अपनी प्रथा-परंपरा आपके लिए ज्यादा महत्त्वपूर्ण है, चाहे वह सती के नाम पर किसी स्त्री को जिंदा जला देना ही क्यों न हो। ब्राह्मण तंत्र तो यों भी दुनिया के किसी भी कानून से श्रेष्ठ है। फिर सती की “महान” परंपरा क्यों नहीं? शायद बुढ़ापे के कारण याद नहीं रहा कि आपने पिछले के पिछले के पिछले के पिछले के पिछले… जन्म में क्या कहा था। “सहज जड़ नारि अयानि” (स्त्रियां स्वभाव से मूर्ख और अज्ञानी होती हैं) और “सहज अपावनि नारि” (स्त्रियां स्वभाव से ही अपवित्र हैं) जैसी महान उक्तियां आपके ही तुलसी श्रीमुख की देन हैं न…। तो ऐसी अपावनि नारियों को पुरुषों का सान्निध्य मिल जाता है, यही क्या कम मेहरबानी है। और अगर उसके पति-परमेश्वरो के “देहत्याग” के बाद उस “अपावनि नारि” को भी जिंदा जला दिया जाता है, तो इसमें आश्चर्य कैसा! यह तो गर्व का विषय है, क्योंकि यह पाप-सम अंग्रेजी कानूनों के बरक्स हमारी परंपराएं-प्रथाएं हैं, जो हमारे ब्राह्मण धर्म की जीवन रेखाएं हैं।
रत्नेश त्रिपाठी
आपका लेख, चिंता, समझदारी व विद्वान लोंगों की टिपण्णी बहुत ही अच्छी है किन्तु आप सभी एक बात का जबाब दे दें तो मुझे अति प्रशन्नता होगी कि कुछ लोगों के लेखों के आधार पर आप लोग पूरे ब्राह्मण समाज को गाली दे देते हैं, क्या वे इस देश के अपराधी हैं? आप लोगों ने कितना इतिहास पढ़ा है ये मै नहीं जानता किन्तु मै भी इतिहास का छात्र हूँ इस लिए कह रहा हूँ, अपनी वैमनष्यता को किसी भी व्यक्ति को आधार न बनावें, उसकी गलती कि सजा उसी को दें, शायद मेरी नजर में ( जरुरी नहीं सभी इससे सहमत हों) विद्वता यही कहती है।
तो शूद्रों और स्त्रियों का इलाज हो गया न…! आपकी ट्रेनिंग के सामने तो संसार के बड़े-बड़े सूरमा फेल। इसी सदियों की ट्रेनिंग की बात कर रहे हैं न आप, जोशी जी? बहुत सारे शिष्यों को दुख होगा कि जिसे बड़े जतन से एक मूर्ति के रूप प्रतिष्ठापित किया था, उसका भंजन! इतनी निर्ममता से! “मैजोकिज़्म” जब परंपरा बनाई जाएगी, तो उसकी परिणति के रूप में “सैडिज़्म” कहां जाएगा बंधु-श्रेष्ठों? बहुत सारे लोगों का वहम बिखर चुका है, और बहुत सारे लोग सुखबोध में चले गए हैं कि प्रभाष जोशी ने ब्राह्मणवाद का नया मानकीकरण किया है। “स्वर्ग की सीढ़ियों” के सपने से लेकर “सच का सामना” के सकार से लबरेज आधुनिकता का फेफड़ा ब्राह्मणवाद के ऑक्सीजन से फूल और पिचक रहा है। फिर सूरमाओं की जोर-आजमाइश का हासिल क्या?
हासिल ये कि शंबूक अब उठ खड़ा हुआ है। उसने वेद को सबसे पास के कूड़ेदान में फेंक दिया है (जलाने में ज्यादा वक्त लगता)। अब वह हाथ में अपने उपनिषदों के अक्षरों की तलवार लिए खड़ा है। (राम का खौफ देख सकें तो देखें)। और अहिल्या अब गौतम से लेकर इंद्र और राम तक से हिसाब मांगने के लिए तैयार खड़ी है।
खरी बात
August 22, 2009 at 3:41 pm
प्रेमरंजन जी का बेहद महत्वपर्ण आलेख हैं। वाद विवाद से इतर भी इसका स्थायी महत्व है। पोंगापंथी लोग अपनी बातों को धारण करते हैं वैसे ही समाज का विकास चाहने वालों को भी ऐसी बातें धारण करनी चाहिए।
और भाई अफलातून की बात सुन रहे हैं जोशी जी। ये समाजवाद के इस समय के सबसे महत्वपूर्णँ नेताओं में हैं और महात्मा गांधी के बेहद करीबी महादेव देसाई के परिवार और परंपरा के हैं। आपके बचाव में आने का दम इस समय किसी में नहीं है। ब्राह्मणवादी उग्र पंडापंथी बड़बोलापन अब किसी का नहीं चल सकता, चाहे उस पंडे का नाम प्रभाष जोशी ही क्यों न हो। समय आगे बढ़ गया है जोशी जी। चलिए सॉरी बोलिए।
Sanjay Grover
August 22, 2009 at 4:13 pm
Shabash Premranjan!
घोस्ट राइटिंग
August 22, 2009 at 4:17 pm
Aur ye ki Brahmin Network aaj ki samajik vyavastha men kis tarah apna KAM karta hai, ye bhayavah sachchayi kaun samne layega !?
Mrityunjay Prabhakar
August 23, 2009 at 2:35 pm
Yah post bahut hi achha hai aur Prem Jee iske liye badhai ke patra hain. Unhone jis tarah se tarkon ka sahara lekar Prabhash jee ki dhulai ki hai wah bilkul sahi hai. mauka ayega to main bhi kabhi likhunga par abhi to inke brahmantva ko pranam karta hun. Prasidh itihaskar Ramsharan Sharma ne kabhi nizi batcheet me kaha tha ki Brahmanon ka jo hal abhi hai(common brahmano ki baat kar raha hun, bade sampadkon ki nahin) ane wale samay men aur bhi bura hal hoga. Yeh sochate hain pratibha inki bapauti hai. Ek din aisa ayega jab ye sulabh sauchalaya me hi nazar ayenge kyunki hunar to inke paas hai nahin aur vayviya jyan (matlab ishwar se ya brahmm se sidhe samvad ki jaroorat rah nahi jayegi) ki jaroorat rahh nahi jayegi. so itihas ke kudedan men jane ke liye ye log apne ko khud hi taiyar kar rahe hain..
aur inke is tarahh ke bol bachan khud b khud inhe us or le jayenge..
par ab jaroorat is baat ki hai ki inhe thoda dhakka diya jaye taki
ye jaldi se wahan jayen aur manavta ka aur vinashh karne ka mauka inhe na mile..
ashish rai
August 23, 2009 at 4:46 pm
prabhas ji sey aisi ummid nahi thi……
amit tyagi
August 23, 2009 at 7:43 pm
mujhe eisa lagta hai ki prabhash joshi jaise naaam ko is tarah ka rukh lene se pahle sau baaar sochna chahiye. tathakathit samazwad aur samantawad ka matlab yah to nahin ki brahmn ke alawa is desh mein baki sabhee bewkoof hain. prabhash jee ke kai shishya jo sc st hain, kya prabhash jee unhein bewakoof mante hain?