जनसत्ता के पहले संपादक प्रभाष जोशी को लगभग ढाई दशक पहले जब पत्रकारों की टीम बनाने का पहला मौका मिलता है तो कुछ ऐसी टीम बनती है। ये है जनसत्ता की शुरुआती टीम के टॉप 15 प्लेयर:-
1. प्रभाष जोशी (संपादक)
2. गोपाल मिश्र (न्यूज एडिटर)
3. श्याम आचार्य (दूसरे न्यूज एडिटर)
4. अच्युतानंद मिश्र (तीसरे न्यूज एडिटर)
5. हरिशंकर व्यास (असिस्टेंट एडिटर)
6. सतीश झा (असिस्टेंट एडिटर)
7. बनवारी (असिस्टेंट एडिटर)
8. मंगलेश डबराल (रविवारी के इंचार्ज)
9. ब्रजेंद्र पांडे (खेल डेस्क के इंचार्ज)
10. उमेश जोशी (बिजनेस डेस्क के इंचार्ज)
11. सत्यप्रकाश त्रिपाठी (डेस्क के इंचार्ज)
12. परमानंद पांडे ( डेस्क के इंचार्ज)
13. देवप्रिय अवस्थी (डेस्क इंचार्ज)
14. श्रीश मिश्र (डेस्क इंचार्ज)
15. जगदीश उपासने (डेस्क इंचार्ज)
सती प्रथा पर जनसत्ता के नाम समाजवादी विचारक किशन पटनायक जी का खुला पत्र[ दिवराला ( राजस्थान ) सती - कांड के बाद भारतीय संस्कृति में नर - नारी सम्बन्धों पर सितम्बर - अक्टूबर 1987 में जनसत्ता के दिल्ली संस्करण के सम्पादक श्री बनवारी के कई लेख छपे । इन लेखों पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए मैंने (किशन पटनायक )बनवारीजी को एक लेख-पत्र लिखा । यह जनसत्ता में नहीं छपा तो मैंने उसे ’हंस’ को भेज दिया तो उसमें यह प्रकाशित हुआ और बाद में सामयिक वार्ता में भी । ]
प्रिय बनवारी जी,
भारतीयता पर आपका जो भी लेख मेरी नजर से गुज्रता है , मैं उसे अवश्य पढ़ता हूँ। कारण , मेरी भी यह मान्यता है कि आधुनिकतावाद हमारे देश को घोर मूल्यहीनता और दरिद्रता की ओर ले जा रहा है। परन्तु आपके लेखों को पढ़ते वक्त मुझे कभी कभी परेशानी होती है। मुझे लगता है आपके प्रतिपादनों से कट्टर हिन्दूवाद को ही बल मिलेगा। अगर आपका लक्ष्य है कि भारतीयता के आधार पर एक नई संस्कृति और समाज का निर्माण हो तो कट्टर हिन्दूवाद के बढ़ने से इस लक्ष्य पर प्रतिकूल असर होगा। कई बार इच्छा हुई कि आपसे मिलकर बातचीत करूँ। परन्तु दूरी के कारण ऐसा नहीं हो सका। इसलिए आपको सम्बोधित करते हुए यह लेख-पत्र लिख रहा हूँ। आपके लेखों से मेरे मन में जो संशय उत्पन्न होता है उसी को इस लेख-पत्र में लिपिबद्ध कर रहा हूँ।
आधुनिकतावाद के विरोध में और भारतीयता के समर्थन में इस वक्त देश में एक छोटा सा वैचारिक समूह बना हुआ है। इतिहासकार धर्मपाल , कन्नड़ लेखक अनन्तमूर्ति और हिन्दी लेखक निर्मल वर्मा भी शायद इस धारा के अन्तर्गत हैं। अरुण शौरी को मैं इस धारा का नहीं मानता हूँ। वे सिर्फ़ हिन्दूवाद के पक्षधर हैं। वे भारतीयतावादी नहीं हैं। राजनीति व अर्थनीति में वे सम्पूर्ण आधुनिकतावादी हैं। अनन्तमूर्ति व निर्मल वर्मा को मैंने ठीक ढंग से नहीं पढ़ा है। आपके लेखों को कुछ ज्यादा पढ़ा है। वैसे तो आपकी धारा को भारतीयतावादी कहता हूँ लेकिन जब मुझे इसमें खतरा दिखाई देता है तब इसे “बौद्धिक हिन्दूवाद” कहता हूँ। साम्प्रदायिक हिन्दूवाद और कट्टर हिन्दूवाद से सम्पूर्ण भिन्न होने पर भी इसकी कुछ ऐसी कमजोरियाँ हैं कि साम्प्रदायिक और कट्टर हिन्दूवाद के लिए वह एक चुनौती बनने के बजाय एक ढाल बन जाता है। सती – प्रथा पर विवाद के सन्दर्भ में यही हो रहा है। राजपूत जाति के तलवारधारी संरक्षकगण और पुरी के शंकराचार्य के भक्त लोग आपको अपना पक्षधर मानेंगे। … ((Read More))
ये लिस्ट लगभग ढाई दशक पुरानी है। कुछ नाम छूटे हों या पदनाम गलत हों तो कृपया बताएं। खासकर अगर किसी दलित, ओबीसी या मुसलमान या किसी महिला का नाम छूट गया हो तो जरूर बताएं।
वैसे ऊपर की लिस्ट में एक महिला नहीं है (जनसत्ता के लिए सती का समर्थन करना खास मुश्किल नहीं रहा होगा), सिर्फ बनवारी अवर्ण हैं। एक ठाकुर नहीं, एक कायस्थ नहीं। बाकी ओबीसी, दलित, आदिवासी और मुसलमान की तो बात ही मत कीजिए। जनसत्ता की ये सत्ता संरचना क्या आपको चौंकाती है? होने को ये सिर्फ संयोग हो सकता है (इस लिस्ट में कई बेहतरीन पत्रकार हैं और हम उनका सम्मान करते हैं)। लेकिन ऐसी लिस्ट का होना संयोग नहीं भी हो सकता है। क्योंकि जनसत्ता के जब तीन शहरों से संस्करण निकाले गए तो उनमें भी तीनों के स्थानीय संपादक ब्राह्मण ही बनाए गए। क्या ये भी संयोग ही रहा होगा? कागद कारे के नायकों के नाम अक्सर नानाजी देशमुख, विष्णु चिंचालकर, कुमार गंधर्व, तेंडुलकर, गावस्कर, नरसिंह राव, राहुल बारपुते, अनुपम मिश्र जैसा कुछ होना भी संयोग हो सकता है। प्रभाष जोशी को संदेह का लाभ मिलना चाहिए?
अब उनके चर्चित इंटरव्यू का एक अंश देखिए (संदर्भ के लिए पूरा इंटरव्यू रविवार डॉट कॉम पर जरूर पढ़ें, वरना संदर्भों से काटकर बात को पेश करने का आरोप लग जाएगा)- “क्योंकि ब्राह्मण अपनी ट्रेनिंग से अवव्यक्त चीजों को हैंडल करना बेहतर जानता है. क्योंकि वह ब्रह्म से संवाद कर रहा है. तो जो वायवीय चीजें होती हैं, जो स्थूल, सामने शारिरिक रूप में नहीं खड़ी है, जो अमूर्तन में काम करते हैं, जो आकाश में काम करते हैं. यानी चीजों को इमेजीन करके काम करते हैं. सामने जो उपस्थित है, वो नहीं करते. ब्राह्मणों की बचपन से ट्रेनिंग वही है, इसलिए वो अव्यक्त चीजों को, अभौतिक चीजों को, अयथार्थ चीजों को यथार्थ करने की कूव्वत रखते है, कौशल रखते हैं…. एक समाज में स्किल का लेवल होता है, कौशल का एक लेवल होता है, जो वो काम करते-करते प्राप्त करता है. उस कौशल का आप अपने क्षेत्र में कैसा इस्तमाल करते हैं, उस पर निर्भर करता है…. जिन लोगों को सदियों से जिस प्रकार के काम को करने की ट्रेनिंग मिली है, वे उस काम को अच्छा करते हैं.”
उनकी टीम को देखकर और उनके इंटरव्यू को पढ़कर क्या कुछ सूत्र जुड़ते हैं? क्या ये वाणी और कर्म के बीच एकता का उदाहरण नहीं हैं? क्या आपको नहीं लगता कि जोशी जी ने जो इंटरव्यू दिया है वो कोई अलग-थलग मामला नहीं है?
नोट- धारण करने वालों और ब्रह्म संवाद से समर्थ लोगों की ऐसी सघन उपस्थिति के बावजूद प्रभाष जोशी का जनसत्ता, न्यूज रूम की बेहतर विविधता वाले अखबार नवभारत टाइम्स (प्रधान संपादक-राजेंद्र माथुर) के आधे सर्कुलेशन तक भी कभी नहीं पहुंच सका।
रंगनाथ सिंह
August 24, 2009 at 5:29 am
ye huyi fact finding wali khanti patrakrita.is mudde ko hawayi baton se aage badhane ke liye dhanyavad.babhanvad ka pardafas karne ke liye aise hi reporting ki jarurat hai.
संजय कुमार सिंह
August 24, 2009 at 1:09 pm
जनसत्ता की शुरुआती टीम इस प्रकार थी। इसमें एक महिला के अलावा ठाकुर और दूसरी जातियों के लोग भी हैं। इस सूची का उद्देश्य छूट गए लोगों को शामिल करना है और कुछ मामूली गतलियों को सुधारना है। प्रभाषजी के ब्राह्मणवाद से इस सूची को प्रस्तुत करने का कोई संबंध नहीं है। यह सूची जानकार भरोसेमंद सूत्रों के हवाले से है पर वरिष्ठता क्रम के आधार पर नहीं है। टॉप 15 जैसा कुछ भी उस समय नहीं था। पूर्व प्रकाशित सूची के श्याम आचार्य और अच्युतानंद मिश्र जनसत्ता से बाद में जुड़े थे। इसी तरह ब्रजेन्द्र पांडे को खेल डेस्क इंचार्ज कहा गया है जबकि इसपद पर सुरेश कौशिक थे। तथ्यों को सही ढंग से प्रस्तुत करने के लिए यह भी बताया जा सकता है कि प्रभाष जोशी 97-98 में रिटायर हो गए थे। उनके बाद राहुल देव और फिर ओम थानवी जनसत्ता के संपादक बने जो अब भी हैं।
1. प्रभाष जोशी
2. बनवारी
3. हरिशंकर व्यास
4. सतीश झा
5. गोपाल मिश्र
6. मंगलेश डबराल
7. देवप्रिय अवस्थी
8. अशोक कुमार
9. जगदीश उपासने
10. अमित प्रकाश सिंह
11. सत्य प्रकाश त्रिपाठी
12. परमानंद पांडे
13. कुमार आनंद
14. शंभू नाथ शुक्ल
15. सुधांशु भूषण मिश्र
16. उमेश जोशी
17. राजीव शुक्ल
18. बाला सुंदरम गिरि
19. अच्छे लाल प्रजापति
20. चमन लाल
21. दयानंद पांडे
22. पारुल शर्मा
23. श्रीभगवान सुजानपुरिया
24. सुरेश कौशिक
25. मनोज चतुर्वेदी
26. ब्रजेन्द्र पांडे के अलावा रिपोर्टिंग में
27. राम बहादुर राय
28. राकेश कोहरवाल
29. महादेव चौहान
30. अलोक तोमर
चार्वाक सत्य
August 24, 2009 at 2:33 pm
संजय जी आभार आपका। जैसा कि मैंने निवेदन किया है कि पुरानी लिस्ट है इसलिए जरूरी है कि जनसत्ता को जानने वाले लोग इसे दुरुस्त करें। आपने जो लिस्ट बनाई है उसमें सबसे नीचे के स्तर के संपादकीय कर्मियों को भी शामिल किया है। लेकिन इस लिस्ट की भी मीमांसा करेंगे तो पाएंगे कि इससे जनसत्ता की समाजिक संरचना के बारे में मूल स्थापना बदलती नहीं है।
अब लंबी हो चुकी 30 की लिस्ट में भी सिर्फ एक महिला और वो भी सबसे नीचे के पद पर। इस लिस्ट में कहां हैं दलित, और कहां हैं मुसलमान? कितने ओबीसी, कितने ठाकुर, कितने कायस्थ, कुल कितने अब्राह्मण हैं यहां? संजय जी, क्या ये सवाल निरर्थक है कि 3 प्रतिशत आबादी वाला एक समुदाय किसी मीडिया हाउस में दो तिहाई संपादकीय पदों पर आसीन है? ऊपर के पदों पर तो हालात और भी बदतर। क्या ये सिर्फ संयोग है या फिर जोशी जी की स्थापना ही सही है कि सबको कहां मिली हजारों साल की ट्रेनिंग।
ये स्थिति दो ही तरह के लोगों को सहज लग सकती है। एक तो वो जो 3% में शामिल हैं और दूसरे वो जो निहायत भोले हैं।
संजय जी, एक उपकार और कीजिए। आप तो जानकार हैं। लोग कहते हैं कि प्रभाष जोशी के 1991 में अचानक सेकुलर बनने से पहले जनसत्ता के तमाम संस्करणों में सबसे नीचे के संपादकीय पद पर भी कोई दलित या मुसलमान नहीं था। क्या ये सच है?
नीयत शायद किसी की खराब नहीं होगी न ही ये कोई षड्यंत्र होगा, लेकिन ये जानना रोचक होगा कि कितने दलित और मुसलमान थे उस समय के जनसत्ता में?
संजय कुमार सिंह
August 24, 2009 at 3:09 pm
मैंने जनसत्ता में नौकरी जरूर की है पर जातिवादी व्यवस्था में मेंरी दिलचस्पी बहुत नहीं थी और ठाकुर होने के बाद भी बगैर किसी परिचय के मुझे जनसत्ता में रख लिया गया था इसलिए वहां का तथाकथित ब्राह्मणवादी माहौल मुझे कभी अखरा नहीं और मैंने साथियों की जाति के संबंध में कभी कोई दिलचस्पी नहीं ली। निजी तौर पर मैंने कभी कोई परेशानी भी महसूस नहीं की। मुसलमान चूंकि नाम से ही जाने जा सकते हैं इसलिए कह सकता हूं कि मेरी जानकारी में दिल्ली के संपादकीय विभाग में कोई मुसलमान नहीं था। हालांकि उन दिनों पटना से अली अनवर स्ट्रिंगर हुआ करते थे। जयपुर से रियाजुद्दीन शेख संवाददाता थे। बाद के समय में शम्स ताहिर खान, असरार खान, सफदर रिज्वी और अनवर चौहान जैसे स्ट्रिंगर दिल्ली में रहे हैं। पर ये ठीक-ठीक याद नहीं है कि कौन कब जनसत्ता से जुड़ा और अलग हुआ। 1991 में कोलकाता संस्करण में प्रभाष जोशी ने फजल इमाम मल्लिक को रखा जो अब दिल्ली में हैं और मुंबई में जावेद इकबाल भी थे।
चार्वाक सत्य
August 24, 2009 at 8:04 pm
फजल इमाम मलिक के रूप में जनसत्ता में पहली मुस्लिम नियुक्ति हुई, 1991 में। तब तक प्रभाष जी का बीजेपी से प्रेम खत्म हो गया था। संजय जी, सही है? पहला दलित भी 1991 में ही रिक्रूट हो पाया। और ये नियुक्तियां भी मुख्यालय में नहीं हुई थीं। ये कुछ निर्मम-निष्ठुर तथ्य हैं। प्रमोशन से लेकर इंक्रिमेंट में जातीय भेदभाव के कई किस्से हैं जनसत्ता में।
संजय कुमार सिंह
August 25, 2009 at 1:47 am
चार्वाक सत्य जी, तथ्य मेरे या आपके चाहने से नहीं बदलेगा। मैंने जो लिखा है उसे फिर पढ़िए। अली अनवर पटना से स्ट्रिंगर थे और रियाजुद्दीन शेख जयपुर से संवाददाता थे। रियाजुद्दीन शेख 1987 में मेरे जनसत्ता ज्वाइन करने से पहले से जयपुर में रिपोर्टर थे। और उनकी नियुक्ति औपचारिक थी। पहले आपने 90-91 के दौर की बात की थी इसलिए मैंने अली अनवर का नाम पहले लिखा था। पर आप फजल इमाम मलिक को पहली नियुक्त मान ले रहे हैं।
चार्वाक सत्य
August 25, 2009 at 8:46 am
अस्तु, उस समय तीन शहरों से निकलने वाले अखबार जनसत्ता में एक मुसलमान स्टाफ भी था (ये पढ़े लिखे लोगों का मंच है इसलिए स्ट्रिंगर यानी टेंपररी संवाददाता क्या होता है ये बताने की जरूरत कदाचित नहीं है) । अब तो प्रभाष जी पर नियुक्तियों के मामले में सांप्रदायिक होने का आरोप लग ही नहीं सकता। संजय जी, बधाई और शुभकामनाएं।
अब दलित स्टाफर के बारे में भी स्थिति स्पष्ट कर ही डालें। प्रभाष जी को दलित विरोधी ही भला क्यों कहा जाए। जनसत्ता के बड़े पदों पर लगभग 80 फीसदी और कुल पदों पर लगभग 60 फीसदी ब्राह्मणों की मौजूदगी भी अगर प्रभाष जोशी को जातिवादी साबित नहीं करती है, तो फिर यहां से तर्क के अंत की शुरुआत होती है। मानसिक गुलामी इसे ही कहते हैं शायद, जब गुलाम को ये लगे ही नहीं कि वो गुलाम है। इसे स्टॉकहोम सिंड्रॉम भी कह सकते हैं जब अपहृत लोग अपहरणकर्ताओं से सहानुभूति, बल्कि कई बार प्रेम भी करने लगते हैं।
Updesh Awasthee
August 26, 2009 at 7:20 pm
charvok ji
According to shri prabhash josi
“क्योंकि ब्राह्मण अपनी ट्रेनिंग से अवव्यक्त चीजों को हैंडल करना बेहतर जानता है. क्योंकि वह ब्रह्म से संवाद कर रहा है. तो जो वायवीय चीजें होती हैं, जो स्थूल, सामने शारिरिक रूप में नहीं खड़ी है, जो अमूर्तन में काम करते हैं, जो आकाश में काम करते हैं. यानी चीजों को इमेजीन करके काम करते हैं. सामने जो उपस्थित है, वो नहीं करते. ब्राह्मणों की बचपन से ट्रेनिंग वही है, इसलिए वो अव्यक्त चीजों को, अभौतिक चीजों को, अयथार्थ चीजों को यथार्थ करने की कूव्वत रखते है, कौशल रखते हैं…. एक समाज में स्किल का लेवल होता है, कौशल का एक लेवल होता है, जो वो काम करते-करते प्राप्त करता है. उस कौशल का आप अपने क्षेत्र में कैसा इस्तमाल करते हैं, उस पर निर्भर करता है…. जिन लोगों को सदियों से जिस प्रकार के काम को करने की ट्रेनिंग मिली है, वे उस काम को अच्छा करते हैं.”
Absolutely correct. But it’s meanings how can you know? It’s problem of your thinking. Coz U ARE NOT A BRAHMIN
BRAHMIN DON’T DO DIFFERENT THINGS. THEY DO THINGS DIFFERENTLY.
रंगनाथ सिंह
August 24, 2009 at 6:28 pm
संजय जी आपने बहस को ज्यादा ठोस जमीन पर खड़ा किया है। लेकिन इसके बाद भी चार्वाक का कथन हमारे माथे पर लकीरें ले ही आता है। क्योंकि उसमें सच्चाई है। इन नए आंकड़ों के आने के बाद ब्राह्मणवाद किन चीजों से समझौता करके अपनी सत्ता बचाए रखने में सफल रहा है इसकी भी पड़ताल की जा सकती है। जैसे कोई ठाकुर किसी बड़े प्रसिद्ध व्यक्ति का बेटा हो। या कोई दलित किसी दलित नेता का बेटा हो या कोई महिला किसी की रिष्तेदार हो। ऐसे तमाम कारणो पर विचार करना जरूरी है। जिस तरह से मायावती का पैर छूने से कोई ब्राह्मण अपने गाँव के दलितों को सम्मान देने वाला नहीं बन जाता उसी तरह किसी खास कारण से नाम गिनानेभर की भर्तियों से कोई पाक-साफ नहीं हो जाता। इन कारणों को ध्यान में रखते हुए इस सूची का विष्लेषण करना होगा।
सवर्णवाद के भीतरी अहाते में ठाकुर बनाम बाभन का पौराणिक काल से चलता आ रहा द्वंद्व भी जातिवादी संरचना को समझने में सहायक होता है। ध्यान रहे कि बुद्ध,महावीर,विष्वामित्र के लिए ही ब्राह्मण सत्ता को खुली चुनौती देना संभव था। यह भी ध्यान रहे कि भारत में ईसा पूर्व से ही ब्राह्मण धर्म और श्रमण धर्म के बीच सीधा टकराव रहा है। ऐसा तो संभव नहीं है कि बाभनवाद को ठाकुरवाद,लालावार,सवर्णवाद,हिन्दुवाद,सांप्रदायिकताविरोधवाद के अंतरसंबधों से काट कर देखा जाए। कुछ लोगों को सांप्रदायिकताविरोधवाद कहने पर आपत्ति होगी। इसके जवाब में अभी सिर्फ इतना कहुँगा कि सरसंघचालकों और पोलितसंघचालकों की जातीय संरचना की तुलना कर लें। निर्लज्ज जातिवाद के दानव ने हर विचारधारा और दर्षन की पेंदी में छेद कर दिया है। हम जिसे भारतीय नवजागरण काल कहते हैं उसमें से अधिकतर सुधारवादियों ने जातिवाद का खुला विरोध किया था। यहां तक संघ भी सैद्धांतिक स्तर पर जाति का विरोध करता है। वामपंथी तो अपने दर्षन की मूल प्रवृत्ति से ही ऐसी महामारियांे से आजाद रहते हैं। तुर्रा ये कि इस जातिवाद ने देश के हर विचारधारा को पटकनी दे दी। सर्वविदित है कि इस तरह के धूर्त और पाखण्डी जातिवाद का अब दलितवाद से भी गठबंधन हो चुका है। शेख और महंत के बीच का गठबंधन तो पुराना है। हिन्दु सवर्णवाद,मुस्लिम सवर्णवाद,सवर्णदलितवाद के बीच पल-पल परिवर्तित होते चालाक समीकरणों को खोल कर समझने के बाद ही हमें पता चलेगा कि आजादी के बासठ साल बाद भी,तमाम वादों के बाद भी दलितों और आदिवासियों की स्थिती में उल्लेखनीय परिवर्तन क्यों नहीं आया। आदिवासियों की स्थिती तो सर्वाधिक खराब है। पूर्वोत्तर में सरकार के पैर के ठीक नीचे भारतीय नागरिकों की गर्दन दबी हुई है। लेकिन सारे वादी-फसादी अमेरिका से लड़ने में,फासीवाद से लड़ने में व्यस्त है। एक समय में कई लड़ाईयां लड़ने की मजबुरी हो सकती है। लेकिन जरा एक बार देश के अंदर अमीरवाद,जातिवाद,सत्तावाद,खानदानवाद, गुरू-चेला वाद पर भी उल्लेखनीय लर्ड़ाइंयां लड़िए। प्रधानमंत्री के खिलाफ विरोधपत्र लिखने का बौद्धिक एकांकी बहुत खेला जा चुका है। अब जरा गाँव के जातिवादी प्रधान के खिलाफ भी दो आखर लिखिए। अमेरिका के खिलाफ रैली में बड़ी रैली निकालिए तो निकालिए। लेकिन कभी जातिवाद की बेहया पैरोकारी का भी तो उग्र विरोध कीजिए। जिससे लोगों को पता चले कि आप ऐसे कुकृत्यों से कितने आहत होते हैं।
अंत में कुछ तथाकथित सुसभ्य लोगों से कहुँगा कि पाखण्डियों तुम प्रभाष जोशी से असहमत हो ऐसा कहके अभी तो अपनी खाल नहीं बचा सकते। जैसा कि प्रभाष जोशी ने सालों-साल से किया होगा। ढोगियों ऐसे कुकृत्यों से असहमत होने के पिण्डछुड़ाऊ पालिष्ड असहमति प्रदर्शन के ढोंग के बजाए मुखर विरोध करो। तुम लोग तो ऐसे सहमत या असहमत हो रहे हो कि जैसे जोशी साहेब कोई वैज्ञानिक या दार्शनिक सिद्धातं का प्रतिपादन कर रहे हैं और तुम उनसे शास्त्रार्थ करने बैठै हो। रस्मअदायगी करना बंद करो। खुल कर समर्थन करो और खुल कर विरोध करो।
कुछ लोगों को छद्म नामों से लिखी टिप्पणियों या लेखों पर एतराज है। उन लोगों से गुजारिष है कि जरा सोचें कि खुल कर विरोध कर सकने की स्थिति के अभाव में ही लोग छापामार तरीके से विरोध कर रहे हैं। जिन को जातिय भय नहीं है उनको पेट मारे जाने का भय है। कोई सिंह,चतुर्वेदी,श्रीवास्तव खुल कर घिनौने जातिवादी का विरोध कर पा रहा है तो इसके पीछे भी जातिय सुरक्षाबोध का व्यापक समाजशास्त्र है। इक्कीसवीं सदी में जातिय आधार पर सुरक्षा-असुरक्षा का समीकरण बनना हमारे देष की षर्मनाक वास्तविक स्थिति को दिखाता है।
कुछ लोगों को इन लोगों की भाषा पर एतराज है। उनसे सिर्फ यही पूछुँगा कि जब उनके आँख में सूजा चुभोया जाएगा तो उनके मुँह से कैसी ध्वनी निकलेगी। सारेगामा या…………….। सूजा चुभोने वाले से वह व्यक्ति संवाद करेगा या……….। कम से कम मेरे देखे तो अभी तक किसी ने भी ऐसी अभद्रता नहीं कि जिसके आधार पर कोई यह कह सके कि यह प्रभाष जोशी के चरित्रहनन की साजिष है।
नैतिकता और षुचिता का सोटा चलाने से पहले ठोस भौतिक सच्चाईयों को नजरअंदाज न करें। प्रभाष जोशी के सतीवाद और ब्राह्मणवाद की पैरवी करते ढीठ बयानों को पढ़ते वक्त यह भी ध्यान रखें कि यह बयान 2009 में दिया गया है न कि 1909 या 1809 या 1709 या 1609 में।
कुछ लोगांे को ब्राह्मणवाद का विरोध ब्राह्मणो का विरोध लगता है। अव्वल तो वो लोग इस बहस के मूल तत्व को समझ नहीं पा रहे हैं या फिर वो यह समझते हैं कि ब्राह्मण और ब्राह्मणवाद एक ही षब्द के दो रूप हैं। दोनों ही स्थितियों में उन्हें पुनर्विचार करने की जरूरत है।
कुछ लोग प्रभाष जोशी को पत्रकारिता का महानायक जैसा कुछ बता कर उनके विरोध की धार की कुंद करना चाहते हैं। पहले तो उनको यह समझना चाहिए कि जिस तरह से वो लोग किसी को महानायक बता रहे हैं उस तर्क पद्धति पर कोई किसी को महाखलनायक भी बता सकता है। दुनिया जानती है कि महानायकत्व का गुणवत्ता से कोई सीधा संबंध नहीं है। यह शब्द जिस फिल्मी दुकान से लूटा गया है वहाँ भी सुपरस्टार और सुपरएक्टर का भेद सबको समझ में आता है। फिल्मी दुनिया के सर्वश्रेष्ठ अभिनेता महानायक नहीं बन पाते। आज भी षाहरूख खान सबसे बड़े स्टार है लेकिन विजय राज या के के मेनन से बहुत ज्यादा बेहतर अभिनेता नहीं माने जाएंगे। इस तरह के चालू स्टारडम की ओट से किसी बहस की हत्या करने की चालाक कोशिश ठीक नहीं है।
अभी इतना ही।