संजय जी आपने बहस को ज्यादा ठोस जमीन पर खड़ा किया है। लेकिन इसके बाद भी चार्वाक का कथन हमारे माथे पर लकीरें ले ही आता है। क्योंकि उसमें सच्चाई है। इन नए आंकड़ों के आने के बाद ब्राह्मणवाद किन चीजों से समझौता करके अपनी सत्ता बचाए रखने में सफल रहा है इसकी भी पड़ताल की जा सकती है। जैसे कोई ठाकुर किसी बड़े प्रसिद्ध व्यक्ति का बेटा हो। या कोई दलित किसी दलित नेता का बेटा हो या कोई महिला किसी की रिश्तेदार हो। ऐसे तमाम कारणों पर विचार करना जरूरी है। जिस तरह से मायावती का पैर छूने से कोई ब्राह्मण अपने गांव के दलितों को सम्मान देने वाला नहीं बन जाता उसी रह किसी खास कारण से नाम गिनानेभर की भर्तियों से कोई पाक-साफ नहीं हो जाता। इन कारणों को ध्यान में रखते हुए इस सूची का विश्लेषण करना होगा।
संजय कुमार सिंह
जनसत्ता की शुरुआती टीम इस प्रकार थी। इसमें एक महिला के अलावा ठाकुर और दूसरी जातियों के लोग भी हैं। इस सूची का उद्देश्य छूट गए लोगों को शामिल करना है और कुछ मामूली गतलियों को सुधारना है। प्रभाषजी के ब्राह्मणवाद से इस सूची को प्रस्तुत करने का कोई संबंध नहीं है। यह सूची जानकार भरोसेमंद सूत्रों के हवाले से है पर वरिष्ठता क्रम के आधार पर नहीं है। टॉप 15 जैसा कुछ भी उस समय नहीं था। पूर्व प्रकाशित सूची के श्याम आचार्य और अच्युतानंद मिश्र जनसत्ता से बाद में जुड़े थे। इसी तरह ब्रजेन्द्र पांडे को खेल डेस्क इंचार्ज कहा गया है जबकि इसपद पर सुरेश कौशिक थे। तथ्यों को सही ढंग से प्रस्तुत करने के लिए यह भी बताया जा सकता है कि प्रभाष जोशी 97-98 में रिटायर हो गए थे। उनके बाद राहुल देव और फिर ओम थानवी जनसत्ता के संपादक बने जो अब भी हैं।1. प्रभाष जोशी
2. बनवारी
3. हरिशंकर व्यास
4. सतीश झा
5. गोपाल मिश्र
6. मंगलेश डबराल
7. देवप्रिय अवस्थी
8. अशोक कुमार
9. जगदीश उपासने
10. अमित प्रकाश सिंह
11. सत्य प्रकाश त्रिपाठी
12. परमानंद पांडे
13. कुमार आनंद
14. शंभू नाथ शुक्ल
15. सुधांशु भूषण मिश्र
16. उमेश जोशी
17. राजीव शुक्ल
18. बाला सुंदरम गिरि
19. अच्छे लाल प्रजापति
20. चमन लाल
21. दयानंद पांडे
22. पारुल शर्मा
23. श्रीभगवान सुजानपुरिया
24. सुरेश कौशिक
25. मनोज चतुर्वेदी
26. ब्रजेन्द्र पांडे
27. राम बहादुर राय
28. राकेश कोहरवाल
29. महादेव चौहान
30. अलोक तोमर
सवर्णवाद के भीतरी अहाते में ठाकुर बनाम बाभन का पौराणिक काल से चलता आ रहा द्वंद्व भी जातिवादी संरचना को समझने में सहायक होता है। ध्यान रहे कि बुद्ध, महावीर, विश्वामित्र के लिए ही ब्राह्मण सत्ता को खुली चुनौती देना संभव था। यह भी ध्यान रहे कि भारत में ईसा पूर्व से ही ब्राह्मण धर्म और श्रमण धर्म के बीच सीधा टकराव रहा है। ऐसा तो संभव नहीं है कि बाभनवाद को ठाकुरवाद, लालावाद, सवर्णवाद, हिंदूवाद, सांप्रदायिकताविरोधवाद के अंतरसंबधों से काट कर देखा जाए। कुछ लोगों को सांप्रदायिकताविरोधवाद कहने पर आपत्ति होगी। इसके जवाब में अभी सिर्फ़ इतना कहूंगा कि सरसंघचालकों और पोलितसंघचालकों की जातीय संरचना की तुलना कर लें। निर्लज्ज जातिवाद के दानव ने हर विचारधारा और दर्शन की पेंदी में छेद कर दिया है। हम जिसे भारतीय नवजागरण काल कहते हैं उसमें से अधिकतर सुधारवादियों ने जातिवाद का खुला विरोध किया था। यहां तक संघ भी सैद्धांतिक स्तर पर जाति का विरोध करता है। वामपंथी तो अपने दर्शन की मूल प्रवृत्ति से ही ऐसी महामारियों से आजाद रहते हैं।
तुर्रा ये कि इस जातिवाद ने देश में हर विचारधारा को पटकनी दे दी। सर्वविदित है कि इस तरह के धूर्त और पाखण्डी जातिवाद का अब दलितवाद से भी गठबंधन हो चुका है। शेख और महंत के बीच का गठबंधन तो पुराना है। हिंदू सवर्णवाद, मुस्लिम सवर्णवाद, सवर्णदलितवाद के बीच पल-पल परिवर्तित होते चालाक समीकरणों को खोल कर समझने के बाद ही हमें पता चलेगा कि आजादी के बासठ साल बाद भी, तमाम वादों के बाद भी दलितों और आदिवासियों की स्थिति में उल्लेखनीय परिवर्तन क्यों नहीं आया। आदिवासियों की स्थिति तो सर्वाधिक खराब है। पूर्वोत्तर में सरकार के पैर के ठीक नीचे भारतीय नागरिकों की गर्दन दबी हुई है। लेकिन सारे वादी-फसादी अमेरिका से लड़ने में, फासीवाद से लड़ने में व्यस्त है। एक समय में कई लड़ाईयां लड़ने की मजबूरी हो सकती है। लेकिन जरा एक बार देश के अंदर अमीरवाद, जातिवाद, सत्तावाद, खानदानवाद, गुरू-चेला वाद पर भी उल्लेखनीय लड़ाइयां लड़िए। प्रधानमंत्री के खिलाफ विरोधपत्र लिखने का बौद्धिक एकांकी बहुत खेला जा चुका है। अब जरा गांव के जातिवादी प्रधान के ख़िलाफ़ भी दो आखर लिखिए। अमेरिका के ख़िलाफ़ बड़ी रैली निकालिए, लेकिन कभी जातिवाद की बेहया पैरोकारी का भी तो उग्र विरोध कीजिए। जिससे लोगों को पता चले कि आप ऐसे कुकृत्यों से कितने आहत होते हैं।
चार्वाक सत्य
संजय जी आभार आपका। जैसा कि मैंने निवेदन किया है कि पुरानी लिस्ट है इसलिए जरूरी है कि जनसत्ता को जानने वाले लोग इसे दुरुस्त करें। आपने जो लिस्ट बनाई है उसमें सबसे नीचे के स्तर के संपादकीय कर्मियों को भी शामिल किया है। लेकिन इस लिस्ट की भी मीमांसा करेंगे तो पाएंगे कि इससे जनसत्ता की समाजिक संरचना के बारे में मूल स्थापना बदलती नहीं है।अब लंबी हो चुकी 30 की लिस्ट में भी सिर्फ एक महिला और वो भी सबसे नीचे के पद पर। इस लिस्ट में कहां हैं दलित, और कहां हैं मुसलमान? कितने ओबीसी, कितने ठाकुर, कितने कायस्थ, कुल कितने अब्राह्मण हैं यहां? संजय जी, क्या ये सवाल निरर्थक है कि 3 प्रतिशत आबादी वाला एक समुदाय किसी मीडिया हाउस में दो तिहाई संपादकीय पदों पर आसीन है? ऊपर के पदों पर तो हालात और भी बदतर। क्या ये सिर्फ संयोग है या फिर जोशी जी की स्थापना ही सही है कि सबको कहां मिली हजारों साल की ट्रेनिंग? ये स्थिति दो ही तरह के लोगों को सहज लग सकती है। एक तो वो जो 3% में शामिल हैं और दूसरे वो जो निहायत भोले हैं।
संजय जी, एक उपकार और कीजिए। आप तो जानकार हैं। लोग कहते हैं कि प्रभाष जोशी के 1991 में अचानक सेकुलर बनने से पहले जनसत्ता के तमाम संस्करणों में सबसे नीचे के संपादकीय पद पर भी कोई दलित या मुसलमान नहीं था। क्या ये सच है?
नीयत शायद किसी की खराब नहीं होगी न ही ये कोई षड्यंत्र होगा, लेकिन ये जानना रोचक होगा कि कितने दलित और मुसलमान थे उस समय के जनसत्ता में?
अंत में कुछ तथाकथित सुसभ्य लोगों से कहूंगा कि पाखण्डियों तुम प्रभाष जोशी से असहमत हो ऐसा कह कर अभी तो अपनी खाल नहीं बचा सकते। जैसा कि प्रभाष जोशी ने सालों-साल से किया होगा। ढोंगियों ऐसे कुकृत्यों से असहमत होने के पिण्डछुड़ाऊ पॉलिश्ड असहमति प्रदर्शन के ढोंग के बजाए मुखर विरोध करो। तुम लोग तो ऐसे सहमत या असहमत हो रहे हो कि जैसे जोशी साहेब कोई वैज्ञानिक या दार्शनिक सिद्धांत का प्रतिपादन कर रहे हैं और तुम उनसे शास्त्रार्थ करने बैठै हो। रस्मअदायगी करना बंद करो। खुल कर समर्थन करो और खुल कर विरोध करो।
कुछ लोगों को छद्म नामों से लिखी टिप्पणियों या लेखों पर एतराज है। उन लोगों से गुजारिश है कि जरा सोचें कि खुल कर विरोध कर सकने की स्थिति के अभाव में ही लोग छापामार तरीके से विरोध कर रहे हैं। जिन को जातीय भय नहीं है उनको पेट मारे जाने का भय है। कोई सिंह, चतुर्वेदी, श्रीवास्तव खुल कर घिनौने जातिवाद का विरोध कर पा रहा है तो इसके पीछे भी जातीय सुरक्षाबोध का व्यापक समाजशास्त्र है। इक्कीसवीं सदी में जातीय आधार पर सुरक्षा-असुरक्षा का समीकरण बनना हमारे देश की शर्मनाक वास्तविक स्थिति को दिखाता है।
कुछ लोगों को इन लोगों की भाषा पर एतराज है। उनसे सिर्फ़ यही सवाल है कि जब उनके आंख में सूजा चुभोया जाएगा तो उनके मुंह से कैसी ध्वनि निकलेगी। सारेगामा या …..। सूजा चुभोने वाले से वह व्यक्ति संवाद करेगा या …….। कम से कम मेरे देखे तो अभी तक किसी ने भी ऐसी अभद्रता नहीं कि जिसके आधार पर कोई यह कह सके कि यह प्रभाष जोशी के चरित्रहनन की साजिश है।
संजय कुमार सिंह
मैंने जनसत्ता में नौकरी जरूर की है पर जातिवादी व्यवस्था में मेरी दिलचस्पी बहुत नहीं थी। ठाकुर होने के बाद भी बगैर किसी परिचय के मुझे जनसत्ता में रख लिया गया था इसलिए वहां का तथाकथित ब्राह्मणवादी माहौल मुझे कभी अखरा नहीं और मैंने साथियों की जाति के संबंध में कभी कोई दिलचस्पी नहीं ली। निजी तौर पर मैंने कभी कोई परेशानी भी महसूस नहीं की। मुसलमान चूंकि नाम से ही जाने जा सकते हैं इसलिए कह सकता हूं कि मेरी जानकारी में दिल्ली के संपादकीय विभाग में कोई मुसलमान नहीं था। हालांकि उन दिनों पटना से अली अनवर स्ट्रिंगर हुआ करते थे। जयपुर से रियाजुद्दीन शेख संवाददाता थे। बाद के समय में शम्स ताहिर खान, असरार खान, सफदर रिज्वी और अनवर चौहान जैसे स्ट्रिंगर दिल्ली में रहे हैं। पर ये ठीक-ठीक याद नहीं है कि कौन कब जनसत्ता से जुड़ा और अलग हुआ। 1991 में कोलकाता संस्करण में प्रभाष जोशी ने फजल इमाम मल्लिक को रखा जो अब दिल्ली में हैं और मुंबई में जावेद इकबाल भी थे।
नैतिकता और शुचिता का सोटा चलाने से पहले ठोस भौतिक सच्चाईयों को नजरअंदाज न करें। प्रभाष जोशी के सतीवाद और ब्राह्मणवाद की पैरवी करते ढीठ बयानों को पढ़ते वक्त यह भी ध्यान रखें कि यह बयान 2009 में दिया गया है न कि 1909 या 1809 या 1709 या 1609 में।
कुछ लोगों को ब्राह्मणवाद का विरोध ब्राह्मणों का विरोध लगता है। अव्वल तो वो लोग इस बहस के मूल तत्व को समझ नहीं पा रहे हैं या फिर वो यह समझते हैं कि ब्राह्मण और ब्राह्मणवाद एक ही शब्द के दो रूप हैं। दोनों ही स्थितियों में उन्हें पुनर्विचार करने की जरूरत है।
कुछ लोग प्रभाष जोशी को पत्रकारिता का महानायक जैसा कुछ बता कर उनके विरोध की धार की कुंद करना चाहते हैं। पहले तो उनको यह समझना चाहिए कि जिस तरह से वो लोग किसी को महानायक बता रहे हैं उस तर्क पद्धति पर कोई किसी को महाखलनायक भी बता सकता है। दुनिया जानती है कि महानायकत्व का गुणवत्ता से कोई सीधा संबंध नहीं है। यह शब्द जिस फिल्मी दुकान से लूटा गया है वहां भी सुपरस्टार और सुपरएक्टर का भेद सबको समझ में आता है। फिल्मी दुनिया के सर्वश्रेष्ठ अभिनेता महानायक नहीं बन पाते। आज भी शाह रुख़ ख़ान सबसे बड़े स्टार है लेकिन विजय राज या के के मेनन से बहुत ज़्यादा बेहतर अभिनेता नहीं माने जाएंगे। इस तरह के चालू स्टारडम की ओट से किसी बहस की हत्या करने की चालाक कोशिश ठीक नहीं है। अभी इतना ही।
एकलव्य
August 24, 2009 at 9:11 pm
रंगनाथ की प्रस्तुती भी अच्छी है और नीयत भी साफ ही लगती है। और भैय्या इतना भयमुक्त समाज अभी तक तो कोई सरकार बना ना पायी कि हर कोई खुल के बोल ले। जाति-वर्ण तो छोड़ो आप पड़ोस के ज़मीनी एनक्रोचमेंट की शिकायत करके देख लो। अड़ोस-पड़ोस के लोग पागल न कहने लगें तो मुझसे बात कर लीजो।
बी.आर.अंबेडकर
August 24, 2009 at 9:39 pm
बेटा अंदर आ जाऊं क्या ? जोशी सर तो नहीं हैं न यहां ? नहीं बेटा, पानी-वानी नहीं चाहिए, बहुत पी लिया। बस अपने ख़्यालात के लिए माफी मांगने आया था। न न, कहे तो कभी किसी से नहीं, बस सोचे थे। अब सोचता हूं सोचे भी क्यों ? बात ऐसी थी माय सन कि मैं सोचता था कि हम लोग जो सेवा करते आए हैं, मैला ढोया, जूते गांठे, क्या-क्या न किया, गालियां सुनी, बलात्कार करवाए, देखो भाई अब कहने दो मुझे, अब पानी-वानी नहीं चाहिए, तो जो लोग कुछ न करके दान-दक्षिणा खाते थे और हम सेवा करे जाते थे। तो एक ही बात सोच-सोच के खुश हो लेते थे कि चलो ये हमारी धारण-क्षमता है कि हमने निठल्लों को धारण कर लिया है। कभी सुघर जाएंगे और अपना काम खुद करना सीख जाएंगे। तब तक धारण किए रहो इन्हे। पर आज मालूम हुआ माय सन कि अपन को, माफ करना बाबा, मतलब हम लोगों को धारण-क्षमता का मतलब ही नहीं मालूम था। आज मालूम हो गया रे बाबा। जिसे हम अपनी धारण-क्षमता समझकर खुश थे वो भी आपकी निकली। माफ करना जोशी सर। जो बोल गया उसको पाचक-क्षमता से पचा लेना। जब आता हूं जोशी सर तो मिलते नहीं पर माहौल वही मिलता है बिलकुल प्राचीनकाल जैसा। कपड़े बोली ज़रुर बदल गयी है आपकी। चलो कभी तो खुद भी बदलोगे। तब तक तो धारण करना पड़ेगा न….ओ नहीं नहीं रे बाबा, फिर ग़लत बोल गया….ओके बाबा…। हां, पानी खुद ही पी लेना…
चार्वाक सत्य
August 24, 2009 at 11:17 pm
फजल इमाम मलिक के रूप में जनसत्ता में पहली मुस्लिम नियुक्ति हुई, 1991 में। तब तक प्रभाष जी का बीजेपी से प्रेम खत्म हो गया था। संजय कुमार सिंह जी, सही है? पहला दलित भी 1991 में ही रिक्रूट हो पाया। और ये नियुक्तियां भी मुख्यालय में नहीं हुई थीं। ये कुछ निर्मम-निष्ठुर तथ्य हैं। प्रमोशन से लेकर इंक्रिमेंट में जातीय भेदभाव के कई किस्से हैं जनसत्ता में।
खैर, जैसा कि कई लोग कह रहे हैं, हमें प्रभाष जी के निजी आचरण पर बात नहीं करनी चाहिए। जनसत्ता की संरचना में दो-तिहाई ब्राह्मओं का होना गलत कैसे कहा जा सकता है? इस बारे में प्रभाष जोशी से जवाब तलब कतई नहीं किया जाना चाहिए। टेलेंट ही वहां मिला तो बेचारे जोशी क्या करते।
संजय कुमार सिंह
August 25, 2009 at 1:02 am
चार्वाक सत्य जी, तथ्य मेरे या आपके चाहने से नहीं बदलेगा। मैंने जो लिखा है उसे फिर पढ़िए। अली अनवर पटना से स्ट्रिंगर थे और रियाजुद्दीन शेख जयपुर से संवाददाता थे। रियाजुद्दीन शेख 1987 में मेरे जनसत्ता ज्वाइन करने से पहले से जयपुर में रिपोर्टर थे। और उनकी नियुक्ति औपचारिक थी। पहले आपने 90-91 के दौर की बात की थी इसलिए मैंने अली अनवर का नाम पहले लिखा था। पर आप फजल इमाम मलिक को पहली नियुक्त मान ले रहे हैं।
चार्वाक सत्य
August 25, 2009 at 8:51 am
अस्तु, उस समय तीन शहरों से निकलने वाले अखबार जनसत्ता में एक मुसलमान स्टाफ भी था (ये पढ़े लिखे लोगों का मंच है इसलिए स्ट्रिंगर यानी टेंपररी संवाददाता क्या होता है ये बताने की जरूरत कदाचित नहीं है) । अब तो प्रभाष जी पर नियुक्तियों के मामले में सांप्रदायिक होने का आरोप लग ही नहीं सकता। संजय जी, बधाई और शुभकामनाएं।
अब दलित स्टाफर के बारे में भी स्थिति स्पष्ट कर ही डालें। प्रभाष जी को दलित विरोधी ही भला क्यों कहा जाए। जनसत्ता के बड़े पदों पर लगभग 80 फीसदी और कुल पदों पर लगभग 60 फीसदी ब्राह्मणों की मौजूदगी भी अगर प्रभाष जोशी को जातिवादी साबित नहीं करती है, तो फिर यहां से तर्क के अंत की शुरुआत होती है। मानसिक गुलामी इसे ही कहते हैं शायद, जब गुलाम को ये लगे ही नहीं कि वो गुलाम है। इसे स्टॉकहोम सिंड्रॉम भी कह सकते हैं जब अपहृत लोग अपहरणकर्ताओं से सहानुभूति, बल्कि कई बार प्रेम भी करने लगते हैं.
संजय कुमार सिंह
August 25, 2009 at 12:44 pm
मान्यवर, मैं तर्क कर ही नहीं रहा। मैंने तो सिर्फ तथ्य प्रस्तुत किए थे। इस नोट के साथ कि इसका आपकी बहस से कोई संबंध नहीं है। पर आप चाह रहे हैं कि मैं जनसत्ता के साथियों की जाति आपको बताऊं। तो वह मेरी जानकारी में नहीं है। मेरी दिलचस्पी का विषय न था और न है। यह स्टॉकहोम सिन्ड्रोम का शिकार होने के कारण भी हो सकता है। मेरी लाचारी है।
sidharth
August 25, 2009 at 12:49 pm
कितनी दुखद बात है कि कुछ छुटभैय्ये कथुत बुद्धिजीवी दोनों साईटों पर कभी आंबेडकर के नाम पर तो कभी गांधीजी के नाम पर अपनी बात रख रहे हैं. अरे भैय्या इसमें कम से कम देश के महान नेताओं के नाम लाकर इस मुद्दाहीन बहस को जातीय टन देने की और समाज को बांटने की कोशिश तो मत करो.
एकलव्य
August 25, 2009 at 2:41 pm
अब यह बात किसी से छुपी नहीं है कि गांधी और अंबेडकर को आप कितना महान समझते हो और कैसे वक्त-वक्त पर उनका इस्तेमाल करते हो। यह भी अब सब जान गए हैं कि समाज को वर्ण व्यवस्था बनाकर किसने बांटा ! अब समानता की कोशिशों को कौन रोक रहा है ‘समाज बांटने की कोशिश’ कहकर, यह भी दलित-पिछड़े जान चुके हैं। अब कोई नयी चाल लाओ, सिद्धार्थ बड़भैय्या।
सिद्धार्थ नाम रख लेने से कोई बुद्ध या प्रबुद्ध नहीं हो जाता।
असली बात तो यह है कि गांधीजी और अंबेडकरजी जो सवाल पूछ रहे हैं उनका जवाब दो।
ambrish kumar
August 26, 2009 at 8:19 pm
sari meharbani jansatta par hi hogi ya samajik nyay ka buldozar aur bade akhbaro
par bhi chalega.samrendra ji joshi ji brahbhanvadi hai ,sanghi hai amerikaparast ho gaye aise me unko itna mahatva kyo diya ja raha hai.behtar ho desh ko disha dene vale patrkaaro par bhi charcha kare .joshi ji ka samai ja chuka hai aap ke dishanirdesh me hi hum log bhi kuch seekh lenge.
रंगनाथ सिंह
August 27, 2009 at 1:33 am
अंबरीश जी, गर आप वही है जो जनसत्ता में खबरें लिखते हैं तो……..
महोदय ये सामाजिक न्याय का बुलडोजर क्या बला है ? खैर यह जो भी है इतना ध्यान दिला दूँ कि कुछ लोग बिना पगार के भी जनसत्ता से आप जितना ही प्यार करते हैं। मैं ऐसे बहुत से लोगों में से मात्र एक हूँ। पत्रकार को सबूत चाहिए होगा,है ना ? इसलिए अपना एक महीने से ज्यादा पुराना कमेंट नीचे सिर्फ आपके लिए कापी-पेस्ट कर रहा हूँ।
“…..रंगनाथ सिंह says:
July 24, 2009 at 12:38 am
समरेन्द्र
आप के मुद्दे के इतर जनसत्ता से जुड़ा एक मुद्दा है जिसे मैं इस पोस्ट पर टिप्पणी के माध्यम से उठाना चाहता हूँ।
आपने वो किस्सा सुना होगा,
मरलो हाथी
नौ लाख क
दूसरे सभी हिन्दी अखबारों के मुकाबले जनसत्ता को रखने पर यही मुहावरा याद आया।
श्रीमान जी, मुझे लगता है कि जनसत्ता को कोसना आज कल फैशन बन गया है।
जिसे देखो वो इस अखबार के संग कोई न कोई चिप्पी चिपका कर चल देता है।
जनसत्ता हिन्दी का आखिरी अखबार है !!
आखिरकार इसके पीछे पड़ कर लोग क्या साबित करना चाहते हैं ?
इस अखबार में जो कमियाँ है उनके बावजूद यह हिन्दी का बेस्ट अखबार है।
जनसत्ता के वर्तमान कार्यकारी संपादक ने लेई जैसा चिपचिपा लेख लिखने वाले एक खास लेखक समूह को पाल कर इस अखबार को गर्त में ढकेलने का प्रोग्राम चलाया है।
वरना इस अखबार के पत्रकारों से अच्छी खबर लिखते हुए तो मैंने किसी अन्य अखबार को कम ही देखा है।
हमें पत्रकारिता पढ़ाने वाले ज्यादातर दोगले मास्टर जनसत्ता को हिन्दी का बेस्ट अखबार बताते नहीं थकते थे…..जो गेस्ट मास्टर आते थे तो वो भी यही खटराग दुहराते थे……
जब हमारी अंदर थोड़ी पत्रकारिता घुसी और हमने जानना चाहा कि हमें राय देने वाले कौन-कौन से माट साब अपने घर में जनसत्ता मँगाते हैं ?
तो हमें गहरी निराशा हुई !!
ज्यादातर माट साब लोग नंगी लड़कियों को देखने का रस लेने के लिए अखबार वही मँगाते थे जिनमें उन्हें यह सुख मिल सके। क्योंकि बीबी तो सोचेगी कि पति देव अखबार पढ़ रहे हैं उधर माट साब अखबार पढ़ने के बजाए उसे पी रहे होते हैं !!
मैं तो चाहता हूँ कहीं कोई ऐसी बहस चले कि जहाँ जनसत्ता के पाठक खुल कर बता सकें कि,
उन्हें अपने प्रिय अखबार में क्या खामियां खटकती हैं !!
आलोचना रचनात्मक हो तो क्या बुराई है ??….”
गर आप इस कमेंट का संदर्भ-प्रसंग देखना चााहे तो इस लिंक पर क्लिक करें।(http://janatantra.com/2009/07/16/janasatta-and-metro-rail/)
महोदय आप प्रभाष जोशी के जातिवादी दर्शन पर चल रही बहस को गर जनसत्ता के खिलाफ मुहिम समझ रहे हैं तो इसके कारण स्पष्ट कीजिए। गर आपकी बात में तथ्य हुआ हो तो आप हमें अपने पक्ष में पाएंगे। और अगर ऐसा नहीं है तो आप को अपने विचार पर पुनर्विचार करना चाहिए।
रंगनाथ सिंह
August 27, 2009 at 1:44 am
अम्बरीष जी लिंक फिर से दे रहा हूं……यह लिंक भी काम न करे तो कापी-पेस्ट कर लीजिएगा।
http://janatantra.com/2009/07/16/janasatta-and-metro-rail/
ambrish kumar
August 27, 2009 at 10:35 am
सिर्फ जनसत्ता से पगार नहीं लेता आधे दशक तक इंडियन एक्सप्रेस एम्प्लाइज युनियन में जनसत्ता का प्रतिनिधि रहा खासकर जब संघी भाई जनसत्ता पर कब्जा करने का प्रयास कर रहे थे .और जब जनसत्ता में जब सती पर संपादकीय आया था तो देश में आग लग गई थी। जयपुर,भोपाल, और दिल्ली में प्रदर्शन हुए थे। प्रभाष जी के कमरे पर वामपंथी महिलाओं ने हल्ला बोला था।तो खुद मैने लखनऊ में 3000 लड़कियों/महिलाओं के साथ जुलूस निकाला था और अमृतलाल नागर मुख्य वक्ता थे। बाभन प्रभाष जोशी के सबसे करीबी जो रहे है उनके नाम है अलोक तोमर,बनवारी,कुमार आनंद और राम बहादुर राय आदि .जिन्होंने जनसत्ता में उनका विरोध किया उनमे अभय दुबे ,उमेश जोशी ,अरुण त्रिपाठी आदि रहे है .हमारा भी प्रमोसन प्रभाष जोशी ने नहीं किया था बाद में हुआ पर इन सब के बावजूद प्रभाष जोशी बाभनवादी है यह जनसत्ता में कोई नहीं मानता .आप भी अपना परिचय दे देते तो बेहतर होता मुझे लगता है आप भी किसी बड़े अखबार के सम्पदकं होंगे .सती का सम्पादकीय भी बनवारी ने लिखा था प्रभाष जोशी ने नहीं हमे इस समय सती का मुद्दा उठाने पर हैरानी हो रही है .देश के बड़े बड़े सपद्को ने क्या क्या किया है सभी पर आप कोई मुहीम चला रहे हो तो बात अलग है .सामाजिक न्याय से मेरा अर्थ यही है किस अखबार में दलित ,पिछडे ,मुस्लिम और महिला का कोटा तय है .नवभरत टाईम्स में जिस समय किलकारियों की बात कर रहे है उन दिनों रात का खाना टाईम्स के सामने ढाबे में ही खाते थे कभी ऐसा नहीं लगा की किसी महिला हास्टल के सामने बैठे हो न ही वहा कभी इतनी महिलाये रही .प्रभाष जोशी के खिलाफ दुसरे संपादको के इशारे पर मुहीम चलती रही है यह कोई नई बात नहीं है आप भी सदियों के अपमान का बदला ले सकते है
रंगनाथ सिंह
August 27, 2009 at 3:06 pm
अंबरीश जी,यानि आप वही है जो जनसत्ता में खबरें लिखते हैं…खैर… !!
क्या बात है बड़े मिंया ? संपादक से नीचे आप तो बात ही नहीं करते ?
आपने मेरा ऊपर लिखा कमेंट पढ़ा है या नहीं पता नहीं ?
“इस अखबार में जो कमियाँ है उनके बावजूद यह हिन्दी का बेस्ट अखबार है।”
“मरलो हाथी/नौ लाख क… दूसरे सभी हिन्दी अखबारों के मुकाबले जनसत्ता को रखने पर यही मुहावरा याद आया।”
“इस अखबार के पत्रकारों से अच्छी खबर लिखते हुए तो मैंने किसी अन्य अखबार को कम ही देखा है।”
खैर…., मुझे जनसत्ता के पत्रकारांे से ऐसी वैचारिकी की उम्मीद तो नहीं थी। साफ-साफ बताइए बड़े मिंया आपके बड़े-बड़े मियां के सार्वजनिक रूप से दिए गए प्रवचन पर आप कोई बात क्यों नहीं करते ?
प्रभाष जोशी के खिलाफ लिखे गए लेखों को जनसत्ता के खिलाफ लेख साबित करने की वजह या नीयत मुझे समझ नहीं आ रही है। आप लोगों के यहाँ आने के बाद मुझे लग रहा है कि जनसत्ता और प्रभाष जोशी समानार्थक शब्द है। मैं तो आज तक इसी भ्रम में था कि जनसत्ता में बड़े अच्छे पत्रकार हैं बस जरूरी है एक अच्छे संपादक की। आपने देखा होगा कि आमतौर पर लोग जनसत्ता के रविवारीय वगैरह या तथाकथित साहित्यिक टाइप लेखों के लिए पढ़ने का दावा करते हैं। आप को बताना जरूरी समझता हूँ कि मैं जनसत्ता न्यूज स्टोरी के लिए पढ़ता हूँ। जिन पर भाई लोग फिदा रहते हैं वो तो मुझे हिन्दी के वैचारिक दारिद्रय का प्रत्यक्ष प्रमाण दिखते हैं। लेकिन अब समझ में आ रहा है कि यहाँ तो सेंध में पंचायत चल रही है !!
मेरा परिचय जानने की आपकी गहरी इच्छा को देखते हुए कहना पड़ रहा है कि प्रभाष जोषी के लिए लठैती करने से फुर्सत मिले तो मोहल्लालाइव पर थोड़ी तफरीह कर लीजिएगा। मेरा परिचय मिल जाएगा। जिज्ञासा कुछ ज्यादा कोंचे तो मेरे ब्लाग http://www.vipakshkasvar.blogspot.com पर एक नजर डाल लीजिएगा बायोडाटा मौजूद है।
आप जिस स्तर पर उतर रहे हैं उसे देख कर आपके पूछने से पहले ही अपने लिखने की वजह बता दूँ, काका की कसम अंदाज थोड़ा फिल्मी है जरा संभालिएगा…
पुष्पा…. आइ हेट कास्टिइज्म…. आइ हेट कास्टिइज्म…… पुष्पा
बिलीव मी पुष्पा… यह हेट ब्लडी आइडियोलाग आफ कास्टिइज्म आल्सो….रिअली आइ हैट देम…पुष्पा
alok
August 27, 2009 at 4:57 pm
भारत के सबसे सिद्व और प्रसिद्व संपादक और उससे भी आगे शास्त्रीय संगीत से ले कर क्रिकेट तक हुनर जानने वाले प्रभाष जोशी के पीछे आज कल कुछ लफंगों की जमात पड़ गई है। खास तौर पर इंटरनेट पर जहां प्रभाष जी जाते नहीं, और नेट को समाज मानने से भी इंकार करते हैं, कई अज्ञात कुलशील वेबसाइटें और ब्लॉग भरे पड़े हैं जो प्रभाष जी को ब्राह्मणवादी, सामंती और सती प्रथा का समर्थक बता रहे हैं।aage padhne ke liye janadesh.in par jaye
ambrish kumar
August 27, 2009 at 5:29 pm
रंगनाथ सिंह, आपने सही पहचाना। हम लोग प्रभाष जोशी के लठैत हैं। छात्र राजनीति से लेकर ट्रेड यूनियन की राजनीति की है और एक नहीं कई बार जेल गए हैं। इंडियन एक्सप्रेस यूनियन का जब मैं चुनाव लड़ा था तो प्रभाष जोशी के बारे में दूसरे पक्ष ने जो आपत्तिजनक टिप्पणी की, उस पर हिंसा हुई और मतगणना के दौरान ही आधा दजर्न लोग घायल हो गए। बंदूकें भी निकल आई थीं। उसी के बाद प्रबंधन और सम्पादकीय विभाग के बीच जो टकराव हुआ, उसके चलते हमारे तत्कालीन ब्यूरो चीफ कुमार आनंद ने इस्तीफा दे दिया। दूसरी तरफ इंडियन एक्सप्रेस के महाप्रबंधक को हटा दिया गया। इसके बाद प्रभाष जोशी ने हम लोगों से पूछा था कि कोई मुङो कुछ कहेगा तो क्या लड़ाई-ङागड़ा करोगे? हम लोगों का जबाब तब भी हां था और आज भी हां है। कुमार आनंद बाभन नहीं हैं और न ही बाभन परिवार में मेरा जन्म हुआ। जनसत्ता का संपादकीय नेतृत्व क्या कर रहा है, इस पर कोई भी टिप्पणी कर सकता है। हो सकता है आपका लेख न छपा हो या फिर नौकरी आदि के संबंध में संपादक ने मिलने से मना कर दिया हो। जनसत्ता में जितने लेख छपते हैं, उन सभी से मैं सहमत हूं, जरूरी नहीं। कई पत्रकार भी चारण किस्म की पत्रकारिता करते हैं, उनसे भी हम सहमत नहीं हैं। मंडल को लेकर प्रभाष जी के विचारों से भी हम सहमत नहीं हैं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि प्रभाष जोशी जतिवादी और सांप्रदायिक पत्रकार हैं। बाबरी मसजिद गिरने के बाद पूरे देश में किसी व्यक्ति ने अगर सांप्रदायिक ताकतों के खिलाफ सबसे मुखर मोर्चा खोला तो वे प्रभाष जी थे। उनके दाएं-बाएं संघी भी नजर आएंगे और वामपंथी भी। यदि आपको ब्लाग आदि का प्रचार करना हो तो यह मुहिम जरी रखिए। लेकिन यदि गंभीरता से बहस करना चाहते हों तो सड़क छाप शब्दों का इस्तेमाल बंद कर दीजिए। मियां, मौलाना और मुल्ला जसे शब्दों का जबाब हमें भी देना आता है। सती जसे मुद्दे पर हमने सड़क पर उतर कर जनसत्ता के संपादकीय का विरोध किया था और जब बिहार प्रेस बिल आया तो दिल्ली के इंडिया गेट पर रामनाथ गोयनका के नेतृत्व में जो विरोध प्रदर्शन हुआ, उसमें भी शामिल होकर अपना विरोध दर्ज कराया था। पता नहीं आप लोग कहां पर थे? ब्लाग पर बौद्धिक विरोध के साथ कुछ जमीनी विरोध की भी तैयारी करें।
धन्यवाद।
अंबरीश कुमार
ambrish kumar
August 27, 2009 at 7:01 pm
bahash jari rahe jantantra .com ke bare me puri jankari mujhe mil gai aur ab mai
koi comment karne ki jarurat nahi samjhta.kisi ko mere comment se dukh hua ho to khed jatana chahunga.
Fazal Imam Mallick
August 27, 2009 at 11:25 pm
Chunke musalmanon ko lekar bhi Sawal Utahaya gaya hai, to Ek baat ka ziker zaruri hai ke Jansatta mein Apne sahyogiyon ke beech kabhi bhi kayee Aisi Tipanni nahi suni jis se mujhe kabhi bhi Apne musalman hone per Sharminda hona para ho. Is puri bahas mein Ek baat Choot rahi hai. wih hai Samajik tanebane ki. Wajah chahe jo rahi jo lekin Aaj se dus-pandarh saal pahle ya thora aur pahle PTRKARITA bahut Aadarsh Pesha nahi hota tha. Na to AbhiBhawkon ko yah ruchta tha aur na hi logon ko. logon ko paker ker hi patarkar banaya jata tha. Tab aaj ki tarah PATRKARITA ke Itne DUKAN bhi nahi the, jhana kat-chant ker patarkar banaya jata tha. Musalmanon ke yahan bhi Doctor aur Engineer banane per ho zor rahta tha, Patarkar to nahi hi. unhe na to samaj mein bahut partishtha thi aur na hi logon ke beech use le kar utsah tha. Isliye bahut kam hi Musalman Is peshe se jure rahe. Mere jaise log hi the jisne ghar mein Abhibahwakon se lat ker alag rah chuni. ek bat aur batata chalun ke maine Hotel management ka course kiye tha aur kayee saal taj Exceutive ke pad per kaam karne ke baad patarkarita ko hi apne liye chuna. Shayad yeh wajah bhi rahi hogi ke Parbhash Joshi Samne. Musalman agar samne aayega hi nahi to phir kisi bhi Sansthan mein woh jagah ksise payega. Kolkata mein main Akela musalman tha aur Apni pahli naukri Jansatta mein apply karte hi cgor di thi kyonke mujhe yakeen tha ke main iske liye chuna jaunga aur main tab parbhash ji ko sirf naam se janta tha. main ne apne chayan ke liye koyee sifarish bhi nahi karayee thi lekin parbhash ji ne interview ke baad apne haath se nliyukti patar diya tha. Bhedbhav kahan nahi hota hai. Jativaad ke khilaf yeh sab batein karne wale Apne gireban bhi jhankein to payeinge ke unhone ne bhi kayee astar per logon ke sath bhedbhav kiya hai.
FAZAL IMAM MALLICK
रंगनाथ सिंह
August 28, 2009 at 5:02 pm
श्रीमान अंबरीश कुमार
जब आप प्रभाष जोशी के सती उवाच के खिलाफ सड़क पर उतर जाए तो वह क्रांति होती है। और दूसरा उनके जातिवादी उवाच के खिलाफ लिखित विरोध भी करे तो अपराध…षडयंत्र…।
आपके लेखन को देखकर साफ हो चुका है कि आप ने जीवन में कभी पालेमिक्स नहीं की है जिसका मुझे सख्त अफसोस है। गर की है तो मुझे भी बताएं।
आप मान क्यों नहीं लेते कि आपको सती उवाच से तकलीफ हुई थी लेकिन प्रभाष जोशी के जातिवादी दर्शन से नहीं हुई है। जिसे तकलीफ हुई वो विरोध कर रहा है। आप से यही कहना है कि ऐसे लोगों को धमकाने का अपना बचकाना प्रयास बंद कीजिए। आप असल मुद्दे के दांए-बांए कर रहे हैं। आपने अभी तक हमारे मूल प्रश्न का जवाब दिया ही नहीं। प्रभाष जोशी के जातिवादी दर्शन पर आप अपना बयान क्यों नहीं जारी करते?
मुझे यह भी अफसोस है कि आप उन्हीं लोगों में से हैं जिनका अच्छाई और सच्चाई से भरोसा उठ गया है। जिस वजह से आप को लगता है कि निर्लज्ज जातिवादी दर्शन के खिलाफ कलम उठाने वाला हर शख्स के मन में खोट है। आपका प्रभाष जोशी से क्या संबंध है यह आप खुद जगजाहिर कर चुके हैं। मैं आप समेत जनसत्ता की पूरी खोजी टीम को चुनौती देता हूँ कि वो यह साबित करके दिखाए कि मेरा इस वेबसाइट के माडरेटर से कोई संबंध है।
मेरे जिस पोस्ट पर आपने अपने अमृत वचन उड़ेले हैं वो भी मैंने माडरेटर को नहीं भेजा था। वो भी मैंने व्यथित होकर कमेंट के रूप में लिखा था। मेरे नाम से लगी दूसरी पोस्ट भी कमेंट ही थी। जिसे माडरेटर ने अपनी मर्जी से पोस्ट के रूप में लगाया। ऊपर लिखी किसी भी बात को आप और आपकी पूरी मण्डली गलत साबित कर दे तो उसे मेरी तरफ से प्रतीक रूप में पांच रुपये इनाम मिलेगा।
आप और आपकी मण्डली को भ्रम है कि दुनिया जनसत्ता में काम करने या छपने के लिए मरी जा रही है। श्रीमान जी आप अपने दल बल के साथ मिल कर यह साबित कर दें कि मैंने कभी भी किसी भी तरह से कागज की एक पुर्जी भी जनसत्ता के किसी संपादक को विचार हेतु दिखाई हो। गर आप ने मेरे इस दावे को झूठा साबित कर दिया तो मैं अपना प्रतीकात्मक इनाम बढ़ा कर ग्यारह रुपये करने का वचन देता हूँ।
मैंने आपको बार-बार समझाना चाहा कि मैं जनसत्ता अखबार का बहुत बड़ा प्रशंसक हूँ। मैंने एक महीने पहले का अपना कमेंट लगाया कि आप समझ सकें कि जनसत्ता के बारे में मेरी क्या राय है। मैंने दोबारा उस कमेंट से कोट किया कि आप को समझ आए कि मामला क्या है। लेकिन आप का दिल है कि मानता ही नहीं।
श्रीमान जी आप को यह भी बताता चलूं कि मिंया कोई सड़क छाप शब्द नहीं है। जानकारी न हो प्रभाष जोशी से पूछ लीजिएगा। मेरी समझ में मिंया शब्द हिन्दी के श्रीमान शब्द का समानार्थक शब्द है। बाकि इसके नए मायने आप मुझे जरूर बताइएगा। मिंया, मुल्ला, मौलाना जैसे शब्दों को आप अपमानजनक समझते हैं तो यह आपकी राय है जिससे मैं असहमत हूं।
श्रीमान जी नई पीढ़ी के प्रति आप लोगों यह रवैया ही इस देश की बौद्धिक दरिद्रता का कारण है। आप लागों को बूढ़े बरगद की जटाएं पकड़ कर झूला झूलने की आदत हो गई है। हमें इस तरह की पेंग मारने का कोई शौक नहीं है। आप लोगों के संगठित हमले के बाद यह जाहिर हो चुका है कि पत्रकारिता में नए लड़कों की कमर कैसे तोड़ी जाती है। और कैसे कच्ची उम्र में ही उनके बौद्धिक अण्डकोष को कूट कर उन्हें मानसिक रूप से बांझ बनाया जाता है।
श्रीमान जी कहना बहुत कुछ है लेकिन शेष मेरे बारे में आपके खोजी पत्रकारिता के परिणाम आने के बाद। यदि हस्बेमामूल आपके पास मेरी बातों का कोई जवाब न हो तो चुप मार कर नदा जाने के बजाए अपनी साफगोई दिखाने की आदत की लाज रखिएगा।
हम हैं राही प्यार के.. फिर मिलेंगे.. चलते-चलते… अंदाज थोड़ा फिल्मी है जरा संभालिएगा…
ambrish kumar
August 28, 2009 at 9:37 pm
रंगनाथ जी
जी लगाना हमारा संस्कार है .पत्रकारिता में नया पुराना का खेल अब समाप्त हो चुका हो चूका है पहले जो दंभ और अंहकार दस साल बाद आता है कई में पत्रकारिता में घुसते ही आजाता है .खैर जरा तर्क के साथ मुद्दे पर बात हो जाये .प्रभाष जोशी जो संप्रदायिक ताकतों के खिलाफ मोर्चा खोले है उसका कोई पत्रकार मुकाबला कर सकता है.दूसरा जो प्रभाष जी लिख रहे है या चॅनल पर बोलते है वैसा कोई लिख सकता है .मैंने छत्तीसगढ़ में जोगी सरकार के खिलाफ अभियान चलाया तो मुझे हटना पड़ा . जबकि .मैं इंडियन एक्सप्रेस के लोगो में रहा हु जिसने प्रबंधन पर सबसे ज्यादा दबाव बनाया था .उत्तर प्रदेश में कौन अखबार मुस्लिम बिरादरी के उत्पीडन लिख पाया जरा एक उदहारण दे ,कौन मुलायम सिंह के खिलाफ आवाज उठा रहा था सोच कर बताये एक खबर पर हिन्दुस्तान के संपादक को मायावती सरकार के अफसरों ने निपटा दिया .ऐसे में प्रभाष जोशी उन लोगो में है जो लिखते है किसी संपादक में यह बूटा नहीं है .
अब बाभनवाद पर .जनसत्ता का एक भी बाभन पत्रकार क्या प्रभाष जोशी के समर्थन में आया ? अम्बरीश कुमार, संजय सिंग और अलोक तोमर क्या बाभन है .फिर भी कुतरक करना चाहे तो करे . एक और मुगालता दूर करे प्रभाष जोशी जनसत्ता में अब नहीं है .वे किसी का प्रमोशन क्या कराएँगे .दुसरे बहजी या भाई साहब जो हो उन्हें यह भी बता दू की जब मेरा प्रमोशन इंडियन एक्सप्रेस में किया गया मैंने मना कर दिया था क्योकि मैं एक्सप्रेस कर्मचारी संघ का नेता भी था.प्रभाष जी जनसत्ता में करीब दस साल से कोई दखल नहीं देते है. .
रंगनाथ सिंह
August 29, 2009 at 1:52 am
श्रीमान जी आप हमेशा भूतकाल में क्यों चले जाते हैं? वर्तमान में वापस आइए। आप प्रभाष जोशी के रविवारडाटकाम पर दिए गए साक्षात्कार पर अपनी राय क्यों नहीं देते? एक दूसरे पोस्ट पर किसी ने प्रभाष जी से कुछ प्रश्न पूछे हैं, आप उन प्रश्नों का जवाब क्यों नहीं देते?
किसी ने ताउम्र कोई हत्या नहीं की हो तो इसका ये मतलब नहीं कि उसे अंत समय में हत्या का लाइसेंस मिल जाता है। और आप को यह बताने की जरूरत भी नहीं है कि पिछले दस साल में जनसत्ता में प्रभाष जोशी का सीधा हस्तक्षेप नहीं रहा है। ये बातें जगजाहिर हैं।
श्रीमान जी आपकी समस्या क्या है? प्रभाष जोशी के बचाव के लिए आप बार-बार जनसत्ता की पीठ की ओट क्यों ले रहे हैं? प्रभाष जोशी जनसत्ता में एक कालम लिखते हैं। फिर आप उनके पक्ष में पूरे अखबार की हालिया उपलब्धियों का बेजा इस्तेमाल क्यों कर रहे हैं?
आप का यह भोला तर्क कि जनसत्ता से कोई ब्राह्मण उनके पक्ष में क्यों नहीं आया… !!
श्रीमान जी ऐसे बचकाने छक्के-पंजे अपने पास रखिए। ऐसी मामूली तकनीकी चीजों का खयाल रखे बिना कोई प्रभाष जोशी यूं ही इतने “लठैत” नहीं पाल लेता…
आप ने प्रभाष जी का साक्षात्कार पढ़ा नहीं है क्या? हो सकता है जातीय ट्रेनिंग को ध्यान में रखते हुए प्रभाष जोशी ने कुछ खास लोगों को कुछ खास कामों के लिए भर्ती किया हो। वरना क्या कारण है कि एक ऐसा शख्स जिसे खुद प्रभाष जोशी ने जनसत्ता से भगाए जाने के बाद, चूक गया घोषित कर दिया है… वो चिल्ला चिल्ला कर बता रहा है कि वो प्रभाष जी का चेला है। और वो मुनादी करते घूमता है कि वो ओम थानवी के नहीं प्रभाष जोशी के जनसत्ता की पौध है।
एक दूसरा शख्स है जो न जाने किन कारणों से जनसत्ता से निकाला गया? वो भी आज अपनी गुरू भक्ति दिखाने अचानक गुफावास से बाहर निकल आया है। तीसरे बचे आप। आप खुद बता चुके हैं कि प्रभाष जोशी के हटने के बाद आपका प्रमोशन हुआ।
श्रीमान जी प्रभाष जोशी ने जातीय कुसंस्कारों को ध्यान में रखते हुए हमलावर दस्ता बनाते वक्त एक बात का ध्यान नहीं रखा। उन्हें ध्यान नहीं रहा कि पालतू बन जाने के बाद बड़े-बड़े बब्बर बिल्ली बन जाते हैं।
और सुनिए दिन में किसी के खिलाफ लेख लिख कर सार्वजनिक छवि बनाना और रात को उसी के संग बैठ कर निजी स्तर की मित्रता निभाना… ये सब टोटके बहुत पुराने हो चुके हैं।
रही बात मोर्चों और जनाजों की… श्रीमान जी देश को इमरजेंसी देने वाले और गुजरात दंगा देने वाले प्रधानमंत्रियों को वो देश के सर्वश्रेष्ठ प्रधानमंत्रियों में से एक बता रहे हैं। श्रीमान जी मोहासक्ती से बाहर निकलिए। आप का चालाक शोषण हो रहा है। जरा सचेत होइए। और मैं अभी से बता दूं कि देश का छठा महान प्रधानमंत्री राहुल गांधी होंगे …!! प्रभाष जी से पूछ लीजिएगा। राजीव गांधी की तरह वो भी तो ब्राह्मण ही होंगे ना ??
आप को यह भी बता दूं कि मुझे बड़ी शिद्दत से लगता है कि उत्तर प्रदेश से लेकर विदर्भ तक एक बार फिर जातिवाद के खिलाफ नौजवानों को लामबंद करने की कोशिश शुरू करने की सख्त जरूरत है।
ambrish kumar
August 29, 2009 at 7:04 am
singh ji
kutark ka koi javab nahi hota. aap ko jativaad ka khatra jyada bada nazar aa raha hai yah aapki samjh hai har koi isase sahmat ho jaruri nahi. Jab mandal lagu kiya gaya tha to maine apne thakur bhaman mitro ki jatiya dekhi thi. Usase pahale jab vahini sejuda tabhi jati sochak sabd lagana band kar diya. Tab jativaad ka jyada bolbala tha .agar ghar me aag 20 saal pahale lahi ho to ab pani lekar nikalne se koi fayada nahi hone vala.
prabhash ji ka interview koi kuraan ya gita nahi hai jo uske jarie mai unko pahchanugas. aap interviwe ki granthi se bahar nikale aur jati se bhi upar uthe.
singh lagaye rakhe par samaj ke samne aaj bada khatra kya hai yah samjhne ki kosis kare kal koi sampadak ka interview de aur china ya amerika ke sath
kadha nazaraaya to fir aap ko uska interview sabko padhana padega aur amerika ke khilaaf dandauthana hoga.
note -kripya jansatta se jo ab na nikala gayaho uska charitra bhi sanghiyo jaisa saf suthra ho .jo raat me doodh pita ho aise patrkaro
ki sochi bana le aur kisi mandir me baith kar bahash kare. aap ke kisi bhi charitra praman patr ki jarurat mujhe nahi hai. sp singh rajendra mathur jis akhbar me rahe hai vaha mahila patrkaar ko kya kya bhugtana pada hai yah akhbaar me chap chuka hai par isase sp singh ya rajendra mathur ki patrkarita par sawal khada nahi kiya ja sakta .
aur samai na hone aur kisano ki beech jane ki vajah se mai internet se door rahunga aur aap jaise logo sesanwad nahi kar paunga. Aap apna jati todo aandolan jari rakhe .