
जवाब दो!
जनसत्ता में अपने कॉलम कागद कारे में इसी महीने की नौ तारीख को प्रभाष जोशी ने ये पंक्तियां लिखी थीं। उन्होंने चुनाव के दौरान अख़बारों के काले कारनामों की खुल कर आलोचना की थी। लेकिन किसी भी अख़बार की तरफ से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई। अख़बारों की चुप्पी पर प्रभाष जी ने कागद कारे में अपनी चिंता इस तरह व्यक्त की। कहा कि सवालों का जवाब नहीं देना लोकतंत्र की अवहेलना करने जैसा है। लेकिन लगता है कि अब प्रभाष जी खुद डक करने में जुटे हैं। रविवार डॉट कॉम पर दिए विवादित इंटरव्यू के बाद कई लोग उन पर ताबड़तोड़ बाउंसर फेंक रहे हैं। बाउंसर फेंकने वालों में विरोधियों के साथ उनके चाहने वाले भी शामिल हैं। कुछ नाम छिपा कर तो कुछ खुल कर सवाल उठा रहे हैं। लेकिन लगता है कि सारस्वत ब्राह्मण क्रिकेटर सुनील गावस्कर के घनघोर प्रशंसक प्रभाष जोशी भी डक करने में उस्ताद हैं। इसलिए सभी बाउंसरों को उन्होंने उछल कर नीचे दबा दिया। अभी तक कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। न तो अपने शब्दों पर खेद जाहिर किया है और ना ही कोई जवाबी हमला बोला है। आखिर क्यों? अख़बारों पर संवेदनहीनता और बेशर्मी का आरोप लगाने वाले प्रभाष जी खुद क्यों ख़ामोश हैं?
प्रभाष जी उसी कागद कारे में आगे लिखते हैं कि “अखबार अगर लोकतंत्र में सार्वजनिक बहस के मंच हैं तो अपने ही किए-धरे पर बहस उन्हीं को करनी चाहिए या नेट पर होनी चाहिए? सब अखबारों के नेट संस्करण हैं, लेकिन इस मामले पर बहस में तो उनने कोई शिरकत नहीं की। बहस पत्रकारों और नागरिकों ने की। कुछ पाठक भी शामिल हुए। लेकिन जिन अखबारों ने यह किया वे बहस से दूर चुप्पी साधे रहे।”
लोकतंत्र की बुनियादी शर्तों को प्रभाष जोशी से बेहतर बहुत कम लोग ही जानते होंगे। स्वस्थ्य बहस भी लोकतंत्र की एक बुनियादी शर्त है। प्रभाष जोशी को इस बहस से मुंह नहीं मोड़ना चाहिए। बल्कि अपने इंटरव्यू से उठे सवालों का खुलकर जवाब देना चाहिए। उन्होंने अपना इंटरव्यू एक वेबसाइट को दिया है। लेकिन हम उनसे यह नहीं कह रहे कि वो सवालों का जवाब इंटरनेट पर ही दें। वो जहां चाहें वहीं जवाब दें। लेकिन मौन न रहें। अगर उन्होंने सवालों का जवाब नहीं दिया तो उनमें और ख़बरों की कालाबाज़ारी करने वाले अख़बारों में क्या अंतर रह जाएगा? जिस तरह अख़बार अपनी आर्थिक कालाबाज़ारी पर चुप हैं ठीक उसी तरह प्रभाष जी भी तो अपनी वैचारिक कालाबाज़ारी पर खामोश हैं ! और हां जवाब उनके चेलों से नहीं चाहिए। विवाद को जन्म प्रभाष जी ने दिया है तो इससे उठे सवालों का जवाब भी खुद उन्हें ही देना चाहिए।
गांधीजी
August 24, 2009 at 7:16 am
माफ करना मित्रो, ब्राहमण नहीं हूं फिर भी वक्तव्य देने चला आया। दरअसल एक ज़रुरी सच्चाई बताने आया हूं कि इस देश को मैंने नहीं नाथूराम ने आज़ाद कराया था। आपको तो मालूम है कि नाथूराम ब्राहमण था और उसकी धारण-क्षमता की गोली मेरे सीने में मलाई की तरह घुल गई थी।
गुरुदेव प्रभाष जोशी जी से कहना आपका चेला गांधी आया था। कमज़ोर धारण-क्षमता की वजह से ज्यादा देर रुक नहीं पाया। अच्छा मित्रो चलता हूं, पाचक-क्षमता भी जवाब दे रही है।
*पुनश्चः*** बेटा, एक ज़रुरी बात रह गयी थी, आना पड़ा। अच्छा बताओ तो, गुरुदेव प्रभाष जी ने इस बहस के बारे में कुछ कहा कि नहीं। क्या बोला! आप सब को लल्लू-पंजू बोल रहे हैं। ठीक ही तो है बेटा, मैं तो अपने अखबारों में छात्रों से बराबरी के स्तर पर संवाद करता था। अब इतनी धारण-क्षमता तो थी नहीं कि भेद-भाव करता ! अच्छा पूछना कि जो प्रयोग मैं किया करता था वही बा ने किए होते तो क्या वे तब भी मेरे गुरु बने रहते ? थोड़ा अजीब तो लगता है बेटा पर हिम्मत करके पूछ ही लेना। वैसे तो सवाल गंभीर हैं बेटा पर अगर कोई भदेस कहे तो कहना कि हमारे गुरुदेव ह्यूमर के भी काफी शौकीन हैं। धारण-क्षमता का सवाल है, बेटा। आप तो सवालों की गठरी खोले बैठे हो, दो सवाल मेरे भी डाल लो, बेटा। अच्छा चलता हूं। इस सवाल पर गुरुदेव नाराज़ न हुए तो फिर आऊंगा। अभी रास्ते में गुरु गौडसे की समाधि पर मत्था भी टेकना है। सी यू बेटा, हां।
manas
August 25, 2009 at 1:09 pm
ब्राह्मण कैसे हैं। इनके बारे में अगंरेजों ने सही समझ लिया था. वे जानते थे कि ये लंबा-लंबा फेंक तो सकते हैं। कथित ज्ञानी हो सकते हैं। महानता की बाते कर सकते हैं। लेकिन जंग में शहीद नहीं हो सकते । यही वजह है कि ब्राह्मणों के नाम पर किसी फौजी रेजिमेंट को नहीं बनाया गया। उन्हे मालूम था कि इनकी बदौलत जंग जितने का भरोसा करना कितना खतरनाक हो सकता है। अपवाद छोड़ दे तो गौर करने वाली बात यह है कि आज भी कोई ब्राह्मण फौज में भर्ती नहीं होता है। आईआईटी कंपनियों के चेयरमैन ब्राह्मण हैं एेसी बाते करेगा, तमाम बहस करेगा, लंबा-लंबा फेंकेगा लेकिन देश के लिए जान देने की बात आती है तो सोचता है कोई दूसरा जान दे। शहीद कोई और हो मलाई कोई और खाए।