झूठी और ग़लत ख़बरों के बहुत बड़े ख़तरे होते हैं। एक ग़लत ख़बर किसी की नौकरी छीन सकती है। किसी को बर्बाद कर सकती है। इसलिए किसी को भी यह हक़ नहीं दिया जा सकता है कि वो ग़लत ख़बर देकर दूसरों की रोजी रोटी के साथ खिलवाड़ करे। फिर यहां तो बड़ी संख्या में लोगों की नौकरी का सवाल है। बात हो रही है सहारा समय की। आज सुबह भड़ास4मीडिया पर ख़बर छपी कि सहारा के कर्मचारियों ने अपना संगठन बना लिया है। इस ख़बर के बाद दिल्ली से लेकर उत्तर प्रदेश के कई ब्यूरो में सहारा के कर्मचारियों से बात की गई। उन कर्मचारियों से भी जिनकी रोजी रोटी ख़तरे में है। उन सभी ने यही कहा कि सहारा में संगठन बनाने की मनाही है, फिर “हम ऐसे समय में संगठन क्यों बनाएंगे जब मैनेजमेंट ने हमारी मांगों पर संवेदनशीलता से विचार करने का भरोसा दिया है।”
सहारा के कर्मचारियों ने यह भी बताया कि लखनऊ में टॉप मैनेजमेंट से हुई बातचीत के दौरान भी उनसे यही सवाल पूछा गया था कि क्या आप सब नेतागीरी करना चाहते हैं? तब उन सभी ने यही जवाब दिया कि “आप लोग हमारे अभिभावक हैं और हम तो अपने अभिभावकों के पास अपना दुखड़ा कहने आए हैं। नेतागीरी अब तक नहीं की और आगे भी इरादा नहीं है।”
यह कहने का आशय सिर्फ़ इतना ही है कि सहारा समय के पीड़ितों ने अभी तक कोई संगठन नहीं तैयार किया है। संगठन की ख़बर से वो खुद हैरान हैं। उनका कहना है कि “ये हमें बदनाम करने की एक साज़िश है। अब कुछ लोग उस वेबसाइट पर छपी ख़बर की फोटोकॉपी करा कर सुब्रत राय के सामने पेश करेंगे। और ये आरोप लगाएंगे कि जिन कर्मचारियों को फौरी राहत दी गई है वो आंदोलन करने की तैयारी कर रहे हैं। जिसके बाद हम सभी पर अनुशासन तोड़ने का आरोप भी मढ़ दिया जाएगा। फिर हम सबको नौकरी से निकाल दिया जाएगा।”
इस तरह के हथकंडे कारोबारी दुनिया में आम हैं। केजी बेसिन से जुड़े विवाद पर आपने देखा कि कितनी तरह की प्लांटेड ख़बरें आ रही हैं। कोई अनिल अंबानी को कठघरे में खड़ा कर रहा है तो कोई मुकेश अंबानी को। ठीक उसी तरह कर्मचारियों के हितों के खिलवाड़ करने वाले भी ख़बरें प्लांट करते हैं। कर्मचारियों के मुताबिक सहारा के भीतर भी कई “ऐसे लोग हैं” जो “निजी फायदे” के लिए सैकड़ों लोगों की बलि देना चाहते हैं।
कर्मचारियों का यह भी कहना है कि वेबसाइट पर जो प्रेस विज्ञप्ति छापी गई है उसकी भाषा भी हैरान करने वाली है। आप उस भाषा पर गौर कीजिए – “दरअसल सहारा भी इस देश की तरह चल रहा है जहां कुछ लोग अपने निहित स्वार्थ के लिए कंपनी का कोई भी नुकसान कराने को तैयार रहते हैं. ये लोग जैसे तैसे बड़े बड़े पदों पर पहुंच गये हैं और फिर वहीं से सारी मनमानी करते हैं. इन सीनियर के पास असल में कोई काम भी नहीं है और इन सभी ने किसी न किसी तरह एक केबिन अपने लिए अलाट करा लिया है. इन केबिनों में दिन भर गप्पेबाजी होती रहती है.” वेबसाइट पर छपी उस विज्ञप्ति में ये भी लिखा है कि “पता नहीं मीडिया हेड को इन फुंके हुए कारतूसों से कैसी मोहब्बत है कि इन्हें पाल पोस कर बनाए हुए हैं। उन्हें शायद नहीं पता यही लोग एक दिन उनकी भी लुटिया डुबो देंगे. अगर कंपनी ऐसे लोगों को बाहर कर दे तो रकम के तौर पर लाखों की बचत तो होगी ही इनकी खुराफाती गतिविधियां रुक जाने से करोड़ो का नुकसान बच जाएगा.”
अब आप अंदाजा लगा सकते हैं कि जिस दिन टॉप मैनेजमेंट को कर्मचारियों के हक़ से जुड़ा फ़ैसला करना है। उससे ठीक पहले ऐसी प्रेस रिलीज जारी करने और उसे छापने का मतलब क्या हो सकता है?
क्या है पूरा मामला?
सहारा समय में बीते हफ़्ते 48 कर्मचारियों से इस्तीफा मांगा गया। मुआवजे के तौर पर तीन महीने की बेसिक सैलरी देने के वादे के साथ उन्हें नौकरी छोड़ने को कहा गया। ये फैसला दुखद था। उन कर्मचारियों ने इसका विरोध किया तो उन्हें रात में गेस्ट हाउस से बाहर कर दिया गया। उसके बाद निकाले जा रहे कर्मचारियों का एक दल सहारा के टॉप मैनेजमेंट से बात करने के लिए लखनऊ रवाना हो गया। उसने एलान किया कि अगर जरूरत पड़ी तो वो सूबे की मुख्यमंत्री मायावती से भी मिलेंगे। यहां ध्यान रखिए कि संगठन बनाने जैसी कोई बात नहीं है। वो सभी आहत थे… रोजी रोटी का सवाल था इसलिए एक साथ लखनऊ गए थे।
लखनऊ में सहारा के टॉप मैनेजमेंट के साथ उनकी बैठक हुई। उन सभी ने अपनी-अपनी बात रखी। मैराथन बैठक में मैनेजमेंट ने उनकी मांगों पर गौर करने का भरोसा दिया और कहा कि वो सभी अपने-अपने शहर लौट जाएं और रिपोर्टिंग करें। अगले दिन वो सभी अपने शहर में थे। लेकिन दो दिन बाद उन्हें कहा गया कि उन सभी के बारे में मंगलवार (मतलब आज) तक अंतिम फ़ैसला ले लिया जाएगा और तब तक वो दफ़्तर नहीं आएं। यह आदेश उन्हें लिखित नहीं… मौखिक तौर पर दिया गया। लिखित आदेश एक तरह का सबूत हो सकता है।
ऐसे में आज जब उन सभी कर्मचारियों के बारे में अंतिम फ़ैसला आना है और वो सभी अपने-अपने शहर में बैठे उस फ़ैसले का इंतज़ार कर रहे हैं … कहीं एक ऐसी ख़बर छपती है जो मैनेजमेंट और मालिक को भड़का सके तो उस ख़बर का आशय आप समझ सकते हैं। और उसके पीछे किस किस्म के शख़्स का दिमाग होगा यह भी अंदाजा लगाया जा सकता है।
निकाले जा रहे कर्मचारियों में से कुछ का यह भी कहना है कि वो किसी भी तरह का संगठन नहीं बनाना चाहते। वो सिर्फ़ नौकरी करना चाहते हैं। उन्होंने अब तक वही किया है। लेकिन सहारा समय के कुछ लोग उन्हें उस मोड़ पर ढकेल देना चाहते हैं जहां उनके पास संघर्ष के अलावा कोई रास्ता नहीं बचे। भविष्य में क्या होगा… इसका फ़ैसला तो टॉप मैनेजमेंट के आज के फ़ैसले के बाद तय होगा। अभी का सच सिर्फ इतना है कि उन्होंने कोई संगठन नहीं बनाया है।
((ये रिपोर्ट सहारा के करीब दस कर्मचारियों से बात करने के बाद तैयार की गई है। इनमें ज़्यादातर ऐसे कर्मचारी हैं जो सीधे तौर पर प्रभावित हैं। उन सभी ने नाम नहीं छापने की एक गुजारिश की जिसका जनतंत्र ने पूरा ध्यान रखा है।))
इसी से जुड़ी कुछ पुरानी ख़बरें
कर्मचारियों को टॉप मैनेजमेंट ने दिया फिलहाल “सहारा”
rajshekhar singh
August 25, 2009 at 9:11 pm
हैरानी होती है ये जान कर की कुछ लोग इतने गैर जिम्मेदार होते है की वो दूसरो की रोज़ी रोटी के सवाल पर भी गंभीरता नही दिखाते, हो सकता है ये लोग किसी स्वार्थ वश ऐसा करते हो ..किसी फायदे की लालच में, ये लोग ये भी नही सोचते की किसी एक की नौकरी जाने का मतलब सिर्फ एक आदमी का बेरोजगार होना नही है, नौकरी जाने के बाद ऐसा लगता है पूरा परिवार बेरोजगार हो गया, वो बेरोजगार खुद को फिर से भले एक नए संघर्ष के वास्ते तैयार कर ले लेकिन घर के बच्चों, बुजुर्गों के चेहरों पर बहुत समय तक अपने के बेरोजगार होने की मायूसी दिखती है, जो तब तक कायम रहती है जब तक उस अपने को नया काम न मिल जाये, इस तरह का काम जो लोग अंजाम देते हैं उनके दिमाग में ये बात नही आती ?
Rakesh sing
August 26, 2009 at 1:14 am
मुझे आपकी इस खबर में कुछ ज्यादा दम दिखाई नहीं दे रहा है हालांकि भड़ास की खबर पूरी तरह से सही नहीं हो सकती है लेकिन पूरी तरह से झूठी भी नहीं हो सकती है। क्योंकि उसमें भी बहुत हद तक सच्चाई लगती है।जबकि आपकी खबर पढ़ने के बाद इसमें कुछ मैनेजमैंट की भाषा भी दिखाई दे रही है। और जिस तरह से आप ने भड़ास का नाम लेकर उसकी खबर को गलत बताया है उससे लगता है कि आप की बेवसाइट पत्रकारिता के बेसिक भूल गई है। अगर आपको लगता है कि आपके सूत्र सही है तो आप अपनी बात अपने सबूतों के आधार पर कहे न की गलत सही का फैसला करें। आप अपनी राय दे और बाकी पाठकों पर छोड़ दे अन्यथा आपकी विश्वसनीयता पर भी सवाल उठने लाजमी है
जनतंत्र डेस्क
August 26, 2009 at 1:40 am
राकेश जी,
पत्रकारिता के बेसिक क्या कहते हैं, इसका अंदाजा हमें है। आपने देखा होगा कि हेडर कोट में दिया गया है। हेडर ही नहीं कर्मचारियों ने जो कुछ भी कहा है वो कोट में दिया गया है। संगठन बनाने की बात गलत है – ये हम नहीं कह रहे है बल्कि राष्ट्रीय सहारा के वो तमाम कर्मचारी कह रहे हैं जिनकी नौकरी ख़तरे में है और जिनसे हमारी बात हुई है। रही बात वेबसाइट का नाम लेने की तो कई बार संदर्भ साफ करने पड़ते हैं। ये खुल कर बताना पड़ता है कि आप किसके बारे में बात कर रहे हैं। ख़बर भड़ास पर छपी थी इसलिए उस वेबसाइट का नाम लिया गया।