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जिसकी जितनी जातीय औकात, उतना उसका प्राप्य


“……..अपने यहां मुसलमान कौन हुए? मुसलमान वो हुए, जो हाथ से काम करने वाले लोग थे. जुलाहे, लोहार, कुम्हार जो-जो भी हाथ से काम करने वाले लोग थे और जिनको आप के समाज में इज्जत की नजर से नहीं देखा जाता था, वो लोग मुसलमान हुए. वे स्वाभाविक रूप से हाथ को, उंगलियों को हैंडल करने वाले लोग थे. उनकी स्किल हमसे और आप से बेहतर है क्योंकि वो हाथ से ही काम करने वाले लोग थे. हम दिमाग से काम करने वाले लोग है….” - प्रभाष जोशी

संजय जी, आप ने गौर नहीं किया कि प्रभाष जोषी ने मुसलमानों को उनके धर्म के आधार पर नहीं तौला है। बल्कि मुस्लिमों की धर्मांतरण से पूर्व की जाति के आधार पर उनकी योग्यता का मूल्यांकन किया है। प्रभाष जोशी के दिमाग मे छिपी जातिवाद की सड़ी गांठ का कमाल देखिए कि जिसने सैकड़ों साल पहले धर्म बदल दिया उसकी भी जाति के नागपाश से मुक्ति नहीं हुई। प्रभाष जी ने स्पष्ट कहा है कि मुस्लिम हाथ से काम करने वाले लोग हैं और वो (यानि की हिंदू) दिमाग से काम करने वाले लोग हैं। खैर मनाएं कि अभी किसी ने उनके इस ब्राह्मण-दर्शन पर ध्यान नहीं दिया है। वरना आप समझ सकते हैं कि उनकी दुर्गति के नए द्वार खुलते देर न लगेगी।

तथ्य पेश करने से बहस की हत्या हो गई?

संजय कुमार सिंह

प्रभाष जोशी के “ब्राह्मणवाद” पर चल रही बहस में हिस्सा लेने की योग्यता मुझमें नहीं है। इसका मुख्य कारण तो यही है कि मैं उनके मातहत काम कर चुका हूं और ब्राह्मण नहीं होने के बावजूद मुझे नौकरी देने का उनका एहसान मुझ पर है। इसके अलावा इस वक्त मैं बेरोजगार हूं और प्रभाष जोशी तो क्या उनके कई चेले भी मुझे अच्छी नौकरी देने की हैसियत में हैं। पक्ष में लिखूं तो यही कहा जाएगा कि चमचागीरी कर रहा है। खुल कर नाम के साथ ख़िलाफ़ लिखूं तो कहा जाएगा कि किसी बड़े बाप का बेटा होगा। लेकिन मैंने सिर्फ़ तथ्य को तथ्य के रूप में इस सूचना के साथ प्रस्तुत किया कि प्रभाष जी के ब्राह्मणवाद से इस सूची को प्रस्तुत करने का कोई संबंध नहीं है। तो शीर्षक लगा, “ब्राह्मणवाद पर बहस कीजिए, बहस की हत्या नहीं।

इस तरह उकसाने और भड़काने का खेल मुझे भी खूब आता है और कह सकता हूं कि कर के अघा चुका हूं। जहां तक प्रभाष जी के ब्राह्मणवाद पर बहस का सवाल है, मेरा मानना है कि रविवार डॉट कॉम को दिए इंटरव्यू में उन्होंने जो कुछ कहा वह उनके निजी विचार हैं और प्रभाष जी जैसे बड़े लोग अपनी निजी राय सार्वजनिक कर दें तो इसमें अपनी भलाई ही है।

फिर भी हर कोई उनके पीछे पिल पड़ा है। किसी के भी विचार निजी होते हैं और उसे वह सार्वजनिक करता है तो इसीलिए कि आप उसे उसी आलोक में जाने समझें। वरना निजी विचारों को (और अगर वे हर किसी की राय में बुरे हैं तो) जाहिर करने की क्या जरूरत? कुछ लोग कहेंगे विवाद में या खबरों में रहने के लिए। लेकिन ऐसा कोई अपनी छवि खराब करने के लिए या उसकी कीमत पर नहीं करेगा। प्रभाष जोशी भी इतने कच्चे खिलाड़ी नहीं हैं। एक इंटरव्यू में पूछे जाने पर उन्होंने ब्राह्मणों के बारे में अपनी राय बताई, गलत तथ्यों पर ब्राह्मण को श्रेष्ठ साबित करने की कोशिश की – यह उनकी गलती है (आप चाहें तो शरारत कहें) पर इसका मतलब यह नहीं है कि उन्होंने कुछ किया-कमाया ही नहीं है और जो चाहे कंप्यूटर पर बैठे उनके बारे में कुछ भी लिखकर अपलोड कर दे।

एक शीर्षक है, “प्रभाष जी की मति भ्रष्ट हो गई है”। अब आप बताइए कि अगर किसी के विचार हमसे मेल नहीं खाएं तो क्या ये एलान कर देना कि उसकी उसकी मति भ्रष्ट हो गई है – कहां तक सही है? किसी ऐरे-गैरे के बारे में आप ऐसा सोचे तो सोचे, जिसने कई अच्छे और उल्लेखनीय काम किए हैं, उसके बारे में इतनी आसानी से ऐसा नहीं कहा जा सकता। मुझे जानने वाले जानते हैं कि मैं जनसत्ता में रहकर भी प्रभाष जी से असहमति जताता रहा हूं। मैं यही मानता हूं कि हमें वहां इसकी छूट थी लेकिन आप चाहें तो मान लीजिए कि मुझे इसका नुकसान हुआ और इसीलिए बेरोजगार हूं। लेकिन मैं यह नहीं कहूंगा कि ऐसा इसलिए हुआ कि वे ब्राह्मणवादी हैं या मैं ब्राह्मण नहीं हूं।

जनसत्ता में मेरा चयन प्रभाष जोशी के अलावा उनके मातहत कई ब्राह्मणों के रहते हुए हुआ था। उस समय समाचार संपादक, उप समाचार संपादक और उसके नीचे भी कई ब्राह्मण थे। इन सभी ब्राह्मणों के साथ काम करते हुए मुझे कभी नहीं लगा कि वे काम में कहीं कमजोर थे या जनसत्ता में उन्हें ब्राह्मण होने के कारण ही रख लिया गया था। प्रभाष जोशी के ब्राह्मणवादी होने से उनका किया कराया सब धुल नहीं जाएगा। उन्होंने ब्राह्मण के बारे में अपनी राय बताई है, आप जान लीजिए, नोट कर लीजिए उनके कहे-किए को इसी आलोक में देखिए, परखिए और अपनी राय बनाइए। उनकी राय पर टिप्पणी भी कीजिए पर संयत रहकर।

मुझे जनसत्ता ज्वाइन करने के बाद उनकी एक राय मालूम पड़ी। वो मानते रहे हैं कि ज़्यादा पैसे मिलने से कोई अच्छा शीर्षक नहीं लगा लेगा (ऐसा ही कुछ)। उनकी इस राय का नुकसान यह हुआ कि उनके संपादक रहते डेस्क पर कई साल तक किसी को तरक्की नहीं दी गई। उपसंपादकों और उनकी तनख्वाह के संबंध में उनकी यह राय मुझे पहले मालूम होती तो मैं जनसत्ता किसी भी सूरत में ज्वाइन नहीं करता। उनके संपादक रहते तो बिल्कुल नहीं क्योंकि मैं पत्रकारिता को एक नौकरी समझकर ही दिल्ली आया था। इसलिए साथियों, वरिष्ठों की राय जानने की कोशिश करो। उन्हें अपनी राय रखने दो। और उस हिसाब से काम करो। राय सामने आते ही इस तरह पिल पड़ोगे तो कोई भी अपना सच नहीं बताएगा।

ऊपर दिए प्रभाष जोशी के बयान से आप समझ गए होंगे कि हिन्दी पट्टी के सीने पर कसे जातिवादी नागपाश का ताना-बाना अति-जटिल है। हिंदू-मुस्लिम एकता, गंगा-जमुनी तहजीब, जैसी बातों का इस बहस से सीधा संबंध नहीं है। हमारे बहस के केन्द्र में प्रभाष जोशी द्वारा प्रतिपादित सर्वधर्मसमावेशी जातिवाद है। अतः सरलीकृत ढंग से मुस्लिम नाम गिनाने से इस बहस का कोई संबंध नहीं है। मुस्लिम नाम गिनाना ही है तो कृपया प्रभाष जी से उन सभी मूल जाति के बारे में पूछ लें और उसे हमारे सामने जाहिर करते हुए उनके नाम का उदाहरण दें।

मुझे मुस्लिम जाति संरचना की ज़्यादा जानकारी नहीं है। कोई ऐसा व्यक्ति है जो व्यावहारिक जीवन में व्याप्त मुस्लिम जाति व्यवस्था पर जानकारी रखता है तो वो इस बहस के नए आयाम खोल सकता है। चार्वाक ने जो नए तथ्य दिए हैं उनसे तो ऐसा लगता है कि भाजपा-प्रभाव के बढ़ती छाया में प्रतीक रूप में कुछ भर्तियां की गईं जिन्हें नकाब बनाकर भाई लोग अपनी असलियत छिपा सकें। खैर, यह एक संभावना है। जिस पर गौर किया जा सकता है।

दूसरी जरूरी बात यह है कि प्रभाष जी ने अपने ब्राह्मण-दर्शन में यह कहीं नहीं कहा है कि गैर-ब्राह्मण क्रिकेट खेलने के लायक नहीं है। न ही उन्होंने यह कहा है कि गैर-ब्राह्मण को कंप्यूटर में काम करने की योग्यता नहीं है। उन्होंने ये भी नहीं कहा कि गैर-ब्राह्मणों को प्रधानमंत्री बनने का हक नहीं है। ऐसा कहने का ख़तरा उठाने की हिम्मत शायद उनमें नहीं है। मुझे पूरा विश्वास है कि अगर आज चंद्रशेखर सिंह और विश्वनाथ प्रताप सिंह जीवित होते तो प्रभाष जी को अपनी महान-प्रधानमंत्री सूची में…….

खैर, आप प्रभाष जोशी के जालीदार नकाब के पीछे की हकीकत देखिए। उनका कहना है कि क्रिकेट हो, कंप्यूटर हो या प्रधानमंत्रित्व हो सबसे महान लोग वही होंगे जिनका जन्म ब्राह्मण पारे में हुआ है। भाई जाति व्यवस्था की क्लासिक थीसिस भी तो यही है कि ब्राह्मण सबसे ऊपर….. उसके बाद का पदानुक्रम आप सब जानते हैं।

अतः इस थीसिस के तहत एक ठाकुर उपकप्तान के पद तक तो जा ही सकता है। मूल सवाल तो यह है कि दलित और आदिवासी किस पद तक जा सकते हैं। गर प्रभाष जी किसी अवर्ण को जनसत्ता में चपरासी रख दें या फिर स्ट्रिंगर या फिर रिर्पोटर रख देंगे तो भी उनका जातिवादी ब्राह्मण-दर्शन पर कोई आंच नहीं आएगी। जो जिस स्तर का काम करने लायक रहेगा उसे प्रभाष जी वो काम तो देंगे ही। हो सकता है कि वो कल कह दें कि रिपोर्टिंग में आदिवासी ही फिट हैं क्योंकि उन्हें कठिन शारीरिक श्रम की आदत होती है। कोई सोचेगा कि प्रभाष जी ने उसे जाति से ऊपर उठ कर काम दिया। जबकि प्रभाष जी का कहना है कि किसी के भविष्य की संभावना उसके जातीय संस्कारों पर टिकी होती है। तो ऐसे ब्राह्मण-दर्शन के हिसाब से प्रभाष जी अलग-अलग जाति के लोगों के जातीय संस्कारों के आधार पर श्रम-विभाजन करके अपने दर्शन को क्रिया में रूपांतरित करते रहे होंगे।

इसी ब्राह्मण-दर्शन के तहत यह जानना महत्वपूर्ण हो जाता है कि प्रभाष जी के खुदमुख़्तारी में जनसत्ता के भीतर महत्वपूर्ण पदों पर पहुंचने वालों को बचपन से किस बात की ट्रेनिंग दी गई थी। मैं फिर से स्पष्ट कर दूं कि प्रभाष जी गैर-ब्राह्मणों को तड़ीपार नहीं करना चाहते। वो तो बस जातीय ट्रेनिंग के आधार पर धारण क्षमता जांच कर उन्हें उनकी वाजिब(!) जगह पर रखना चाहते हैं। यानि जिसकी जितनी जातीय औकात उतना उसका प्राप्य।

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13 Responses to जिसकी जितनी जातीय औकात, उतना उसका प्राप्य

  1. चार्वाक सत्य Reply

    August 25, 2009 at 9:16 am

    संजय जी , आप स्टॉकहोम सिंड्रॉम के शिकार हैं। आपसे पूरी सहानुभूति है। और रंगनाथ जी, ब्राह्मणवाद दूसरी जातियों को ही नहीं ब्राह्मणियों समेत तमाम महिलाओं को भी मारता है, उन्हें वंचित रखता है। जैसा कि खुद संजय ने कहा कि जब प्रभाष जी ने पत्रकारों की अपनी पहली टीम बनाई तो उसमें एक महिला थी। पूरी टीम में एक महिला और वो भी सबसे नीचे के पद पर। इस एक तथ्य को ध्यान में रख लें तो सती पर प्रभाष जी के विचारों से चौंकने की जरूरत नहीं पड़ेगी।

  2. संजय कुमार सिंह Reply

    August 25, 2009 at 12:34 pm

    जो लोग चार्वाक सत्य जी की तरह ज्ञानी नहीं हैं उनके लिए, विकीपीडिया के मुताबिक : Stockholm syndrome is a psychological response sometimes seen in abducted hostages, in which the hostage shows signs of loyalty to the hostage-taker, regardless of the danger or risk in which they have been placed.

    “स्टॉकहोम सिनड्रोम एक मनोवैज्ञानिक प्रतिक्रिया है जो कई बार अपहृत बंधकों में दिखता है, जिसमें बंधक बनाने वाले के प्रति बंधक अपनी निष्ठा दिखाने के संकेत व्यक्त करते हैं और इसमें उस खतरे या जोखिम का ख्याल नहीं रखते जिसमें वे हैं।”

    और चार्वाक सत्य जी के बारे में मुझे लगता है कि वे सत्य से ही नाराज वे गए हैं क्योंकि वह उनके अनुकूल नहीं है।

  3. चार्वाक सत्य Reply

    August 25, 2009 at 1:34 pm

    “अस्तु, उस समय तीन शहरों से निकलने वाले अखबार जनसत्ता में एक मुसलमान स्टाफ भी था (ये पढ़े लिखे लोगों का मंच है इसलिए स्ट्रिंगर यानी टेंपररी संवाददाता क्या होता है ये बताने की जरूरत कदाचित नहीं है) । अब तो प्रभाष जी पर नियुक्तियों के मामले में सांप्रदायिक होने का आरोप लग ही नहीं सकता। संजय जी, बधाई और शुभकामनाएं।

    अब दलित स्टाफर के बारे में भी स्थिति स्पष्ट कर ही डालें। प्रभाष जी को दलित विरोधी ही भला क्यों कहा जाए। जनसत्ता के बड़े पदों पर लगभग 80 फीसदी और कुल पदों पर लगभग 60 फीसदी ब्राह्मणों की मौजूदगी भी अगर प्रभाष जोशी को जातिवादी साबित नहीं करती है, तो फिर यहां से तर्क के अंत की शुरुआत होती है। मानसिक गुलामी इसे ही कहते हैं शायद, जब गुलाम को ये लगे ही नहीं कि वो गुलाम है। इसे स्टॉकहोम सिंड्रॉम भी कह सकते हैं जब अपहृत लोग अपहरणकर्ताओं से सहानुभूति, बल्कि कई बार प्रेम भी करने लगते हैं।”

    सच कड़वा होता है तो नाराजगी होती है संजय जी। ऊपर मैंने जो लिखा उसके पीछे नाराजगी आपसे नहीं, प्रभाष जोशी नाम के व्यक्ति से भी नहीं, उस सामाजिक व्यवस्था है, जिसमें ऐसा न्यूजरूम बनता है। और आश्चर्य होता है जब ऐसी संरचना लोगों को चौकाती तक नहीं है।

    • संजय कुमार सिंह Reply

      August 25, 2009 at 2:37 pm

      चार्वाक सत्य जी, ऐसी संरचना सिर्फ अखबारों में नहीं, किसी भी संस्थान में है। सेना से लेकर दिहाड़ी मजदूर और पत्रकार से लेकर वफादार तक में। जनतंत्र पर मैं पहले भी लिख चुका हूं कि प्रतिशत और गणना से नियुक्तियां नहीं हुआ करतीं। किसी संस्थान में दो नौकरी हो तो एक पुरुष और एक स्त्री को रख लो। 100 हों तो 53 पुरुष और 47 महिला को और 47 महिलाओं में क मुसलमान, ख दलित और ग ब्राह्मण तथा इसी तरह 53 पुरुषों में ए मुसलमान, बी दलित और सी ब्राह्मण नहीं रखे जा सकते।

      एनसीआर में मेरे स्कूल में मेरे साथ पढ़े चार मित्र हैं। इनमें महिला एक भी नहीं है और सिर्फ एक कायस्थ है (यह उनके उपनाम से स्पष्ट है, पूछा नहीं है, गलत हो सकता हूं)। बाकी तीन मेरी ही तरह ठाकुर हैं। इस तरह तो मित्र बनाने (या बनाए रखने) में मैं घोर ठाकुरवादी हो गया और महिलाओं को तो पूछता ही नही। स्कूली पढ़ाई जमशेदपुर में हुई है इसलिए मेरे साथ पढ़ने वालों में सिख, मुसलमान सब हैं। क्लास में लड़कियां तो करीब लड़कों के बराबर ही थीं। पर वे दिल्ली में नहीं हैं इसलिए उनसे संपर्क नहीं है, वैसी दोस्ती नहीं है। इसका मतलब यह नहीं हुआ कि मित्र बनाने (या बनाए रखने में) मैं जातिवादी हो गया और न ही इसका मतलब यह है कि एनसीआर दिल्ली में मुसलमानों, इसाइयों और सिखों का वही अनुपात है जो मेरे मित्रों का है।

      इन तर्कों को प्रस्तुत करने के लिए आप मुझपर जो भी आरोप लगाइए – मैं जाति वाले मामले में चीजों को इसी नजरिए से देखता हूं। जो मैं नहीं कर सकता उसकी दूसरों से अपेक्षा भी नहीं करता।

      • चार्वाक सत्य Reply

        August 25, 2009 at 11:20 pm

        संजय जी आप सज्जन आदमी हैं। ईश्वर (जिसे मैं नहीं मानता) आपको संतोष और मन की शांति दे। लेकिन कामना ये भी है की जनसत्ता की तरह की सामाजिक संरचना वाला कोई मीडिया ग्रुप अब न बने। हजारों फूलों को खिलने का मौका मिले और माली पूरे बाग में सिर्फ एक ही फूल के बिरवे न रोप दे। हर तरह के पौधों का वो ख्याल रखे, सबको पानी दे, खाद दे। जो कमजोर पौधे हैं, उनका ज्यादा ध्यान रखें।

        जो बातें आपको बुरी लगी हों, उन्हें कृपया दिल पर मत लीजिएगा। हो सके तो ये समझने का प्रयास कीजिएगा कि चार्वाक सत्य ऐसी कड़वी बातें क्यों बोलता है।

        • संजय कुमार सिंह Reply

          August 25, 2009 at 11:46 pm

          अपने आचरण, सोच, व्यवहार, हैसियत, कार्य, श्रम आदि आदि से मैं पहले ही पर्याप्त संतोष और मन की शांति प्राप्त कर चुका हूं। फिर भी आपकी शुभकामनाओं के लिए शुक्रिया।
          मैं जानता और मानता हूं कि माली भी फूलों का चुनाव अपनी पसंद से ही करेगा और अज्ञानता के कारण बेमौसम के फूल सींचेंगा तो कुछ नहीं पाएगा। मिट्टी और आबोहवा के अनुसार फूल लगाएगा तभी बाग सुंदर बनेगा। पौधों का अनाथालय चलाएगा तो नौकरी से हाथ धोएगा।
          मुझे कुछ बुरा नहीं लगा और मैं नहीं समझता कि सत्य बोलने वाला कड़वा बोलता है। कड़वा को सत्य होता है और उसे झेलने की आदत है।

          • चार्वाक सत्य Reply

            August 26, 2009 at 12:30 am

            संजय जी, एक संदेह खड़ा हो गया है। प्रभाष जी ने 3 अप्रैल 2009 को भड़ास पर दिए एक इंटरव्यू (http://bhadas4media.com/index.php?option=com_content&view=article&catid=31:interview&id=1268:prabhash-joshi&Itemid=52) में ये कहा है-

            “-आपने राकेश कोहरवाल और आलोक तोमर को क्यों निकाला?

            –(दिवंगत राकेश कोहरवाल के बारे में बचते हुए) मैने कागद कारे में लिखा है उनके बारे में। जहां तक आलोक की बात है, एक आर्टिकल था, गिरिराज किशोर का था। लेख छपने के लिए पूरी तरह तैयार था। उसमें कंप्यूटर पर सब उल्टा-पुल्टा कर दिया था। वह कंप्यूटर आलोक का था। उसे जाना पड़ा।

            -आपने लिखा है कि महादेव चौहान, आलोक तोमर और राकेश कोहरवाल आपको अपराध बोध देते हैं। क्या है वह अपराध बोध?

            –ये जब आए थे तो कुछ नहीं थे। जनसत्ता में नाम कमाया था। अखबार ने उन्हें कीर्ति दी थी। इनको उठाया था। सभी के टैलेंट को जनसत्ता ने उभारा था। हिट होने के बाद इनके तौर-तरीके बदल गए, जीवन में ऐसा होता है जब आपकी प्रतिभा को एक बार निखरने का मौका मिल जाता है, तब। आपमें जो प्रतिभा है उसे संभाल कर रोज तराशना और उसे रचनात्मक कार्य में लगाए रखना भी एक प्रतिभा है, वरना जिनमें अधिक प्रतिभा होती है वो विस्फोट करके नष्ट हो जाते हैं। ऐसे कई लोग थे जो जनसत्ता से जाने के बाद फिर कभी नहीं बढ़े।

            जब मेरी पांच किताबों का एक साथ विमोचन था, तब अमर-उजाला के समूह संपादक (अब ग्रुप प्रेसीडेंट, न्यूज) शशि शेखर ने कहा था ‘हम जनसत्ता में आलोक तोमर का नाम सुनते थे। अब वो कहां हैं, किसी को नहीं पता।’

            जब अखबार शुरू हुआ था तभी मैने सबको बुला कर कहा था कि हमें मिलकर एक परिवार बनाना है और यह परिवार अखबार बनाएगा। पांच साल तक पूरे 22 लोगों की टीम थी। इस टीम ने कैसा अखबार निकाला, आप जानते हैं।”

            उन्होंने 22 लोगों का आंकड़ा दिया है। आपने 30 की लिस्ट बताई है। एक बार क्रॉस चेक करने का बनता है? उम्मीद है कि आप स्थिति साफ करने का श्रम करेंगे। वैसे इस मामले में किसी की विश्वसनीयता दांव पर नहीं है। आप समय निकाल पाए तो बताएं कि 22 सही है या 30. या कुछ और ही सही है।

  4. राजेश पांडे Reply

    August 26, 2009 at 12:50 am

    संजय जी और चार्वाक जी,

    आप लोग आंकड़ों में उलझ कर रह गए हैं। अब एक मुसलमान हो या फिर नहीं हो। उससे क्या फ़र्क पड़ता है। बात तो यही है कि अल्पसंख्यकों को, पिछड़ी जातियों और दलितों को और महिलाओं को जो हक़ मिलना चाहिए वो नहीं मिला। प्रभाष जी जैसे बूढ़े गिद्धों ने उन्हें उनका वाजिब अधिकार नहीं किया। जहां तक मुझे लगता है ये मुद्दा एक व्यक्ति, एक जाति और एक संस्थान का नहीं है। ये मुद्दा पूरी व्यवस्था का है। अब संख्या 22 थी या 30 या फिर 15… और उसमें 17 सवर्ण थे या 22 या फिर 14 उससे क्या मतलब? मतलब तो इतना ही है कि टीम बनाते वक़्त जो सोच होनी चाहिए वो सोच नहीं थी।
    ——————

    संजय जी,
    आप कह रहे हैं कि माली अपने हिसाब से फूल लगाएगा। बात सही है अपने हिसाब से ही फूल लगाएगा। लेकिन बेस्ट क्रॉपिंग मिक्स्ड क्रॉपिंग को कहते हैं। अगर आपके पास तीस बीघे खेत हों और आपने तीसों में एक तरह के फूल लगा दिए तो हल्का सा मौसम गड़बड़ाने पर आप बर्बाद हो सकते हैं। इसलिए बताया जाता है कि तीस बीघे में फसलों की वेरायटी बढ़ा दीजिए। ताकी एक फसल पर असर पड़े तो दूसरा आपको संभाल ले। यहां तो लोग एक ही फसल लगाने लगते हैं। ठाकुर है तो ठाकुर भरने लगेगा। बाभन है तो बाभन भरेगा। लाला है तो उसे लाला चाहिए। रही बात प्रतिभा की तो आपके बता दें कि हर जाति में इतने प्रतिभावान लोग होते हैं कि आप सौ-डेढ़ सौ काबिल लोगों की फौज जुटा लीजिए। यहां तो आप लोग 15, 22 और 30 की संख्या ही गिना रहे हैं।

  5. संजय कुमार सिंह Reply

    August 26, 2009 at 1:10 am

    बिलकुल. कल सुबह के लिए पहला काम,

    • संजय कुमार सिंह Reply

      August 26, 2009 at 10:23 am

      22 की गिनती में कुछ गड़बड़ है. मेरी सूची सही है. जनसत्ता में अभी भी करीब 25 लोगों का सम्पादकीय विभाग है इसलिए उस समय 22 ही लोग होंगे ऐसा नहीं लगता.

  6. एकलव्य Reply

    August 26, 2009 at 11:49 am

    देखिए, हम आप लोगों के बीच में बोलने के लिए माफी चाहते हैं, हम भी नहीं चाहते कि बहस में कोई पूर्वाग्रह रहें। लेकिन एक बात बार-बार परेशान करती है कि जो आदमी बार-बार धारण-क्षमता, हजारसाला टेªनिंग और पारंपरिक कौशल की बात करता है, उसने अपने अखबार के लिए टीम चुनते समय इस बात को दिमाग में न रखा होगा, यह कैसे हो सकता है !? अब परसेंटेज 70-30 हो, 80-20 हो या 90-10 हो, क्या मायने रखता है ?

    • खरी बात Reply

      August 26, 2009 at 3:10 pm

      प्रभाष जोशी फैक्ट्स का बैंडबाजा क्यों बजा देते हैं। ये देखिए- http://janatantra.com/2009/08/21/analysis-of-prabhash-ji-article/

      तहलका के एक लेख (http://www.tehelkahindi.com/stambh/diggajdeergha/aughatghaat/256.html)में उन्होंने सारश्वत ब्राह्मण गावस्कर को क्रिकेट इतिहास का अब का सबसे महान ओपनर कहा है। किस आधार पर, ये बताना प्रभाष जोशी के लिए जरूरी नहीं होता। सफल ओपनर कहते तो आंकडों से जांच हो सकती। महानता कैसे नापते हैं जोशी जी?

      और संजय जी आपने ये तो बताया ही नहीं कि जनसत्ता में पहली बार किसी दलित की नियुक्ति कब हुई? और आपकी 30 की लिस्ट में 20 ब्राह्मण थे या सिर्फ 19 थे।

  7. शंबूक Reply

    August 26, 2009 at 3:52 pm

    दुनिया के बेस्ट टेस्ट ओपनर और उनका बैटिंग एवरेज
    1. हरबर्ट सटक्लिफ- 61.11
    2. ग्रियम स्मिथ- 58.35
    3. वीरेंद्र सहवाग- 57.19
    4. एंड्य्रू स्ट्रॉस – 57.17
    5. मैथ्यू हेडन- 53.47
    6. गिब्स- 52.50
    7. जस्टिन लेंगर – 51.58

    स्रोत- http://74.125.153.132/search?q=cache:-2U4e8Jf48cJ:www.cricinfo.com/columns/content/story/209647.html+greatest+test+cricket+opener&cd=1&hl=en&ct=clnk&gl=in

    सारस्वत ब्राह्मण गावस्कर का टेस्ट एवरेज 51.12 है। वन डे में तो उनका एवरेज सिर्फ 35.13 है। अब प्रभाष जोशी जिसे चाहें क्रिकेट इतिहास का सबसे महान ओपनर लिख दें।

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