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जो हरिवंश जी को नहीं जानते, उनके लिए

आदरणीय मॉडरेटर,

मैं आपकी थोड़े दिनों में मशहूर हो गयी वेबसाइट पर लगातार तथागत के लिखे को पढ़ रहा हूं। उनकी राइटिंग इस बात की ओर इशारा करती है कि वे मीडिया के प्रबुद्ध नागरिक हैं – लेकिन उनकी चेतना एकांगी है और ये भी तय है कि वे समग्रता में हमारे दौर को देखने से परहेज़ कर रहे हैं।

ख़ैर, प्रभात ख़बर और हरिवंश जी की बात बाद में। पहले मैं आपको एक ख़बर सुना रहा हूं। संजय यादव रांची में बरसों से पत्रकारिता कर रहे हैं। पहले टीवी और फिर अख़बार। मैं उन्‍हें व्‍यक्तिगत तौर पर जानता हूं। संजय जी के पास दुर्लभ ईमानदारी है, जिसकी हमारे समय में घनघोर कमी है। रांची से आठ किलोमीटर दूर टाटीसिल्‍वे में रहते हैं। वहां पानी की बेतरह परेशानी है। रोज़ दफ़्तर आने से पहले बाल्‍टी-बाल्‍टी पानी ढोकर घर वालों की मदद करते हैं। इस एक जिक्र से आप ये न समझें कि उनकी माली हालत ठीक नहीं है। दरअसल वे कर्मठ स्‍वभाव के शख्‍स हैं और जहां तक मैंने उनको वॉच किया है, श्रमदान उनका प्रिय प्रसंग है।

इन्‍हीं संजय यादव ने अपनी संपत्ति की घोषणा की है। भारत के इतिहास में शायद यह पहली घटना है – जब एक पत्रकार ने इस तरह का साहस दिखाया है, इस तरह की पहलक़दमी ली है। मीडिया की विसंगतियों पर नज़र रखने का दावा करने वाली आपकी साइट मीडिया की इस सुखद घटना के बारे में क्‍या सोचती है – मुझे नहीं मालूम। इतना मालूम है कि मेरे मित्र और मुझसे ज़्यादा प्रतिबद्ध और प्रतिभाशाली पत्रकार संजय यादव मेरी ही तरह हरिवंश जी को चाहते हैं। उनकी बतायी राह पर चलने की मैं कोशिश करता हूं, वे बाक़ायदा चलते हैं। उनका ये क़दम भी पिछले दिनों निम्‍नस्‍तरीय ही सही, एक निजी मीडिया वेबसाइट पर हरिवंश जी के इंटरव्‍यू में आयी बातों के संदर्भ में उठा है। आइए, पढ़ते हैं – हरिवंश जी ने इंटरव्‍यू में कहा क्‍या था…

जनसत्ता कोआपरेटिव सोसाइटी (गाजियाबाद) में एक फ्लैट, एक तीन कमरे का फ्लैट रांची में, जिसमें रहता हूं। रांची में फ्लैट के अलावा दुकाननुमा एक छोटा-सा हाल है। बहुत पहले कुछ साथियों ने मिलकर शहर से काफी दूर छोटा घर बनाने के लिए जमीन का छोटा-सा टुकड़ा (20 डिसमिल) लिया था। रांची का कट्ठा काफी छोटा होता है। कुछ वर्षों पहले उसको बेचकर वैसा ही एक टुकड़ा शहर से उतनी ही दूर लिया। उससे थोड़ा अधिक बड़ा। यही कुल मेरी संपत्ति है। गांव पर पुश्तैनी घर है। पुश्तैनी जमीन है। जब हम गांव जाते हैं तो उसी घर में रहते हैं अन्यथा वह बंद रहता है। गांव में जो हमसे जुड़े लोग रह रहे हैं, पीढ़ियों से, उनके माध्यम से कुछ जमीन पर खेती भी कराते हैं।

नौकरी में आने के बाद जब-जब जो-जो चीजें मैंने लीं, उन सबकी सूचनाएं संबंधित संस्थानों को दे दिया है। हालांकि, यह बाध्यकारी नहीं था। मौजूदा संस्था से दो बार बड़ा लोन लिया। दिल्ली में जब जनसत्ता सोसाइटी में फ्लैट लिया तो उसका पूरा ही लोन इसी संस्था से सूद पर लिया, जो अभी ग्यारह वर्षों बाद, इस साल चुका पाया हूं। इसे मुझे वर्ष 2005-06 में ही चुका देना चाहिए था। इसके अलावा रांची में फ्लैट और एक अन्य छोटा दुकाननुमा हाल लेते वक्त दो बड़े बैंकों से बड़ा कर्ज लिया। इन सबका ब्योरा-विवरण कोई देखना चाहे, तो वह उपलब्ध है। मेरे पास अपनी निजी गाड़ी भी नहीं है, आफिस की गाड़ी है।”

ये हमारे समय के एक संपादक की वो घोषणा है – जिसकी नैतिक आभा से हमारा समय बचा हुआ है। वरना हम जानते हैं कि कुकर्मों की कितनी कितनी कालिख़ वाले पत्रकार इस समय सम्‍मान पा रहे हैं, पद पा रहे हैं। तथागत ने जो कुछ लिखा, उसका सिलसिलेवार उत्तर दिया जा सकता है, फिलहाल इतना ही बताना काफी है कि हरिवंश जी के बरक्‍स उन्‍होंने जिस पत्रकार की तारीफ़ अपेक्षाकृत ज़्यादा स्‍पेस देकर की है, उनके पास आज सौ करोड़ के करीब की संपत्ति होगी। आप समझ सकते हैं कि इ‍तनी संपत्ति सीधे और उजले रास्‍तों से तो आ नहीं सकती। दूसरी तरफ आप देखें कि तथागत ने प्रभात ख़बर और हरिवंश जी पर जातीय भेदभाव का आरोप लगाया है। मैं अपना अनुभव बताना चाहता हूं। मैं उनसे स्‍कूल के ज़माने से मिलता रहा हूं। प्रभात ख़बर में रहते हुए मैंने कभी सरनेम का इस्‍तेमाल नहीं किया। हरिवंश जी ने भी कभी नहीं पूछा। यहां तक कि प्रभात ख़बर में काम करते हुए मेरा शैक्षणिक प्रमाणपत्र भी उन्‍होंने तलब नहीं किया। उन्‍होंने मुझ पर भरोसा किया और संपादक बनाया।

एक संपादक के तौर पर जो सम्‍मान मिलना चाहिए, हरिवंश जी ने हमेशा मुझे दिया। कभी मेरे काम में दखलअंदाज़ी नहीं की। कभी कोई आदेश देना हुआ, तो अंदाज़ ये कभी नहीं रहा कि ऐसा करो, वैसा करो। हमेशा कहते रहे कि मैं समझता हूं कि ऐसा करना चाहिए – वैसे तुम मुझसे बेहतर सोच सकते हो। कभी कोई निजी काम नहीं। कभी अख़बार की मातृकंपनी “उषा मार्टिन” के किसी काम की पैरवी नहीं की, जबकि हमारे संस्‍करण के दायरे में आने वाले ज़ि‍ले में इस कंपनी के कई काम चलते रहे हैं।

और आप एक संपादक से क्‍या अपेक्षा रखते हैं? विशुद्धतावाद और पवित्रतावाद एक सामंती अवधारणा है और तथागत इसी के शिकार हैं। प्रभात खबर के 25 साल होने पर एक उत्‍सव हुआ और उसमें उन्‍होंने राजनीतिज्ञों को बुलाया। इसकी वजह मैं जानता हूं, क्‍या हो सकती है। हरिवंश जी जानते हैं कि तमाम आलोचनाओं के बावजूद यही राजनेता हैं, जो झारखंड की तक़दीर का फ़ैसला कर सकते हैं। राज्‍य को बनाने के लिए प्रभात खबर के उठाये तमाम सवालों का जवाब इन्‍हीं राजनेताओं को देना है, इसलिए हरिवंश जी ने उन्‍हें आमंत्रित किया। आलोचना के बाद मुंह चुराने वाले लोग कभी सच्‍चे अर्थों में समाज का निर्माण नहीं कर सकते। हरिवंश जी आलोचना भी करते हैं और विपक्ष का सामना और सम्‍मान भी करते हैं।

कुछ ग़ैररचनात्‍मक लोगों को तरजीह देने की वजह से मैं भी हरिवंश जी से नाराज़ रहता हूं और अपनी नाराज़गी ज़ाहिर करता रहता हूं। कई बार मैंने अपनी नाराज़गी सार्वजनिक भी की है। लेकिन रचनात्‍मकता को व्‍यापक जगह देने से ज़्यादा ज़रूरी हरिवंश जी को एक ऐसे संस्‍थान को चलाना लगता है, जिससे करीब एक हज़ार लोगों का भविष्‍य जुड़ा है। इसलिए वे अपनी तरह से लोगों का चयन करते हैं और उन्‍हें मौक़ा देते हैं, जो अख़बार को चला सकें। चाहे वे प्रबंधन के लोग हों, या संपादकीय के।

बहरहाल, मैं एक घटना से अपनी बात का अंत करना चाहता हूं। उन दिनों प्रभात ख़बर के ही एक काम के सिलसिले में मैं दिल्‍ली में रहता था। हरिवंश जी ने सूचना दी, मैं दिल्‍ली आ रहा हूं। अपना पता बताओ, मैं आ जाऊंगा। मैंने कहा कि नहीं मैं स्‍टेशन आ जाऊंगा। उन्‍होंने बहुत मना किया, लेकिन मैं स्‍टेशन पहुंच गया। वे राजधानी से नहीं आये थे। पुरुषोत्तम एक्‍सप्रेस से आये थे। बोगी से उतरे, तो उनके पास एक बड़ा रॉलिंग ब्रीफकेस था। मैंने लपक कर ब्रीफकेस पकड़ना चाहा। उन्‍होंने सख्‍ती से मना कर दिया। कहा कि जब तक अपना भार खुद उठा सकता हूं, उठाने दो। खुद ही ब्रीफकेस उठा कर मेरे साथ स्‍टेशन से बाहर आये। खुद ही ऑटो ठीक किया। उससे किराये के बारे में बात की और पहले मुझे बैठने को कहा। फिर खुद बैठे और हम सब घर पहुंचे।

यह सन 2002 की बात है।

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12 Responses to जो हरिवंश जी को नहीं जानते, उनके लिए

  1. amit tyagi Reply

    August 25, 2009 at 7:59 pm

    bahut sahi. sabse badi baaat yah hai ki aaz aap times of india, HT aur dainik jagran, bhaskar ke baaare mein kuchh nahin likh chhap sakte. bacha ek jansatta aur prabhat khabar. yah sach hai harivanshjee ne bahut maaal banaya, lekin phir bhee patrakarita ke daman ko saaaf raha, varna yahan to aankh band aur dibba gol wali halat hai.
    delhi ke ek bade akhbaar mein gopalganj ke ek loksabha pratyashi ke baaare mein chhapne ki koi wazah hai, chande ke siwa. yahan bata dein ki wah akhbar economic news deta hai aur english mein hai, jiska gopalganj mein shayad koi reader ho.

  2. Mrityunjay Prabhakar Reply

    August 25, 2009 at 8:58 pm

    Avinash Bhai,

    Aapke bolne aur likhne ka andaz aisa hai ki usme koi bhi aasani se phansh sakta hai..par bhasha agar sirf tarkon ko pichhe chhodne ke liye istemal ki jaye to chahe jitni bhi achhi ho ek jagah jakar phansh jati hai..
    aapne bachab ki jo mudra aajkal akhtiyar kar rakhi hai..
    khaskar Harivansh Jee ke sandarbh men..
    uska asaya bhale hi kuch ho par imandar to katai nahi hai..

    Harivansh ke bachav men sanjay yadav ki imandari ke charche..
    jaise ek adne sanjay unke sare paap dho denge..
    jis rapat se yah baat samne ayi hai woh
    Pramod Pranjan ki hai..
    us kitab men sirf prabhat khabar hi nahi
    patna se nikalne wale dusre akhbaron ki bhi kalai kholi gayi hai (sandarbh jatiya appointment)..
    dusre yah ki Harivansh par baat isliye jyada ho rahi hai kyunki wo apna waisa hi chehra logon ke samne present karte hai..
    isliye aap hi shabdon men..
    umid bhi unhi se hai(aapko)
    hamen to kabhi nahi raha..
    kyunki hazar-paanch sau rupaye men kam karte-marte dekha hai logon ko
    aap shayad bhul gaye apne purane din
    to shoshan ki yah parakashta..
    media men unhi ki den hai..

    jativad to khair..
    admi sab kuch ho jata hai..
    par mool uski jati hi hai..
    hazaron pragatisheel logon ka labada dekh chuka hun..

    aur purushotam exp se ane ki sadagi..
    is par kaun na mar jaye aie khuda..
    puroshotam ranchi se anewali sabse achhi train hai avinash bhai..
    abhi bhi jabki aap 2002 ki baat kar rahe hain
    us waqt to jyada options bhi na rahe honge..

    aur sabse badi baat to yah ki
    apke in tarkon se unki jatiya niyukti ka koi sawal hal nahi hota.
    behtar hai ki inhen bachane ki jagah sochne aur badlnen ko majboor karen.

  3. Ram Kumar Reply

    August 26, 2009 at 11:42 am

    अविनाश जी,
    हर व्यक्ति के दोस्त और दुश्मन होते हैं। वह चाहे आप हों, मैं या हरिवंश जी हों। तथागत जी के विचारों में कुछ पूर्वाग्रह जरूर हैं, लेकिन उन्होंने जो मुद्दे उठाए हैं वह सही है या नहीं? बात मुद्दों पर होनी चाहिए। भारतीय समाज की जो संरचना है, उसे सभी अच्छी तरह से जानते हैं। मीडिया में जो लोग हैं वे भी इसी सामालिक संरचना के हिस्से हैं। कई सर्वेक्षणों और अध्ययनों से भी यह बात स्पष्ट हो चुकी है कि मीडिया में दलित-पिछड़ों, व अल्पसंख्यकों की मौजुदगी नहीं के बराबर है। आदिवासी तो नहीं ही हैं। आप प्रभात खबर में रहे हैं। ज्यादा बेहतर ढंग से बता सकते हैं कि प्रभात खबर के सभी संस्करणों में या फिर रांची एक्सपे्रस, आज, हिन्दुस्तान और जागरण में कितने आदिवासी हैं। नहीं हैं तो क्यों नहीं हैं?
    मैं आपसे नहीं जानना चाहता हूं कि हरिवंश जी का प्रभात खबर में कितनी सैलरी है, कितना शेयर है। यह भी नहीं पूछूंगा कि वे जिंदगी में कितनी बार पुरूषोत्तम से या फिर हवाई जहाज से आये गये। कितनी विदेश यात्राएं की। यह भी मत बताइए कि रांची में उनके दो-तीन कमरों के फलैट की कीमत क्या है। यह भी मत बताइए कि उषा मार्टिन की बिजली बिल के बकाये (यह सिर्फ एक उदाहरण है। फेहरिस्त लंबी है) को नहीं चुकाने और माइंस लेने के लिए प्रभात खबर डील करवाने में क्या भूमिका निभायी। और क्या यह सब कुछ बिना हरिवंश जी की जानकारी या सहमति के हुई?
    निःसंदेह वे एक बेहतर प्रबंधक-संपादक हैं, लेकिन मनुष्य हैं। देवता नहीं। उनमें खूबियां भी हैं और कमजोरियां भी। मैं मानता हूं कि तथागत का सवाल मनुष्य हरिवंश से है, देवता हरिवंश से नहीं। तथागत की बातों से उनका व्यक्तिगत पूर्वाग्रह निकाल दें और उनके सवालों पर विचार करें, तभी हम उस गंभीर सवाल से जूझ सकेंगे। जिससे पूरा दमित-उत्पीड़ित भारत जूझ रहा है।

    • मॉडरेटर Reply

      August 28, 2009 at 2:31 pm

      तथागत ने अपने संस्मरण में भी राम कुमार जी का जिक्र किया है। वो और उपरोक्त टिप्पणी करने वाले राम कुमार… दोनों अलग-अलग व्यक्ति हैं। इसलिए दोनों को एक नहीं समझा जाए।

  4. अरविंद शेष Reply

    August 26, 2009 at 12:43 pm

    tathagat ke tathyon ke baraks… “NAITIK ABHA”!

  5. विद्रोही Reply

    August 26, 2009 at 2:13 pm

    अविनाश जी ने तस्वीर का दूसरा रुख पेश किया है। ये भी ज़रूरी है।

  6. virendra jain Reply

    August 26, 2009 at 4:10 pm

    मुझे भी हरिवंशजी का एक वाकया याद है जब वे बैंक ऑफ़ इंडिया में हिंदी अधिकारी थे तब बैंक ने उन्हें सेकंड क्लास में चलने पर एक्स्प्लैनेशन काल किया था क्योंकि उनका अधिकार उच्च श्रेणी का था किन्तु हरिवंशजी ने उसके खिलाफ बाकायदा लंबा पत्र व्यवहार किया था की जब सेकंड क्लास में जगह मिल रही है तो उसमें ही यात्रा करना चाहिए

  7. aam admi Reply

    August 26, 2009 at 4:32 pm

    अविनाश जी,

    हरिवंश जी पर सवाल उठाने वाले तथागत और हरिवंश जी का बचाव करने वाले अविनाश को आमने-सामने रखकर देखिये. दोनों में से बेहतर कौन है, आप अच्छी तरह जानते हैं. तथागत के तीखे सवालों से विचलित किसी और को नहीं बल्कि हरिवंश जी को होना चाहिए. सही और असली सवालों से मुंह चुराकर और चुप्पी साधकर हरिवंश जी ठीक वही काम कर रहे हैं, जो अपने इंटरव्यू वाले मसले पर प्रभाष जोशी कर रहे हैं. असली सवालों से कन्नी काटना और सवाल करने वाले को ‘साधने’ की जुगत भिडाना ब्राह्मणवाद की पुरानी फितरत है.

  8. ak Reply

    August 26, 2009 at 8:05 pm

    avinash wahi hai jisne hans patrika me harivansh ji ki khub alochana ki thi. achank gulati kaise mar liye bhai. khair wampanthi ki yehi to ponga panthi hai.

  9. amit kumar Reply

    August 26, 2009 at 8:47 pm

    kisi se pata kar lijiyega, Avinash ji…apke Guru ji ka Flight ka cancellation charge bhi lakhon men jata hai.

  10. Neha Reply

    August 27, 2009 at 7:43 pm

    Tthagat ji aapke laungage se lagta hai ki aap harivansh banne ki kosish to kiye par aap hari bahi bhi nahi ban paye, ishe liye sayad aap ki bato maie ek dar aur jalan ka gandh aa raha hai.
    Maie kafi kam samay Prabhat Khabar maie noukri ki, isliye Harivansh ji ko jitna bhi jan saki aur unse jo kuch bhi sikha, ushi ka aasar hai ki aaj maie ek safal patrkar ban pai huon.
    Har admi maie kuch kamiya hoti hai par iska matlab yeh nahi hota ki wo admi nayak nahi ban sakta.
    Harivansh ji apne karyachetra maie puri tarah safal hai tabhi to aap unke bahane apna nam banne ki koshis kar rahe hai.
    Mari bat aapko galat lage to mafi cahti huon par nakaratmak patrakarita kishi ko bhi age nahi le jati.

  11. sanju Reply

    August 28, 2009 at 2:18 am

    Do take ke log Aut 10-10 rupye me biknewale log PRABHAT KHABAR Ke Bare Me Anargal Bat Kar Rahe Hai. Hai Yogyata to Harivansh Bankar Dikhaye. Ab Jis akhbar se ummid hai, usi par arop lagate hai. Aap sabhi log harinarayan singh ki sampati ki janch ki mang kyo nahi karte. karoro ke malik hai wah. harivansh ji ne to apni sampati ki ghosna pahle hi kar di hai.

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