पहले जसवंत सिंह और अब अरुण शौरी। इन दोनों ने न्यूज़ चैनलों को बैठे बिठाए बहुत बड़ा मुद्दा दे दिया है। सबकी चिंता है कि बीजेपी किस दिशा में जा रही है। चिंता इस बात की भी है कि जसवंत सिंह की विदाई तो हो गई अब अरुण शौरी का क्या होगा? इन सबके बीच आरएसएस आखिर कर क्या रहा है? इन सवालों की पड़ताल न्यूज़ चैनलों में कैसे हो रही है उसके दो नमूने पढ़िए। इनमें किसी का नाम नहीं लिखा गया है क्योंकि यहां नाम महत्वपूर्ण नहीं हैं। साथ ही यह भी स्पष्ट कर देना सही होगा कि यहां पर सिर्फ भाव दर्ज हैं। शब्दश: लिखना मुमकिन नहीं हो सका।
पहला सीन – एक बड़े चैनल का स्टूडियो। मशहूर एंकर और टीवी के दिग्गज पत्रकार के बीच बीजेपी के मौजूदा हालात पर बातचीत हो रही है।
सवाल – अरुण शौरी ने बीजेपी नेताओं पर जो आरोप लगाए हैं वो बहुत संगीन हैं। आप बताएं कि इसके बाद बीजेपी में क्या होगा? अरुण शौरी का क्या होगा?
जवाब – देखिए अरुण शौरी ने जो कुछ भी कहा है उसके बाद अरुण शौरी का हाल जो होना है वो तो होगा ही (यही तो सवाल है.. बताओ न अरुण शौरी का हाल क्या होगा)। देखने लायक बात होगी कि बीजेपी का हाल क्या होता है (फिर एंकर का सवाल दोहरा दिया)? पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह का हाल क्या होता है (ज्ञान में इजाफा किया, एक नाम और जोड़ दिया)? लालकृष्ण आडवाणी का हाल क्या होता है (यहां तक तो किसी की नज़र ही नहीं पहुंची थी, चलिए अब पता चल गया)? ये देखने लायक बात होगी क्योंकि बीजेपी में इन दिनों अनुशासनहीनता चरम पर है। कोई किसी की नहीं सुन रहा। सब अपना अपना राग अलाप रहे हैं (बूझो तो जाने)।
सवाल – आप इस पर भी ज़रा रोशनी डालिए कि आरएसएस क्या करेगा?
जवाब – आप जानते हैं कि संघ वो संगठन है कि जिसके इशारे के बगैर बीजेपी में पत्ता भी नहीं खड़खड़ाता है (अभी तो पूरी की पूरी पार्टी खड़खड़ा रही है… अब संघ ने सबको तो खड़खड़ाने के लिए नहीं कहा होगा)। कहीं न कहीं उस आरएसएस की भूमिका तो महत्वपूर्ण होगी ही। देखना होगा कि अब आरएसएस बीजेपी को कैसे संभालता है। बीजेपी का क्या होगा? राजनाथ का क्या होगा? आडवाणी का क्या होगा (सवाल दो, जवाब एक)? मैं आपको बता दूं (अभी तक क्या कर रहे थे) कि ये देखने लायक कदम होगा (नहीं बताते तो लोग कहां देख पाते। अब आपने बता दिया है और हम ध्यान देंगे तो शायद दिख भी जाए)।
एंकर – आप मेरे साथ बने रहिए। अभी ब्रेक का वक़्त है। बाकी चर्चा ब्रेक के बाद होगी।
चैनल बदलता है और अब दूसरा सीन। वहां पर एक और महान परिचर्चा चल रही है। फिलॉसफर किस्म के एंकर सवाल पर सवाल दाग रहे हैं। दस गज लंबा सवाल और दो गज लंबा जवाब। जवाब दो से ढाई गज लंबा नहीं हो सकता क्योंकि एंकर महोदय, हाथ मलते हुए, बीच में ही जीजी.. जीजी… की रट लगा देते हैं।
एंकर – बीजेपी की लुटिया डूब रही है और हम अपने रिपोर्टर से इस बारे में बहुत कुछ जानना चाहेंगे, जो उस जगह मौजूद थे, जहां अरुण शौरी ने बीजेपी नेताओं पर गंभीर आरोप लगाए। हां तो आप बताएं कि अब बीजेपी में क्या नजारा होगा? पार्टी क्या करेगी? आरएसएस क्या करेगी (करेगा नहीं)? अरुण शौरी क्या करेंगे? (सवाल और भूमिका में पचास सेकेंड लग गए)
जवाब – देखिए … जी बीजेपी की स्थिति खराब है। अरुण शौरी ने जो कहा है उसके बाद से पार्टी में हाहाकार मच गया है। बीजेपी अब अरुण शौरी का क्या करेगी देखना होगा.. (एंकर – जीजी… जीजी – ये इशारा है कि रिपोर्ट जुबां बंद कर दे और रिपोर्टर बोलना बंद कर देता है।)
एंकर – आप बताएं कि अरुण शौरी एक नेता की तरह बोल रहे थे या फिर एक संपादक की तरह। कहीं ऐसा तो नहीं कि उनके भीतर का संपादक जाग गया था (हम अपने पाठकों को बता दें कि अरुण शौरी पेशे से पत्रकार भी रह चुके हैं।)
रिपोर्टर – अब कोई संपादक बोल रहा था या फिर कोई रिपोर्टर यह कहना तो मुश्किल है। लेकिन अरुण शौरी ने जो कुछ कहा है कि उससे बीजेपी में हड़कंप मच गया है। (वगैरह .. वगैरह)
एंकर – हमारे साथ गोविंदाचार्य हैं। एक समय था जब गोविंदाचार्य बीजेपी के बड़े नेता थे। अब भी पार्टी की गतिविधियों पर नज़र रखते हैं। हां तो गोविंद जी क्या कहेंगे आप? बीजेपी में क्या हो रहा है? कहीं ऐसा तो नहीं कि सत्ता ने ही पार्टी को जोड़ कर रखा था? अब सत्ता नहीं है तो सिरफुटौवल मची है।
गोविंदाचार्य – नहीं ऐसा नहीं है। ऐसा होता तो मध्य प्रदेश में तीन-तीन बार मुख्यमंत्री क्यों बदले जाते। वहां तो सत्ता थी। उत्तराखंड में भी सत्ता थी फिर खंडूड़ी को क्यों हटाया गया। सच तो यही है कि बीजेपी का चाल चरित्र और चेहरा बदल गया है। व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाएं, निजी स्वार्थ पार्टी से बड़े हो गए हैं।
एंकर – आपने जो कहा वो तो ठीक है लेकिन बीजेपी सत्ता के बिना तड़प रही है (पहले से ही मान बैठे हैं। पंचों का हुकुम सिर माथे पर मगर खूंटा तो वहीं गड़ेगा)। सत्ता नहीं है तो बीजेपी का असली चेहरा सामने आने लगा है। बड़े बड़े नेता हैं उनके खिलाफ बिगुल बज रहा है। (लेक्चर के बाद अब सवाल) आप बताए कि क्या अब बीजेपी में सिर्फ मुखौटे बचे हैं (संदर्भ – किसी जमाने में गोविंदाचार्य ने अटल बिहारी वाजपेयी को बीजेपी का मुखौटा बताया था)?
गोविंदाचार्य – (हंसते हुए) … पता नहीं मैंने तो कभी मुखौटा नहीं कहा। लेकिन जब भी कोई मुझसे बीजेपी के बारे में बात करता है तो वही मुखौटा लेकर ख़ड़ा हो जाता है (मतलब – कभी तो मुखौटा हटा कर सवाल पूछ लिया करो)।
इन दिनों न्यूज़ चैनलों पर ऐसे ढेरों सवाल जवाब सुनने और देखने को मिलेंगे, जिन पर आप हंस सकते हैं, मुस्कुरा सकते हैं, लेकिन तमाम कोशिश के बाद भी कुछ समझ नहीं सकते। कहीं आत्ममुग्ध एंकर पूरे शो का तमाशा बना कर रख देते हैं। वो रिपोर्टरों को बोलने नहीं देते। सामने कोई भी मेहमान क्यों न हो… उनकी दिलचस्पी उसके जवाब में कम अपने सवालों में ज़्यादा होती है। दूसरा सीन उसी का उदाहरण है। तो पहले सीन में एक महान रिपोर्टर ने ऐसे शानदार जवाब दिए कि क्या कहने।
ये कार्टून चुनाव के दौरान द हिंदू में छपा था।
Nishant
August 25, 2009 at 4:49 pm
अक्सर टीवी पत्रकारों की आलोचना की जाती है कि वो कचरा परोसते हैं.एंकर और रिपोर्टर की तुकबंदी पर तो प्रसून जी भी लिख चुके हैं,जो खुद एक एंकर हैं।लेकिन जब भी इस तरह की आलोचना पढ़िए तो महसूस होता है कि कार्यक्रम को इतने तनमयता से देखा गया है कि लेख में कई जगह अतिश्योक्ति अलंकार का प्रयोग कर दिया गया है।सच पुछिए तो टीवी पत्रकारों के पास जुगाली पत्रकारिता करने का वक्त भी नहीं होता बिना तथ्य या साक्ष्य के बिना किसी खबर को छाप(माफ कीजिएगा ये शब्द लेखनी पत्रकार प्रयोग करते हैं)नहीं सकते और नाहि अगले दिन आपके पास किसी कोने में ये छापने के लिए जगह होती है कि फलाने दिन जो आपने खबर पढ़ी उसको इस तरह से पढिए।दरअसल लोग इस टीवी को लेखनी पत्रकारिता से जोड़कर क्यों देखते हैं।उसके एंकर को कम्यूनिकेटर तक ही क्यों नहीं समझा जाता।बहस का मुद्दा है फिर कभी