अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा को नस्ली बताने वाले ग्लेन बेक के टेलीविजन शो से विज्ञापन कंपनियां किनारा कर रही हैं। जुलाई में न्यूज़ चैनल फॉक्स पर एक शो के दौरान ग्लेन बेक ने अमेरिका के पहले ब्लैक राष्ट्रपति बराक ओबामा को नस्ली करार दिया था। ग्लेन बेक ने कहा था – “ये शख़्स (ओबामा), मेरे हिसाब से नस्ली है”। ग्लेन ने यह भी कहा था कि ओबामा के दिल में “कहीं गहरे गोरे लोगों को प्रति नफ़रत भरी हुई है”।
ग्लेन ने फॉक्स पर एक शो के दौरान अपनी राय दी। उसके बाद मीडिया में काफी हंगामा मचा। फॉक्स ने अपनी सफाई दी। कहा कि उस शो में ग्लेन चैनल के प्रतिनिधि के तौर पर नहीं बल्कि एक जानकार के दौर पर आए थे और वो उनकी निजी राय है। इससे चैनल का कोई लेना-देना नहीं है।
फॉक्स की इस सफाई से ओबामा समर्थकों का गुस्सा शांत नहीं हुआ। उन्होंने एक वेबसाइट के जरिए ग्लेन बेक के ख़िलाफ़ मुहिम छेड़ दी। कलरऑफचेंज डॉट ओआरजी ने ग्लेन बेक के शो को विज्ञापन देने वाली कंपनियों पर भी दबाव बढ़ाया। अब उसका असर दिखने लगा है। ख़बरों के मुताबिक बेक के शो से करीब 36 विज्ञापन कंपनियां जुड़ना नहीं चाहती हैं। फॉक्स ने भी कबूल किया है कि कुछ कंपनियां किनारा कर रही हैं। मगर उसका यह भी दावा है कि ज़्यादातर अब भी उसके साथ हैं।
कलरऑफचेंज डॉट ओआरजी का कहना है कि फॉक्स जैसे चैनलों पर दक्षिणपंथियों का कब्जा है और ग्लेन बेक जैसे लोग नस्लभेद पर चल रही बहस का स्तर और नीचे गिरा रहे हैं। कलरऑफचेंज डॉट ओआरजी के कार्यकारी निदेशक जैम्स रकर ने एएफपी को बताया कि “बेक लगातार ये संदेश देने की कोशिश करते हैं कि ओबामा देश को बर्बाद कर देंगे। इससे लोगों में डर बढ़ रहा है।”
उधर ग्लेन बेक के समर्थकों ने भी अब ऑनलाइन वार छेड़ दिया है। बेक समर्थक उन कंपनियों के उत्पादों का बहिष्कार करने की मांग कर रहे हैं जिन्होंने बेक के शो से अपना नाता तोड़ लिया है। मतलब दोनों तरफ से हमले हो रहे हैं।
रंगनाथ सिंह
August 26, 2009 at 5:00 am
ab heading me bhi ji laga arega kya ??
mai to soch rahaa tha ki dhire dhire hum hindi bhasa ko samanti dhanche se azad karayenge !!
रंगनाथ सिंह
August 26, 2009 at 5:45 am
heading- आप सभी का इस जी-जा-जी पोर्टल पर स्वागत है।
क्यों न कुछ हिन्दी न्यूज पोर्टल पर एक तख्ती लगवा दी जाए कि आप सभी का इस जी-जा-जी पोर्टल पर स्वागत है।
मुझे बिल्कुल नहीं पता कि अन्य देशों में ब्लागर या न्यूज पोर्टल के संचालक वहाँ के वरिष्ठ पत्रकारों के ऊपर कोई खबर लगाते हुए उनके नाम के आगे जी टाइप का कोई विशेषण लगाते हैं या नहीं। इस तरह की हेडिंग देखकर लगता है कि हिन्दी अखबारों का भीतरी कल्चर सामंती ही है। बाहर से देखने में भले ही यह लोकतांत्रिक लगता हो लेकिन हिन्दी के युवा लेकिन अनुभवी पत्रकारों के लेखों की हेडिंग देखकर लगता है कि ये पत्रकार इन तथाकथित वरिष्ठों की सामंती धौंस की छाया से निकल नहीं पा रहे हैं। यदि यह सम्मानवश किया जाता है तो फिर यह सम्मान सिर्फ पत्रकार बिरादरी को क्यों नसीब है ?
व्यावहारिक जीवन में वरिष्ठता का सम्मान करने का मैं भी कायल हूँ लेकिन खबरों की हेडिंग में सम्मान का शिरा चूता रहे तो भला नहीं लगता। हमारे मन में किसी के प्रति सम्मान है तो इसे हेडिंग दर हेडिंग टपकाने की जरूरत नहीं है। अगर पत्रकारिता में नए पुराने सब बराबर हैं तो भी और नहीं बराबर हंै तो भी।
गर यही हाल रहा तो जी-जी दुनिया में खबरों की हेडिंग में सर्वाधिक प्रयुक्त किया जाने वाला शब्द बन जाएगा। हिन्दी के न्यूज पोर्टल माडरेटर बंधुओं की यही इच्छा है तो इसे स्पष्ट करें। अन्य लोग इस कीर्तिमान निर्माण में खुल कर मदद करना चाहेंगे। मेरी व्यक्तिगत राय है कि इस चलन के मूल में भाषा के भीतर मौजूद सांमती अवशेष जिम्मेदार हंै। हिन्दी भाषा का विकास चाहने वालों को भाषा के भीतर मौजूद सामंती ढांचे को धक्का देना होगा। जिससे एक लोेकतांत्रिक हिन्दी का निर्माण हो सके। शेष, जो जनमत चाहे वही सही।
विद्रोही
August 26, 2009 at 2:23 pm
ये ‘जोशी जी’ वाली हेडिंग मुझे तो व्यंग्यात्मक लग रही है। इसमें कोई श्रद्धाभाव तो नहीं दिखता।
एकलव्य
August 26, 2009 at 11:37 am
बिलकुल सही। मैं इसमे इतना जोड़ना चाहूंगा कि यह ‘जी’ राजेंद्र यादव, उदयप्रकाश, मायावती या लालू यादव के साथ उतनी मात्रा में नहीं दिखता या न के बराबर दिखता है। और एक तरफ भौतिकतावादी अमेरिका है जहां विज्ञापन वाले भी नस्लवादी गोरों के शो से किनारा कर रहे हैं। दूसरी तरफ अध्यात्मवादी जगदगुरु भारत है जहां एक ‘जी’ संपादक के खिलाफ कोई खुलकर बोल तक नहीं रहा।
शंबूक
August 26, 2009 at 3:32 pm
सम्मान दे रहे तो साबित करो, ये है “जी” वाद का राज़
हम जोशी को जी क्यों लिखते हैं? आप लाख सम्मान देना चाहकर कर भी एमजे अकबर को अकबर जी, शेखर गुप्ता को गुप्ता जी, अरुण पुरी को पुरी जी,या दिलीप पडगांवकर को पडगांवकर जी या नैनन को नैनन जी नहीं कहते और न ही लिखते हैं। आप इनके मुंह पर भी और पीछे भी इन्हें अकबर, शेखर, अरुण, दिलीप, या नैनेन कहते हैं और ये कितना स्वाभाविक लगता है। ये सारे वो लोग हैं जो सर, ओनरेबल या जी कहलाना नापसंद करते हैं। टीनएजर ट्रेनी भी उन्हें नाम से ही पुकारता है। दिवंगत सुरेंद्र प्रताप सिंह को भी सभी एसपी ही कहते थे। उदय शंकर भी सिर्फ उदय है। दिबांग भी दिबांग ही हैं। लेकिन कुछ लोग बिना किसी वजह से जी बन बैठे हैं। दरअसल प्रभाष जोशी ने कभी ये नहीं कहा कि मुझे जी मत कहिए। मेरे चरण स्पर्श मत कीजिए। कहने वाले तो ये भी कहते हैं कि चरण स्पर्श किए बगैर जनसत्ता में प्रमोशन नहीं मिल सकता था।
दरअसल प्रभाष जी या जोशी जी लिखने में किसी का दोष नहीं है। ये हमारी आदत में है। इसे कुछ लोग हिंदी के खून में चापलूसी है ऐसा कहते हैं। हिंदी के सामंती संस्कार अभी छंटे नहीं है। प्रभाष जोशी को सिर्फ प्रभाष लिखने में अभी समय लगेगा। ये हिंदी का दुर्भाग्य है।
शशि सिंह
August 26, 2009 at 7:18 pm
जहां तक सवाल इस लेख के शीर्षक का है इसमें प्रयुक्त “जी” मुझे व्यंगात्मक ही लग रहा है।
रही बात “जी” के आम प्रयोग की तो मेरा मानना है कि किसी के प्रति आदर, अनादर या निर्विकार भाव हमारी व्यक्तिगत पसंद हो सकती है। जिसका प्रदर्शन हम व्यक्तिगत मुलाकातों या पारिवारिक समारोहों में कर सकते हैं लेकिन अखबार, रेडियो, टीवी या समाचार-विचार वाली वेबसाइट आदि सार्वजनिक जगहों पर पाठक, दर्शक या श्रोताओं पर व्यक्तिगत पसंद थोपना बिलकुल ठीक नहीं है।