दिल्ली में हिंदी पत्रकारिता के दो बड़े संस्थान। इंच टेप से नापें तो दोनों के बीच की दूरी ढाई सौ मीटर से ज्यादा न होगी। लेकिन दोनों के माहौल में जमीन-आसमान का अंतर था। ये बात लगभग 20 साल पुरानी है। पहले संस्थान में थी सिर्फ एक लड़की। डेस्क पर काम करती थी। और दूसरे संस्थान में लगभग एक दर्जन। हंसती-बतियाती और अखबार निकालती। जी नहीं, वो सिर्फ महिलाओं के पन्ने नहीं निकाल रही थीं। वो शिफ्ट संभाल रही थीं। हार्ड न्यूज से निबट रही थी। अखबार का पहला पन्ना निकाल रही थीं। इस संस्थान में कई बार महिला इंचार्ज के अंडर में कई पुरुष काम करते होते।
अब इन संस्थानों के नाम बताने की बारी है। सही अनुमान है आपका। पहला संस्थान तो निस्संदेह जनसत्ता था, जहां लड़कियों को काम मिलना लगभग असंभव था। दूसरी ओर नवभारत टाइम्स में हर संपादकीय विभाग, डेस्क, रिपोर्टिंग, फीचर और संपादकीय पेज पर लड़किया/महिलाएं थीं। और चूंकि एक महिला की मौजूदगी भर से न्यूज फ्लोर का माहौल बदल सकता है तो जहां इतनी महिलाएं हों वहां के माहौल में शिष्टाचार और सौम्यता अपने आप आ जाती है। नवभारत टाइम्स के डेस्क पर मां-बहन की गाली नहीं दी जा सकती थी। लोग तमीज से बात करते और कभी कभार तमीज से ही झगड़ा करते और निबटाते।
अब जान लेते हैं किनके नेतृत्व में ये संस्थान चल रहे थे। पहले संस्थान का नेतृत्व पंडित प्रभाष जोशी कर रहे थे, जबकि दूसरे संस्थान का नेतृत्व राजेंद्र माथुर और सुरेंद्र प्रताप सिंह संभाल रहे थे। नवभारत टाइम्स में शायद पहली बार किसी हिंदी अखबार में रात की शिफ्ट भी एक लड़की के नेतृत्व में चली और पूरा अखबार महीनों तक उन्होंने निकाला। ये भरोसा करने की बात है।
पहले अखबार ने सती प्रथा का समर्थन किया दूसरे ने जमकर विरोध किया। पहले अखबार ने शुरुआती दौर में हिंदुत्व के उभार को हवा दी और दूसरे ने धर्मनिरपेक्षता की कमान संभाली। पहले अखबार ने आरक्षण आंदोलन का खुलकर सवर्ण कार्यकर्ता की तरह समर्थन किया, दूसरे अखबार ने संतुलित खबरें दीं। पहला अखबार असफल रहा, दूसरा अखबार कामयाब बना।
लेकिन पहले अखबार का संपादक पत्रकारिता का महानायक बन गया, जबकि दूसरे अखबार के दोनों संपादकों के नाम धीरे-धीरे गुम होते जा रहे हैं। कितनी अजीब बात है! या ये बेहद स्वाभाविक बात है!!
aam admi
August 26, 2009 at 5:36 pm
धारण क्षमता, हजारों साल की ट्रेनिंग और पारंपरिक कौशल की दुहाई देने वाले किसी इंसान के जेहन में महिलाओं पर भरोसा करने की बात भी आ सकती है, यह सोचकर मुझे हंसी आती है. भरोसा सिर्फ वही आदमी कर सकता है जिसमे सहभागिता का सच्चा जज्बा हो. इस बात का अनुमान लगाना बहुत मुश्किल नहीं कि ‘ धारण’ की धारणा से ओब्सेस्ड व्यक्ति में दलित, पिछडों और महिलाओं के प्रति सहकार और सम्मान की भावना कितनी होगी.
Ganesh Prasad Jha
August 26, 2009 at 7:17 pm
माननीय चार्वाक जी सत्य, आपको शायद पता नहीं है कि जनसत्ता में भी लड़कियां काम करती थीं. एक-दो नहीं, चार-चार लड़कियां. उनके नाम गिनना चाहें तो गिन लें- रजनी नागपाल, पारुल शर्मा, नीलम गुप्ता और उषा पाहवा. दूसरी बात यह कि हमारे यहां न्यूज रुम में लड़कियां कम थीं या नहीं थीं तो भी हम आपस में कभी गाली-गलौच में बातचीत नहीं करते थे. जनसत्ता कोई सरकारी दफ्तर नहीं था और है जहां कर्मचारियों-पत्रकारों की भर्ती के लिए जाति, धर्म और लिंग के आधार पर कोई कोटा निर्धारित हो. नियुक्ति के लिए जितनी अर्जियां आईं उनमें ढंग के लोगों को देख-परख कर रख लिया गया. हो सकता है आपने भी कभी जनसत्ता में नौकरी के लिए अर्जी दी हो पर काबिलियत न होने की वजह से चयन न हुआ हो और इसीलिए आप अब यहां अपनी भड़ास निकाल रहे हैं. आपको जनसत्ता, प्रभाष जोशी और दूसरे जनसत्ताईयों को गाली देना हो तो जितना मर्जी आए दे लें. कोई जनसत्ताई मना नहीं करेगा. हां, एसा करके आप अपनी छवि जरूर बिगाड़ रहे हैं.
कबीर
August 26, 2009 at 11:53 pm
गणेश प्रसाद झा जी,
जनसत्ता में चार-चार लड़कियां. भई कमाल हो गया. लेकिन आप यह भी बता देते कि क्या ये चारों प्रभाष जोशी की कोर टीम का हिस्सा थीं या नहीं तो और अच्छा होता. वरना तब से अब तक कोई लड़कियों की संख्या गिनाने बैठे तो हो सकता है एक दर्जन का आंकड़ा पार हो जाए.
आपने कहा कि जनसत्ता सरकारी दफ़्तर न था न है. यहां किसी ने ऐसा कहा है क्या? यहां तो बात हो रही है कि प्रभाष जोशी एक घोर कट्टरपंथी और जातिवादी किस्म के प्राणी हैं. उनकी नज़रों में पिछड़ों, दलितों, आदिवासियों, मुसलमानों और महिलाओं के लिए कोई सम्मान नहीं है. रविवार को दिए इंटरव्यू में भी उन्होंने अपने इसी चरित्र को जाहिर किया. इसलिए उनकी निंदा की जा रही है और उन्हीं के बहाने मीडिया के जातिवादी चेहरे पर बात हो रही है.
वैसे प्रभाष जोशी के कई चेलों को जानता हूं. बाभन, भूमिहार, राजपूत और लाला… चेलों को. कुछ अपवादों को छोड़ कर सब अपने गुरू की तरह ही घोर जातिवादी हैं. अपनी-अपनी जाति का कल्याण करने में जुटे हैं. आप भी इस मुद्दे पर ज़रा खुल कर लिखिए ताकि पता चल सके कि आपकी कलम का झुकाव किस ओर है. कहीं ज़्यादातार जनसत्ताइयों की तरह आपकी कलम भी जातिवादी तो नहीं!
संजय कुमार सिंह
August 27, 2009 at 12:33 am
चार्वाक सत्य जी
आप कहां से देखते थे नवभारत टाइम्स की चहकती लड़कियों को। मैंने एक्सप्रेस बिल्डिंग के बगल वाले ढाबे पर और प्रताप भवन के सामने पराठे वाले के यहां बहुत इंतजार किया है – हिन्दी बोलने वाली लड़कियों का पर बिरले ही कोई नजर आई। सब अंग्रेजीदां होती थीं – टाइम्स ऑफ इंडिया, इंडियन एक्सप्रेस की और कुछेक मौलाना आजाद मेडिकल कॉलेज की भी। आप इन्हीं को नवभारत टाइम्स की पत्रकार तो नहीं समझ रहे। वैसे, सब मिलाकर भी कोई झुंड नजर नहीं आता था।
गणेश झा ने चार लड़कियों के नाम गिनाए तो कबीर भाई ऐसे बतिया रहे हैं जैसे नवभारत टाइम्स अखबार नहीं गर्ल्स हॉस्टल हुआ करता था।
आपलोगों के गंभीर विषय को हल्का कर रहा हूं। प्रभाष जोशी का विरोध करने वाली जनतंत्र और जनतंत्र के पाठकों की टीम में कोई महिला नहीं है। फर्जी नामों से ही गोले दागना है तो एक आईडी किसी महिला के नाम से भी हो जाए। आपलोगों की गंभीरता बनी रहेगी।
Indian Spartacus
August 27, 2009 at 9:12 am
How you missed the bus sanajy. I feel sorry for you. Kindly do get ur eye sight checked. Some of ur friends in Jansatta had tea with girls from NBT and they are happy family. but’s lets not deviate from the main issue and that is anti women-anti minority-anti human brahminical attitude of Mr Prabhash Joshi. End game has just started my friend!
Sanjay, do you have clippings of Jansatta and Mr Joshi’s writings during anti mandal movement? Charwak Satya should also dig those ugly brahminical writings? I am enjoying the fall of Mr Joahi. He will not be same again. This is paying back time.
संजय कुमार सिंह
August 27, 2009 at 1:03 pm
no, brother (or bhabhi) i didn’t miss the bus and know very well who boarded the bus, who missed it and got into it and how, who disembarked midway. but that is other matter.
ambrish kumar
August 27, 2009 at 11:34 am
बुरका पहन कर कब तक लडोगे भाई ,
castelessmedia
August 27, 2009 at 1:28 pm
चार्वाक का बेसिक रिसर्च खराब है। वो जनसत्ता, नवभारत टाइम्स या मीडिया के बारे में कुछ नहीं जानते। या तो उन्हें जनसत्ता में कभी नौकरी नहीं मिली, जिसका गुस्सा है या फिर वो मीडिया के आदमी नहीं हैं किसी बीएसपी बामसेफ के कार्यकर्ता हैं, कहीं से गप सुनकर लिख रहे हैं। मीडिया में जातिवाद फैला रहे हैं। जनसत्ता में जब चार महिलाएं थीं तो नवभारत टाइम्स में छह थी। यही सही आंकड़ा है। महिलाएं कम थीं, पर दोनों जगह कम थी।
jatiwadimedia
August 27, 2009 at 2:22 pm
charwak ka research kharab hai. joshi ji ne kabhi bhi sati ko support nahin kiya. Aapne jo padha wo nazaron ka dhoka tha. Ha…ha…
rajpoot
August 27, 2009 at 5:07 pm
dhakkan kism ke thakur bloggor hai inpar samay faltu me kyo kharaab kiya jaye ek ballia ka to dusra banaras ka chavannichap .
Ganesh Prasad Jha
August 27, 2009 at 5:56 pm
मैं जनसत्ता में काम करनेवाली महिला पत्रकारों की संख्या में थोड़ा सुधार करना चाहता हूं. जनसत्ता में उन दिनों एक और मिहला पत्रकार काम करती थीं. नाम था सावित्री बलूनी. इस तरह कुल पांच महिला पत्रकारों की संख्या बनती है. मैं चाहूंगा कि भाई अंबरीश जी उन पुराने दिनों को याद करें और इस संख्या में कुछ और जोड़ सकते हों तो कृपया जोड़ दें. मुझे याद नहीं आ रहा है. दूसरी बात यह कि नवभारत टाइम्स में मैंने भी कभी लड़कियों की फौज नहीं देखी. बुर्काधारी चार्वाक सत्य जी पता नहीं किस खिड़की से नभाटा में झांका करते थे. लगता है यहां बात जातिवाद की नहीं चल रही, जनसत्ता और प्रभाष जोशी जी के खिलाफ किसी न किसी बहाने खुन्नस निकाली जा रही है.साफ है कि ये सारे बुरकाधारी वही लोग हैं जो कभी जनसत्ता का टेस्ट पास नहीं कर पाए. क्योंकि जनसत्ता का टेस्ट तो उस दौर के बड़े-बड़े महारथी भी पास नहीं कर पाए थे. जिनमें काबिलियत थी सिर्फ वही लोग उस टेस्ट में पास हुए थे और नौकरी पा सके थे. अंबरीश जी ने बुर्काधारियों से बुर्का हटाकर सामने आने को ललकार ही दिया है. सो जो कोई लड़ना चाहते हैं वे चेहरा सामने लेकर आएं. जरा हम भी तो देखें कैसे-कैसे पहलवान हैं ये लोग.
चार्वाक सत्य
August 27, 2009 at 9:25 pm
जोशी जी के समर्थन में सबसे पहले उतरे और अब तक जमकर टिके संजय कुमार सिंह ने जनसत्ता की शुरुआती टीम के बारे में जो लिखा है, उसे पढ़िए। इनमें पारुल शर्मा के अलावा भी कोई महिला हैं क्या? और बुर्का इसलिए है कि ब्राह्मणवादियों की प्रतिशोध वृत्ति से बहुत डर लगता है। आप लोग आपस में तय कर लो कि क्या सच है। फिर बात कर लेंगे। बाकी चार लड़कियों ने कब ज्वाइन किया ये बताना न भूलें क्योंकि पूरी चर्चा 20 साल पहले के दौर के बारे में हो रही है।
“जनसत्ता की शुरुआती टीम इस प्रकार थी। इसमें एक महिला के अलावा ठाकुर और दूसरी जातियों के लोग भी हैं। इस सूची का उद्देश्य छूट गए लोगों को शामिल करना है और कुछ मामूली गतलियों को सुधारना है। प्रभाषजी के ब्राह्मणवाद से इस सूची को प्रस्तुत करने का कोई संबंध नहीं है। यह सूची जानकार भरोसेमंद सूत्रों के हवाले से है पर वरिष्ठता क्रम के आधार पर नहीं है। टॉप 15 जैसा कुछ भी उस समय नहीं था। पूर्व प्रकाशित सूची के श्याम आचार्य और अच्युतानंद मिश्र जनसत्ता से बाद में जुड़े थे। इसी तरह ब्रजेन्द्र पांडे को खेल डेस्क इंचार्ज कहा गया है जबकि इसपद पर सुरेश कौशिक थे। तथ्यों को सही ढंग से प्रस्तुत करने के लिए यह भी बताया जा सकता है कि प्रभाष जोशी 97-98 में रिटायर हो गए थे। उनके बाद राहुल देव और फिर ओम थानवी जनसत्ता के संपादक बने जो अब भी हैं।
1. प्रभाष जोशी
2. बनवारी
3. हरिशंकर व्यास
4. सतीश झा
5. गोपाल मिश्र
6. मंगलेश डबराल
7. देवप्रिय अवस्थी
8. अशोक कुमार
9. जगदीश उपासने
10. अमित प्रकाश सिंह
11. सत्य प्रकाश त्रिपाठी
12. परमानंद पांडे
13. कुमार आनंद
14. शंभू नाथ शुक्ल
15. सुधांशु भूषण मिश्र
16. उमेश जोशी
17. राजीव शुक्ल
18. बाला सुंदरम गिरि
19. अच्छे लाल प्रजापति
20. चमन लाल
21. दयानंद पांडे
22. पारुल शर्मा
23. श्रीभगवान सुजानपुरिया
24. सुरेश कौशिक
25. मनोज चतुर्वेदी
26. ब्रजेन्द्र पांडे
27. राम बहादुर राय
28. राकेश कोहरवाल
29. महादेव चौहान
30. अलोक तोमर”
जनसत्ता के बारे में मेरी जानकारी के स्रोत संजय भाई हैं। नवभारत टाइम्स के बारे में मेरी जानकार अधूरी हो सकती है। जिनसे पूछा था उन्होंने गलत बताया होगा। आपलोग जांचकर बता दें।
संजय कुमार सिंह
August 27, 2009 at 11:52 pm
चार्वाक सत्य जी
मेरी ही सूचना पर राय बनानी है और यकीन करना है तो मान लीजिये, आप जो साबित करना चाहते हैं वो नहीं होगा. प्रभाष जोशी ने जनसत्ता की पहली टीम में चाहे जिसे रखा और जिसे नहीं रखा – निर्णय टेस्ट से हुआ और बाद में यह साबित हो चुका है कि निर्णय सही था। दूसरे अखबारों और पत्र-पत्रिकाओं की बात कीजिए वहां न तो टेस्ट होता है और न संतुलन बनाकर रखा गया है। किस हिन्दी अखबार में पुरुषों और महिलाओं का अनुपात आधा-आधा है और किस दफ्तर या कारखाने में यह सही है। इसी तरह मुसलमानों का अनुपात कहां 13.4 प्रतिशत है।
चार्वाक सत्य
August 28, 2009 at 8:21 am
कुछ साबित नहीं करना है संजय जी। एक ब्राह्मणवादी संपादक एक ऐसा न्यूजरूम बनाता है जो स्त्री-पुरुष बराबरी के खिलाफ सबसे अश्लील हरकत (सती का समर्थन) करता है, 1991 से पहले तक घनघोर सांप्रदायिक स्टैंड लेता है और कभी ठाकुर होने की वजह से तो कभी रिजर्वेशन लागू करने की वजह से वी पी सिंह के खिलाफ कैंपेन चलाता है, के बारे में चार्वाक को कुछ साबित नहीं करना है। ये सब जब होता रहा तो न्यूजरूम में विरोध नहीं था, वामपंथी भी चुप, ये सब तो समकालीन इतिहास है। क्यों नहीं था विरोध ये आप सोचिए। अभी तो लोगों की समृति में दर्ज है सब।
जब कोई शोधार्थी सती कांड या मंडल आंदोलन या मंदिर आंदोलन (शुरुआती दौर) में मीडिया की भूमिका के बारे में शोध करेगा तो क्या जनसत्ता की तमाम फाइलें उसे नहीं मिलेंगी। कहां छिपाएंगे उन पन्नों को। ब्रूनो को बेशक जला दिया गया पर ब्रूनों की संतानें भी तो हिसाब मागेंगी।
आप लोग सिर्फ ये तय करें कि बदलते समाज में आप यथास्थिति के पक्ष में हैं या बदलाव के पक्ष में। वैसे आपकी संताने आप सबको बदलते समाज के कई सबक सिखा देंगी। नस्लीय-जातीय श्रेष्ठताबोध और अहंकार अब किसी काम का नहीं है। बदलाव तो आपके घरों तक में हो रहा है। उसे कैसे रोकेंगे।
संजय कुमार सिंह
August 28, 2009 at 10:17 am
बदलाव हो ही रहा है। और पिछले चुनावों में कुछ अखबारों ने जो किया (जिसके खिलाफ प्रभाष जोशी ने झंडा बुलंद किया) वह भी शायद इसी बदलाव का हिस्सा है। हम कहां रोक पा रहे हैं। स्टैंड लेने में मैं कोई बुराई नहीं मानता। वह किसी की राय में गलत और किसी की राय में सही हो सकता है। गलत वही नहीं करता है जो कुछ नहीं करता। जो कुछ करेगा वह सही करेगा तो कुछ गलत भी करेगा। गलत हो तो उसका विरोध भी होना चाहिए। कीजिए, लोग करते ही हैं। पर इसका मतलब यह नहीं है कि कोई स्टैंड ही नहीं लिया जाए। जनसत्ता अब चाहे जो हो (मैं नहीं पढ़ता) जब तक प्रभाष जोशी थे लिजलिजा नहीं था। सती प्रथा के तथाकथित समर्थन के लिए आप जनसत्ता को खारिज करना चाहें तो यह संभव नहीं है। संपादक को अगर आप निर्णय लेने और स्टैंड लेने का अधिकार नहीं देंगे तो काहे का संपादक। फिर क्यों रोना रोया जा रहा है कि संपादक नाम की संस्था खत्म हो रही है।
विद्रोही
August 28, 2009 at 12:09 pm
प्रभाष जोशी के समर्थकों, आपसे एक गुज़ारिश है।
जनसत्ता हिंदी में अब तक का सर्वश्रेष्ठ अखबार रहा है। आज भी, स्तर में गिरावट के बावजूद, बाकियों से बेहतर है। इसीलिए आजतक उसे मंगाता हूं और पढ़ता हूं। लेकिन उसी अख़बार ने जब सती प्रथा का समर्थन किया, तो उसका जमकर विरोध हुआ। वैसे ही अखबारों या चैनलों में न्यूज़रूम के भीतर सामाजिक न्याय नहीं है, तो उसकी भी पड़ताल होनी चाहिए। जनसत्ता और प्रभात ख़बर पर चर्चा शायद इसलिए ज़्यादा हो रही है, क्योंकि इन अखबारों से लोगों को कुछ ज्यादा उम्मीदें रही हैं। और उम्मीदें टूटने पर प्रतिक्रिया तीखी होनी स्वाभाविक है। दक्षिणपंथी-मनुवादी विचारधारा वाले या विचार शून्य दुकानदारी चलाने वाले अख़बारों से किसे उम्मीद है, जो उन पर कोई चर्चा करेगा? सबको मालूम है उनकी असलियत।
जनसत्ता में टेस्ट में पास होने वालों को ही रखे जाने की दलील का जहां तक सवाल है, तो क्या इसका ये मतलब निकाला जाए कि सिर्फ द्विज ही टेस्ट में पास होने की क्षमता रखते हैं? अगर ऐसा है, तब तो प्रभाष जोशी की ब्रह्म संवाद और धारण शक्ति वाली दलील में वाकई दम है! तो अच्छा हो कि आप लोग पंडित प्रभाष जोशी के ‘ब्रह्म-संवाद’ के समर्थन में भी दलीलें दीजिए। उनके इस इंटरव्यू ने उनके चाहने वालों को कितना दुखी किया है, इसका अनुमान शायद आप लोगों को नहीं है। अगर समझाना है, तो उन्हें समझाइए कि ऐसी अनर्गल बातें क्यों कर रहे हैं? खुद को गांधी का चेला बताते हैं, जो बनिया थे, पंडित जोशी की दलील पर चलें, तो धारण शक्ति उनमें नहीं थी। लेकिन पवनार में ब्रह्म-विद्या का मंदिर बनाने वाले चितपावन ब्राह्मण विनोबा भावे उन्हें अपना गुरु मानते थे। जिन जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में देश ने लोकतंत्र बहाली की लड़ाई लड़ी, वो भी ब्राह्मण नहीं थे। उन्हें विनोबा ने संत कहा था। सच कहूं, तो मुझे पहली बार तो पढ़कर यकीन ही नहीं आया कि ये इंटरव्यू वाकई प्रभाष जोशी का है। अगर आपमें से किसी की उनसे बात होती तो कृपया उनसे इस मसले पर अपनी स्थिति स्पष्ट करने को ज़रूर कहें। इंटरनेट को नहीं मानते तो कागद कारे में ही लिख दें।
संजय कुमार सिंह
August 28, 2009 at 12:45 pm
जनसत्ता हिंदी में अब तक का सर्वश्रेष्ठ अखबार रहा है। क्योंकि वहां आरक्षण नहीं है। आरक्षण की अपनी बुराइयां हैं। वह अलग बहस का मुद्दा है पर उससे शायद हिट्स न मिलें इसलिए उसपर चर्चा फिजूल है। फजल इमाम मल्लिक ने लिखा है कि उनके समय में या साथ के मुसलमानों को पत्रकार बनने का शौक नहीं था। तो कोई प्रभाष जोशी कहां ढूंढ़ने जाएगा मुसलमान और दलित? आप बताइए किस दलित ने जनसत्ता की परीक्षा दी और चुना नहीं गया। मैं बताउंगा कितने द्विज नहीं चुने गए या परीक्षा देने की हिम्मत ही नहीं की।
खरी बात
August 28, 2009 at 3:56 pm
आपकी इस भोली अदा पर हम सब कुर्बान हैं संजय। मुसलमान आते ही नहीं थे, दलित भी आते नहीं थे, ठाकुर कम आए, कायस्थ भी कम ही आए। सो बेचारे जोशी जी क्या कर लेते। इन्हें पत्रकार बनने का शौक ही नहीं था। उन्हें तो गंदगी ढोने, मरे हुए जानवरों को उठाने और साइकिल के पंचर बनाने में इतना आनंद आता था कि वो जनसत्ता में पत्रकार बनने का शौक क्यों पालते? अब तर्क के नाम पर ये आ रहा है। प्रभाष जी के “धतकरम” का बचाव ऐसे होगा? ये है देश के पत्रकारों की so called बेस्ट टीम की बौद्धिक क्षमता का हाल। आरक्षण के विरोध में ये तर्क तो पान की दुकानों में भी नहीं सुनाई देता। जब आप किसी ऐसी बात के पक्ष में खड़े हों, जिसके पक्ष में आपका दिल न हो, तो ऐसे ही बेमन से तर्क जुटाए जाते हैं।
और जो आपने अपने जनसत्ता को हिंदी का अब तक का सर्वश्रेष्ट अखबार कहा है तो आपकी साइकिल दुनिया की बेस्ट साइकिल, आपकी थाली दुनिया की बेस्ट थाली। आपके चम्मच दुनिया के बेस्ट चम्मच। आपकी मर्जी आप जिसे सर्वश्रेष्ठ कह दें। आप वहां नौकरी करते हैं, उससे अच्छी जगह और क्या हो सकती है। इसका खंडन करने का दम कम से कम मुझमें तो नहीं है।
एक और संजय
August 28, 2009 at 7:21 pm
जनसत्ता के बारे में लेखक की जानकारी बहुत कम है। संजय सिंह ने जो बात कही है वो सही है लेकिन पता नहीं किसने लेखक के दिमाग में डाल दिया है कि वहां लड़कियां नहीं थी और जैसा कि उन्होंने लिखा है कि…. ” चूंकि एक महिला की मौजूदगी भर से न्यूज फ्लोर का माहौल बदल सकता है तो जहां इतनी महिलाएं हों वहां के माहौल में शिष्टाचार और सौम्यता अपने आप आ जाती है। नवभारत टाइम्स के डेस्क पर मां-बहन की गाली नहीं दी जा सकती थी….” एकदम गलत है। जनसत्ता पहला अखबार था, जिसने अपने डेस्क पर इंडियन एक्सप्रेस (इंगलिश) और जनसत्ता (हिंदी) के पत्रकारों के साथ-साथ बिठाया था, और अंग्रेजी की लड़कियां और हिंदी के लड़के दिन भर साथ बैठते और खाते पीते थे…रही बात शिष्टाचार की और मां बहन की गाली की तो आपको बता दें कि वहां कभी कोई ऐसी अभद्र भाषा में कभी बात नहीं करता था…
अब बात लड़कियों की..
वहां काम करती थीं- पारुल शर्मा जो अभी भी वहीं है। वहां काम करती थीं रजनी नागपाल, उषा पाहवा, और नीलम गुप्ता। लेखक ने सिर्फ नीलम गुप्ता का जिक्र करने की कोशिश की है। रही बात इंडियन एक्प्रेस में लड़कियों की तो नाम गिनाते हुए पन्ना भर जाएगा..और वो सारी हमारे साथ ही बैठती थीं। जनसत्ता एक ऐसे मॉड्यूल का अखबार था जो पूरी तरह एक्सप्रेस से जुड़ा था। मतलब अपनी अलग पहचान के साथ बड़े भाई के साथ उसके रिश्ते अति मधुर थे। तब हिंदी वाले अंग्रेजी वालों के साथ खाली उठते बैठते नहीं ते..ब्याह भी कर लेते थे..दोनों में से किसी को कोई कांप्लेक्स नहीं था।
रही बात वहां लड़कियों को काम नहीं मिलने की..तो आपको बता दूं कि उन दिनों 86-87-88 में जनसत्ता में नौकरी मिलना मतलब आईएएस की परीक्षा पास करने की तरह था। प्रभाष जोशी और बनवारी की टीम किसी की सिफारिश नहीं सुनती थी…और जो परीक्षा वो लिया करते थे उसे आज के तमाम पत्रकार पास नहीं कर सकते थे। अंग्रेजी नहीं आने वालों को तो वहां घुसने नहीं दिया जाता था, और हिंदी दुरुस्त न हो तो परीक्षा की पहली कड़ी पार नहीं कर सकते थे। जेनरल नॉलेज की बात ये है कि वहां हवाई चप्पल पहने सब एडिटर भी थ्योरी ऑफ रेलेविटी के फंडा से लेकर जॉर्ज बुश सीनियर तक की बखिया उधेड़ सकते थे। उस जमाने के लोग हो सकता है कि आपको कहीं इस सिस्टम में आज बहुत आगे न दिख पा रहे हों..लेकिन एक बार जाकर संजय कुमार सिंह (अब अनुवाद में व्यस्त), सत्येंद्र रंजन (एनडीवी में रहे), अरुण त्रिपाठी (असिस्टेंट एडिटर, हिंदुस्तान), शंभू नाथ शुक्ला (स्थानीय संपादक अमर उजाला), बालेंदु दाधिच (प्रभा साक्षी), मनोहर नायक (फ्री लांसिंग) से मिल लीजिए। आप उन्हें देख कर हैरान रह जाएंगे और सोचने पर मजबूर हो जाएंगे कि उपभोक्ता संस्कृति और चाटूकारिता के खेल में वे भले आपसे पीछे रह गए हों, पर ये वो लोग हैं, जिन्होंने सचमुच पत्रकारिता को मिशन ही माना था, और डीटीसी की बसों में चलते हुए ये लोग अपने दमकते चेहरे के साथ दफ्तर में हासिल होते थे। ये वे लोग हैं जिनमें से ज्यादातर लोग किसी प्रेस कांफ्रेंस में चाय पीना भी अपराध मानते थे। इन लोगों के बीच के जनसत्ता को गाली गलौच वाला माहौल मानने वालों को सोचना चाहिए कि वे पत्रकारिता की अगली पीढ़ी को क्या बताने जा रहे हैं। ये सच है कि जनसत्ता अपनी मौत मर रहा है…लेकिन लेखक ने जिस दौर की बात की है उस दौर में जनसत्ता अगर हिंदी का सबसे बड़ा अखबार था तो सिर्फ रामनाथ गोयनका के हौसले, और प्रभाष जोशी की लेखनी की बदौलत नहीं था। जिनके नाम मैंने लिखे हैं और जिनके नहीं लिखें हैं उनके अपने चरित्र के बल पर भी था।
इनमें से जिनके नाम मैने लिखे हैं, उनमें से ज्यादातर उस जमाने में भी ग्रेड 1 की सरकारी नौकरी आसानी से हासिल कर सकते थे, थोड़ा और खुल कर कहूं तो यूपीएससी और पीसीएस क्वालिफाइ कर सकते थे…लेकिन ये लोग तब पत्रकारिता में इसलिए आए थे कि कुछ और करना चाहते थे..
और लेखक ने जिस सती प्रथा के समर्थन की बात कही है उसके बारे में उनका थोड़ा ज्ञान बढ़ा दूं-
सती के बारे में प्रभाष जोशी ने नहीं लिखा था..वो संपादकीय बनवारी की तरफ से था। जो लोग बनवारी को नहीं जानते..वे कुछ भी कह सकते हैं..लेकिन बनवारी ने अपने संपादकीय में कतई सती प्रथा का समर्थन नहीं किया था। इसे तोड़ मरोड़ कर पेश किया गया। बनवारी ने लिखा था कि जिसके भीतर देवराला की रूप कंवर की तरह सतित्व होगा वही सती हो सकती है और उन्होंने सत्वान की पत्नी सावित्री का हवाला दिया था। उन्होंने रूप कंवर के जल जाने के निंदा की थी, लेकिन दुर्भाग्य से तब एक महिला संगठन ने जनसत्ता के दफ्तर में खूब उत्पात मचाया। फिर प्रभाष जोशी ने प्रधान संपादक की भूमिका निभाते हुए एक संपादकीय और लिखा था कि “हमने ऐसा नहीं कहा था।”
लेकिन तब तक बात का बतंगड़ हो चुका था और आज तक लोग यही मानते हैं कि जनसत्ता ने सती का समर्थन किया था।
खैर, मैं यहां किसी की तरफ से सफाई नहीं दे रहा, सिवाय ये कहने के कि..जो सच जानते हैं वो कुछ कहें तो ठीक है, नहीं तो सुनी सुनाई बात पर राय रखना एक निजी बात हो सकती है लेकिन उसे सार्वजनिक तौर पर परोसना गुनाह है।
एक और संजय
खरी बात
August 28, 2009 at 11:06 pm
एक और संजय अद्भभुत जीव है। प्रभाष जोशी पर जो सवाल खड़े कर रहे हैं उनका भय तो समझ में आता है कि ब्राह्मणवादी हिंसा की हजारों साल पुरानी परंपरा से वो डरे हुए हैं। लेकिन एक और संजय को किनसे डर है। महिला विरोधी स्टैंड लेने से कहीं घर में कलह शुरू होने का भय तो नहीं। फर्जी नाम क्यों?
और आप लोग ये समझते क्यों नहीं कि शुरुआती जनसत्ता में सिर्फ पारुल जी थीं, बाकी की एंट्री काफी बाद में हुई। संजय कुमार सिंह बाकायदा 30 की लिस्ट आपको दिखा रहे हैं और आप लोग हैं कि समझते ही नहीं। 4-5-6 और जाने क्या क्या आंकड़े ला रहे हैं। वैसे तो शुरुआत से लेकर अब तक जनसत्ता में कई महिलाएं होंगी। लेकिन फिर बाकी अखबारों का आंकड़ा भी तो उतना ही बढ़ जाएगा। इतनी सी मोटी बात आप लोग समझने को तैयार नहीं हैं। अजीब लोग हैं आप सब। न समझने का नाटक खेले जा रहे हैं। बस कीजिए।
संजय कुमार सिंह
August 28, 2009 at 7:26 pm
नाम खरी बात रख लेने से आप जो लिखेंगे वह खरी बात नहीं हो जाएगी। जनसत्ता को सर्वश्रेष्ठ अखबार मैंने नहीं कहा है ऊपर पढ़िए विद्रोही जी ने लिखा है मैंने उन्हें क्वोट करके कहा है क्योंकि … तसल्ली से पढ़ लेते तब जवाब देते। ऐसी भी क्या जल्दी है। मुसलमानों की बात मैने फजल इमाम मलिक के हवाले से लिखी है और कहा है कि आप एक दलित का नाम बताइए जिसे जनसत्ता की परीक्षा में फेल कर दिया गया था मैं द्विजों के नाम बताऊंगा जो परीक्षा में बैठने की हिम्मत ही नहीं जुटा पाए। तथ्य और तर्क से बात कीजिए बौद्धिक क्षमता तो मेरी जो है सो है। आप ने अपनी नहीं दिखा दी क्या? पर आप तो बुर्के में हैं। (बुर्के वालों के लिए मैं पुल्लिंग का ही प्रयोग कर रहा हूं। कोई स्त्रीलिंग हो तो कृपया बता दे।)
ambrish kumar
August 28, 2009 at 10:43 pm
jansatta sabse mariyal akbaar hone ke bavjood mulayam singh ke corporate samajvaad se lada aur mayavati ke pattarvaad se lad raha hai .visvav ke sabse bade akhbaar ke sanvaddata jab myau myau vali bhasha me likhte hai to jansatta chatti par chadh kar likhtahai amar singh lucknow me indian express ke samoroh me jansattako sudharane ki salah dete hain kyoki baaki to khud hi sudhar chuke hote hai.ck nayadu hindustaan se bahar sirf ek khabar par ho jate hai.yah pradesh ki hakikat hai baki indira gandhi se lekar rajiv gandhi tak delhi me jansattane kaise morcha liya yah batane ki jarurat nahi hai.saipu saipu patrkarita karne vale ab gyaan nade
संजय कुमार सिंह
August 29, 2009 at 1:15 am
भाई खरी बात (बुर्का वालों को मैं पुल्लिंग ही मान रहा हूं) का जवाब मैंने भी जल्दी में दे दिया। अब दुबारा उनका पत्र पढ़कर तो मजा आ गया। भाई ने लिखा है – जब आप किसी ऐसी बात के पक्ष में खड़े हों, जिसके पक्ष में आपका दिल न हो, तो ऐसे ही बेमन से तर्क जुटाए जाते हैं। इससे पहले आपने फरमाया है, ये है देश के पत्रकारों की so called बेस्ट टीम की बौद्धिक क्षमता का हाल। आप कहना क्या चाहते हैं समझ नहीं आ रहा। बेमन का तर्क है या मेरी योग्यता ही नहीं है। तय कर लेते कहना क्या चाहते हैं। आप ने यह भी लिखा है – आप (मैं) वहां नौकरी करते हैं, उससे अच्छी जगह और क्या हो सकती है। इसलिए आपको बता देना वाजिब होगा कि मैंने 2002 में 38 साल की उम्र में वीआरएस ले लिया था और तबसे नौकरी करने या मांगने की जरूरत नहीं पड़ी।
sk singh
August 29, 2009 at 6:30 am
jansatta ke sare log apni pahchaan ke sath baat kar rahe hai par prabhash joshi ke virodhi benami ya naqli naam ka sahara le rahe hai charvak,sambook,sidhi baat type.manch par aap log kaisebolte honge.
खरी बात
August 29, 2009 at 11:03 am
संजय इसी बात पर पुलकित हो रहे हैं कि उन्होंने खरी बात को बुर्के वाला या वाली कह दिया। हे ईश्वर, लोगों को ऐसे ही खुश रख। महिलाओं के प्रति इनके निजी जीवन में व्यवहार का कोई लेखा जोखा नहीं है मेरे पास, लेकिन सती से लेकर तमाम मुद्दों पर जनसत्ता का नारी विरोधी होना अपवाद या व्यतिक्रम नहीं, स्वाभाविक है। यथा गुरु तथा चेला। ब्राह्मणवाद की अंतर्वस्तु में ही नारी विरोध है। इसी का परिचय संजय दे रहे हैं।
एक और संजय
August 29, 2009 at 4:47 pm
एक और संजय फर्जी नाम नहीं है। ना ही उन्हें किसी का डर है। जो लोग डरते होंगे वे जनसत्ता में काम न कर सकते थे और न ही उन्हें वहां काम मिल सकता था। जनसत्ता आज जो हो उससे कोई अंदाजा और फैसला मत लीजिए। हर चीज की अपनी उम्र होती है और हो सकता है कि जनसत्ता के मामले में भी ऐसा ही हो। लेकिन हकीकत ये है जनसत्ता ने ही सिखाया नीडर होना।
रही बात घर में कलह की तो यहां ये साफ कर दूं कि कलह उस घर में होती है जहां घर के माहौल में असुरक्षा होती है, यहां एक और संजय के घर में ऐसा नहीं है। आपने बहस शुरु की दफ्तर में लड़कियों के होने की और न होने की, आपने बहस शुरु की जनसत्ता के माहौल की..तो अब आपको इतना सब झेलना तो पड़ेगा ही।
जिस संजय कुमार सिंह के पत्रों के आप जवाब दे रहे हैं उनके बारे में भी जरा ज्ञान बढ़ा लीजिए। वो पढ़ाई के दौरान सदा अव्वल रहे। वो उस जमाने में भी मेडिकल और इंजीनियरिंग खुल कर पास कर सकते थे। लेकिन 22 साल की उम्र में पत्रकारिता से रिश्ता जोड़ने वाले और 38 की उम्र में पत्रकारिता को बाय बाय कहने वाले संजय कुमार सिंह ने दोनों फैसला अपने जमीर के बल पर लिया था। जुबान का क्या है कुछ भी कह सकती है। लेकिन संजय कुमार सिंह ने जो कहा जमीर से कहा। आपको शायद न पता हो, 1987 के किसी भी अखबार को उठा कर पढ़ लीजिएगा, ये संजय कुमार सिंह ही थे जो अपने पत्रकार और मजदूर साथियों के लिए लड़ते हुए चेहरे पर तेजाब तक खा बैठे थे। ये था जनसत्ता और ऐसे थे वहां काम करने वाले लोग।
रही बात शुरुआती टीम मे एक लड़की की होने की, तो शुरुआती टीम और आखिरी टीम क्या होती है। शुरुआत में तो केवल प्रभाष जोशी और बनवारी वहां थे तो इसका क्या मतलब हुआ कि दो ही लोग जनसत्ता में थे?
वो तो लोग आते गए और कारवां बढ़ता गया और फिर जनसत्ता वो जनसत्ता बना जिसकी कसमें आज भी हिंदी के पत्रकार खाते हैं। मैं तो तमाम लोगों को जानता हूं जिन्हें वहां काम नहीं मिला उसे गरियाने लगे। लेकिन इससे क्या होता है?
लेखक को मेरी एक बार फिर सलाह है कि वे एक बार बनवारी, शंभुनाथ शुक्ल, सत्येंद्र रंजन, अरुण त्रिपाठी, अरिहन जैन, संजय कुमार सिंह, बालेंदु दाधिच, मनोहर नायक, मंगलेश डबराल, सत्यप्रकाश त्रिपाठी और न जाने कितने नाम जिनकी मैं चर्चा नहीं कर पा रहा हूं- से मिल तो लें। उनकी धारणा बदल जाएगी अखबार के बारे में और वहां उस दौर में काम किए लोगों के बारे में …उनसे मिल कर शायद वे यकीन ही नहीं कर पाएंगे कि ऐसे लोग भी हिंदी की पत्रकारिता में कभी आए थे। रही बात एक और संजय की..तो उससे मिल कर शायद कांप्लेक्स ही हो जाए। एक और संजय ने अपना परिचय छिपाया नहीं है, वो गुमनामी पसंद शख्स है। ऐसा नहीं है कि वो अखबार में छपे नहीं या टीवी पर दिखे नहीं। पूरी दुनिया घूमने और वहां काफी समय गुजारने के बाद एक और संजय ने ये समझा है और जाना है कि पहचान भीतर की होनी चाहिए..उपर की नहीं।
एक और संजय
Ganesh Prasad Jha
August 29, 2009 at 5:02 pm
ये जितने बुर्काधारी हैं सब के सब वही लोग हैं जिनमें जनसत्ता का टेस्ट पास करने की कुव्वत नहीं थी और जो टेस्ट देकर फेल हुए थे और निराश होकर घर लौट गए थे. अब वेबसाइट मल गया है तो बुर्का पहनकर गालियां दे रहे हैं. खुद को पराड़कर का बाप बता रहे हैं. आज भी अंग्रेजी का एक लेख अनुवाद करने को दे दें तो औकात फट कर हाथ में आ जाएगी. लेख का अनवाद करने की बात तो दूर, किसी साइंटिफिक रिसर्च की एजेंसी की कापी ही पकड़ा दी जाए तो तारे नजर आने लगेंगे. भाई लोगों को नहीं मालूम क जनसत्ता के उस दौर के लोग किस क्षमता के थे. प्रभाष जी और बनवारी जी ने हमें कोई चेहरा देखकर और जाति पूछकर नौकरी नहीं दी थी. सात घंटे का कठिन टेस्ट लिया गया था और समें अच्छे नंबरों से पास होने वालों को ही इंटरव्यू के लिए बुलाया गया था. फिर एसे तपे-तपाए उन थोड़े से लोगों में से भी जो चंद लोग लंबा और कठिन इंटरव्यू पास कर सके उन्हें ही नौकरी दी गई थी.
कबीर वाणी
August 29, 2009 at 7:46 pm
इन प्रतिभाशाली लोगों ने शुरुआती चार साल संघ के गुण गाने में बिताए। फिर एक साल आरक्षण को गाली देने में काटे और बीच में जय सती मैया की भी बोल गए। अचानक सेकुलर बने और फिर पाठकों से तलाक ले बैठे। बूम टाइम में एडिशन बंद कराए। ऐसी महान टीम का इंडियन एक्सप्रेस क्या करता महानुभावों। सो वहां वीआरएस स्कीम काफी समय तक चलती रही, ऐसा लोग कहते हैं। देश के सबसे टैलेंटेड लोगों के लिए वीआरएस। क्या बात है! जोशी जी का इंटरव्यू आप लोगों ने पढ़ा है या नहीं? रविवार डॉट कॉम में छपा है।
कौशिक
August 30, 2009 at 10:49 am
भाई एक और संजय जी,
आप का आत्मविश्वास देख कर मजा ही गया। दोस्त हो तो आप जैसा। संजय कुमार सिंह के बारे में वो सब बताने के लिए धन्यवाद जिसे वाकई हमलोग नहीं जानते थे। ये तेजाब वाली कौन सी घटना है जिसका आप जिक्र कर रहे हैं। लेकिन इतना तो मैं मानता हूं कि आपने तीन नई जानकारी हम लोगों को दी है। एक तो ये कि सती वाला संपादकीय प्रभाश जोशी ने नहीं बनवारी की कलम से निकला था। कभी प्रभष जोशी ने इसका खुलासा नही किया। वो बदनामी में भी नाम सुख भोगते रहे। दूसरे इस सपादकीय में कहीं भी रूप कंवर के सती होने की सराहना नही की गई थी, और ये कि संजय कुमार सिंह पर कभी पत्रकारों के लिए लड़ते हुए तेजाब फेंका गया था।
अगर सती वाला संपादकीय और आपने प्रभाष जोशी के जिस दूसरे संपादकीय की चर्चा की है की कटिंग मिले तो इस साइट पर डालने की कृपा करें।
और हां, क्या आपका नाम ही एक और संजय है, या फिर संजय कुमार सिंह के साथ खुद को जोड़ कर दूसरे संजय बन गए हैं। आपने लिखा है कि आपसे मिल कर ही लोगों को कांप्लेक्स हो जाएगा, तो भईया मिलने की बड़ी प्रबल इच्छा है। कांपलेक्स पाने के लिए नहीं, आपके आत्मविश्वास को देखने के लिए।
कौशिक
media ka madhav
August 30, 2009 at 5:06 pm
navbharat times me 1986 me
maya sharma
asha kishor
lata karandikar
kiran arora
ira jha
madhu singh
seema jain ab murlidhara theen.
naven dashak shayad 1991-92 me supriya tomar,sangeeta mahadani,manjari chaturvedi aain.beech me anuja bhatt bhi theen.1999 me manjula singh,shipra tomar ne join kiya.news me ladkiyon ko laene kee parampara nbt se hee shuru hui.asha kishor,kiran,ira ,madhu seema news me theen.ira jha ko sabse pahle akhbar kee team ka netritva karne ka mauka mila.ve 1989 se unhen suspend kiye jane tak nbt nikaltee rahin.us samay tak ve chief sub editor banne vali rashtriya hindi akhbaron me pahlee mahila theen.
media ka madhav
August 30, 2009 at 7:33 pm
beech me charls shobhraj kee vakeel snehlata sengar bhee aaai thee.annu jain aur lalita khurana reporting me rahin ab to ladkiyon kee bharmar hai.
madhav
August 31, 2009 at 12:34 am
jansatta
parul Sharma
neelam gupta
rajni nagpal
usha pahwa
savitri balooni
anita sinha
pragati saxena- bhi wahin rahti thin. but not working.
roshanlal
June 28, 2010 at 7:19 pm
lagata hai ki bhai log NBT aur jansatta me hi atake hain. ab in ko poochhata koun hai? bahut hi achchhe newspaper jagah jagah se aa gaye hain aur aa rahe hain shreeman. zara aankhe to koliye. kya shuturmurg jaie hi rahenga?