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“प्रभाष जोशी” के जातिवाद पर बहस बंद नहीं होगी

प्रभाष जोशी के इंटरव्यू पर जो बहस शुरू हुई है – उस पर कुछ “जनसत्ताइयों” की प्रतिक्रया आई है। उन सभी का एक ही दर्द है कि प्रभाष जोशी के बहाने जनसत्ता के माहौल पर चर्चा क्यों हो रही है? जनसत्ता के माहौल को ब्राह्मणवादी क्यों बताया जा रहा है? और भी ग़म हैं ज़माने में .. की तर्ज पर उनका यह भी कहना है कि मान लेते हैं कि प्रभाष जोशी जातिवादी हैं। अब इस बहस को यहीं ख़त्म कर दिया जाए। दूसरे मुद्दों पर ध्यान दिया जाए। कुछ पुराने जनसत्ताई व्यंगात्मक लहजे में बहस को खारिज करने में जुटे हैं तो कुछ चुनौती दे रहे हैं कि “प्रभाष जोशी का समय जा चुका है आप लोगों के दिशानिर्देशन में ही हम लोग कुछ सीख लेंगे।”

इन सभी तर्कों का मतलब सिर्फ़ एक ही है कि ये बहस यहीं रोक दी जाए। इसलिए क्योंकि बहस जाति से जुड़ी है। धर्म से जुड़ी है। जाति और धर्म पर कोई भी चर्चा लोगों को भीतर से बेचैन करने लगती है। और अगर यह चर्चा मीडिया के जातिवादी चरित्र पर, सामंती और उन्मादी चेहरे पर हो तो पत्रकारों को और भी ज़्यादा बेचैन करती है। दूसरी संस्थाओं की बुराइयों पर खुल कर बहस करने की वकालत करने वाले पत्रकार छटपटाने लगते हैं। ठंडे दिमाग से सोचने की जगह गुस्से और तिरस्कार से भर जाते हैं। ये मीडिया का वो चेहरा है जो डराता है और सोचने पर मजबूर करता है।

कुछ दिन पहले जनतंत्र पर वरिष्ठ पत्रकार अनिल चमड़िया का एक लेख छपा था। उस लेख में उन्होंने बताया कि कैसे एक ही संस्थान से पास होकर निकलने वाले छात्रों में से सवर्णों को तुरंत जगह मिल जाती है जबकि दलितों का संघर्ष लंबा हो जाता है। उन्होंने यह भी बताया था कि देश के तमाम मीडिया संस्थानों में दलितों, आदिवासियों और पिछड़ों की संख्या नहीं के बराबर है। उन्होंने अपने उस लेख में ये बताया था कि कैसे सवर्णों ने मीडिया पर कब्जा कर रखा है। “मीडिया में फैसले लेने वाले पदों पर हिन्दू उच्च जाति के पुरूषों का हिस्सा 71 प्रतिशत है जबकि कुल आबादी में उनका हिस्सा आठ प्रतिशत है। केवल 17 प्रतिशत महिलाएं हैं। यहां गौर करने वाली बात है कि महिलाओं की अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति (32 प्रतिशत) अंग्रेजी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में है। क्या यह महज संयोग है कि आधुनिक लोकतंत्र का लबादा 60 वर्षों तक ओढ़कर रखने के बाद भी द्विज हिंदुओं (द्विजों में ब्राह्मण, कायस्थ, राजपूत, वैश्य और खत्री) की मीडिया में स्थिति पुरातनकालीन संस्थाओं की तरह बरकरार है। उनकी जनसंख्या 16 प्रतिशत है लेकिन मीडिया में उनकी हिस्सेदारी 86 प्रतिशत है। केवल ब्राह्मण (इसमें भूमिहार, त्यागी भी शामिल हैं) के हिस्से में 49 प्रतिशत है। राष्ट्रीय मीडिया के 315 प्रमुख पदों में एक भी दलित और आदिवासी नहीं है। अन्य पिछड़े वर्ग का राष्ट्रीय मीडिया में प्रतिनिधित्व चार प्रतिशत है।”

अभी ऐसी ही एक रिपोर्ट बिहार में आई है। जुझारू पत्रकार प्रमोद रंजन की पुस्तिका मीडिया में हिस्सेदारी में बताया गया है कि हिंदुस्तान, प्रभात ख़बर, दैनिक जागरण और राष्ट्रीय सहारा समेत ज़्यादातर अख़बारों में फ़ैसले लेने वाले पदों से दलित, आदिवासी और पिछड़े गायब हैं। आप सभी चाहें तो अपने-अपने शहर में एक सर्वे कर लें। हर जगह हालात एक से मिलेंगे। ये सभी तथ्य किसी को भी सोचने पर मजबूर कर सकते हैं। लेकिन सोचने की जगह सभी अपने बचाव में तर्क गढ़ने लगते हैं। ठीक वैसे ही फासीवादी तर्क जैसे प्रभात जोशी ने अपने इंटरव्यू में दिए हैं। उन्होंने कहा है कि “एक समाज में स्किल का लेवल होता है, कौशल का एक लेवल होता है, जो वो काम करते-करते प्राप्त करता है. उस कौशल का आप अपने क्षेत्र में कैसा इस्तमाल करते हैं, उस पर निर्भर करता है.”

ये नस्लवादी सिद्धांत है। जिसमें एक नस्ल दूसरे की तुलना में खुद को बेहतर मानती है। उस नस्ल के लोग अपनी शुद्धता को बचाए रखने की कोशिश करते हैं। दूसरे नस्लों पर हिंसक हमले करते हैं। इसी फासीवादी दलील की आड़ में सदियों से हिंसा का तांडव खेला गया है। आज भी पश्चिमी समाज में सुपीरियर रेस के सिद्धांत में यकीन रखने वाले गोरों की संख्या बहुत ज़्यादा है। अभी अमेरिका में पहले अश्वेत राष्ट्रपति बराक ओबामा को नस्लभेदी हमलों से जूझना पड़ रहा है। वहां भी यही कहा जा रहा है कि अश्वेत ओबामा के दिल में गोरों के प्रति नफ़रत काफ़ी गहरी हैं। मीडिया पर गोरों का कब्जा है और वो अपने नस्लवादी चेहरे पर गौर करने की जगह ओबामा को ही नस्लवादी साबित करने में जुटे हैं। ओबामा चाह कर भी कुछ नहीं कर पा रहे। आशय सिर्फ़ इतना कि नस्लवाद का जाल बहुत घना है। इतना घना कि उसमें दुनिया का सबसे ताक़तवर शख़्स भी उलझ कर मछली की तरह तड़पड़ाने लगता है। और जाल बुनने वाले हर लिहाज से कमजोर होते हुए भी उसकी तड़पड़ाहट देख कर लुत्फ़ उठाते हैं। इससे अधिक क्रूर समाज की परिकल्पना नामुमकिन है।

भारत में जातिवाद भी उतना ही क्रूर और घिनौना है। इसमें सदियों से बहुसंख्यक आबादी सिसक रही है। हालांकि पहले की तुलना में सुधार हुआ है, लेकिन इस सुधार की रफ़्तार इतनी धीमी है कि ठोस बदलाव की जमीन तैयार होते होते सदियां बीत जाएंगी।

यहां कुछ लोग कह रहे हैं कि भाषा की मर्यादा टूट रही है। इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि भाषा की अपनी एक मर्यादा होती है। लेकिन जनतंत्र पर छपे लेखों के बारे में तो दावा किया ही जा सकता है कि कहीं भी प्रभाष जोशी के लिए अभद्र शब्द का इस्तेमाल नहीं किया गया है। कुछ पाठक प्रतिक्रिया देते वक़्त थोड़ा तल्ख ज़रूर हुए हैं लेकिन ये तल्खी प्रभाष जोशी के ज़हर बुझे इंटरव्यू की तुलना में बहुत कम है। और चार्वाक सत्य की माने तो ये “गुस्सा हज़ारों साल पुराना है।” यहां यह भी ध्यान रखने की बात है कि प्रभाष जी के समर्थन में एक शख़्स (संजय कुमार सिंह) को छोड़ दिया जाए तो किसी ने तार्किक तरीके से अपनी बात रखने की कोशिश नहीं की है। सबने व्यंगात्मक और तल्ख टिप्पणियां ही की हैं।

इसलिए जातिवाद पर बहस तो तब तक बंद नहीं हो सकती जब तक प्रभाष जोशी जैसे लोग जाति का ज़हर फैलाना बंद नहीं करेंगे। जब तक पिछड़ों, दलितों आदिवासियों, अल्पसंख्यकों और महिलाओं को उनका वाजिब हक़ नहीं दे दिया जाएगा। जब तक नस्ल की उच्चता और शुद्धता का भ्रम पूरी तरह नहीं टूटेगा। हो सकता है कि ये बहस एक-दो दिन बाद थम जाए लेकिन जब भी कोई “प्रभाष जोशी” अहंकार में चूर किसी जाति का मजाक उड़ाएगा… हम लोग उस पर सवाल ज़रूर उठाएंगे और इसी शिद्दत के साथ उस शख़्स को भी कठघरे में खड़ा करेंगे। उस शख़्स के बहाने समाज के क्रूर चेहरे पर खुल कर बात होगी। फ़र्क पड़े या नहीं पड़े अपनी तरफ से कोशिश ज़रूर होगी।

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8 Responses to “प्रभाष जोशी” के जातिवाद पर बहस बंद नहीं होगी

  1. aam admi Reply

    August 27, 2009 at 11:36 am

    समरेन्द्र,

    फर्क जरूर पड़ेगा, अगर कोशिश ईमानदार है तो. जातिवाद का नकाब नोचने का कोई भी प्रतिबद्ध प्रयास खाली नहीं जायेगा मेरे दोस्त. बस तुम सच्चाई से लगे रहो.

  2. शंबूक Reply

    August 27, 2009 at 12:17 pm

    चीजें बदलती हैं भाई। मेरे शिरोच्छेद के बाद से दुनिया काफी बदल चुकी है। पंडित प्रभाष जोशी के लेखन की अब सामाजिक दृष्टि से पड़ताल होगी, ये छोटी बात नहीं है। याद कीजिए कि दो साल पहले जब आरक्षण विरोधी आंदोलन के बाद योगेंद्र यादव, अनिल चमड़िया और जितेंद्र कुमार ने दिल्ली के मीडिया की सोशल प्रोफाइलिंग की थी तो कितनी गाली-गलौच हुई थी। लेकिन अब किसी के लिए भी इस मुद्दे की अनदेखी करना संभव नहीं है। अमेरिका में 70 के दशक में ये काम हो चुका है। किसी को इसे लेकर मन में कड़वाहट लाने की जरूरत नहीं है। ये समाज की गति है। वक्त ऐसे ही बदलता है जनतंत्र में।

  3. Ganesh Prasad Jha Reply

    August 27, 2009 at 6:45 pm

    भाई समरेंद्र जी,
    जहां तक मेरा अपना अनुभव है, मैंने बिहार के गांव से आकर बीस से ज्यादा वर्षों तक दिल्ली में रहकर राष्ट्रीय स्तर पर पत्रकारिता की है. विभिन्न प्रदेशों, जातियों, धर्मों और संप्रदायों के पत्रकारों के बीच और उन सबके साथ मिलकर कई अलग-अलग संस्थानों में काम किया है. मुझे कभी एसा नहीं लगा कि भारत में पत्रकारिता में राष्ट्रीय स्तर पर कहीं कोई क्षेत्रवाद, जातिवाद, नस्लवाद या संप्रदायवाद है. सभी कुनबे के लोग साथ मिलकर एक परिवार के भाईयों की तरह काम किया. अनिल चमड़िया मेरे पुराने साथी हैं. बिहार में पत्रकारिता के दिनों के. मैं पहले दिल्ली आया, वे कुछ साल बाद आए. उसने ही पूछ लीजिए कि जातिवाद के घनघोर दलदल में फंसे बिहार में पत्रकारिता में कभी कोई जातिवाद था क्या. हम जब बिहार से चलकर दिल्ली आए तो दिल्ली की राष्ट्रीय पत्रकारता में भी कभी कोई जातिवाद नहीं देखा. पत्रकारिता में किसी तरह का जातिवाद होने की कभी किसी ने कोई कल्पना ही नहीं की. कभी किसी साथी के मन में एसी कोई फीलिंग ही नहीं रही. आपलोगों ने यह जो लाइन ली है और जो बहस छेड़ रखी है इस पर तो हमारा कभी ध्यान ही नहीं गया. किसी ने कभी इस लाइन पर सोचा ही नहीं और न कभी एसा सोचने की किसी ने जरूरत ही समझी. यह अचानक आपलोग क्या करने लगे हैं. यह कैसा जहर घोल रहे हैं मीडिया समाज में. एसा करके आप लोग मीडिया समाज को जातिवादी सोचवाला बना रहे हैं या बना देंगे. जो जातिवादी जहर मैंने बिहार की राजनीति में देखी है उसे आपलोग मीडिया में क्यों पिरोने मे लगे हैं. जानते हैं इसका काफी दूरगामी असर भी हो सकता है, और अगर असर हो गया तो कल्पना कीजिए कि फिर क्या-क्या होने लगेगा. हम पत्रकार देश की राजनीति के जातिवादी चेहरे पर हमेशा से लिखते रहे हैं, उसका पुरजोर विरोध करते रहे हैं. पर हमने अपनी विरादरी को कभी इस जहरीले रंग में रंगने नहीं दिया. पत्रकार इस जहर से हमेशा दूर ही रहे. आपकी इस तरह की बहसें देश की पत्रकारिता की पवित्र सलिला गंगा को गंदला और जहरीला कर रही हैं. इसे फौरन रोक दीजिए. हम सारे पत्रकार आपस में भाई-बंधु हैं. हमें मिलकर रहने और काम करने दीजिए. मेरी आपसे याचना है कि हमारी पत्रकार विरादरी को कृपया इस क्षेत्रवाद, जातिवाद, संप्रदायवाद और नस्लवाद के टुकड़ों में मत बांटिए.

  4. Shesh Narain Singh Reply

    August 27, 2009 at 6:58 pm

    प्रभाष जी को अपमानित करने के अभियान में शामिल लोगों से एक अपील

    प्रभाष जी पर हमला करके क्या हासिल करने की तमन्ना है..उनको पतित कहना ,ब्राह्मणवादी कहना ,सीधी बात तो नहीं हो सकती…जो आदमी जिन्दगी भर गाँधी जी की तरह सच की लड़ाई के अगले दस्ते का कमांडर रहा हो, उसको हमले का निशाना बना कर मूर्ती भंजक मुद्रा में खड़े होकर क्या हासिल करना चाहते हैं आप लोग.मैंने प्रभाष जी के साथ कभी काम नहीं किया लेकिन मैंने दिल्ली के वह भयानक १९ महीने देखे हैं जब इस देश में इमर्जेंसी लगी हुयी थी .पत्रकारिता के बड़े बड़े सूरमा इंदिरा गाँधी के कारिंदों के तलवे चाट रहे थे, उस दौर में यह आदमी विरोध के स्वर को ताक़त दे रहा था.एक बात और जिन लोगों ने प्रभाष जी के साथ काम नहीं किया है उन्हें मालूम ही नहीं कि प्रेस की स्वतंत्रता क्या चीज़ है. मेरे भाइयों, इस बात में कोई शक नहीं कि प्रभाष जोशी को गाली देने से नाम होता है. वैसे नाम कमाने के और भी रास्ते हैं. इससलिए अपने को बहुत भारी मूर्ती भंजक सिद्ध करने के लिए कोई और धंधा कर लो. हिन्दी पत्रकारिता के शलाका पुरुष को अपमानित मत करो क्योंकि हम जैसे लोग भी हैं जो प्रभाष जी के लेखन को पढ़ कर कुछ लिखना पढना सीखने में कामयाब हुए हैं. अपनी रोटी कमा रहे हैं .हम लोग बहुत मामूली लोग हैं .आप लोगों की ऊर्जा का जवाब नहीं दे सकते. लेकिन आपको यह बताना ज़रूरी समझते हैं कि हमें प्रभाष जी के खिलाफ अनर्गल प्रलाप सुन कर तकलीफ होती है..और अगर कोई प्रभाष जी को जातिवादी कहने की हिम्मत भी जुटा सकता है तो उसका पत्थर का कलेजा होगा.आप लोग सूचना क्रान्ति के जिस मोड़ पर खड़े हैं ,वहां से किसी को भी बे-इज्ज़त कर सकते हैं. इन्टरनेट का हथियार आपके पास है लेकिन प्रभाष जोशी को दफ़न करके आपके हाथ हिन्दी पत्रकारिता के नाम पर गर्व करने लायक कुछ नहीं बचेगा और किसी को गाली देकर आप महान नहीं बन जायेंगें . जहां तक प्रभाष जी का सवाल है वे निराला, अम्बिका प्रसाद वाजपेयी , मुंशी नवजादिक लाल श्रीवास्तव ,पराड़कर की परंपरा के पत्रकार हैं उन्हें अपमानित करने की कोशिश न करें ,आप पत्रकारिता का बहुत नुकसान कर रहे हैं..मेरी बातों का बुरा मानकर मुझे ही मत गरियाने लगियेगा. मैं बहुत मामूली आदमी हूँ..

  5. पूरा सच Reply

    August 27, 2009 at 9:07 pm

    आपके देवता सम प्रभाष जोशी के उन इंदिरा गांधी के बारे में उच्च विचार पढ़ें, जिनके लगाए आपातकाल के दौरान विरोध को स्वर वो दे रहे थे। इसके बाद भी साफ नजर न आए तो अपकी मर्जी।

    “अब धारण शक्ति उन लोगों में होती है, जो शुरू से जो धारण करने की प्रवृत्ति के कारण आगे बढ़ते है. अब आप देखो अपने समाज में, अपनी राजनीति में. अपने यहां सबसे अच्छे राजनेता कौन है ? आप देखोगे जवाहरलाल नेहरू ब्राह्मण, इंदिरा गांधी ब्राह्मण, अटल बिहारी वाजपेयी ब्राह्मण, नरसिंह राव ब्राह्मण, राजीव गांधी ब्राह्मण. क्यों ? क्योंकि सब चीजों को संभालकर चलाना है इसलिए ये समझौता वो समझौता वो सब कर सकते है. बेचारे अटल बिहारी बाजपेयी ने तो इतने समझौते किये कि उनके घुटनों को ऑपरेशन हुआ तो मैंने लिखा कि इतनी बार झुके है कि उनके घुटने खत्म हो गये, इसलिए ऑपेरशन करना पड़ा.”
    लेकिन ये सब कहने के बावजूद प्रभाष जोशी जातिवादी या ब्राह्मणवादी नहीं है। कम से कम उनका तो यही मानना है। आप भी पढ़ें-
    “एक समाज में स्किल का लेवल होता है, कौशल का एक लेवल होता है, जो वो काम करते-करते प्राप्त करता है. उस कौशल का आप अपने क्षेत्र में कैसा इस्तमाल करते हैं, उस पर निर्भर करता है. इंदिरा गांधी बचपन में गूंगी गुड़ियाओं की सेना बना कर लड़ा करती थीं. जब वह प्रधानमंत्री बनीं तो उन्होंने अपने आसपास गूंगे लोगो की फौज खड़ी की. ऐसे लोग, जो उसके खिलाफ बोल नहीं सकते थे. या जो अपनी खुद की कैपासिटी में कुछ कर नहीं सकते है. वही एक सर्वोच्च नेता रहीं. बचपन के जो खिलौने होते हैं, वो बाद में हमारे औजार बनते है. जिससे हम चीजों को हैंडल करना सीखते है.”

    पूरा इंटरव्यू रविवार डॉट कॉम पर पढ़ें

    • Shesh Narain Singh Reply

      August 28, 2009 at 1:14 pm

      एक गाँव में पंचायत हुई. सरहंग पक्ष ने ऐलान किया कि उन लोगों ने पंचायत की हर बात मान ली.. .मामला एक खूंटा गाड़ने को लेकर था. और जब पंचायत ख़त्म हुई तो कहा कि पञ्च की बात तो हमने मान ली है लेकिन खूंटा वहीं गडेगा जहां पहले था….तो बाबू लोग, आप लोग ताक़तवर लोग हैं ,आप प्रभाष जी को अपमानित करिए ,जिसे आप ने अपना पेशा बना रखा है,हम आपका कुछ नहीं बना बिगाड़ सकते.

  6. Amitabh Reply

    August 28, 2009 at 4:51 pm

    गाली देने वाले प्रसिद्धि के लिए, किसी भी हद तक जा सकते हैं. लेकिन ये सच है कि आसमान की और थूकने वाले शायद यह भूल रहे हैं कि गन्दा आसमान नहीं, उनका अपना चेहरा होगा. प्रभाष जी भारतीय पत्रकारिता के आदर्श पुरुष हैं, ऐसा मैं भी मानता हूँ. आदरणीय शेष जी ने जो कुछ कहा है, मैं उससे पूर्णतः सहमत हूँ.

  7. Sanjeev Tiwari Reply

    August 30, 2009 at 1:26 am

    भैया, आप लोग जिस http://www.raviwar.com में छपी टिप्पणी को लेकर इतनी बहस कर रहे हैं, उसकी सच्चाई जानने की कोशिश की है आपलोगों ने ? क्या यह बातचीत रिकार्डेड है ? अगर हां, तो सबसे पहले उसकी रिकार्डिंग का पता लगाया जाए, उसमें कहीं तथ्यों का हेरफेर तो नहीं है ?

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