प्रभाष जोशी चुप हैं। चुप्पी एक हथियार है। वो हथियार जिससे सत्ता बड़े से बड़े आंदोलन को दबाती है। प्रभाष जोशी पत्रकारिता के शलाका पुरुष हैं। वो इस हथियार से न केवल वाकिफ हैं। बल्कि इसकी मारक क्षमता के परिचित भी हैं। कुछ दिन पहले उन्होंने कागद कारे में लिखा कि बड़ी बेशर्मी है कोई जवाब भी नहीं देता। वो आहत थे। आहत इसलिए कि उन्होंने पैसे लेकर ख़बरें छापने का काला धंधा उजागर किया था उस पर कोई संस्थान जवाब नहीं दे रहा था। ठीक वैसे ही प्रभाष जोशी भी अपने इंटरव्यू से उठे सवालों पर जवाब नहीं दे रहे हैं। लेकिन अब उनके बदले कई लोग प्रतिक्रिया दे रहे हैं। अंबरीश कुमार, आलोक, संजय कुमार सिंह, गणेश प्रसाद झा, शमशेर सिंह… सभी के “नामों” से प्रतिक्रिया आई है। यहां हम उन सभी की प्रतिक्रिया छाप रहे हैं। उनकी ई-मेल आईडी भी। कोई खुद को प्रभाष जोशी का “लठैत” बता रहा है। कोई “पहलवान” तो कोई प्रभाष जोशी के इंटरव्यू पर सवाल उठाने वालों को “लफंगा” कह रहा है। अब आप इनकी भाषा पढ़िये और अपनी प्रतिक्रिया दीजिए। – मॉडरेटर
भारत के सबसे सिद्ध और प्रसिद्ध संपादक और उससे भी आगे शास्त्रीय संगीत से ले कर क्रिकेट तक हुनर जानने वाले प्रभाष जोशी के पीछे आज कल कुछ लफंगों की जमात पड़ गई है। खास तौर पर इंटरनेट पर जहां प्रभाष जी जाते नहीं और नेट को समाज मानने से भी इंकार करते हैं। कई अज्ञात कुलशील वेबसाइटें और ब्लॉग भरे पड़े हैं जो प्रभाष जी को ब्राह्मणवादी, सामंती और सती प्रथा का समर्थक बता रहे हैं। आगे पढ़ने के लिए जनादेश डॉट इन पर जाएं।
अंबरीश कुमार
ambrish_kumar2000@yahoo.com
रंगनाथ सिंह, आपने सही पहचाना। हम लोग प्रभाष जोशी के लठैत हैं। छात्र राजनीति से लेकर ट्रेड यूनियन की राजनीति की है और एक नहीं कई बार जेल गए हैं। इंडियन एक्सप्रेस यूनियन का जब मैं चुनाव लड़ा था तो प्रभाष जोशी के बारे में दूसरे पक्ष ने जो आपत्तिजनक टिप्पणी की, उस पर हिंसा हुई और मतगणना के दौरान ही आधा दर्जन लोग घायल हो गए। बंदूकें भी निकल आई थीं। उसी के बाद प्रबंधन और संपादकीय विभाग के बीच जो टकराव हुआ, उसके चलते हमारे तत्कालीन ब्यूरो चीफ कुमार आनंद ने इस्तीफा दे दिया। दूसरी तरफ इंडियन एक्सप्रेस के महाप्रबंधक को हटा दिया गया। इसके बाद प्रभाष जोशी ने हम लोगों से पूछा था कि कोई मुझे कुछ कहेगा तो क्या लड़ाई-झगड़ा करोगे? हम लोगों का जबाब तब भी हां था और आज भी हां है। कुमार आनंद बाभन नहीं हैं और न ही बाभन परिवार में मेरा जन्म हुआ। जनसत्ता का संपादकीय नेतृत्व क्या कर रहा है, इस पर कोई भी टिप्पणी कर सकता है। हो सकता है आपका लेख न छपा हो या फिर नौकरी आदि के संबंध में संपादक ने मिलने से मना कर दिया हो। जनसत्ता में जितने लेख छपते हैं, उन सभी से मैं सहमत हूं, जरूरी नहीं। कई पत्रकार भी चारण किस्म की पत्रकारिता करते हैं, उनसे भी हम सहमत नहीं हैं। मंडल को लेकर प्रभाष जी के विचारों से भी हम सहमत नहीं हैं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि प्रभाष जोशी जतिवादी और सांप्रदायिक पत्रकार हैं। बाबरी मस्जिद गिरने के बाद पूरे देश में किसी व्यक्ति ने अगर सांप्रदायिक ताकतों के खिलाफ सबसे मुखर मोर्चा खोला तो वे प्रभाष जी थे। उनके दाएं-बाएं संघी भी नजर आएंगे और वामपंथी भी। यदि आपको ब्लाग आदि का प्रचार करना हो तो यह मुहिम जरी रखिए। लेकिन यदि गंभीरता से बहस करना चाहते हों तो सड़क छाप शब्दों का इस्तेमाल बंद कर दीजिए। मियां, मौलाना और मुल्ला जसे शब्दों का जबाब हमें भी देना आता है। सती जसे मुद्दे पर हमने सड़क पर उतर कर जनसत्ता के संपादकीय का विरोध किया था और जब बिहार प्रेस बिल आया तो दिल्ली के इंडिया गेट पर रामनाथ गोयनका के नेतृत्व में जो विरोध प्रदर्शन हुआ, उसमें भी शामिल होकर अपना विरोध दर्ज कराया था। पता नहीं आप लोग कहां पर थे? ब्लाग पर बौद्धिक विरोध के साथ कुछ जमीनी विरोध की भी तैयारी करें।
धन्यवाद।
अंबरीश कुमार
गणेश प्रसाद झा
ganeshprasadjha@gmail.comमैं जनसत्ता में काम करने वाली महिला पत्रकारों की संख्या में थोड़ा सुधार करना चाहता हूं. जनसत्ता में उन दिनों एक और मिहला पत्रकार काम करती थीं. नाम था सावित्री बलूनी. इस तरह कुल पांच महिला पत्रकारों की संख्या बनती है. मैं चाहूंगा कि भाई अंबरीश जी उन पुराने दिनों को याद करें और इस संख्या में कुछ और जोड़ सकते हों तो कृपया जोड़ दें. मुझे याद नहीं आ रहा है. दूसरी बात यह कि नवभारत टाइम्स में मैंने भी कभी लड़कियों की फौज नहीं देखी. बुर्काधारी चार्वाक सत्य जी पता नहीं किस खिड़की से नभाटा में झांका करते थे. लगता है यहां बात जातिवाद की नहीं चल रही, जनसत्ता और प्रभाष जोशी जी के खिलाफ किसी न किसी बहाने खुन्नस निकाली जा रही है. साफ है कि ये सारे बुरकाधारी वही लोग हैं जो कभी जनसत्ता का टेस्ट पास नहीं कर पाए. क्योंकि जनसत्ता का टेस्ट तो उस दौर के बड़े-बड़े महारथी भी पास नहीं कर पाए थे. जिनमें काबिलियत थी सिर्फ वही लोग उस टेस्ट में पास हुए थे और नौकरी पा सके थे. अंबरीश जी ने बुर्काधारियों से बुर्का हटाकर सामने आने को ललकार ही दिया है. सो जो कोई लड़ना चाहते हैं वे चेहरा सामने लेकर आएं. जरा हम भी तो देखें कैसे-कैसे पहलवान हैं ये लोग.
शेश नारायण सिंह
sheshji@gmail.comप्रभाष जी को अपमानित करने के अभियान में शामिल लोगों से एक अपील
प्रभाष जी पर हमला करके क्या हासिल करने की तमन्ना है… उनको पतित कहना, ब्राह्मणवादी कहना, सीधी बात तो नहीं हो सकती…जो आदमी जिन्दगी भर गांधी जी की तरह सच की लड़ाई के अगले दस्ते का कमांडर रहा हो, उसको हमले का निशाना बना कर मूर्ती भंजक मुद्रा में खड़े होकर क्या हासिल करना चाहते हैं आप लोग? मैंने प्रभाष जी के साथ कभी काम नहीं किया लेकिन मैंने दिल्ली के वह भयानक 19 महीने देखे हैं जब इस देश में इमरजेंसी लगी हुयी थी. पत्रकारिता के बड़े बड़े सूरमा इंदिरा गांधी के कारिंदों के तलवे चाट रहे थे, उस दौर में यह आदमी विरोध के स्वर को ताक़त दे रहा था. एक बात और जिन लोगों ने प्रभाष जी के साथ काम नहीं किया है उन्हें मालूम ही नहीं कि प्रेस की स्वतंत्रता क्या चीज़ है. मेरे भाइयों, इस बात में कोई शक नहीं कि प्रभाष जोशी को गाली देने से नाम होता है. वैसे नाम कमाने के और भी रास्ते हैं. इसलिए अपने को बहुत भारी मूर्ती भंजक सिद्ध करने के लिए कोई और धंधा कर लो. हिन्दी पत्रकारिता के शलाका पुरुष को अपमानित मत करो क्योंकि हम जैसे लोग भी हैं जो प्रभाष जी के लेखन को पढ़ कर कुछ लिखना पढना सीखने में कामयाब हुए हैं. अपनी रोटी कमा रहे हैं. हम लोग बहुत मामूली लोग हैं. आप लोगों की ऊर्जा का जवाब नहीं दे सकते. लेकिन आपको यह बताना ज़रूरी समझते हैं कि हमें प्रभाष जी के खिलाफ अनर्गल प्रलाप सुन कर तकलीफ होती है.. और अगर कोई प्रभाष जी को जातिवादी कहने की हिम्मत भी जुटा सकता है तो उसका पत्थर का कलेजा होगा. आप लोग सूचना क्रान्ति के जिस मोड़ पर खड़े हैं, वहां से किसी को भी बे-इज्ज़त कर सकते हैं. इन्टरनेट का हथियार आपके पास है लेकिन प्रभाष जोशी को दफ़न करके आपके हाथ हिन्दी पत्रकारिता के नाम पर गर्व करने लायक कुछ नहीं बचेगा और किसी को गाली देकर आप महान नहीं बन जायेंगे. जहां तक प्रभाष जी का सवाल है वे निराला, अम्बिका प्रसाद वाजपेयी, मुंशी नवजादिक लाल श्रीवास्तव, पराड़कर की परंपरा के पत्रकार हैं उन्हें अपमानित करने की कोशिश न करें, आप पत्रकारिता का बहुत नुकसान कर रहे हैं.. मेरी बातों का बुरा मानकर मुझे ही मत गरियाने लगियेगा. मैं बहुत मामूली आदमी हूं।
गणेश प्रसाद झा
ganeshprasadjha@gmail.comभाई समरेंद्र जी,
जहां तक मेरा अपना अनुभव है, मैंने बिहार के गांव से आकर बीस से ज्यादा वर्षों तक दिल्ली में रहकर राष्ट्रीय स्तर पर पत्रकारिता की है. विभिन्न प्रदेशों, जातियों, धर्मों और संप्रदायों के पत्रकारों के बीच और उन सबके साथ मिलकर कई अलग-अलग संस्थानों में काम किया है. मुझे कभी एसा नहीं लगा कि भारत में पत्रकारिता में राष्ट्रीय स्तर पर कहीं कोई क्षेत्रवाद, जातिवाद, नस्लवाद या संप्रदायवाद है. सभी कुनबे के लोग साथ मिलकर एक परिवार के भाईयों की तरह काम किया. अनिल चमड़िया मेरे पुराने साथी हैं. बिहार में पत्रकारिता के दिनों के. मैं पहले दिल्ली आया, वे कुछ साल बाद आए. उसने ही पूछ लीजिए कि जातिवाद के घनघोर दलदल में फंसे बिहार में पत्रकारिता में कभी कोई जातिवाद था क्या. हम जब बिहार से चलकर दिल्ली आए तो दिल्ली की राष्ट्रीय पत्रकारता में भी कभी कोई जातिवाद नहीं देखा. पत्रकारिता में किसी तरह का जातिवाद होने की कभी किसी ने कोई कल्पना ही नहीं की. कभी किसी साथी के मन में एसी कोई फीलिंग ही नहीं रही. आपलोगों ने यह जो लाइन ली है और जो बहस छेड़ रखी है इस पर तो हमारा कभी ध्यान ही नहीं गया. किसी ने कभी इस लाइन पर सोचा ही नहीं और न कभी एसा सोचने की किसी ने जरूरत ही समझी. यह अचानक आपलोग क्या करने लगे हैं. यह कैसा जहर घोल रहे हैं मीडिया समाज में. एसा करके आप लोग मीडिया समाज को जातिवादी सोचवाला बना रहे हैं या बना देंगे. जो जातिवादी जहर मैंने बिहार की राजनीति में देखी है उसे आपलोग मीडिया में क्यों पिरोने मे लगे हैं. जानते हैं इसका काफी दूरगामी असर भी हो सकता है, और अगर असर हो गया तो कल्पना कीजिए कि फिर क्या-क्या होने लगेगा. हम पत्रकार देश की राजनीति के जातिवादी चेहरे पर हमेशा से लिखते रहे हैं, उसका पुरजोर विरोध करते रहे हैं. पर हमने अपनी विरादरी को कभी इस जहरीले रंग में रंगने नहीं दिया. पत्रकार इस जहर से हमेशा दूर ही रहे. आपकी इस तरह की बहसें देश की पत्रकारिता की पवित्र सलिला गंगा को गंदला और जहरीला कर रही हैं. इसे फौरन रोक दीजिए. हम सारे पत्रकार आपस में भाई-बंधु हैं. हमें मिलकर रहने और काम करने दीजिए. मेरी आपसे याचना है कि हमारी पत्रकार विरादरी को कृपया इस क्षेत्रवाद, जातिवाद, संप्रदायवाद और नस्लवाद के टुकड़ों में मत बांटिए.
राजपूत
jansatta@expressindia.comढक्कन किस्म के ठाकुर ब्लॉगर हैं। इनपर समय फालतू में क्यों ख़राब किया जाए। एक बलिया का दूसरा बनारस का चवन्नीछाप है।
sanjeet kumar singh
August 27, 2009 at 10:18 pm
अम्बरीश कुमार हो या आलोक तोमर या फिर शेष नारायण सिंह क्या गलत कहा है .आप क्या पत्रकारिता के दरोगा है जो फतवे पर फतवा दिए जा रहे है पत्रकारिता में आप का योगदान क्या है वेबसाइट चमकाने के लिए पत्रकारिता को कोठे पर न ले जाये.
विनीत कुमार
August 27, 2009 at 11:10 pm
प्रभाषजी के समर्थन में आए पत्रकार भाईयों की लगता है लिखने के पहले जमकर मीटिंग हुई है। वैसे भी इतनी चुप्पी के बाद एक जुबान से एक भाषा बोलने में टाइम तो लगता ही हैं।
प्रभाष जोशी जवाब दें
August 28, 2009 at 7:15 am
प्रभाष जोशी का बयान- “‘नई दुनिया’ ने पहली बार खेल का कवरेज चालू किया तो मैं वो पेज निकाला करता था. उस पेज में यह था कि नायडू साहब का कुछ छपे, जगदाले साहब का कुछ छपे तो इनकी तरफ से मैं घोस्ट राइटिंग किया करता था. उस घोस्ट राइटिंग के कारण मुझको लगा कि यह मामला लिखकर आगे बढ़ाया जा सकता है.”
QUESTION – पाठक् जिसे खिलाड़ियों लेख समझते थे वो मूलतः किसी भूत लेखक का लिखा हुआ था। शलाका पत्रकार की इस हरकत से पाठकों के संग छल हुआ था या नहीं ???
प्रभाष जोशी जवाब दें
August 28, 2009 at 7:27 am
प्रभाष जोशी का बयान – “आपकी टीम इंग्लैंड जाती है तो आप के जितने भी लोग ब्रिटिश नागरीक हो गये है, वो वहां जाकर ब्रिटेन की टीम के लिए चीयर नहीं करते है, वो आपकी टीम के लिए चीयर करते है. जिस देश को छोड़ आए है, जिस देश की नागरिकता भी छोड़ दी. उस देश के मूल के आप हैं, इसलिए अपनी टीम को आप चीयर करते है. अब अगर एक मुसलमान पाकिस्तान की टीम को चीयर करता है तो आप को आपत्ति क्यों होनी चाहिए ? ”
QUESTION – शलाका पत्रकार बताएं कि भारत में रहने वाले मुसलमान कहां के मूल नागरिक हैं ?
जिस तरह कुछ भरतीय लोग ब्रिटेन में जा बसे हैं उस तरह भारत में कौन आ बसा है ?
प्रभाष जोशी जवाब दें
August 28, 2009 at 7:32 am
प्रभाष जोशी का बयान – “…. वीर सावरकर ने हिन्दूत्व में बहुत पहले ये कहा कि आप अगर कल किसी से लड़ोगे तो क्रिश्चियन और मुसलमान आपकी सेना के खिलाफ हो जायेंगे. यूरोप के दो उदाहरण उन्होंने दिए.
आज तक आपने देख लिया कि तीन युद्ध हो गये पाकिस्तान से, ऐसा कभी नहीं हुआ कि मुसलमानों की बस्ती ने पाकिस्तान की मदद करनी चालू कर दी. एक जगह ऐसा नहीं हुआ तो फिर आप उनकी निष्ठा पर संदेह क्यों करते हैं ? ”
QUESTION – शलाका पत्रकार बताएं कि वीर सावरकर ने सर्वधर्म समभाव पर और क्या-क्या कहा था ?
प्रभाष जोशी जवाब दें
August 28, 2009 at 8:00 am
प्रभाष जोशी का बयान – “अपने यहां मुसलमान कौन हुए? मुसलमान वो हुए, जो हाथ से काम करने वाले लोग थे. जुलाहे, लोहार, कुम्हार जो-जो भी हाथ से काम करने वाले लोग थे और जिनको आप के समाज में इज्जत की नजर से नहीं देखा जाता था, वो लोग मुसलमान हुए. वे स्वाभाविक रूप से हाथ को, उंगलियों को हैंडल करने वाले लोग थे. उनकी स्किल हमसे और आप से बेहतर है क्योंकि वो हाथ से ही काम करने वाले लोग थे. हम दिमाग से काम करने वाले लोग है.”
QUESTION -शलाका पत्रकार विस्तार से बताएं कि लोहार और कुम्हार को परंपरागत भारतीय ग्रामीण समाज में किस नजर से देखा जाता था ? जुलाहा के पेशा भारत में कब से है यह भी बताएं ? अगर थोड़ी देर के लिए मान लिया जाए ये कि ये पेशे भारत मे अपमानजनक रहे हैं तो प्रभाष जोशी बताएं कि देश के समस्त लोहार और कुम्हार जाति में से कितने प्रतिशत लोग इस अपमान से मुक्ति के लिए मुस्लिम बने ? अपमान से मुक्ति की यह राह दूसरों को क्यों नहीं सूझी ?
ग्रामीण समाज में अत्यंत महत्वपूर्ण और सम्मानित इन पेशों से बहुत ज्यादा अपमानजनक स्थिति में जीने को मजबूर सभी दलितों मुस्लिम क्यों नहीं बने ?
शलाका पत्रकार साफ-साफ बताएं कि देश में कौन-कौन सी जातियां हाथ से काम करने वाली हैं और कौन सी दिमाग से काम करने वाली ??
प्रभाष जोशी जवाब दें
August 28, 2009 at 8:15 am
प्रभाष जोशी का बयान – “जैसे सिलिकॉन वैली अमेरिका में नहीं होता, अगर दक्षिण भारत में आरक्षण नहीं लगा होता. दक्षिण के आरक्षण के कारण जितने भी ब्राह्मण लोग थे, ऊंची जातियों के, वो अमरीका गये और आज सिलिकॉन वेली की हर आईटी कंपनी का या तो प्रेसिडेंट इंडियन है या चेयरमेन इंडियन है या वाइस चेयरमेन इंडियन है या सेक्रेटरी इंडियन है. क्यों ? क्योंकि ब्राह्मण अपनी ट्रेनिंग से अवव्यक्त चीजों को हैंडल करना बेहतर जानता है. क्योंकि वह ब्रह्म से संवाद कर रहा है. तो जो वायवीय चीजें होती हैं, जो स्थूल, सामने शारिरिक रूप में नहीं खड़ी है, जो अमूर्तन में काम करते हैं, जो आकाश में काम करते हैं. यानी चीजों को इमेजीन करके काम करते हैं. सामने जो उपस्थित है, वो नहीं करते. ब्राह्मणों की बचपन से ट्रेनिंग वही है, इसलिए वो अव्यक्त चीजों को, अभौतिक चीजों को, अयथार्थ चीजों को यथार्थ करने की कूव्वत रखते है, कौशल रखते हैं. इसलिए आईटी वहां इतना सफल हुआ. आईटी में वो इतने सफल हुए. ”
QUESTION – सिलिकान अमरीका में क्यों है फिर से बताएं ? अमरीका के किन टाप आईटी कंपनी के टाप अधिकारी ब्राह्मण हैं ? ब्राह्मण-ब्रह्म संवाद क्या है इसे स्पष्ट करें ? वायवी कामों में ब्राह्मणों की बचपन से ट्रेनिंग से उनका क्या आशय है ?
भारती
August 28, 2009 at 8:48 am
ऊपर पूछे गए सवाल रविवारडाटकाम पर आठ पेज में छपे प्रभाष जोशी के साक्षात्कार के पहले तीन पेज से पूछे गए हैं। शेष पांच पेज में भी ऐसे कई सवाल हैं जिन पर प्रभाष जोशी को जवाब देना चाहिए। यहाँ पूछे गए प्रश्नों के जवाब प्रभाष जोशी के समर्थक भी दे सकते हैं। प्रभाष जोशी और उनके समर्थक में थोड़ा भी नैतिक साहस बचा है तो इस साक्षात्कार को जनसत्ता में छाप कर दिखाएं। उसके बाद पाठकों की प्रतिक्रिया से उनके भविष्य का फैसला हो जाएगा।
कुछ लोग जिनकी भाषा लंपटो जैसी है वो प्रभाष जोशी के समर्थन में खड़े हो कर अपना नाम चमकाना चाहते हैं। कुछ को प्रमोशन चाहिए। कुछ बेरोजगारों को नौकरी चाहिए। कुछ ऐसे हैं जिन्हें प्रभाष जोशी ने जनसत्ता से भगा दिया और बकौल प्रभाष जोशी निकाले जाने के बाद वो कुछ नहीं कर पाए।
लेकिन सबसे बुरे हैं वो हैं जिनके बारे में लोग कह रहें हैं कि इन सब को किसी संपादक ने पैसे खिलाएं है। इस बात के लिए कि तुम लोग प्रभाष जोशी के गलत पक्ष में कुतर्क करो। नौजवान लड़के हैं भड़क उठेंगे। और तब प्रभाष जोशी की हालत टाइट हो जाएगी। कुछ लोग हैं कि वो सार्वजनिक रूप से प्रभाष जोशी के पक्ष में किए गए मार-पिटाई तक का जिक्र करके प्रभाष जोशी को अपना पुराना एहसान दिलाना चाहते हैं। अब उसकी कीमत चाहते हैं।
बहुत से लोगों के मन में यह सवाल उठ रहा है कि प्रभाष जोशी ने अपने ,अब अधेड़ हो चुके लठैतों को सिर्फ गाली-गलौच करना सिखाया है क्या ?
संजय कुमार सिंह
August 28, 2009 at 11:40 am
जनतंत्र पर और इन दिनों प्रभाष जोशी का समर्थक मैं भी हूं (घोषित नहीं, स्वंयभू)। इसलिए आपको बताना चाहता हूं कि संपादकों का छपा हुआ इंटरव्यू उनके मौजूदा या पुराने अखबारों में छापने का कोई कानून इस देश में नहीं है। यह पूरी तरह (मौजूदा) संपादक के विवेक पर निर्भर करता है कि वह अपना या पूर्ववर्ती संपादक के चर्चित इंटरव्यू को स्थान दे या नहीं। देश में ऐसा भी कोई कानून नहीं है कि किसी अखबार का संपादक अपने पूर्ववर्ती संपादक का समर्थक हो ही। अगर ऐसा नहीं है तो आप जनसत्ता के मौजूदा संपादक को बिलावजह चुनौती दे रहे (रही) हैं और इस विवाद में घसीट रहे (रही) हैं।
प्रभाष जोशी का अब जनसत्ता अखबार से शायद ही कोई लेना देना है। उनका कॉलम कागद कारे जरूर छपता है पर इसका मतलब यह नहीं है कि अखबार की संपादकीय नीति उन्हीं की है।
शंबूक
August 28, 2009 at 10:38 am
डेविड ने गोलियथ को धूल चटाई है
जनतंत्र को गाली देने और धमकाने (जैसा कि अंबरीष ने कहा है कि प्रभाष जोशी के बारे में आपत्तिजनक कहने पर बंदूकें निकल आई थीं) का एक ही मतलब है कि निशाना वहां लगा है, जहां सबसे ज्यादा दर्द होता है। बुजुर्ग संपादक के बूढ़े होते लठैतों के मुंह से निकलती झाग बता रही है कि जनतंत्र ने क्या कर दिखाया है। सिद्ध, प्रसिद्ध, स्वयंसिद्ध, नायक, महानायक और न जाने क्या क्या (दोस्तो ये भाषा कहां से सीखते हो) कहलाने वाले जोशी जी अब संदेह के दायरे में है। अब उनके हर लेखन, उनके द्वारा बांटे जानी हर पदवी, हर पुरस्कार, उनके हर रिकमंडेशन, उनके हर सार्वजनिक कृत्य की सामाजिक समीक्षा होगी। ये छोटी बात नहीं है। डेविड ने गोलियथ को धूल चटाई है। इसे लोग आने वाले कई साल तक भूल नहीं सकते। ब्राह्मणवाद के समर्थक तो इसे जन्म-जन्मांतर तक भुला न पाएंगे और प्रतिशोध की आग में जलते रहेंगे।
और चापलूसी करने वाले जान लें कि दुनिया में चापलूसी का इतिहास नहीं लिखा जाता। लेकिन ये दर्ज जरूर होता है। और जोशी जी ने साफ कह दया है कि आपमें से ज्यादातर में धारण क्षमता है ही नहीं और न आप ब्रह्म से संवाद करने में सक्षम हैं। इसलिए आप लोगों को कुछ मिलने वाला नहीं है। इस्तेमाल आप लोग जरूर होंगे।
sanjeet kumar singh
August 28, 2009 at 11:29 am
jantantra dhol bajakar nache aur sambuko jaise benami badhbhujo aur vidushko se commement karata rahe is khel se trp nahi badhne vali .
sanjeet kumar singh
August 28, 2009 at 11:33 am
bhasha ke liye prabhash joshi jaise sampadak ka netritva chahiye assi ke ghaat par khaini khakar budhivilash karne se bhasha nahi aa jayegi pappu.
राजेश पांडे
August 28, 2009 at 12:34 pm
अब बात समझ में आ रही है कि आलोक तोमर कैसी रिपोर्टिंग करते रहे होंगे। वैसे जानने वाले बताते हैं कि आलोक तोमर बहुत बड़े झूठे और लफ़्फाज हैं। अपनी इन्हीं हरकतों की वजह से जनसत्ता से लतियाए गए थे और एक बार लतियाए जाने के बाद अब तक कहीं ठौर नहीं मिला है। जानने वाले यह भी बताते हैं कि लिखते वक़्त भी तथ्यों का खयाल नहीं रखते। खैर जब गुरू (प्रभाष जोशी) ही तथ्यों का ख्याल नहीं रखता तो चेला क्यों और कैसे रखेगा? यकीन नहीं हो तो आलोक तोमर के बारे में राम बहादुर राय जी की राय पढ़िए। ”नया तो नहीं कहेंगे लेकिन भाषा के करिश्मे में आलोक तोमर का कोई मुकाबला नहीं है। मगर वह तथ्यों के बारे में सावधानी नहीं बरतते।“ प्रभाष जोशी के इस अंधभक्त चेले पर इससे अधिक कुछ भी कहना खुद को उसके स्तर तक गिराना होगा। इससे किसी भी संवेदनशील शख़्स को बचना चाहिए।
ambrish kumar
August 28, 2009 at 2:50 pm
समरेन्द्र जी ,आप से बात हो चुकी थी आप से मेरे सम्बन्ध करीब दशक भर पुराने है .यह जानकारी मिलने के बाद बाद कोई विवाद नहीं बचता .फिर भी अब लोग निजी हमला करने लगे है .लठैत मुझे आप के रंगनाथ सिंह ने बनाया था जिसे मैंने स्वीकार किया .भाषा बदलने की शुरुवात भी हमने नहीं आप के लोगो ने की .प्रभाष जोशी हम लोगो के संपादक ही नहीं अभिभावक भी रहे है और जब सब्द बुरा लगता है तो विरोध किया जाता है अलोक तोमर जिस साईट की तारीफ करते है उस साईट के लोग ही उन्हें गाली दे रहे है .निजी हमला भी जरी रखे पर इससे जनतंत्र की साख क्या बनेगी यह जरुर सोचे.मैंने एक घटना का जिक्र किया था यह बताने के लिए की प्रभाष जी को यदि कुछ कहा जायेगा तो हम लोगो को बुरा लगेगा .इसे आप लोग धमकाने की भाषा समझे तो क्या किया जा सकता है.न ही हमरा मकसद किसी को धमकाना है जैसा की एक बहनजी ने कहा और न ही हम किसी आरोप प्रत्यारोप से डरने वाले है . कुछ लोग पत्रकारिता और भाषा भी सिखा रहे . मंडल से लेकर कमंडल तक हम लोग मोर्चा लेते रहे है आगे भी लेंगे .पर जिन ताकतों को साथ होना चाहिए वे आपस में टकराए यह उचित नहीं है
समरेंद्र
August 28, 2009 at 3:01 pm
जनतंत्र की तरफ़ से आप सभी से एक अपील है। बहस की गरिमा बनाए रखने की अपील। अभी कई ऐसी टिप्पणियां आई हैं जिनमें लोगों ने एक दूसरे पर बेहद निजी हमले किए हैं। भद्दे शब्दों का इस्तेमाल किया है। ये ग़लत है। जनतंत्र को हमें वैचारिक बहस की जगह के तौर पर तैयार करना है, जहां छोटे-बड़े, जवान-बुजुर्ग, सभी बिना हिचक अपनी प्रतिक्रिया दे सकें। इसे किसी के चरित्रहनन का जरिया नहीं बनाना। आपको जनतंत्र से कोई शिकायत हो तो उसके ख़िलाफ़ लिखें, हम आपकी शिकायत छापेंगे। लेकिन किसी और के बारे में किसी भी तरह की भद्दी टिप्पणी नहीं छापी जाएगी। इसलिए आप सभी से यही गुजारिश है कि टिप्पणी करते वक़्त थोड़ा संयम रखें। एक स्वस्थ बहस की परंपरा का पालन करें।
धन्यवाद
समरेंद्र
दिलीप मंडल
August 28, 2009 at 3:34 pm
समरेंद्र, आपने सही स्टैंड लिया है। अंबरीश जी आपके परिचित नहीं होते, तो भी मुझे भरोसा है कि आप ऐसा ही स्टैंड लेते। अगर यहां जोशी जी के इंटरव्यू और उससे जुड़े मुद्दे पर बातचीत हो रही है तो निजी हमलों का स्पेस नहीं होना चाहिए। उनसे लंबे समय से सीखता रहा हूं। सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर उनके विचार जगजाहिर हैं और वो हमेशा जनपक्षीय सरोकारों से जुड़े रहे हैं। सती से लेकर मंदिर, मंडल और आजमगढ़ में कथित आतंकवाद तक हर महत्वपूर्ण मौकों पर उन्होंने खुलकर पक्ष लिया है। मुद्दों पर बात करें तो उनके लेखन में कोई एक कमजोरी नहीं निकाल सकता। मेरे ख्याल से इसके खतरे उन्होंने उठाए होंगे। वैचारिक असहमति के बावजूद प्रभाष जी के प्रति अगर उनके मन में श्रद्धा है तो ये आस्था का प्रश्न है। किसी के व्यक्तित्व में कई रंग होते हैं और ऐसे ही मिले जुले आदमी तो हम सब हैं।
किसी पर निजी हमले करते हुए हमें ये नहीं भूलना चाहिए कि ऐसे हमले किसी पर भी किए जा सकते हैं। प्रभाष जी के इंटरव्यू से मुझे शिकायत है। जाति श्रेष्ठता पर उनके विचारों से मेरी घोर असहमति है। इसलिए मैंने अपनी बातें खुलकर रखी हैं। उन्हें आप मोहल्ला लाइव पर पढ़ सकते हैं। बहस इस इंटरव्यू के आसपास हो सके तो बेहतर क्योंकि हम सब आखिर एक सुंदर समाज ही तो चाहते हैं। धन्यवाद
रंगनाथ सिंह
August 28, 2009 at 4:00 pm
श्रीमान अंबरीश कुमार
आप जिस स्तर पर उतर चुके थे उसे देखने के बाद मैंने आप का जवाब देना उचित न समझा। लेकिन आप हैं कि कहते हैं अब मैं कुछ नहीं बोलूंगा और फिर भी बोलने से बाज नहीं आते। आप बोलिए यही जनतंत्र है। लेकिन तथ्यो को तोड़-मरोड़ कर न परोसे। आपको मैंने लठैत नहीं कहा। मैंने लठैती करना के मुहावरे का प्रयोग किया था। इस मुहावरे के प्रयोग की वजह आप की दबंगई वाली भाषा थी। पहले आप ने मुझ पर व्यंग्य कसा है कि…आप भी कहीं के संपादक होंगे?….. ? नए लड़कों से ऐसे प्रश्न पूछना किस शालीनता के दायरे के तहत आता है ? आप ने कहा,… आप भी अपना परिचय दे दे तो…. बहस में लिखने वाले का बायोडेटा खंगालने का क्या मकसद होता है ? उससे पहले आप ने कहा कि जोशी जी का समय जा चुका अब आप ही लोग हमारा मार्गदर्शन कर दें…. !! ऐसे वाक्यों में कितनी शालीनता है जरा यह भी बताएं ?
आप के ऐसे तमाम छिछले भड़काऊ फिकरों के बाद ही मैंने वो मुहावरे का प्रयोग किया। उसके जवाब में आप ने जो लाठी, बल्लम, बंदूक का पुराण पढ़ा उसे देख कर तो कोई भी शालीन आदमी शरमा जाएगा। आप भले न शरमाएं। और जब आप मानते ही हैं कि आप प्रभाष जोशी के लठैत/गनमैन हैं तो फिर ऐसा कहने पर भड़कते क्यों है ?
आप में बौद्धिक समझ के बारे में लोगों के बीच दो राय सकती है लेकिन आपकी साफगोई के हम मुरीद हो चुके हैं। प्रभाष जोशी के पक्ष में बावजह बंदूक चलाने को तैयार रहने का उदघाटन तो आप पहले ही कर चुके थे। अब आप कहते हैं कि आप समरेन्द्र को दस साल से जानते हैं इसलिए आप के पास बहस की कोई वजह नहीं बची !!
श्रीमान जी आप हम सब को बताएं कि क्या आप हमेशा व्यक्तिगत संबंधों के आधार पर बहस करते हैं ??? हालांकि आप के अपने बयानो से यह जाहिर हो चुका है लेकिन मैं आपके मुंह से सुनना चाहता हूं।
आप ने समरेन्द्र से कहा कि आप के रंगनाथ सिंह……श्रीमान जी आप ने मुझे समझा क्या है? आपके हिसाब से इस जंगल के सारे प्राणी पालतू हैं क्या? समरेन्द्र से तो आपकी बात होने ही लगी है पूछ लीजिएगा कि क्या उनका मेरा कोई संबंध है? खैर आपका संबंध तो दस साल पुराना है !!
यह भी स्पष्ट कर दूं कि मेरे नाम से जो दोनों पोस्ट लगी हैं वो मैने कमेंट किए थे जिसे माडरेटर ने अपनी स्वेच्छा से पोस्ट रूप में लगाया था, मैने कहा नहीं था, इसकी भी फोन घुमा कर तस्दीक कर लीजिएगा।
आप के इस कमेंट को देखने के बाद मैं आप के पिछले कमेंट जिसके अंत में आप ने झूठी खेद अदायगी की थी उसका जवाब लिखने जा रहा हूँ। वहीं पढ़ लीजिएगा।
विनीत कुमार
August 28, 2009 at 6:18 pm
आप के ऐसे तमाम छिछले भड़काऊ फिकरों के बाद ही मैंने वो मुहावरे का प्रयोग किया। उसके जवाब में आप ने जो लाठी, बल्लम, बंदूक का पुराण पढ़ा उसे देख कर तो कोई भी शालीन आदमी शरमा जाएगा। आप भले न शरमाएं। और जब आप मानते ही हैं कि आप प्रभाष जोशी के लठैत/गनमैन हैं तो फिर ऐसा कहने पर भड़कते क्यों है ?…
यकीन मानिए,ये है तर्क की भाषा। पत्रकारिता के भारी-भरकम अनुभव लेकर जो लोग यहां बहसबाजी कर रहे हैं,अगर उनमें कुछ सीखने का शउर बचा है तो सीख लें कि नए मिजाज के लोगों की बातों में कितना तर्क है। रंगनाथ सिंह की बातों से सौ फीसदी सहमति।..
ambrish kumar
August 28, 2009 at 8:13 pm
rangnath ji
baat yah nahi hai ki samrendra ko mai janta hu isliye bahash khatam ho gai .site ke piche koun hai jab tak yah pakki jankari na mil jaye tab tak galatfahmi ho sakti hai .samrendra ka stand hum jante hai prabhash ji se unki koi khunnas bhi nahi rahi hai jo ve kar rahe the uski unhone puri jankari di aur usme bahash ke star ke alawa sabhi se mai sahmat hu. .lekin aap ke vyang aur sabd patrkarita ki nai jamat ki nahi balki kafi anbhavi hi nazar aa rahi thi .delhi se mai 10 saal se bahar hu aur vaha bahut se log bahut upar pahuch gaye hai.sabki jankaari mai rakhta bhi nahi aur jyadatar sampadak bhi ho chuke hai .sampadak me pratibha ho yah jaruri bhi nahi.likhne ko aap aajad hai jo chahe likhe. aap isase nahi jude hai iska javab aap khud dhamki ki bhasha me de rahe hai .1980 -90 ke dashak me delhi ke akhbaro khaskar times aur indian express me hinsa ki jabardat rajniti hui aur jo sanjay singh comment kar rahe hai ve un logo me samil hai jin par rod aur tezab se hamla kiya gaya tha.iska ullekh karne ka matlab aap dhamkane se nikalna chahe
to nikaal sakte hai. baki aap kuch likh denge aur me bila jaunga to yah mugalta pale rahe .10 salo me maine kam se kam 40 patrkaaro ko akhbaar se joda aur unki madad ki .par koi vyang karke soche ki mai javab nahi dunga yah galat hai .aap
ko apna parichay dena nagvaar gujre to uska koi javab nahi hai. jaha tak dabangai ki bhasha hai to yah likhte likhe budhe ho chuke hai aur roj likhte hai.
रंगनाथ सिंह
August 29, 2009 at 3:40 am
अंबरीश जी
सर्वप्रथम,आपको मेरे लेखनी एक परिपक्व व्यक्ति की या पिछले पीढ़ी के पत्रकारों सी लगती है……. इस अकुंठ तारीफ के लिए आभारी हूँ। आप जैसे अनुभवी पत्रकार के मुंह से ऐसी तारीफ सुन कर हुई खुशी को मैं हर्गिज नहीं छिपाना चाहता।
श्रीमान जी शिकायत यह है कि आपने अपने कमेंट की शुरूआत ऐसे की है जैसे हमारे बीच गलतफहमी हो गई है। लेकिन हर अगली लाईन के साथ आप तेवर दिखाते गए हैं। हम में से किसने पहले तंज किया था इस बेबात की बात को हटाइए। मैं आप को जो बात बुरी लगी हो उसके लिए माफी मांगता हूं।
अब मुझे उम्मीद है कि आप मेरे प्रति कटुता थूक कर प्रभाष जोशी से पूछे गए प्रश्नों के उत्तर देने की कोशिश करेंगे। मुझे यह भी उम्मीद है कि आप अपनी तई प्रयास करेंगे कि प्रभाष जोशी के ऊपर जिस साक्षात्कार के कारण इतने सवाल उठे हैं वो उसका स्पष्टीकरण दें। आप ही सोचिए कि उनकी चुप्पी का क्या राज है ?
जबकि अभी हाल ही में वो दूसरों की चुप्पी को बेशर्मी बता चुके हैं। उसी कागद कारे में उन्होंने बहस कल्चर को बचाने के लिए इंटरनेट वालों की तारीफ भी की थी। उन्होंने बहस के लिए गुत्थमगुत्था शब्द का प्रयोग किया था। मुझे उम्मीद है कि आप हमारी तरफ से मामला का संज्ञान लेते हुए हमारा पक्ष उन तक पहुंचाएंगे। आप उन्हें बताइएगा कि उनके दिए बयानों पर एक बार फिर इंटरनेट पर गुत्थमगुत्था चल रही है।
आप ने अभी तक जो साहस और ईमानदारी दिखाई है उसे देखने के बाद मुझे पूरी उम्मीद है कि आप जल्द ही हमें इस संदर्भ में प्रभाष जोशी के विचारों से अवगत कराएंगे।
आप बुरा न माने तो कहूं (छोटा मुंह बड़ी बात) ….
श्रीमान जी ऐसे द्रोण से बचिए जो आप के लिए किसी एकलव्य का अंगूठा काट ले… इतिहास आप को भी गाली देगा। उन्हें तो देगा ही।
आप उन परशुरामों से भी बचिए जो कर्ण को सारी विद्या सिखाने के बाद यह शाप दे दे कि जा तु यह विद्या ऐनवक्त पर भूल जाएगा!! इस ब्रह्मजाल से बचिए श्रीमान जी।
खरी बात
August 28, 2009 at 9:50 pm
मैं कुछ लोगों का नाम लिए बगैर उनके लिए शिखंडी शब्द का इस्तेमाल करना चाहता हूं, क्योंकि प्रभाष जोशी की युद्धनीति में अब यही खेल हो रहा है। वो खुद भी आगे नहीं आ रहे है न ही किसी कुलीन ब्राह्मण को बचाव के लिए आगे कर रहे हैं।
आधुनिकता
August 29, 2009 at 10:32 am
प्रभाष जोशी, आपको मालूम नहीं आपने समाज का कितना अहित किया है। आज ज्यादातर ब्राह्मण शहरों में नौकरी कर रहे हैं, पंडा नहीं है वो। अपने श्रम का खाते है, कोई हजारों साल की धारण क्षमता का नहीं खाते। और आप कैसे इंसान हैं जो कहते हैं कि वो ब्रह्म से संवाद करते हैं। सुलभ शौचालय के संस्थापक बिंदेश्वर पाठक से सीखिए, जिन्होंने एक अपारंपरिक अब्राह्मण क्षेत्र में आकर कितना बड़ा काम किया है। लाखों लोगों को शुचिता सिखाई है। मंगल पांडे से सीखिए, जिन्होंने शस्त्र धारण किया। उन ब्राह्मण कारोबारियों से सीखिए, जो वाणिज्य में अपना हुनर दिखा रहे हैं। सीखना हो तो नारायणमूर्ति से सीखिए।
सीखना तो आपको उन ब्राह्मण चपरासियों से भी चाहिए जो लाखों की संख्या में दफ्तरों में लोगों को पानी पिला रहे हैं लोगों की सेवा कर रहे हैं और अपना परिवार चला रहे हैं, बच्चों को बेहतर शिक्षा देने की कोशिश कर रहे हैं। मैक्डॉनल्ड और पिजा हट जैसे हजारों रेस्टोरेंट में काम करने और जूठी प्लेट उठाने वालों की जाति के बारे में जानते हैं आप। वो युवा आपसे बेहतर इंग्लिश बोलते हैं और मजे से अपना काम करते हैं और पेसे बचाकर गर्ल फ्रैंड या ब्वॉय फ्रैंड के साथ पब और डिस्को भी हो आते हैं। वो आपकी तरह पोंगापंथी नहीं हैं। ब्राह्मण आज जीवन के हर क्षेत्र में है। हर तरह का काम करता है। मेहनत करके जीता है। आप जैसे लोगों के कारण समाज में कड़वाहट बढ़ती है। रोकिए इसे और माफी मांगिए।
Ganesh Prasad Jha
August 29, 2009 at 6:40 pm
प्रिय विनीत जी, लगता है आपने जनसत्ता और उसके नए-पुराने तमाम लोगों से खुन्नस इसलिए पाल ली है क्योंकि आपने पिछले दिनों जनसत्ता में अपनी कोई रचना या फिर कोई लेख छपने के लिए भेजा हो और वह नहीं छपा हो. भाई लेख या रचना छापना या न छापना तो अखबार के संपादक का अधिकार क्षेत्र है. आपने कुछ भेजा और वह नहीं छपा तो शायद इसलिए कि संपादक ने आपकी उस रचना को अखबार के स्थापित स्तरों के काबिल नहीं माना गया होगा. जनसत्ता की अपनी एक स्तरीय भाषा है. हर कोई जनसत्ता के स्तर का लेखन नही कर सकता. इसमें दुखी होने की कोई बात ही नहीं है. जनसत्ता में रहते हुए हमलोग अक्सर बड़े-बड़े तीसमार खां पत्रकारों की रचनाएं रद्दी की टोकरी के हवाले कर दिया करते थे क्योंकि उन रचनाओं में कोई दम नहीं होता था और वे अक्सर घटिया दर्जे की होती थी. छपती सिर्फ वहीं रचनाएं थी जो जनसत्ता के स्तर की होती थी. इससे आप नाराज क्यों हो रहे हैं. दोबारा कुछ लिख भेजिए. शायद वह पीस आप जनसत्ता के लिहाज से स्तरीय लिख सकें. कोशिश करने में क्या बुराई है. स्पाईडर की तरह बार-बार कोशिश करते रहना चाहिए आपको. खुन्नस छोड़िए और खुश रहा करिए. लिखते रहिए. एक दिन सफलता जरूर मिलेगी.
शंबूक
August 29, 2009 at 7:37 pm
स्तरीय जनसत्ता के बारे में कल सुबह अपने हॉकर से बात कर लीजिएगा। सच के कुछ टुकड़े तो वो आपको बता देगा। यहां कोई जनसत्ता में छपने के लिए मरा नहीं जा रहा, जहां तीसमारखां रचनाकारों की रचनाएं आप कूड़े के ढेर में फेंक देते थे। और जनसत्ता की ये दशा महानायक संपादक के काल में ही हो गई थी। आज के संपादकों को तो ऐसा ही अखबार मिला था।