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पाकिस्तानी मंदिरों पर रिपोर्ट – पर्दे के पीछे की कहानी

पाकिस्तान से रिपोर्टिंग अपने आप में चुनौती का काम है। भारत और पाकिस्तान के बीच हमेशा जो एक शक का माहौल रहता है। उसके मद्देनज़र दोनों देशों के पत्रकारों की चुनौती और बढ़ जाती है। पाकिस्तान की ज़मीन से रिपोर्टिंग करने के मुझे अब तक तीन मौक़े मिले हैं। ये तीनों ही मौक़े पाकिस्तान की इतिहास के अहम पड़ाव रहे हैं… इमरजेंसी, बेनज़ीर की हत्या और आम चुनाव।

पाकिस्तान में हिंदू मंदिरों की हालत पर मेरी इस रिपोर्ट की अहमियत इसलिए बढ़ जाती है क्योंकि इसे मैंने तमाम मुश्किलातों के बीच तैयार की है।
1- स्थानीय वीज़ा के बिना
2- ख़ुद कैमरा चलाते हुए
3- कठिन पहाड़ी रास्ता और
4- पाकिस्तान में इमरजेंसी के हालात

पाकिस्तान जाने वाले भारतीय नागरिकों को वहां के हर ज़िले के लिहाज़ से वीज़ा लेना होता है। मतलब अगर वीज़ा लाहौर का है तो आप सिर्फ लाहौर जाएगे… आस पास के भी किसी और इलाक़े में नहीं। मेरे पास सिर्फ लाहौर का वीज़ा था जबकि कटासराज, नंदना का किला, मकलोड का विष्णु मंदिर झेलम और चकवाल ज़िले में आते हैं। ये सभी पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के सुदूरवर्ती इलाक़े हैं। यहां तक मेरा पहुंच पाना इसलिए संभव हो पाया क्योंकि मैं साउथ एशिया फ्री मीडिया एसोसिएशन (साफ्मा) के पत्रकारों के एक प्रतिनिधिमंडल में शामिल था।

इस पूरी रिपोर्टिंग के दौरान कैमरे से पूरी शूटिंग मैंने खुद की। कैमरे को दीवार या फिर किसी पत्थर पर रख कर पीस-टू-कैमरा करना पड़ा। जो कुछ भी रास्ते में मिलता मैं उसे कैमरे में उतारता गया। सबसे ज़्यादा मुश्किल पेश आयी नंदना फोर्ट के रास्ते में। 5 घंटे की ट्रेकिंग। कोई पगडंडी भी नहीं… जिधर चल पड़ो उधर से ही रास्ता निकालने जैसी हालत। कंटीली झाड़ियां, पहाड़ पर कभी खड़ी चढाई तो कभी सीधी ढ़लान, रास्ता भटक जाना, पीने के पानी का ख़त्म हो जाना और दल के कई साथियों का बीमार पड़ जाना। ये सभी बातें इस रिपोर्ट में शामिल हैं।

3 नवबंर को, इस शूट के बीच में ही पाकिस्तान में जनरल मुशर्रफ़ ने इमरजेंसी लगा दी। इससे सुरक्षा के हालात और ख़राब हो गए। भारतीय नागरिक होने की वजह से मेरे पाकिस्तानी साथी मुझे लेकर काफ़ी चिंतित हो गए… लेकिन सभी ने मेरे काम में पूरा सहयोग दिया और मेरा हौसला बनाए रखा।

इन हालातों के बीच तैयार इस रिपोर्ट में मैंने कटासराज, मकलोड और नंदना मंदिर के भूत और वर्तमान के बारे में बताने की कोशिश की है। स्थानीय गाइड सलमान राशिद साहब के अलावा दल में शामिल पाकिस्तान, अफ़गानिस्तान, नेपाल समेत कई देशों के पत्रकार साथियों के ऑन-द-स्पॉट कमेंट्स (मौके पर ली गई प्रतिक्रियाएं) हैं।

एक ऐसे समय में जब पाकिस्तान में सिर्फ़ टेरेरिज़्म की बात होती है… मैंने टूरिज़्म की बात कर ये जताने की कोशिश की है कि अगर इस मुल्क के अंदरुनी हालात पर क़ाबू पा लिया गया तो ये न सिर्फ़ एक बेहतरीन टूरिस्ट डेस्टीनेशन बन सकता है… बल्कि बड़ी तादाद में हिंदू तीर्थ यात्रियों को भी अपनी ओर खींच सकता है।

मेरी इस रिपोर्ट को एनडीटीवी इंडिया पर पहली बार 29 जून 2008 को रात साढ़े नौ बजे प्रसारित किया गया।

 

((पाकिस्तानी मंदिरों पर रिपोर्ट के लिए उमाशंकर सिंह को न्यूज़ रिपोर्टर ऑफ द इयर का पुरस्कार दिया गया है। इस पुरस्कार से जुड़ी रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।))

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