पत्रकारिता के शोधार्थी और अब दिल्ली विश्वविद्यालय में शिक्षक डॉक्टर श्योराज सिंह बेचैन ने रुहेलखंड विश्वविद्यालय से पीएचडी करने के दौरान एक प्रश्नावली कई पत्रकारों को भेजी थी। ये लगभग 13 साल पुरानी बात होगी। इस शोध के गाइड कवि-पत्रकार डॉक्टर वीरेन कुमार डंगवाल थे। आप पढ़िए सुरेंद्र प्रताप सिंह का साक्षात्कार, बिना किसी काट-छांट के। ये साक्षात्कार उस दौर का है जब एसपी ‘आज तक’ पहुंच चुके थे:
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जो लोग पत्रकारिता के शीर्ष पर बैठे थे उस जाति, वर्ग से आए थे जिसे पिछड़ी और दलित जातियों का समान अस्तित्व स्वीकार नहीं था। आर्यसमाज व हिंदू संगठनों ने थोड़े बहुत उदारवादी आंदोलन चलाए उनके पीछे उनका विचार यह नहीं था कि जात पांत संबंधी स्वयं में बुराइयां हैं और उन्हें दूर किया जाए बल्कि उनकी मुख्य चिंता यह थी कि दलित जातियां उनके भेदभावपूर्ण रवैए से तंग आकर कहीं ईसाई या मुसलमान न बन जाएँ। यही कारण था कि सुधारवादी आंदोलन जल्दी ही विफल हो गया।
पत्रकारिता में दलितों की हिस्सेदारी क्यों नहीं?
यह तथ्य आंकड़ों से स्पष्ट है कि स्थापित पत्रों, पत्रकारिता संस्थानों व तमाम व्यावसायिक पत्रों के वरिष्ठ पत्रकारों यानी संपादकों या सहसंपादकों में कोई दलित जाति से हो ऐसा मेरी जानकारी में नहीं है। अपने निजी पत्रों के अलावा प्रमुख पत्रों व हिंदी साहित्य में जब पिछड़ी जाति के लोगों की संख्या ही नगण्य है तो दलितों की सहभागिता की तो शुरुआत भी नहीं। यथास्थिति के समर्थक कहेंगे कि क्योंकि दलितों में शिक्षा ही नहीं है वो पढ़े लिखे नहीं हैं, इसलिए ये स्थिति है। सवाल उठता है कि उन्हें पत्रकार बनाने के क्या प्रयास किए गए? क्यों नहीं किए गए? मैं इस आरोप का सौ फीसदी समर्थन करता हूं कि हिंदी साहित्य व पत्रकारिता को जान बूझकर सवर्ण पत्रकारिता व सवर्ण साहित्य रखा गया है। और आज भी रखा जा रहा है।
मंडल विरोधी आंदोलन की रिपोर्टिंग के दौरान पत्रकारिता बिल्कुल निष्पक्ष तटस्थ और वस्तुपरक नहीं रही। इसलिए कि समाचार तंत्र पर सवर्ण जातियों का पूरी तरह कब्जा कायम है। बहुत सारे अखबारों ने भड़काऊ भूमिका निभाई। सवर्ण छात्र-छात्राओं की उत्तेजना को जलने-मरने को, आत्म बलिदान, आत्मयज्ञ, आत्मशहादत, देश के लिए कुर्बानी देने की बात कही गई, जो पक्षपातपूर्ण और निंदनीय है।
प्रशिक्षण संस्थानों में उनकी नगण्य संख्या व प्रतिभा के संकट के बारे में मैं एक उदाहरण देना चाहूंगा। पिछले सत्र में मै भारतीय जन संचार संस्थान के साक्षात्कार मंडल में था। मुझसे पहले ही कहा गया कि चूंकि एस.सी., एस.टी के छात्रों के आने से हमारा स्तर गिरता है, परंतु हमारे यहां रिजर्वेशन है इसलिए इन्हें लेना ही पड़ता है। साक्षात्कार में आए छात्रों में मैंने ऐसे छात्र पाए जो योग्य तो थे ही अपितु बिना आरक्षण के भी दाखिला पाने के लायक थे। मैने ऐसी प्रतिभाओं के पक्ष में अनुशंसा की। यह मैं नहीं जानता कि उन्हें दाखिला मिला या नहीं, ये मेरा निजी अनुभव है।
हिंदी पत्रकारिता को दलितों से संबंधित भूमिका की जांच कौन करेगा? और क्यों करेगा। ऊपर के स्तर पर पत्रकारिता में जब दलित विरोधी जातियों के लोग बैठे हैं तो वे क्या अपनी ही जांच करेंगे? मेरा मानना है कि वह नहीं करेंगे बल्कि यथास्थिति को ही न्यायसंगत ठहराएंगे। यही वह कर रहे हैं।
महिलाओं से संबंधित बलात्कार जैसे अपराधों की रिपोर्टिंग हो या आदिवासी दलितों पर ज्यादतियों के बारे में, मनोरंजन करने का कारण पत्रकारों के मन का ओछापन है। यह दलित स्त्री ही नहीं, स्त्री मात्र के प्रति ओछापन है। और यह पत्रकारिता की विफलता या कमजोरी है। जिनके दिलों में इन तबकों के प्रति सहानुभूति नहीं है वही शीर्ष पर बैठे हैं तो यह कम नहीं हो सकता।
पत्र-पत्रिकाओं में दलित साहित्य सामग्री (कविता, कहानी या लेख आदि) प्रकाशित न होने के कारणों का जवाब भी वही है जो पहले प्रश्न का है। हिंदी पत्रकारिता जातीयता या सांप्रदायिकता कम कर रही है या बढ़ा रही है इस प्रश्न पर विचार करेंगे तो पाएंगे कि पिछड़ी या दलित जातियां अपने अधिकारों के लिए प्रयास करती हैं तो तब सवर्ण पत्रकारिता कहती है कि जातीयता बढ़ रही है ऐसा खुला प्रचार करती है उसे दो यादवों का मुख्यमंत्री बनना लगता है कि सारे यादव मुख्यमंत्री बन गए। लेकिन बारह ब्राह्मण मुख्यमंत्री हों तो कुछ नहीं लगता। नरसिंह राव व राष्ट्रपति के इर्द गिर्द रहने वाले तमाम सलाहकार वरिष्ठ आफिसर ब्राह्मण हैं, पर वह नहीं दिखते। किंतु पिछड़ों और दलितों की योग्यता के बावजूद भी अवसर नहीं देंगे। पत्रकारिता ने जातीयता बढ़ाई है कम नही की है। जब उनके स्वार्थों पर आ बनती है तो उन्हें जातीयता दिखाई पड़ने लगती है। यथार्थ में वही पत्रकारिता चलती है जो बिकती है और वही चलेगी जो बिकेगी। सवर्ण पत्रकारिता बलात्कार और दूसरी दलित विषयक खबरें इसलिए नहीं छापते कि उन्हें इनके प्रति मानवीय सहानुभूति है बल्कि बलात्कार बिकता है, हिंसा बिकती है, इसलिए वह छपती है। ये व्यावसायिक कारण हैं। मराठी के दलित साहित्य का हिंदी, अंग्रेजी में इसलिए अनुवाद नहीं हुआ कि उन्हें इज्जत देनी है, इसलिए कि वह भी अब बिकने लगा है।
(ये साक्षात्कार डॉ. श्योराजसिंह बेचैन की किताब ‘हिंदी की दलित पत्रकारिता पर पत्रकार अम्बेडकर का प्रभाव’ से साभार लिया गया है)
दिनेश शक्तावत
August 28, 2009 at 10:43 pm
ऐसे विचारों वाले एसपी सिंह जब गुजर गए तो उनके पास न अपना घर था न अपनी गाड़ी न अपनी कोई जायदाद।लेकिन उस दिन हजारों लोग रोए थे। कबीर की परंपरा के सच्चे वारिस थे एसपी। खुलकर बोलने का ऐसा दम किसमें है। कोलकाता के गर्व थे एसपी। आपने याद ताजा करा दी। जोशी जी भी इनसे कुछ सीख सकते हैं।
शंबूक
August 29, 2009 at 11:29 am
इतनी बड़ी साजिश!
अब समझ में आया कि आजादी के बाद का हिंदी का सबसे सफल संपादक एसपी सिंह क्यों सबसे महान संपादक, शलाका पुरुष, महानायक आदि नहीं है। ऐसे विचार रखने वालों का नामो निशां मिटा देने में कौन सी कसर छोड़ी होगी ब्राह्मणवादियों ने। उफ! इतनी बड़ी साजिश। न उनके नाम पर कोई पुरस्कार, न कोई पुस्तक, न सिलेबस में जगह, न कोई ट्र्स्ट। इतिहास से इस इंसान का नाम पोंछकर मिटा देने की इतनी गहरी चाल। तो दोस्तो, जो ब्राह्मणवाद के खिलाफ हो वो अपने काम का डॉक्यूमेंटेशन अपने जिंदा रहते करा लो। फिर कुछ नहीं बचने देंगे ये हिंसक ब्राह्णणवादी।
Shambhunath Shukla
September 3, 2009 at 12:28 pm
good, i had been entered in journolism by sp singh though i was a brahiman by birth but i never thought that being a brahiman it is my right to enter in a such profession whom physical labour been least