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सच में बहुत जातिवादी है मीडिया

एसपी का साक्षात्कार जब छपा था (13 साल पहले) तबसे लेकर अब तक हालात में कोई बड़ी तब्दीली नहीं आई है। मुझे याद है साल 2004 में आईआईएमसी के मेरे बैच में – जब सिर्फ एससी-एसटी को ही आरक्षण मिला हुआ था – बमुश्किल एक ओबीसी लड़का (यादव) जेनेरल कैटेगरी में चुना गया था। ये तब के हालत थे जब देश के कई सूबों में दशक भर से ज्यादा से पिछड़ों की सरकार थी। मुझे आश्चर्य इस बात का था कि दक्षिण के कई सूबों में जहां समाजिक सशक्तिकरण कई दशक पुराना है – वहां के पिछड़े-दलित भी नहीं आ पाए थे। हमने देखा था कि 30 के हमारे बैच में 6 सीटें एससी-एसटी के लिए थी और बचे 24 सीटों पर लगभग 18 ब्राह्मण थे। इसका सीधा मतलब ये था कि महज सत्ता में भागीदारी से किसी समुदाय का सर्वांगीण विकास तत्काल नहीं दिख सकता-खासकर तब जब हजारों सालों की वंचना पृष्ठभूमि में हो। जाहिर है, बीमारी गंभीर है।

लेकिन उससे भी गंभीर है वो वर्गीय-जातीय भेदभाव की मानसिकता का तंत्र और समाजिक नेटवर्किंग जो दलितों-पिछड़ों के पास नहीं है। एक दलित या पिछड़ा अपने आपको पत्रकारिता जैसे पेशे में कितना असहाय पाता है जब उसे कोई ढंग का रिफरेंस नहीं मिलता। अंग्रेजी में शायद ये इसका स्वरुप जाति से ज्यादा वर्गीय है (यूं अपने यहां जाति और वर्ग एक से दिखते हैं) जहां आपकी अपब्रिंगिग, एक्सेंट और कम्यूनिकेशन ज्यादा मायने रखता है। अक्सर पिछड़े और दलित अपने ग्रामीण चरित्र की वजह से यहां भी व्यवस्था को अपने खिलाफ पाते हैं।

लेकिन हिंदी में ये बीमारी ‘क्रोनिकल‘ हो गई है। हिंदी का औसत पत्रकार जातिवादी प्राणी है और उसकी बातचीत, भाषा और मानसिकता में घनघोर जातिवाद और अतत: भाईभतीजावाद झलकता है। एक औसत हिंदी पत्रकार के खानदान में बेरोजगारों की फौज होती है जिसे येनकेन प्रकारेण मीडिया में लाकर एक अदद नौकरी दिलवाना उसकी ओढ़ी हुई जिम्मेदारी होती है- ये संकट अंग्रेजी पत्रकारों के परिवारों मे अपेक्षाकृत कम है। ऐसे में एक हिंदी का पत्रकार अक्सर अपने खानदान से ही ऊपर नहीं उठ पाता, दलित और पछड़ों की बात कौन करे। ये हिंदी पट्टी का चारित्रिक दारिद्रय है जो हर मामले में छिपा है, जिसने रोजगार के बहुत कम अवसर पैदा किए हैं और जो हर क्षेत्र में भाईभतीजा वाद चाहता है। ऐसे में पत्रकारिता जैसे पेशे में जहां सवर्णों का वर्चस्व हो – वहां पिछड़ों और दलितों को कितनी मुश्किल होती होगी- ये सिर्फ कल्पना करने की बात है।

दूसरी अहम बात, पत्रकारिता आजादी के वक्त भले ही अंग्रेजों के खिलाफ एक हथियार हो लेकिन वर्तमान में ये ग्लैमर और नेटवर्किंग की कला बन चुकी है- सरोकारों से इसका कोई वास्ता नहीं। मैं जेनरलाइज्ड बात तो नहीं कर सकता, लेकिन हमारे संस्थानों में मुद्दों, जनसरोकारों या मिशन की पढ़ाई नहीं होती- वहां सिर्फ करियर और प्लेसमेंट की बात होती है। इस बात का एक अलग से सर्वे होना चाहिए कि कितने सारे पत्रकारिता पढ़ाने वाले संस्थान हैं जिसमें जनसरोकारों या मुद्दों को प्रोत्साहित करने वाला सिलेबस है या उसकी पढ़ाई होती है। ऐसे में एक दलित या पिछड़े को नौकरी देना या उसके प्रति सहानूभूति रखने का प्रश्न स्वत: नेपथ्य में चला जाता है।

मीडिया खासकर इलेक्ट्रानिक मीडिया में जब से समाजिक राजनीतिक विमर्शों/रिपोर्टों के लिए जगह कम होती जा रही है तब तो इस समुदाय के लिए और भी आफत है- जाहिर है यही वो स्पेस है जहां दलित-पिछड़े पत्रकार कुछ जौहर और लीक से हटकर नई चीज दिखा सकते हैं- क्योंकि व्यवस्था के खिलाफ आक्रोश का लावा जितना उनके भीतर है उतना दूसरों में नहीं। लेकिन अफसोस वो स्पेस मनोरंजन ने ले ली है।

मैं इसमें बुजुर्ग पत्रकारों और संपादकों को ज्यादा दोषी मानता हूं। आखिर, वही तो हैं जो अंतिम चयन करते हैं। तो क्या ये मान लिया जाए कि अधिकांश संपादक किस्म के लोगों के हृदय में समाज के बड़े वर्ग के लिए तनिक भी जगह नहीं? आंकड़े तो यहीं कहते हैं। क्या वे वाकई बुद्धिजीवी कहलाने के अधिकारी हैं?

तो सवाल है कि फिर क्या किया जाए? हाशिए पर रहे वर्गों की भागीदारी मीडिया में कैसे बढ़े। क्या ये युवा पिछड़े पत्रकार सवर्ण पत्रकारों से जिंदगी भर पीआर बनाते रहें कि कोई मौका होगा तो इन्हें याद किया जाएगा और बहुत एक्सट्रीम केस में उन्हें कुछ बचा-खुचा मिल जाएगा। एक ऐसे अभेद्य दुर्ग में जहां जनरल से लेकर संतरी तक सब सवर्ण हैं-वहां एक दलित पिछड़े को कैसे एंट्री मिलेगी-इसका जवाब किसी के पास नहीं है।

इस बात का ख्याल करना तो खुशफहमी है कि हमारी मीडीया अमेरिका की तरह डाइवर्सिटी के सिद्धांत को दिल से अपना लेगी- तो फिर क्यों न सरकार इसमें हस्तक्षेप करे? जो सरकार चौथा खंभा और लोकतंत्र को मजबूत बनाने के नाम पर मीडिया को तमाम सहूलियतें देती है, जो सरकार सस्ते कागज से लेकर सस्ती जमीन और न जाने क्या-2 देती है वो मीडिया को डाइवर्सिटी लाने पर मजबूर क्यों नहीं कर सकती? आखिर, मीडिया जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्र में डाइवर्सिटी लाना तो पुख्ता लोकतंत्र की पहली शर्त होनी चाहिए।

दूसरी उम्मीद मुझे साइबर पत्रकारिता से दिख रही है। ये वो सस्ता मंच है जिसका उपयोग दलित-पिछड़े कम खर्च पर भी कर सकते हैं- और सांस्थानिक मीडिया के उलट, अपनी बात को आसानी से और ज्यादा मजबूत तरीके से रख सकते हैं। शायद आनेवाला वक्त उनकी आवाज़ को ज़्यादा दिनों तक गुमनाम नहीं रहने देगा। वे मंच से वंचित नहीं रहेंगे और ये बहरी हो चुकी व्यवस्था उनके विचारों की धमक को नजरअंदाज नहीं कर पाएगी।

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