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छह से सात रुपये में बिकेंगे अख़बार!

अगले दो से तीन साल के भीतर अख़बारों की कीमत छह से सात रुपये हो सकती है। दिल्ली में दो दिन पहले साउथ एशिया न्यूज़ पेपर कॉन्फ्रेंस हुई। जिसमें न्यूज़पेपर इंडस्ट्री के दिग्गजों ने हिस्सा लिया इस कॉन्फ्रेंस में द हिंदू के प्रबंध निदेशक एन मुरली ने कहा कि अख़बारों की लागत को कम करने के लिए दाम बढ़ाने की ज़रूरत है। उनके मुताबिक अब तक प्रिंट मीडिया का विज्ञापन रेवेन्यू बीस फीसदी प्रति वर्ष की रफ़्तार से बढ़ रहा था। लेकिन अब बढ़ोतरी की रफ़्तार दस फीसदी से कम रहने का अनुमान है। ऐसे में अख़बारों की लागत को कम करने के उपायों पर गौर करना होगा।

एक दिन पहले द हिंदू में इस कॉन्फ्रेंस का पूरा ब्योरा छपा है। जिसके मुताबिक एन मुरली ने अख़बारों के सभी प्रतिनिधियों से हर छह महीने में अख़बार की कीमत में पचास पैसे की बढ़ोतरी करने को कहा। ताकि अगले दो से तीन साल में अख़बारों की कीमत छह से सात रुपये हो सके। उन्होंने कहा कि कुछ समय पहले तक इकनॉमिक बूम का दौर था। उस दौर में अख़बार कम कीमत में बेचना मुमकिन था। लेकिन अब मंदी का दौर है। इसलिए कीमत बढ़ाना चाहिए। द टाइम्स ऑफ इंडिया के रवि धारीवाल ने भी कीमत बढ़ाने की बात का समर्थन किया। रवि धारीवाल ने कहा कि पहले विज्ञापन कंपनियां सर्कुलेशन बढ़ाने के नाम पर पैसे दे रही हैं। लेकिन अब मुनाफा कम हो रहा है। ऐसे में धीमे-धीमे दाम बढ़ाना शुरू करना चाहिए।

इस प्रस्ताव पर दो तरह की प्रतिक्रिया आई। आनंद बाज़ार पत्रिका के प्रबंध निदेशक डी डी पुर्कायस्था ने कहा कि दाम बढ़ाने के बाद भी उनके सर्कुलेशन में कोई कमी नहीं आई। जबकि एचटी मीडिया के सीईओ राजीव वर्मा ने कहा कि जब उन्होंने अख़बारों की कीमत पचास पैसे बढ़ाई तो सर्कुलेशन दस फीसदी गिर गया। उन्होंने मुनाफे में हो रही गिरावट से निपटने के लिए एक ठोस बिजनेस प्लान तैयार करने की ज़रूरत पर बल दिया।

जागरण प्रकाशन के सीईओ संजय गुप्ता ने भी यही बात कही। उनके मुताबिक अख़बारों की कीमत बढ़ाने से सर्कुलेशन पर तो असर पड़ता ही है विज्ञापनों पर भी पड़ने लगता है। मिड डे मल्टीमीडिया के प्रबंध निदेशक तारिक अंसारी ने कहा कि ज़रूरत पाठकों के बीच विश्वसनियता बनाए रखने की है। मौजूदा दौर में विज्ञापन हमारे संपादकीय पक्ष को भी प्रभावित करने लगे हैं और इससे हमारी विश्वसनियता ख़त्म हो सकती है। इसलिए विज्ञापन पर निर्भरता कम करने के लिए अख़बारों की कीमत में बढ़ोतरी जरूरी है।

अख़बारों के नीति निर्माताओं की बातों से अंदाजा लगाया जा सकता है कि वो मुनाफा बढ़ाने के लिए एक रणनीति तैयार करने पर सहमत हैं। लेकिन वो रणनीति क्या होगी इसे लेकर चर्चा चल रही है। भविष्य में हो सकता है कि अख़बार विज्ञापनों में आई गिरावट से हो रहे नुकसान की भरपाई के लिए एकजुट होकर दाम बढ़ाएं। अगर ये हुआ तो इसका सीधा असर पाठकों की जेब पर पड़ेगा और अख़बारों के सर्कुलेशन पर भी।

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