बचपन में एक किस्सा सुनते थे कि एक राजा ने बंदर पाल रखा था। एक दिन सोते वक़्त उसने बंदर से कहा कि किसी को पास मत फटकने देना। आज्ञाकारी बंदर राजा के पैर के पास बैठ कर पंखा हांकने लगा। तभी एक मक्खी भिनभिनाती हुई वहां पहुंच गई और राजा के शरीर पर बैठ गई। आज्ञाकारी बंदर उसे उड़ाने लगा। वो उड़ती और फिर राजा के शरीर पर बैठ जाती। बंदर का गुस्सा बढ़ता जा रहा था। उसी गुस्से में उसने तलवार उठा ली। मक्खी फिर राजा के शरीर पर बैठी और मक्खी को मारने के इरादे से बंदर ने तलवार भांज दी। मक्खी का तो कुछ नहीं बिगड़ा, राजा हलाल हो गया।
आलोक तोमर उवाच – द्वितीय अध्याय
प्रभाष जोशी पर हमला बोलने वाले चिरकुट लफंगों की जमात पर मैंने हमला बोला था और आगे भी अगर प्रभाष जी का अपमान तर्करहित उच्च विचारों द्वारा किया जाएगा तो बोलूंगा। इतना ही नहीं, कोई सामने आ कर बात करेगा और ऐसी ही नीचता और अभद्रता पर उतारू हो जाएगा जैसी इंटरनेट के अगंभीर और अर्धसाक्षर लोग चला रहे हैं तो कनपटी के नीचे झापड़ भी दूंगा। …… आपको कैसे लग गया कि यह मामला गुरु, शिष्य या व्यक्तिगत संबंधों का है। एक नाम बता दीजिए जिसने प्रभाष जी के साथ काम किया हो और कहीं किसी भी मंच पर प्रभाष जी के बारे में अनादर या अभद्र भाषा का इस्तेमाल किया हो। मैं आपको पचास नाम गिना दूंगा जो बाकायदा ब्लैक मेलर, बलात्कारी, जातिवादी और निक्करधारी हैं और अलग अलग ब्लॉग और वेबसाइटों पर प्रभाष जी को कोस रहे हैं क्योंकि या तो उन्हें जनसत्ता में नौकरी नहीं मिली या उनके लेख प्रभाष जी ने नहीं छापे। …
… मैंने नेट के पूरे समाज को गाली नहीं दी है। मगर इंटरनेट पर खास तौर पर हिंदी में इन दिनों जिस तरह के भाई लोगों का मेला लगा है उनमें बहुमत ऐसे ही लोगों का है जो गालियां देते है और गालियां खाते है। जो बारूद की भाषा बोलते हैं उन्हें बारूद से धज्जियां उड़वाने के लिए तैयार रहना चाहिए। आपने शिष्टता का परिचय दिया उसका स्वागत है। काश यही शिष्टता अरुण शौरी वाले लेख में भी होती जिसमें उन्हें पाखंडी कहा गया है।
बड़े-बुजुर्ग इस किस्से को सुनाने के साथ एक सीख देते थे। सीख यह कि मूर्ख दोस्त से समझदार दुश्मन भला। ज़िंदगी में एक समझदार दुश्मन पर भरोसा कर लेना लेकिन मूर्ख दोस्त पर नहीं। जीवन में कई वाकयों ने इस सीख को सही साबित किया। आज आलोक तोमर जैसे प्रभाष जोशी के कुछ चेले उसी बात को फिर प्रणामित कर रहे हैं। वो प्रभाष जोशी के बचाव में बहुत नीचे गिर गए हैं। नीचे गिरने वालों में आलोक तोमर अव्वल हैं। उनके गिरने की कोई सीमा नहीं मापी जा सकती। एक दिन पहले ही उन्होंने लिखा है कि जो विरोध करेगा वो झापड़ खाएगा। अब सीधे तौर पर गाली देना और जान से मारने की धमकी देना बाकी रह गया है। लगता है कि अगले एक-दो दिन में वो यह कमी भी पूरी कर देंगे। यहां सवाल उठता है कि आखिर इस भाषा से आलोक तोमर साबित क्या करना चाहते हैं? इससे तो प्रभाष जोशी का कुछ भला नहीं होने वाला, बल्कि नाम जरूर खराब होगा। इसलिए सवाल उठता है कि कहीं आलोक तोमर समेत जिन-जिन चेलों को प्रभाष जोशी ने लतियाया था वो सभी कहीं मिल कर उनसे हिसाब तो नहीं चुका रहे?
अरे… चौंकिए मत। एक बार शांत दिमाग से सोचिए। इस सवाल की बुनियाद भी मौजूद है। वो बुनियाद खुद प्रभाष जोशी और उनके इन महान चेलों ने ही तैयार की है। ये सभी बार-बार कह रहे हैं कि प्रभाष जोशी ने इनका कोई भला नहीं किया। किसी को लात मार कर नौकरी से निकाल दिया। तो किसी को सात-सात, आठ-आठ साल तक प्रमोशन नहीं दिया। किसी की पगार नहीं बढ़ाई और हर लिहाज से निजी तौर पर बुरा ही किया है।
आलोक तोमर उवाच – प्रथम अध्याय
बात करो मगर औकात में रहकर बात करो : भारत के सबसे सिद्व और प्रसिद्व संपादक और उससे भी आगे शास्त्रीय संगीत से ले कर क्रिकेट तक हुनर जानने वाले प्रभाष जोशी के पीछे आज कल कुछ लफंगों की जमात पड़ गई है। खास तौर पर इंटरनेट पर जहां प्रभाष जी जाते नहीं, और नेट को समाज मानने से भी इंकार करते हैं, कई अज्ञात कुलशील वेबसाइटें और ब्लॉग भरे पड़े हैं जो प्रभाष जी को ब्राह्मणवादी, सामंती और सती प्रथा का समर्थक बता रहे हैं।…… ये वे लोग हैं जो लगभग बेरोजगार हैं और ब्लॉग और नेट पर अपनी कुंठा की सार्वजनिक अभिव्यक्ति करते रहते हैं। नाम लेने का फायदा नहीं हैं क्योंकि अपने नेट के समाज में निरक्षरों और अर्ध साक्षरों की संख्या बहुत है। मैं बहुत विनम्र हो कर कह रहा हूं कि आप प्रभाष जी की पूजा मत करिए। मैं करूंगा क्योंकि वे मेरे गुरु हैं। …
… आपने पंद्रह सोलह हजार का कंप्यूटर खरीद लिया, आपको हिंदी टाइपिंग आती हैं, आपने पांच सात हजार रुपए खर्च करके एक वेबसाइट भी बना ली मगर इससे आपको यह हक नहीं मिल जाता कि भारतीय पत्रकारिता के सबसे बड़े जीवित गौरव प्रभाष जी पर सवाल उठाए और इतनी पतित भाषा में उठाए। क्योंकि अगर गालियों की भाषा मैंने या मेरे जैसे प्रभाष जी के प्रशंसकों ने लिखनी शुरू कर दी तो भाई साहब आपकी बोलती बंद हो जाएगी और आपका कंप्यूटर जाम हो जाएगा। भाइयो, बात करो मगर औकात में रह कर बात करो। बात करने के लिए जरूरी मुद्दे बहुत हैं
प्रभाष जोशी ने भी एक इंटरव्यू में आलोक तोमर को निकालने की बात कबूल की है। हो सकता है कि प्रभाष जोशी के उस फ़ैसले से आलोक तोमर को ठेस पहुंची होगी। गुस्सा आया हो। लेकिन तब आलोक तोमर की ऐसी हैसियत नहीं रही होगी कि वो अपने गुरू का कुछ बिगाड़ सकें। हैसियत तो आज भी नहीं है कि कुछ बिगाड़ लें। इसलिए वो खुल कर उनसे पंगा लेने की जगह पर परोक्ष रूप से हिसाब चुकता करने में जुटे हैं। वो प्रभाष जोशी की तारीफ कुछ इस अंदाज में कर रहे हैं जैसे प्रभाष जोशी कोई लेखक-पत्रकार नहीं, कहीं के डॉन हों। अंडरवर्ल्ड का डॉन दाऊद इब्राहिम और पत्रकारिता के डॉन प्रभाष जोशी। दाऊद का गुर्गा छोटा शकील और प्रभाष जोशी का गुर्गा आलोक तोमर वगैरह वगैरह। इन सभी गुर्गों के लिखे को पढ़िए और सोच कर देखिए।
अगर ये सभी अपने गुरु के सच्चे शिष्य होते तो उन पर लगे आरोपों का जवाब देते। वो अपने गुरु का सच में बचाव करना चाहते तो तार्किक तरीके से उनके कहे को सही प्रमाणित करने की कोशिश करते। कोई सिलिकॉन वैली में कितने ब्राह्मण हैं इसका सबूत जुटाता। कोई सती प्रथा के बारे में ऐतिहासिक दस्तावेज निकालता। धार्मिक ग्रंथों को खंगालता। कोई नस्लवाद की उनकी थ्योरी को सही ठहराने के लिए हिटलर की किताब से तर्क गढ़ता या फिर मेडिकल साइंस की किताबों से कोई वैज्ञानिक पहलू तलाश करता। और तमाम कोशिश के बाद भी जिन सवालों का जवाब देने में ये चेले खुद को असहाय पाते तो भाग कर गुरु के पास जाते और उनसे जवाब मांगते। लेकिन अब तक किसी ने ऐसा कुछ नहीं किया। आलोक तोमर ने भी नहीं। बल्कि वो डराने-धमकाने पर उतर आए हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या अपने चेलों को प्रभाष जोशी ने यही सिखाया है? क्या आठ-आठ दस-दस साल तक पाल कर रखने के बाद भी उन्हें इतनी तमीज नहीं सिखा सके कि दूसरों से कैसे बात की जाए? क्या लिखा जाए? और बहस में कैसे हिस्सा लिया जाए?
मतलब इंटरव्यू से उठे सवालों का जवाब मिला नहीं और गुरु की विद्वता पर कुछ नए सवाल उठ खड़े हुए। फिर ऐसा बचाव करने से क्या फायदा? इसलिए अब सबको आलोक तोमर जैसे चेलों से पूछना चाहिए कि क्या सच में वो गुरु प्रभाष जोशी का बचाव कर रहे हैं या फिर पुराना हिसाब चुकता कर रहे हैं? मैं तो पूछ ही रहा हूं आप भी पूछिए।
raghuveer richhariya
August 30, 2009 at 1:16 pm
साथियों,
रविवार.कॉम में सती प्रथा, सिलकॉन वैली में ब्राह्मण श्रेष्ठता और तेंदुलकर चालीसा का बखान करने वाले प्रभाष जोशी जी के इंटरव्यू को पढ़कर हैरानी हो रही है। उससे ज्यादा परेशानी प्रभाष जी के शिष्यों की अतिवादी प्रतिक्रिया को लेकर। आलोक तोमर जिस तरह से प्रभाष जोशी का बचाव कर रहे हैं (या कहें बचाव के जाल में उन्हें फंसा रहे हैं), उससे हिंदी के इन स्वनामधन्य पत्रकारों के बुद्धि, विवेक पर तरस आता है।
सवाल नं.- 1 जब हम गीता, भागवत, रामचरित मानस, कुरान, बाइबिल में लिखे/छपे तथ्यों, उनके लेखकों पर बहस कर सकते हैं- तो प्रभाष जोशी के सती प्रथा और ब्राह्मणवाद को महिमामंडित करने वाले पोंगापंथी तथ्यों पर क्यों नहीं। ये तो उसी तरह है जैसे जिन्ना पर किताब लिखने वाले जसवंत को बिना पढ़े, सोचे समझे उन्हें पार्टी से निकाल दिया गया। क्या प्रभाष जोशी के लिखे, कहे पर बहस से बचने वाले ऐसा ही नहीं कर रहे हैं।
2- वरिष्ठ पत्रकार और प्रभाष जी के प्रबुद्ध शिष्य आलोक तोमर कह रहे हैं कि प्रभाष जी की मुखालिफत करने लोग वे हैं–जिन्हें जनसत्ता में नौकरी नहीं मिली या जिनके लेख जनसत्ता में नहीं लिखे। तो मेरे भाई आलोक जी, ये तो पता कर लीजिए रविवार.कॉम में जोशी जी का इंटरव्यू करने वाले आलोक प्रकाश पुतुल या जनतंत्र.कॉम चलाने वाले समरेंद्र सिंह ने कब प्रभाष जी से नौकरी मांगी। मेरी जानकारी में कभी नहीं..क्योंकि मैं इन दोनों लोगों को तब से जानता हूं..जब हम सभी ने एक साथ पत्रकारिता शुरू की थी। आलोक ने छत्तीसगढ़ में रहकर देशबंधु औऱ बीबीसी के जरिए जो काम किया है–या कर रहा है–वो देश के किसी चर्चित पत्रकार के काम से कम नहीं है।
3- तीसरी बात–प्रभाष जी, अपने शिष्यों के बीच हिंदी पत्रकारिता के युगपुरुष कहे जाते हैं–उन्हें सत्ता प्रतिष्ठान के खिलाफ बिगुल बजाने वाले संपादक का खिताब हासिल है( जो शायद उन्हें नहीं बल्कि स्वर्गीय श्री रामनाथ गोयनका जी को मिलना चाहिए)–लेकिन सत्ता से करीबी गांठने में इन महानुभाव के चर्चे बहुत कम हुए हैं। बात चल ही पड़ी है तो मैं प्रभाष जी के साथ घटित अपना एक निजी अनुभव (जो शायद उन्हें याद न हो) बांटना चाहता हूं.। 1996 में हम भोपाल के माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय से बीजेएमसी कर रहे थे–विवि के महानिदेशक श्री अऱविंद चतुर्वेदी के खिलाफ छात्रों का आंदोलन हुआ–मुद्दे कई थे (पत्रकारिता विवि की मनमाने ढंग से फ्रेंचाइजी बांटी जा रही थी, जिनमें पत्रकारिता कोर्स नहीं कंप्यूटर की डिग्री/डिप्लोमा बंटते थे, ऑडियो-वीडियो लैब के लिए आई भारी भरकम रकम कहां गई थी–ये चतुर्वेदी जी को ड़कर किसी को मालूम नहीं था। वगैरह..वगैरह…). अरविंद चतुर्वेदी भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति स्व. श्री शंकरदयाल शर्मा के सगे साढ़ू थे–उनके खिलाफ बोलने की हिम्मत कोई नहीं करता था। प्रभाष जोशी जी और श्री अजीत भट्टाचार्जी विवि के सलाहकार मंडल में थे–छात्रों से समझौता कराने आए–और उन्होंने हमें ऐसा प्रस्ताव दिया–कि हम आंदोलन बंद कर दें। बीजेएमसी के छात्रों ने हाथ जोड़ लिए। एक संपादक जो इमर्जेंसी के दौरान सत्ता प्रतिष्ठान के खिलाफ दम भरता रहा हो…वो इमर्जेंसी के 21 साल बाद ही सत्ता प्रतिष्ठानों के प्रति ऐसे लोटने लगेगा–ऐशा हम लोगों ने सोचा भी नहीं था।
- उम्र और बड़े-बुजुर्गों का सम्मान करना हमें बचपन से सिखाया गया है। वो हम लोग करत रहेंगे–लेकिन प्रभाष जी के विचारों पर शुरू हुई बहस ऐसे कैसे थम सकती है।
सादर
रघुवीर रिछारिया