“मेरे इस्तीफे की तात्कालिक वजह हिंदुस्तान में एक जूनियर मोस्ट कर्मचारी को प्रमोशन देकर कई सीनियर संवादाताओं से ऊपर बिठा देना है। ये प्रमोशन एक क्षेत्र विशेष को ध्यान में रख कर दिया गया है और मैं इसका विरोध करता हूं।”
हिंदुस्तान से इस्तीफ़ा देते वक़्त अनूप भटनागर ने कुछ ऐसी ही पंक्तियां लिखीं थी। अनूप इस वक़्त नई दुनिया में लीगल एडिटर हैं। उससे पहले वो हिंदुस्तान में ही सीनियर स्पेशल करस्पॉन्डेंट के तौर पर काम कर चुके हैं। लेकिन जब मृणाल पांडे ने उनसे जूनियर उमाकांत लखेड़ा को उनसे ऊपर बिठाया तो वो बर्दाश्त नहीं कर सके। अनूप बताते हैं कि उसके बाद उन्होंने हिंदुस्तान से इस्तीफ़ा दे दिया। जाने से पहले उनका एग्जिट इंटरव्यू हुआ और उसी इंटरव्यू में मैनेजमेंट के सामने अनूप भटनागर ने ये बात रखी थी।
सिर्फ अनूप भटनागर ही नहीं। हिंदुस्तान के कई पूर्व कर्मचारी मृणाल पांडे पर यह आरोप लगाते हैं। वो खुल कर बताते हैं कि मृणाल पांडे का रवैया तानाशाही था। उन्होंने हिंदुस्तान में जातिवाद फैलाया और क्षेत्रवाद भी। विनोद वार्ष्णेय भी यही मानते हैं। उनका कहना है कि मृणाल पांडे के संचालन का तरीका काफी विवादास्पद रहा। उन्होंने अपने इर्द-गिर्द चाटुकारों की फौज जमा कर ली। पहाड़ी ब्राह्मणों की इस फौज में कई काम करने में कमजोर थे, लेकिन उन्हें भी काफी प्रश्रय दिया गया। जबकि जिसने भी मृणाल पांडे से कंपनी के हितों को ध्यान में रखते हुए असहमति जताई उसे जाना पड़ा। विनोद वार्ष्णेय को भी इसी वजह से हटाया गया। वो बताते हैं कि कई बार उन्होंने ख़बरों को लेकर मृणाल पांडे से बहस की। इस पर मृणाल पांडे को लगना लगा कि वो उन्हें चुनौती दे रहे हैं। फिर एक दिन मैनेजमेंट ने विनोद वार्ष्णेय से इस्तीफा मांग लिया। कहा गया कि कंपनी की आर्थिक हालात ख़राब है, लेकिन सच यही है कि इस्तीफ़ा मृणाल पांडे के इशारे पर मांगा गया था। कंपनी की आर्थिक स्थिति से इसका कोई लेना-देना नहीं था।
विनोद वार्ष्णेय यह भी बताते हैं कि मृणाल पांडे का कंटेंट से ज़्यादा जोर डिजाइन पर रहता था। यही वजह है कि अख़बार का सर्कुलेशन घटता चला गया। पहले हिंदुस्तान तीसरे नंबर पर था और आज चौथे नंबर पर है। उनके मुताबिक सर्कुलेशन में गिरावट और आर्थिक मोर्चों पर नाकामी की वजह से ही मृणाल पांडे की छुट्टी हुई होगी।
हिंदुस्तान में काम कर रहे कई सूत्र मृणाल पांडे पर लगे इन आरोपों को सही ठहराते हैं। उनके मुताबिक हाल के दिनों में हिंदुस्तान में पहाड़वाद इतना फैला कि इलाहाबाद से लेकर दिल्ली तक हर जगह पहाड़ी पत्रकार छा गए। ये एक ऐसा क्षेत्रवाद है जिसने सबको चौंका दिया। बनारस के स्थानीय संपादक रवि पंत, इलाहाबाद के स्थानीय संपादक– हिमांशु घिल्डियाल, लखनऊ के स्थानीय संपादक नवीन जोशी, दिल्ली के स्थानी संपादक प्रमोद जोशी और ब्यूरो चीफ उमाकांत लखेड़ा। ऐसे नामों की फेहरिस्त लंबी है। वो यह भी कहते हैं कि इनमें से कई बहुत काबिल हैं और उन्हें उनका हक़ दिया गया है लेकिन वो यह भी मानते हैं कि हिंदुस्तान में पहाड़वाद इतना हावी हो गया कि कई दूसरे काबिल लोगों का हक मार लिया गया। पॉलिटिकल एडिटर शंभूनाथ, एडिट पेज के इंचार्ज अरविंद मोहन, सुबोध मिश्र, इरा झा, विनोद वार्ष्णेय, अनूप भटनागर, राजीव रंजन नाग, संदीप ठाकुर, शैलबाला समेत कई बड़े और सुलझे हुए पत्रकारों को मृणाल पांडे के रवैये के कारण ही नौकरी छोड़ कर जाना पड़ा। ये फेहरिस्त काफी लंबी है।
मृणाल पांडे की एक छवि नारीवादी विचारक की भी है। लेकिन उनके कार्यकाल में इरा झा, शैलबाला, कोमिका भारद्वाज, मेधा, नरजिस हुसैन समेत छह से ज़्यादा महिलाओं को नौकरी छोड़नी पड़ी। बताया जाता है कि इनमें से कुछ ने अपने-अपने अधिकारियों के ख़िलाफ़ शिकायत की थी, लेकिन उन शिकायतों को दूर करने के जगह उन्हें ही संस्थान से दूर कर दिया गया।
लाल सन्त कुमार नाथ शाहदेव
August 31, 2009 at 5:32 pm
कुछ भी हो, उनका जाना अच्छा नहीं लगा।