सहारा इंडिया टीवी नेटवर्क ने जनतंत्र को कानूनी नोटिस भेजा है। मानहानि का ये नोटिस 19 अगस्त को सहारा से जुड़ी ख़बरें प्रकाशित करने पर भेजा गया है। नोटिस के मुताबिक सहारा को जनतंत्र पर छपी ख़बरों से धक्का लगा है और हैरानी हुई है। जनतंत्र पर कंपनी से जुड़ी कुल चार ख़बरें छापी गई थीं, जिनमें से तीन का ज़िक्र नोटिस में है। पहली खबर है, “सहारा में सुनामी, 48 कर्मचारियों से मांगा गया इस्तीफ़ा“। दूसरी, “सहारा के कर्मचारी नहीं करेंगे सरेंडर” और तीसरी ख़बर, “कर्मचारियों को टॉप मैनेजमेंट ने दिया फिलहाल “सहारा”।” नोटिस में हमारी ख़बरों को ग़लत बताया गया है। लेकिन हमें जो जानकारी मिली है, उसके मुताबिक हाल में सहारा के कई कर्मचारियों से वाकई इस्तीफा लिया गया है और कई कर्मचारियों का तबादला किया गया है। तबादला उन्हीं कर्मचारियों का हुआ है… जिनका जनतंत्र में नाम छपा था। और उन्हीं ब्यूरो से हुआ है जिनका जनतंत्र में ज़िक्र हुआ था। क्या ये ख़बर के ग़लत होने का संकेत है? अगर कर्मचारियों से इस्तीफ़ा मांगने की ख़बर गलत है तो फिर सहारा के कर्मचारी दूसरी नौकरी मिले बगैर इस्तीफ़ा क्यों दे रहे हैं? क्या वो सभी अचानक इतने अमीर हो गए हैं कि उन्हें नौकरी की ज़रूरत नहीं रही?
सहारा में मची है भगदड़
सहारा समय से इन दिनों बुरी ख़बरें ही आ रही हैं। एक के बाद एक लोग इस्तीफा दे रहे हैं। कुछ दिन पहले मीडिया में ख़बर आई कि सहारा में प्रबंधन ने 48 कर्मचारियों से इस्तीफा मांगा है। सूत्रों के मुताबिक कर्मचारियों ने उसका विरोध किया। अपनी बात रखने के लिए वो लखनऊ भी गए। लखनऊ से छन कर जो ख़बरें आईं उसके मुताबिक टॉप मैनेजमेंट ने कर्मचारियों के हितों का ख्याल रखने का वादा किया और उन सभी को समझा-बुझा कर वापस भेज दिया। लेकिन एक दिन बाद स्थिति बदल गई। वो रिपोर्टिंग के लिए दफ़्तर पहुंचे तो उन्हें बता दिया गया कि मंगलवार (25 अगस्त) तक इंतज़ार …
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नोटिस में इस बात पर एतराज़ किया गया है कि जनतंत्र की रिपोर्ट ने इस सबके पीछे एक “खेल” होने का आरोप लगाया है और इस खेल में सहारा के उच्च अधिकारियों सीईओ सुमित रॉय, मध्य प्रदेश चैनल के हेड राजेश कुमार और बिहार चैनल के हेड संजय मिश्रा के शामिल होने की बात कही गई है। सवाल ये है कि क्या बिना किसी खेल के इतनी बड़ी तादाद में कर्मचारियों की नौकरी ख़तरे में पड़ गई है? अगर कंपनी मंदी के चलते कर्मचारियों की छंटनी करना चाहती है, तो उसका भी एक वाजिब तरीका होना चाहिए। अगर मंदी होगी तो उसका असर हर जगह नज़र आना चाहिए। लेकिन हाल के दिनों में देखा गया है कि मंदी में अधिकारी तो मस्त रहते हैं और निचले पायदान पर तैनात कर्मचारियों पर गाज़ गिरती है। ये खेल नहीं है तो क्या है? सहारा पर जनतंत्र की रिपोर्ट में बताया गया था कि कंपनी ने सीईओ के लिए हाल के दिनों में दो महंगी गाड़ियां खरीदी हैं। मर्सडीज और फोर्ड एनडेवर। यही नहीं सभी चैनल हेड्स के लिए मारुति डिजायर भी खरीदी गई है। ब्लैक बेरी फोन दिये गए हैं। इन सब पर जितने पैसे खर्च हुए होंगे, उसके बहुत से कर्मचारियों को साल भर तक तनख्वाह दी जा सकती थी। कंपनी की ओर से मिले नोटिस में इन तथ्यों को कहीं भी चुनौती नहीं दी गई है। मंदी से जूझ रही एक कंपनी लक्ज़री पर खर्च करती है और कर्मचारियों की छंटनी करती है .. ये खेल नहीं तो क्या है? किसी भी कंपनी को मंदी से उबारने के लिए खर्चों में कटौती करने की ज़िम्मेदारी किनकी होती है? कंपनी के बड़े अधिकारियों की ही ना! लेकिन जब ऐसे अधिकारी खुद ही अपनी सुविधाओं पर पैसे लुटाएं और कर्मचारियों की नौकरियां ख़तरे में पड़ जाएं, तो इसे क्या कहेंगे?
नोटिस में जनतंत्र की रिपोर्ट पर एक और एतराज जाहिर किया गया है। इसमें कहा गया है कि भविष्य में 200 से 250 कर्मचारियों को हटाने की बात ग़लत है। चलिए इस पर भी हमारी नज़र रहेगी। इससे अधिक खुशी की क्या बात हो सकती है कि कर्मचारियों को नहीं हटाया जाए। वैसे भी रिपोर्ट में साफ तौर पर लिखा गया है कि “ऐसा बताया जा रहा है”। जब बड़ी संख्या में लोगों की नौकरी ख़तरे में होगी तो बताने वाले भी मिल ही जाएंगे। हमने इतना ख्याल जरूर रखा कि जब भी ख़बर आई तो लखनऊ में बैठे कुछ सूत्रों से उस ख़बर की पुष्टि की गई। अब वो सूत्र कौन हैं – ये सार्वजनिक करना हमारी मजबूरी नहीं।
नोटिस में ये भी कहा गया है कि जनतंत्र की ख़बर से कर्मचारियों में अफ़रा-तफरी मच गई। अरे भई, जहां पहले से ही भगदड़ मची हो, लोग हटाए जा रहे हों या नौकरी छोड़ कर जा रहे हों, वहां ख़बर से अफरा-तफरी मचने की दलील में कितना दम हो सकता है?
जनतंत्र पर एक और आरोप लगाया गया है कि सहारा के मैनेजमेंट से कोई प्रतिक्रिया नहीं ली गई। यहां पर हम दो बातें साफ कर देना चाहते हैं। पहली बात, ख़बर उस समय आई जब सहारा के कर्मचारियों ने गेस्ट हाउस खाली किया और लखनऊ के लिए रवाना होने का फैसला किया। उस वक़्त रात हो चुकी थी और ख़बर को अगले दिन तक रोकना ज़रूरी नहीं लगा। दूसरी बात, अगले दिन सहारा के टॉप मैनेजमेंट को ख़बर की प्रति ई-मेल से भेजी गई। लखनऊ में बैठे अधिकारियों को भी भेजी गई। ई-मेल में उनसे प्रतिक्रिया मांगी गयी थी और ये वादा भी किया गया था कि उनकी प्रतिक्रिया को भी जनतंत्र पर प्रकाशित किया जाएगा। लेकिन किसी ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। अब कोई प्रतिक्रिया नहीं दे और कहे कि बगैर प्रतिक्रिया रिपोर्ट छापने का क्या तुक – दोनों बातें तो नहीं हो सकती। वैसे भी हम जानते हैं कि बैलेंस करने के चक्कर में कई बार ख़बरें ग़ायब हो जाती हैं। इसलिए अगर आपको स्टोरी के सही होने का पूरा भरोसा हो, तो उसे छापने से परहेज नहीं करना चाहिए। हमने वही किया है और आगे भी ऐसा करते रहेंगे।
विनीत कुमार
August 30, 2009 at 1:06 am
अपने अनुभव से इन दिनों जो मैं महसूस कर रहा हूं वो ये कि इंटरनेट पर मीडिया संस्थानों के भीतर की खबर लिखे जाने से इनसे जुड़े मैनेजमेंट के लोग अच्छे-खासे परेशान है। जो सामान्य स्तर पर करनेवाले लोग हैं उन्हें तो एक जुबान और मंच मिल गया है जहां वो अपनी बात रख सकते हैं। नहीं तो मीडिया संस्थानों के भीतर काम करनेवाले लोगों की सबसे बड़ी बिडंबना रही है कि वो दुनियाभर के लोगों के लिए शोषण और गैरबराबरी के विरोध में आवाज उठाते रहे हैं लेकिन अपनी स्थिति वो किसी भी रुप में बयान नहीं कर सकते या कहिए कि ऐसा महौल नहीं रहा कि वो ऐसा कर पाएं। इसलिए उनके लिए इंटरनेट,न्यूज और मीडिया से जुड़े पॉर्टल ने एक बेहतर स्थिति पैदा की है। आप देखिए कि आए दिन किसी न किसी मीडिया संस्थानों के भीतर से वहां से जुड़े लोगों को सप्रेस किए जाने की खबरें आतीं हैं। ऐसा हो पाना इधर दो-तीन सालों से ही संभव हो पाया है नहीं तो मीडिया के भीतर की कोई भी खबर,खबर की शक्ल में कभी भी आने नहीं पायी,चाहे वो मीडियाकर्मियों से जुड़े अधिकार का मामला हो या फिर उनके साथ जबरदस्ती किए जाने का मामला। लेकिन अब इनलोगों के लिए अभिव्यक्ति के स्तर पर ही सही एक बेहतर और राहत की स्थिति बन रही है।
दूसरी तरफ मीडिया संस्थानों के मैंनेजमेंट के लिए ये सिरदर्द बनता जा रहा है। उन्होंने पहले तो ब्लॉग पर अपने संस्थान से जुड़ी खबरों के आने को बहुत ही हल्के में लिया,फर्क नहीं पड़ता के अंदाज में टालने की कोशिशें की। ये अलग बात है कि तब भी वो इन ब्लॉगों पर नजर बनाए रहते। उसके बाद उन्होंने समय की बर्बादी का हवाला देकर ब्लॉग औऱ मीडिया से जुडी़ साइटों को ऑफिस में खोलने पर पाबंदी लगा दी,बैन कर दिया और जब ऐसा करने के वाबजूद भी अपनी सुरक्षा को लेकर आश्वस्त नहीं हुए तो अब साइट चलानेवाले,ब्लॉगिंग करनेवाले लोगों पर कभी कानूनी तो कभी व्यक्तिगत हमले करने शुरु कर दिए हैं।
मेनस्ट्रीम मीडिया से जुड़े लोग मीडिया पार्टल और ब्लॉगिंग के बारे में ये लगातार महौल बनाने का काम कर रहे हैं कि इनसे जुड़े लोगों के पास औऱ कुछ काम नहीं है,वो अपनी बेरोजगारी से आहत होकर इस तरह के काम कर रहे हैं। मीडिया पार्टल औऱ साइट चलानेवाले लोग आर्थिक रुप से कमजोर हैं इसलिए अगर इन पर कानूनी पेंच लगाए जाएं तो ये आसानी से टूट जाएंगे। ये काम अगर किसी एक साइट के साथ किया गया तो बाकी साइट के लोग भीतर से सहम जाएंगे औऱ हमारे विरोध में लिखने के पहले दस बार सोचेंगे। ये समझ और महौल मीडिया संस्थान के भीतर वो बड़े पत्रकार औऱ मीडियाकर्मी बना रहे हैं जो मैनेजमेंट और सामान्य मीडियाक्रमियों के बीच सेतु का काम करते हैं।
लेकिन असल बात ये है कि इंटरनेट पर मीडिया से जुड़े मसलों पर जो लोग भी लिख रहे हैं उनकी उपस्थिति भले ही वर्चुअल स्पेस पर है लेकिन इसका मतलब कतई नहीं है कि वो हवा में रहकर काम कर रहे हैं और सोच रहे हैं। मैनेजमेंट सहित देश के सेतु पत्रकार अगर अपनी ये गलतफहमी जितनी जल्दी दूर कर लें उतना ही अच्छा। इंटरनेट पर लिखनेवाले लोग जितनी तल्खी से अभिव्यक्ति के स्तर पर अन्याय होने की स्थिति में सक्रिय होते हैं,उतनी ही तल्खी से सड़कों पर भी उतर सकते हैं।..और जहां तक बात बेरोजगार और आर्थिक रुप से कमजोर होने की बात है तो लोकतंत्र के बीच में होकर अधिकार की लड़ाई पैसों से नहीं लड़ी जाती, बदलाव के लिए किया जानेवाला कोई भी मुठभेड़ पैसों का मोहताज नहीं।
संजय तिवारी
August 30, 2009 at 8:41 pm
बधाई हो. कर्मचारियों की नौकरी बचाने के लिए भी और नोटिस पाने के लिए भी.
नोटिस का मतलब है नोटिस होना. जो काम करते रहने के लिए जरूरी होता है.
RAKESH SING
August 31, 2009 at 11:41 pm
ये तो होना ही था क्योंकि इस समय सहारा समय के कई चैनलों का ऐसे लोग नेतृत्व कर रहे हैं जो कि पत्रकार हैं ही नहीं। उन्हें तो शायद खबर का भी पता नहीं होगा और सेलरी लाखों में ले रहे है। और अगर संस्थान ऐसे लोगों को निकाल दे तो शायद छोटे कर्मचारियों के निकालने से भी कहीं ज्यादा फायदा होगा। पर ये तो संस्थान का नेतृत्व कर रहे लोगों को सोचना होगा कि उन्हें कौन चाहिए?