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“प्रभाष जोशी और राजेंद्र यादव ने शर्मसार किया है”

श्रीमान प्रभाष जोशी और राजेंद्र यादव,

मेरे करीबी रिश्तेदारों में कई जातियों के लोग हैं। ब्राह्मण से लेकर कायस्थ और नायर से लेकर दलित तक। ये सभी परिवार प्रेम से रह रहे हैं। आपके परिवारों में भी लोगों ने प्रेम किया होगा और कई ने जाति से बाहर शादियां भी की होंगी। अब आप जाति पर अपने शर्मसार करने वाले विचारों को अपने रिश्तेदारों पर लागू करके देखिए और हिसाब लगाइए कि कौन सी बच्ची या बच्चा कवि बनेगा और कौन कहानीकार और कौन आत्मकथा बेहतर लिखेगा (देखिए देशकाल डॉट कॉम पर राजेंद्र यादव की खबर)। या हिसाब लगाइए इस बात का कि कौन बैटिंग करेगा और कौन बॉलिंग और कौन टिक कर खेलेगा और कौन टिककर नहीं खेलेगा या फिर कौन बेहतर नेतृत्व क्षमता दिखाएगा और कौन नहीं दिखाएगा (देखिए रविवार डॉट कॉम पर प्रभाष जोशी का इंटरव्यू)। आपको अपने ही विचारों से शायद नफरत होने लगे और आप अपने बच्चों और पोते-पोतियों से माफी मांगने के अलावा कुछ और नहीं कर पाएं। बड़े कहे जाने वाले लोग जब इस तरह अश्लीलता फैलाएं और समाज में नफरत फैलाने वाली बातें करने लगें तो हमारा सिर शर्म से झुक जाता है।


ब्राह्मण और कविता – राजेंद्र यादव


कविता-कर्म अमूर्त पर आधारित है और ब्राम्हण अदृश्य को देखने और कल्पना करने में माहिर होते हैं इसलिए वे इस क्षेत्र में दूसरी जातियों से आगे हैं या यहां एक तरह से उनका वर्चस्व है। अध्यात्म और तत्वज्ञान के बारीक विश्लेषण का हुनर उनमें होता है और ये कविता करने में काम आता है। ये हुनर उनमें जातिवादी व्यवस्था के जरिए विरासत में मिली बौद्धिक संपदा की बदौलत आता है।

 

मैं ये सोचने की कोशिश कर रहा हूं कि ये हमारे ये दोनों बुजुर्ग बीमार क्यों हैं। इसका एक कारण तो मुझे समझ में आ रहा है। इन्हें दुनिया की शायद खबर ही नहीं है। प्रभाष जोशी इंटरनेट नहीं देखते। वो ऑर्कुट पर नहीं हैं। वो फेसबुक में भी नहीं हैं। मुझे नहीं मालूम कि उनके पास ई-मेल आईडी है या नहीं। कुछ लोग कहते हैं कि मेल आईडी तो हैं पर मेल का प्रिटआउट मंगाकर पढ़ते हैं। कुछ समय पहले तक उनके पास मोबाइल फोन भी नहीं था। एसएमएस पता नहीं वो करते हैं या नहीं। जाहिर है वो ट्विटर पर ट्विट भी नहीं करते होंगे। उनका कोई ब्लॉग भी नहीं है। राजेंद्र यादव का भी कमोबेश यही हाल होगा। वैसे तो इस गरीब देश के ज्यादातर लोगों के प्रोफाइल सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर नहीं हैं, वो ईमेल भी नहीं करते, न ही कंप्यूटर से उनका कोई वास्ता है। देश में इस समय लगभग 6 करोड़ लोग ही इंटरनेट का इस्तेमाल करते हैं (देखें मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन ऑफ इन्फॉर्मेशन टेक्नॉलॉजी की सालाना रिपोर्ट)। तो अगर राजेंद्र यादव या प्रभाष जोशी देश के छह करोड़ कनेक्टेड लोगों में नहीं हैं तो क्या फर्क पड़ता है?

फर्क पड़ता है। इसलिए क्योंकि ये दोनों कम्युनिकेशन यानी संवाद के धंधे में हैं। और भी ज्यादा फर्क पड़ता है क्योंकि ये अपने धंधे में चोटी के माने जाते हैं। और ऐसे लोग अगर दीन-दुनिया से अपडेट न रहें तो फर्क पड़ता है। ये बात चिंताजनक है कि भारत में संवाद से जुड़े दो बड़े लोगो का दुनिया और भारत में सबसे तेजी से बढ़ते संचार माध्यम (देखिए फिक्की और केपीएमजी की भारत में मीडिया और एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री पर रिपोर्ट) से कोई वास्ता नहीं है। ये बेखबर लोग अगर अपनी बात खुद तक ही रखें तो हमें धेले भर की परवाह नहीं। लेकिन वो बोल रहे हैं और बेहद बेतुका और बेहूदा बोल रहे हैं।

ये दोनों लोग ऐसी बातें बोल रहे हैं जो उनके चेलों के अलावा हर किसी को अखर रही है। मैं एक भी ऐसे आदमी को नहीं जानता जो जातिवाद के समर्थन में उनके विचारों का कम से कम सार्वजनिक तौर पर समर्थन करें। इन दोनों महान लोगों के चेलों के पास भी बचाव में देने को कोई तर्क नहीं हैं। आखिर इनके चेलों में से भी कई ने जाति से बाहर शादी की है। उन्हें मालूम है कि उनकी अगली पीढ़ी क्या करने वाली है। हर जाति के लोगों को ये लेखन आउटडेटेड और सड़ा हुआ लग रहा है। 21वीं सदी के लगभग 10 साल बीतने के बाद ये अज्ञानी लेखन हमारी देवभाषा में ही संभव है। इस समय पश्चिम में आप कल्पना नहीं कर सकते कि कोई जाति या वर्ण या नस्ल या रंग के आधार पर श्रेष्ठता का ऐसा खुल्लमखुल्ला और अश्लील समर्थन करे। उसे पूरा देश दौड़ा लेगा।


प्रभाष जोशी के इंटरव्यू पर राजेंद्र यादव


“प्रभाषजी का इंटरव्यू मैंने पढ़ा है, उन्होंने ब्राम्हणों और ब्राम्हणवाद को महिमांडित किया है। उनके कथन श्रेष्ठताबोध से भरे हुए हैं। मैं उनसे सहमत नही हूँ। मेरा कहना ये है कि ब्राम्हणों में कुछ चीज़ें से अभ्यास आई हैं जैसे कि अमूर्तन पर विचार-मनन और इसीलिए कविताई में उनका वर्चस्व है। इन्हीं वजहों से विश्वविद्यालयों और अकादमियों में भी वे काबिज़ हैं। प्रभाषजी इस वैज्ञानिक तथ्य तक सीमित नहीं रहते, वे इसे और आगे ले जाते हैं और वहाँ मेरी उनसे असहमति है।”

 

बहरहाल ये इस बात का प्रमाण है कि ये दोनों लोग दुनिया में चल रहे आधुनिक विमर्श से वाकिफ ही नहीं हैँ। ये महानगर में रहते है। आर्थिक रूप से समर्थ हैं। लेकिन नेट पर नहीं है। पता नहीं की-बोर्ड पर काम करना इन्हें आता भी है या नहीं। ऐसे में दोनों को पता ही कैसे चलेगा कि नॉम चॉमस्की ने अपने ब्लॉग http://www.zmag.org/blog/noamchomsky पर ताजा क्या लिखा है या फिर फ्रांसिस फुकोयामा के बारे में ब्लॉग में क्या चल रहा है (http://en.wordpress.com/tag/francis-fukuyama/)। उन्हें पता ही नहीं कि दुनिया कितनी बदल गई है। नहीं, ये एलीट होने या जेब में ढेर सारे पैसे होने की बात नहीं है। 10-15 रुपए में कोई भी आदमी आधे से लेकर एक घंटे तक इंटरनेट कैफे में कनेक्ट हो सकता है। प्रभाष जोशी और राजेंद्र यादव भी ये कर सकते हैं। वो ऐसा नहीं करते, इस वजह से उनका अपने पाठकों की दुनिया से जबर्दस्त डिस्कनेक्ट हैं। ये आश्चर्यजनक है कि दुनिया के सबसे तेजी से उभरते संचार माध्यम से उनका परिचय ही नहीं है।

वो ये बात भी भूल जाते हैं कि भारत में इतने हमलावर आए हैं (उनमें से ज्यादातर अपने साथ परिवार लेकर नहीं आए) और समाज व्यवस्था में इतनी उथल पुथल हुई है कि रक्त शुद्धता की बात कोई कूढ़मगज इंसान ही कर सकता है। हिमालय के किसी बेहद दुर्गम गांव में या किसी द्वीप या किसी बीहड़ जंगल में बसी बस्ती के अलावा रक्त अब शायद ही कहीं शुद्ध बचा होगा। ऐसे में कोई ये कहे कि कोई किसी खास काम को करने में इसलिए ज्यादा सक्षम और समर्थ है कि उसका जन्म किसी खास जाति में हुआ है तो इस पर आप हंसने के अलावा क्या कर सकते हैं। आप रो भी सकते हैं कि जिन लोगों को हिंदी भाषा ने नायक कहकर सिर पर बिठाया है, उनकी मेधा का स्तर ये है।

प्रभाष जोशी और राजेंद्र यादव, क्या आपको अपने घरों में नई पीढ़ी की हंसी की आवाज सुनाई दे रही है? पता लगाइए कि कहीं वो आप पर तो नहीं हंस रहे हैं।

प्रभाष जोशी तो खुद को ब्राह्मण ही मानते होंगे। उनमें वो सारे गुण होंगे जिनका जिक्र उन्होंने ब्राह्मणों के बारे में अपने इंटरव्यू में किया है। अगर उनका जन्म मिथिलांचल या मालवा के किसी बेहद गरीब ग्रामीण ब्राह्मण परिवार में हुआ होता तो भी क्या ये तय था कि वो संपादक ही बनते। और राजेंद्र यादव किस जातीय गुण की वजह से संपादक बन गए?

तो श्रीमान प्रभाष जोशी और राजेंद्र यादव, बात सिर्फ इतनी सी है कि किसी को कितना मौका मिला है। बात अवसर की है। ये न होता तो आप अपने बच्चों को किसी गांव के सरकारी स्कूल में पढ़ाते। फिर हम भी देखते धारण क्षमता का चमत्कार। यादव जी का ये कहना गलत है कि “ब्राम्हणों में कुछ चीज़ें से अभ्यास आई हैं जैसे कि अमूर्तन पर विचार-मनन और इसीलिए कविताई में उनका वर्चस्व है। इन्हीं वजहों से विश्वविद्यालयों और अकादमियों में भी वे काबिज़ हैं।”

दिलीप मंडल, वरिष्ठ पत्रकार

दिलीप मंडल, वरिष्ठ पत्रकार

वो वहां काबिज इसलिए हैं क्योंकि उन्हें वहां तक पहुंचने का मौका मिला है। पढ़ाई लिखाई को लेकर चेतना अलग अलग जातियों और समूहों में अलग-अलग समय में आई। सामाजिक ढांचे की वजह से शिक्षा संसार में कई समूहों के लिए प्रवेश ही वर्जित था। कुछ जादू नेटवर्किंग का भी है। नरेंद्र जाधव और बीएल मुणगेकर को मौका मिला तो दलित होते हुए भी वो पुणे और मुंबई जैसे बड़े विश्वविद्यालयों में कुलपति बन गए। कोई भी बन सकता है।

किसी जाति में कोई अलग गुण नहीं होता। कुछ पुरानी बातें अब लागू नहीं होतीं। सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने गीता का भाष्य करते हुए 18वें अध्याय में यही कहा है। पढ़ लीजिएगा। 21वीं सदी में जातीय श्रेष्ठता या जातीय विशिष्टता की बात करेंगे तो घृणा के नहीं, हंसी के पात्र बनेंगे।

((राजेंद्र यादव से बातचीत के आधार पर देशकाल में छपी रिपोर्ट पढ़ने के लिये यहां क्लिक करें।))

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10 Responses to “प्रभाष जोशी और राजेंद्र यादव ने शर्मसार किया है”

  1. sushant jha Reply

    August 31, 2009 at 3:30 pm

    Good analysis. It is really alarming to know that Rajendra Yadav is contradicting the same logic which he has, time and again, written in his editorials in Hans. Many of my generation has learnt many thing from his editorial, especially the fire against the system, but now he is himself professing the same idea. It is really surprising.

  2. pankaj srivastava Reply

    August 31, 2009 at 9:11 pm

    बेहद जरूरी हस्तक्षेप किया है दिलीप भाई आपने। इन दोनों विभूतियों ने बहुत कुछ ऐसा किया है जिसने लोगों के मानस को झकझोरा है और बेहतरी की तड़प पैदा की है। लेकिन इससे उन्हें ये हक नहीं मिल जाता कि वे बुढ़ापे में जर्जर विचारों के पैरोकार बन जाएँ। वैसे विचार, जो तथ्यों की कसौटी पर भी खरे नहीं उतरते हैं।

    भोजन की चिंता से मुक्त ब्राह्मण समुदाय के पास निश्चित ही अमूर्त पर चिंतन का समय था और धीरे-धीरे उन्होंने कविता का हुनर भी साध लिया, लेकिन कपड़ा बिनते कबीर या जूता सिलते रैदास (जैसे अब्राह्मणों या दलितों )ने भी जिस निर्गुण ब्रह्म को कविता में बांधकर दुखीजनों को जिस आनंद से परिचित कराया था, वो भी तो अमूर्त प्रत्यय ही है। ये सगुण भक्ति परंपरा के मुकाबले कहीं ज्यादा दुष्कर काम था।

    इतना तो तय है कि ब्राह्मणवाद को विदा किए बिना किसी नए भारत का निर्माण संभव नहीं है। ये लड़ाई जितना दलितों (पिछड़ा जैसा कोई वर्ण नहीं है) की है उतनी ही ब्राह्मणों की भी है। इससे आंख चुराना या किसी भी तर्क पर ब्राह्मणवाद को प्रतिष्ठित करना, आधुनिक और न्यायी भारत बनाने की राह में रोड़ा अटकाना है।

    • Archana Reply

      September 2, 2009 at 4:04 pm

      Srivastav ji,
      main aapke iss baat se sahmat hoon ki vidwatta kisi jaati vishesh ke ddayre mei nahi bandha hota hai, lekin mai aapke iss baat se bilkul sahmat nahin hoon ki brahmin log bhojan ki chinta se mukt hai. Aap kis zamaane ki baat kar rahe hain, aaj ke daur mei Brahmin do waqt ki roti paane ke liye woh sab kar rahe hain jise kabhi ya aaj bhi Harijan kiya karte the. Mere hi offic mei ek brahmin naukari karta tha, uska kaam toilet saaf karna aur jhadu pocha lagana tha.Iss tarah ke kai udaahara aapko mil jayenge. Jamana badal gaya hai.

  3. Sanjay Grover Reply

    September 1, 2009 at 12:47 am

    agar ye (sati wala)sampadkiye Banvari ne likha tha to Prabhash Joshi ke nam se kaise chala gaya? Iska ek matlab yeh bhi hota hai ki Prabhash Joshi ek laparwah sampadak the. Iska dusra matlab hota hai ki hindi akhbaroN me apne nam se dusroN ka likha chhap lene jaisi ghatiya parmparayeN chalti haiN jiska ek gandhiwadi sampadak ne na to kabhi virodh kiya na hi unhehn rokne-badalne ki koi koshish ki. Iska teesra matlab yeh bhi nikalta hai ki Banwari aur anya logoN ne kai aise bhi sampadkiye likhe honge jinka labh unheN milne ki bajaye Prbhash joshi ko mila hoga.
    ab ye sach to Banwari hi bata sakte haiN ki unheN apne kiye ki saza mil rahi hai ya we bali ka bakra bane hain !!??

  4. Sanjeev Tiwari Reply

    September 1, 2009 at 1:29 am

    श्रीमान संजय ग्रोवर जी, पहले पत्रकारिता और संपादकीय लेखन के बारे में जानें, फिर कुछ लिखें बंधु.

    देश के सारे अखबारों में यही होता है कि संपादकीय कोई एक संपादक नहीं लिखता, संपादकीय दल के कई लोग लिखते हैं और उसमें किसी का नाम नहीं जाता. सती वाले संपादकीय में भी किसी का नाम नहीं था. उसे लिखा बनवारी जी ने था और जब विवाद हुआ तो टीम के मुखिया होने के नाते प्रभाष जोशी ने उसका अपयश अपने माथे पर लिया.बहस का मुद्दा प्रभाष जोशी जी के http://www.raviwar.com में छपा साक्षात्कार है, आप उसे वहीं तक रखें तो अच्छा है. उसके बहाने से पत्रकारिता की लानत-मलामत करने की कोशिश न करें.

  5. anand bharti Reply

    September 1, 2009 at 11:00 am

    Dilipji, sachchi baaten kadwi hoti hain aisa apko sochna chahiye tha, kahne ka andaz kuchh meetha kar lete toh aur badhia lagta.

  6. virendra jain Reply

    September 1, 2009 at 12:45 pm

    आपके सामान्य ज्ञान पर तरस आता है कि आपको पता नहीं है कि राजेन्द्र यादव ईमेलवादी नहीं फीमेलवादी हैं . सही खा गया है कामन सेंस इस नोट सो कामन

  7. Sanjay Grover Reply

    September 1, 2009 at 4:16 pm

    aur agar aapne wo sampadkiye likha hi nahin tha to bees sal bad ‘mera mul jhagda’ kahte huye ‘safai’ kyoN !!??? aur ‘safai’ bhi aisi ki jisme aapke asli vichar chhalak-chhalak ja rahe hain.

  8. गिरिजेश Reply

    September 1, 2009 at 5:56 pm

    “21वीं सदी के लगभग 10 साल बीतने के बाद ये अज्ञानी लेखन हमारी देवभाषा में ही संभव है। इस समय पश्चिम में आप कल्पना नहीं कर सकते कि कोई जाति या वर्ण या नस्ल या रंग के आधार पर श्रेष्ठता का ऐसा खुल्लमखुल्ला और अश्लील समर्थन करे। उसे पूरा देश दौड़ा लेगा।”

    “तो श्रीमान प्रभाष जोशी और राजेंद्र यादव, बात सिर्फ इतनी सी है कि किसी को कितना मौका मिला है। बात अवसर की है। ये न होता तो आप अपने बच्चों को किसी गांव के सरकारी स्कूल में पढ़ाते। फिर हम भी देखते धारण क्षमता का चमत्कार।”

  9. rakesh Reply

    September 2, 2009 at 4:19 pm

    अब भी न समझ में आए बाबाओं को तो क्‍या किया जा सकता है. बढिया कहा दिलीपजी आपने.

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