श्रीलंका में एक पत्रकार को 20 साल क़ैद की सज़ा सुनाई गई है। तमिल मूल के पत्रकार जे एस तिसैनयागम को कोलंबो हाई कोर्ट ने आतंकवाद निरोधी कानून के तहत दोषी ठहराते हुए ये कठोर दंड दिया है। श्रीलंकाई अदालत के इस फ़ैसले से आज़ाद प्रेस की वकालत करने वाले लोगों को धक्का पहुंचा है। उन्हें डर है कि अब श्रीलंका में पत्रकारों पर जुल्म और बढ़ जाएगा।
जे एस तिसैनयागम ने 2006 और 2007 में अपनी पत्रिका नॉर्थ-ईस्टर्न मैगजीन में दो लेख लिखे थे। उन लेखों में उन्होंने श्रीलंका सरकार को आड़े हाथों लिया था। उन्होंने बताया था कि कैसे सरकार रसद और दूसरी ज़रूरी चीजों का इस्तेमाल एक हथियार के तौर पर कर रही है। कैसे तमिल बहुल इलाकों में रसद ले जाने से रोका जा रहा है। उन्होंने एलटीटीई के ख़िलाफ़ श्रीलंका सरकार की मुहिम की भी कड़ी आलोचना की थी। जिसके बाद 7 मार्च 2008 को तिसैनयागम को गिरफ़्तार कर लिया गया। कुछ समय बाद उन पर आतंकवाद निरोधी कानून के तहत आरोप मढ़ दिए गए। वो करीब 16 महीने से जेल में बंद हैं और अब उन्हें 20 साल कैद की सज़ा सुना दी गई है।
अदालत ने कहा कि “संविधान ने मीडिया को आज़ादी दी है, लेकिन किसी को यह अधिकार नहीं कि वो ऐसी झूठी रिपोर्ट प्रकाशित करे जिससे साम्प्रदायिक हिंसा भड़क जाए।” फैसले के वक़्त अदालत में बड़ी संख्या में पत्रकार और मानवाधिकार कार्यकर्ता मौजूद थे। वो सभी काफी सकते में हैं। उनके मुताबिक ये पहली बार है जब ख़बर लिखने के कारण किसी पत्रकार को इतना कठोर दंड़ दिया गया है। उनका कहना है कि तिसैनयागम का कसूर सिर्फ़ इतना था कि उन्होंने अपने राजनीतिक नज़रिए को सामने रखा।
2006 से ही श्रीलंका में पत्रकारों पर लगातार हमले हो रहे हैं। पत्रकारों का आरोप है कि इन हमलों के पीछे सरकार और उसके समर्थकों का हाथ है। बीते तीन साल में करीब 14 पत्रकारों की हत्या की गई है। उनके अलावा बड़ी संख्या में श्रीलंकाई पत्रकारों को देश छोड़ने पर मजबूर किया गया। इनमें तमिल मूल के पत्रकारों के साथ कई सिंघली पत्रकार भी शामिल हैं। लेकिन हैरानी की बात है कि ज़्यादातर मामलों में दोषियों को सज़ा तो दूर कोई कार्रवाई नहीं की गई।
इंटरनेशन फेडरेशन ऑफ जर्नलिस्ट्स (आईएफजे) ने तिसैनयागम के ख़िलाफ़ आए फ़ैसले को “क्रूर और अमानवीय” करार दिया है। आईएफजे ने अपने बयान में श्रीलंका सरकार पर आतंकवाद से जुड़े कानूनों के जरिए लोकतांत्रिक आवाज़ों को दबाने का आरोप लगाया है। आईएफजे के जनरल सेक्रेटरी व्हाइट ने कहा है कि इस फ़ैसले से साबित होता है कि श्रीलंका में आज़ाद ख़्याल पत्रकार कितने ख़तरे में हैं।
आईएफजे ने तिसैनयागम के स्वास्थ्य को लेकर चिंता जताई है। संगठन ने श्रीलंका सरकार से अपील की है कि तिसैनयागम का पूरा ख्याल रखा जाए। उनके सेहत की समय-समय पर जांच की जाए। आईएफजे ने यह भी कहा है कि वो तिसैनयागम की रिहाई के लिए मुहिम और तेज करेंगे।
आईएम नागार्जुन
September 2, 2009 at 5:20 pm
प्रभाष जोशी और आलोक मेहता जैसे मुद्दों पर तो बहस बहुत हो रही है। लेकिन कभी-कभी ऐसे ज़रूरी मुद्दों पर भी बहस होनी चाहिए। ये मुद्दें सीधे तौर पर अभिव्यक्ति की आज़ादी और पत्रकारों की ज़िंदगी से जुड़े हैं। श्रीलंका सरकार ने जे एस तिसैनयागम को जानबूझ कर फंसाया है। उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई सोची समझी साज़िश का नतीजा है। जिस समय उन्होंने नॉर्थ ईस्टर्न मैगजीन में अपने लेख लिखे थे उस समय श्रीलंका में आतंकवाद निरोधी कानून नहीं था। ये कानून बाद में बनाया गया और उसे बैक डेट से लागू किया गया। फिर तिसैनयागम को उसके तहत नामजद किया गया। इससे जाहिर होता है कि श्रीलंका की सरकार बड़ी बेरहमी से प्रेस की आज़ादी को कुचल रही है। असहमति की आवाज़ों को दबा रही है।
श्रीलंका की इस तानाशाही रवैये के ख़िलाफ़ पूरी दुनिया में विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। इंटरनेशनल फेडेरेशन ऑफ जर्नलिस्ट्स ने अपना विरोध जता दिया है। अब रिपोर्टर्स विदआउट बॉरडर्स तिसैनयागम को पुरस्कार देने जा रहा है। कमेटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट्स ने भी तिसैनयागम की रिहाई की मांग की है। इसी साल मई में अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने भी इस मुद्दे पर तिसैनयागम का समर्थन किया था।
लेकिन भारत में इस मुद्दे पर ख़ामोशी है। न सरकार बोल रही है और न ही मीडिया। इसलिए मैं जनतंत्र से अपील करता हूं कि वो इस मुद्दे पर आगे बढ़ कर एक मुहिम शुरू करे। एक पीटिशन लाए। प्रभाष जोशी और आलोक मेहता पर तलवारें भांजने वाले लेखक उस पीटिशन पर खुल कर अपनी राय रखें। फिर उन सभी विचारों को श्रीलंका सरकार के नुमाइंदे के पास पहुंचाया जाए। श्रीलंका सरकार का अभी तक का जो रवैया है उसे देखते हुए बहुत से लोग कहेंगे कि ऐसे पीटिशन का क्या फायदा जब उस पर सुनवाई नहीं होगी। बात सही है। लेकिन यहां एक सवाल भी उठता है। सवाल कि सरकार सुने न सुने क्या हम मजलूमों का साथ देना बंद कर देंगे? इंसाफ़ नहीं मिलने की सूरत में क्या इंसाफ़ के लिए आवाज़ उठाना बंद कर देंगे? क्या हक़ों और उसूलों की लड़ाई सिर्फ़ सत्ता में बैठे लोगों का ध्यान खींचने के लिए लड़ी जाती है?
रंगनाथ सिंह
September 2, 2009 at 5:47 pm
घोर आश्चर्य की श्रीलंका सरकार ऐसा जघन्य कृत्य कर सकती है। एक पत्रकार को खबर लिखने के लिए ऐसा दण्ड देना शर्मनाक है। अमानवीय है।
Sudhir Pandey
September 6, 2009 at 11:33 pm
अपने नजरिये को बेबाक रूप से रख कर पत्रकार महोदय ने जो साहस दिखाया उसके लिये बधाई के पात्र है पर श्रीलंका सरकार द्वारा जनता पर विश्वास पैदा करने की जगह पत्रकार को कैद के पुरस्कार नवाजे जाने पर जनतंत्र् के ठेकेदार भी बधाई के पात्र् है क्योंकि लगने लगा है कि उमका मानसिक संतुलन बिगड गया है अब वक्त आ गया है कि जनतंत्र् के असली हकदार जनता ही इसका बेबाकी से विरोध करें वरना पत्रकार बंधुओं के मुह ऐसे ही बंद कर दिये जायेंगे और अंत में आम जनता ही जुल्म सहेगी