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मीडिया कंपनियों का "आतंकवाद"

सहारा समय न्यूज़ चैनल से दर्जनों पत्रकारों को एक साथ हटाए जाने की घटना बेहद चौंकाने वाली रही। सहारा के साथियों ने तो सपने में भी नहीं सोचा होगा कि उनके साथ कभी ऐसा सलूक भी हो सकता है। ज़्यादा हैरानी तो हटाने के तौर तरीके पर हुई। सहारा प्रबंधन ने उनसे बात करने की भी ज़रुरत नहीं समझी। बरसों का रिश्ता पल भर में तोड़ दिया। इस्तीफा सौंपने का तालिबानी फरमान जारी कर दिया। मीडियाकर्मियों को आतंकित करने का यह कदम बेहद शर्मनाक रहा। सहारा में हुए इस तमाशे ने कई नए सवाल खड़े किये हैं, जिन पर बहस अब वक्त की ज़रुरत है। ज़रूरी इसलिए भी क्योंकि पूंजी का आतंक चौथे स्तम्भ को अपने हाथों की कठपुतली बनाकर लोकतंत्र को दांव पर लगाने की तैयारी में है।

सहारा के प्रबंधन ने अपने लोगों को किस बात की सज़ा दी, यह किसी को नहीं पता। खुद उन्हें भी नहीं, जिन्हें कल तक आंखों का तारा बना कर रखा गया था। बेसहारा किये गए लोगों को सिर्फ यह पता चल सका कि मंदी के दौर में संस्थान पर आर्थिक संकट आ खडा हुआ है। अगर पल भर को यह दलील मान भी लें तो इसमें निकाले गए कर्मचारियों का क्या कसूर? वो अपनी जिम्मेदारी बखूबी अंजाम दे रहे थे। इसके बावजूद अगर संस्थान पर आर्थिक संकट आया तो उसके लिए दोषी कौन? मीडियाकर्मी या प्रबंधन? मीडियाकर्मी तो पूंजी जुटाते नहीं। उनका काम तो ख़बर देना है। वैसे सहारा के पत्रकार तो अरसे से विज्ञापन जुटाकर अपने संस्थान को मजबूती भी देते रहे। फिर वह दोषी कैसे हुए? कसूर तो सहारा के प्रबंधन का है, जो बाज़ार की नब्ज़ नहीं समझ सका। अधिकारियों के ऐशो-आराम और बेतुके खर्चों में कोई कटौती नहीं की गई। यानी करे कोई और भरे कोई।

सहारा ग्रुप के चेयरमैन सुब्रत रॉय का मैं बचपन से फैन रहा हूं। तमाम अखबारों में मैंने उनके दर्जनों इंटरव्यू पढ़े हैं। टीवी चैनलों पर शून्य से शिखर तक पहुंचने की दास्तान खुद उन्हीं की जुबानी सुनी। कैसे गोरखपुर की गलियों का एक अदना सा शख्स मेहनत, लगन व कुशल प्रबंधन के ज़रिये देखते-देखते कामयाबी के एवरेस्ट पर काबिज़ हो गया। चंद सालों में आम आदमी से देश के बड़े पूंजीपतियों में शुमार होना कोई हंसी खेल नहीं। निश्चित तौर पर यह उनके कुशल प्रबंधन का कमाल रहा होगा। लेकिन शून्य से शिखर तक का सफ़र अगर उनकी कामयाबी है तो फिर मंदी के सामने घुटने टेकना और टूटकर बिखर जाना क्या है?… यकीनन नाकामी। इसकी जिम्मेदारी भी तो उसी को लेनी चाहिए जो उपलब्धियों पर इतराता रहा हो।

यही नहीं मीडियाकर्मियों से इस्तीफा मांगते वक़्त जो रवैया अपनाया गया, वह तो कतई जायज़ नहीं था। इस्तीफे की खातिर बेवजह दबाव बनाने के लिए कलम और कैमरे के सिपाहियों को मिनटों में गेस्ट हाउस से बाहर निकाल सड़क पर फेंक देना, आखिर क्या साबित करता है? क्या इस तरह आतंकित किये बिना काम नहीं चलने वाला था? तमाम दूसरे संस्थानों से भी लोग हटाए जाते हैं। वहां भी छंटनी होती है, लेकिन विदाई की बेला में उनसे इस तरह दुश्मनों से भी बदतर सलूक तो नहीं किया जाता। हां, संवेदनाएं ज़रूर जताई जाती हैं। झूठी ही सही पर दिलासा दी जाती है। जिंदगी के सफ़र में फिर कभी साथ काम करने आश्वासन भी दिया जाता है।

बीते एक दशक में मीडिया, खासकर न्यूज़ चैनलों की चकाचौंध ने तमाम पूंजीपतियों को अपने ग्लैमर के जाल में जकडा। बिल्डर से लेकर चूरन बेचने वाले तक, हर किसी को इसमें भविष्य नज़र आने लगा। उन्होंने मीडिया को तमाम सही-गलत धंधों को बेरोक-टोक चलाने का हथियार बना दिया। सियासत के सर्कस में वाह-वाही लूटने का इससे आसान और कारगर तरीका दूसरा कोई नहीं रहा। नतीजतन हर महीने, हर हफ्ते नए मीडिया संस्थान खुलने लगे। ऐसे दुकान की तरह, जहां सिर्फ एक ही ध्येय था … धंधा चमकाना। मानवीय मूल्य, नैतिकता, संवेदना, सरोकार, परम्पराएं और कर्तव्यबोध जैसे शब्द इन दुकानों में बेमोल और अर्थहीन साबित हुए। वहां बातें सिर्फ नफे और नुकसान की होने लगीं। घाटा किसी दूसरे धंधे में हुआ तो भी उसका ठीकरा मीडिया के सर फोड़ने में देरी नहीं लगाई गई। यानी पहले मीडिया की आड़ में चलने वाले धंधे अब उसी के बजट से चलाने की योजना तैयार हुई।

मंदी की मार
से भारतीय मीडिया कितना प्रभावित हुआ है इसका अंदाजा न्यूज़ चैनलों और अखबारों के विज्ञापनों को देखकर आसानी से लगाया जा सकता है। यह एक बड़ा सच है कि भारतीय मीडिया पर मंदी का उतना असर नहीं हुआ जितना बताया जा रहा है। मैं स्टार न्यूज़ में काम करता हूं। वहां तो अब तक मंदी के नाम पर न तो खबरें कम की गईं और न ही पैसे। बल्कि मुझ पर तो ज्यादा से ज्यादा अच्छी स्टोरीज़ करने का दबाव अब भी पहले की तरह ही रहता है। मंदी ने हमारे संस्थान में आर्थिक संकट क्यों नहीं पैदा किया? शायद इसलिए कि यहां की पूंजी, कहीं और खर्च नहीं की गई।

सहारा में आई सुनामी भविष्य के खतरे का संकेत है। अगर चौथा स्तम्भ इसी तरह पूंजीपतियों के हाथों की कठपुतली बनकर रह गया तो देश के लोकतंत्र का क्या होगा? जिस दौर में कार्यपालिका और विधायिका से लोगों का भरोसा उठ चुका हो। न्यायपालिका खुद कटघरे में हो। ऐसे नाजुक दौर में चौथे स्तम्भ का कमज़ोर होना, लोकतंत्र के लिए कतई शुभ नहीं। चौथे स्तम्भ को कमज़ोर करने और इसके खेवनहारों को आतंकित करने वालों का जुर्म किसी “आतंकवाद” से कम नहीं

इस बारे में मंत्रालय और सरकार की चुप्पी भी बेहद खतरनाक है। कलम और कैमरे के सिपाही सरेआम रुसवा हो रहे हैं और सरकार अंधे धृतराष्ट्र की तरह चौथे स्तम्भ के चीरहरण पर खामोश है। लगता है कि नेता इसी मौके के इंतज़ार में थे। आखिर पेट और परिवार की खातिर नौकरी बचाने के लिए पत्रकार जब नेताओं व प्रभावशाली लोगों की परिक्रमा करने को मजबूर होगा, उनके रहमो-करम पर निर्भर होगा, तो उनकी कारगुजारियों की खबर क्या ख़ाक बनाएगा। ऐसे में कथित मीडिया मालिकों के पूंजी के आतंकवाद के खिलाफ सरकार से कोई उम्मीद बेमानी है, इस बारे में कोई पहल तो खुद मीडिया से जुड़े वरिष्ठ लोगों को ही करनी होगी। ऐसा करना उनकी व हम सबकी नैतिक ज़िम्मेदारी भी है।

((मोहम्मद मोईन इलाहाबाद में स्टार न्यूज़ के रिपोर्टर हैं))

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10 Responses to मीडिया कंपनियों का "आतंकवाद"

  1. divyanshu Reply

    September 1, 2009 at 2:21 pm

    यह लेख पढ़ा. दिल को छू गया. वास्तव में मीडिया की हालत दिन ब दिन बद से बदतर होती जा रही है. जो चिंता जताई गयी है वह जायज़ है. अगर मीडिया पर वाकई पूंजीपतियों का कब्ज़ा होता गया तो चौथे स्तम्भ की अहमियत ही ख़त्म हो जाएगी, जिसका हमारे लोकतंत्र पर काफी बुरा असर पड़ेगा.
    आपने जिस प्रकार सहारा की घटना को आधार बनाकर भविष्य के खतरे के बारे में आगाह किया है, उस पर चिंतन बेहद ज़रूरी हो गया है, वरना शायद हम लोग चिंता करने लायक भी नहीं रह पाएंगे. आपसे अनुरोध है आपने जो मुहिम छेड़ी है, उसे बीच में मत छोडियेगा. आप शुरुआत करें, तमाम लोगों का कारवां खुद ब खुद तैयार हो जाएगा. मोहम्मद मोईन के साथ ही जनतंत्र को भी बधाई, कि उसने इतने गंभीर व अनिवार्य विषय को उठाया और बेखौफ होकर तमाम लोगों की आवाज़ बन गया. यही निडरता जनतंत्र की पहचान बन चुकी है.
    *दिव्यांशु

  2. pankaj jha Reply

    September 1, 2009 at 8:56 pm

    shandar hai

  3. suman Reply

    September 1, 2009 at 11:10 pm

    thanks for showing us real picture of media nd journlist.shame on…like sahara nd other compny.

  4. raaj Reply

    September 2, 2009 at 3:45 pm

    moin bhai lagta hai kai din ki dabi aag ko aapne bahar nikalaa…bahut khoob likhaa hai…andar ki aag se khud jalane ke bajaye bahar aise hi nikalte rahiye…jaldi hi kuchh aur pathane ko milega asaa hai……………

  5. JANTANTRA KA SHUBHECHCHHU Reply

    September 2, 2009 at 11:51 pm

    श्री समरेन्द्र जी/ श्री मोईन जी
    यह लेख पढने के बाद मुझे काफी गुस्सा आया और आप दोनों पर दया भी. ऐसा लगता है आप दोनों की सहारा से कोई पुरानी चिढ है. जो बातें लिखी गयी हैं, वह काफी बचकानी हैं और लगता है सस्ती लोकप्रियता पाने के लिए किसी नामचीन हस्ती की आलोचना करने का शार्टकट नुस्खा आप लोगों ने सीख लिया है. आप पत्रकारों के हमदर्द हैं, यह अच्छी बात है, लेकिन पिछले एक सालों में कोई ऐसा न्यूज़ चैनल नहीं, जहाँ स्टाफ की छटनी न की गयी हो, ऐसा कोई संस्थान नहीं जहां पत्रकारों पर गाज न गिरी हो, लेकिन वह आप लोगों को नज़र क्यों नहीं आया. तब आपकी कलम खामोश क्यों रही. आप दोनों खुद जिस संस्थान में थे या हैं, क्या वहाँ पत्रकारों के साथ बड़ा अच्छा सलूक किया जाता है, लेकिन वह आपको नहीं दिखेगा. सहारा ने अपने संस्थान के पत्रकारों को जितनी सुख-सुविधाएं व मान-सम्मान दिया, क्या उतना किसी और जगह के लोगों को मिला है. एक पत्ता क्या हिला आप लोगों ने तूफ़ान मचा दिया और जहां वाकई तूफ़ान आया वहां आँख बंद कर ली. मैं खुद सहारा में हूँ, लेकिन अपना नाम देकर बेवजह के विवाद में नहीं पढ़ना चाहता. अंत में इश्वर से प्रार्थना करता हूँ की वह आप दोनों को सदबुद्धि दे. आपके पोर्टल की एक अलग पहचान थी, लेकिन लगता है ज्यादा भीड़ बटोरने के चक्कर में आप इसे चूरन बना देन चाहते हैं, और खुद दूसरों को चूरन वाला बताते हैं. हो सकता है आप मेरी टिप्पडी प्रकाशित भी न करे, लेकिन अगर सच का सामना करने की हिम्मत है तो मेरी इस सच्चाई पर पोर्टल के माध्यम से अपनी प्रतिक्रिया भी दे.
    जनतंत्र का एक शुभेच्छु

    • समरेंद्र Reply

      September 3, 2009 at 12:26 am

      जनतंत्र के शुभेच्छु जी,
      आप पहले पढ़ा कीजिए। उसके बाद अपनी टिप्पणी दीजिए। आपसे किसने कहा है कि दूसरी जगहों पर हो रही छंटनी की ख़बरें जनतंत्र पर नहीं छपती हैं। एनडीटीवी, न्यूज़ एक्स, वॉयस ऑफ इंडिया और डीएनए समेत सभी जगहों पर हुई छंटनी की ख़बरें यहां छपी हैं। टाइम्स ऑफ इंडिया, दैनिक जागरण, हिंदुस्तान, दैनिक भास्कर, जनसत्ता समेत सभी अख़बारों के ख़बरों के बारे में लिखा गया है। प्रभाष जोशी, शेखर गुप्ता, आलोक मेहता, मृणाल पांडे, हरिवंश, शैलेंद्र दीक्षित समेत कई बड़े और सम्मानित संपादकों की नीतियों और विचारों के बारे में नाम लेकर लिखा गया है। बहुत कड़े शब्दों में आलोचना की गई है। सबने उन खबरों को पढ़ा है और बहुतों ने उन पर अपनी प्रतिक्रिया दी है। लेकिन आप जैसी बौखलाहट कहीं नज़र नहीं आई। शायद इसलिए कि आप एक एजेंडे के तहत जनतंत्र पर पहुंचे और अपने गुस्से को जाहिर कर दिया। इसलिए आपसे एक ही गुजारिश है कि आलोचना करने से पहले पढ़ा कीजिए।

      रही बात जनतंत्र पर टिप्पणी को प्रकाशित करने या नहीं करने की तो यहां पर हमारी नीति साफ है। अगर आपने गाली का सीधे तौर पर या फिर घुमा कर प्रयोग नहीं किया है… अगर आपने किसी का भी चरित्र हनन नहीं किया तो आपकी बात चाहे कितनी भी तल्ख क्यों न हो हम उसे सेंसर नहीं करेंगे। हमारी कोशिश जनतंत्र को एक सार्थक बहस के मंच के तौर पर विकसित करने की है।

      आखिर में बस इतना ही कि आप हम लोगों के लिए कोई प्रार्थना मत कीजिए। ईश्वर से तो कतई नहीं।

  6. sumit kumar Reply

    September 4, 2009 at 1:02 pm

    moin bhai aapki baat sau feesadi sahi hai. sahara me employee ko “KARTAVYA YOGI” ka ek jhutha tamga diya jata hai jisko taang kar wo ghumta hai jab tak ki company ko uski jaroorat rahi tab tak to wo karrtavyayogi karyakarta raha, uske baad us sadasya ko tathakathit parivaar se bina kisi kaaran ke aur bina kaaran bataye baahar ka raasta dikhaya jaata hai. kya parivaar ka yahi matlab hota hai. shayad punjipatiyo ke yahan aisa hota hoga mere aur tamam aur aap ke yahan aisa nahi ho sakta kyoki hum aur aap parivaar ke har sadasya ko unche uthta dekhna chaahenge na ki unke upar se chadhkar apna kad badhana chahenge? kaya sahara parivaar sirf dikhava hai?
    kya sahara parivar “PARIVAR” SHABD KE NAYE MATLAB KHOJ RAHA HAI?

  7. जनतंत्र का एक शुभेच्छु Reply

    September 4, 2009 at 4:17 pm

    श्री समरेन्द्र जी/ श्री मोईन जी,
    आशा के विपरीत आपने मेरी टिप्पणी तो प्रकाशित कर दी, पर अपनी वाह-वाही लूटने से खुद को रोक नहीं सके. टिप्पणी के साथ ही अपना एक पुछल्ला भी लगा दिया, लेकिन उसमे मेरे द्बारा उठाये गए सवाल नदारत रहे, आप खुद अपने मुंह मियाँ मिट्ठू बनते रहे. आप लोग तो कई संस्थानों में रहे हैं, तमाम अनुभव होंगे. क्या सहारा जितना पैसा, मान-सम्मान और सुविधाएं दुसरे किसी मीडिया हाउस ने अपने कर्मचारियों को दी हैं. बेशक नहीं. आप भी इस सच से इनकार नहीं कर सकते, लेकिन इसे स्वीकारेंगे नहीं, क्योंकि आप तो हमारे संस्थान के खिलाफ एक ख़ास उद्देश्य से दुष्प्रचार में लगे हैं. ऐसे में आपसे किसी जवाब की उम्मीद करना बेमतलब है. आप भले ही कुछ कहें, लेकिन सहारा श्री इस देश में पूजे जाते हैं. तमाम घरों के चूल्हे उन्ही की वजह से जलते हैं, हमारे और हमारे जैसे हजारों लोगों के लिए तो वह साक्षात भगवान हैं, लेकिन यह सब आपको इस वजह से नज़र नहीं आएंगा, क्योंकि आपने लेख में तो धृतराष्ट्र और गांधारी का जिक्र किया, लेकिन खुद अपनी आँखों पर पट्टी बांधे हुए हैं. आप लोग सिर्फ वही देखते हैं, जो आप देखना चाहते हैं. सच तो कतई नहीं. छोडिये ! मैं आप लोगों की व्याकुलता और विवशता समझ सकता हूँ. एक ने कई मीडिया हाउस में काम किया, लेकिन हर बार बाहर का रास्ता देखना पडा, और दूसरे महाशय 12-14 साल खपाने के बाद भी अभी किसी चैनल के नियमित स्टाफ नहीं बन सके. सो, सहारा में नौकरी पाने या कुछ और पाने की लालसा में यह दांव खेलने को विवश हैं. मैं भी मीडिया में हूँ, और एक पेशे में होने के नाते आप दोनों साथियों को सलाह दे रहा हूँ कि खुद को कुंठित होने से बचाइये. सहारा परिवार ने बहुतों की मदद की है, उन्हें रोज़गार दिया है, अपने नाम की तरह ही सहारा दिया है. फिर आप दोनों की अनदेखी कैसे की जा सकती है. इस तरह बेवजह कीचड मत उछालिये, मन के मैल मिटाकर खुले दिल से आइये, यकीन मानिए आपको नौकरी के लिए निराश नहीं होना पड़ेगा. वैसे भी आप दोनों अच्छा लिख ही लेते हैं, कम से कम पोर्टल देखकर तो ऐसा ही लगता है. मेरी बातों का बुरा मत मानियेगा, तिलमिलाइएगा भी नहीं. मैं कोई पराया नहीं, आपका ही भाई हूँ, इसलिए अंत में एक और सलाह देना चाहता हूँ, पत्रकारिता के नाम को गंदा मत करिए, अपनी योग्यता और कलम का सही इस्तेमाल करिए, वरना लोकतंत्र सचमुच खतरे में पड़ जाएगा, जिसके जिम्मेदार भी तो आप जैसे लोग ही होंगे.
    जनतंत्र का एक शुभेच्छु

    • AMRESH Reply

      September 4, 2009 at 10:31 pm

      SAHARA WALE BHAI SAHAB, AAPKE LIYE SIRF ITNA HI

      SHAME, SHAME, SHAME

      AGAIN & AGAIN

      SHAME-SHAME

    • pankaj Reply

      September 4, 2009 at 10:42 pm

      अजी यह तो वही बात हुई की जबरा मारे और रोने भी न दे. लेकिन समरेन्द्र भाई आप इनके सामने झुकिएगा नहीं, हम सब लोग आपके साथ हैं और इन्हें जनतंत्र का शुभेछु बनने की कोई ज़रुरत नहीं.

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