
जे एस तिसैनयागम, पत्रकार
अभी साथी आई एम नागार्जुन ने जनतंत्र ने एक अपील की है। वो चाहते हैं कि श्रीलंका में गिरफ़्तार तमिल पत्रकार जे एस तिसैनयागम की रिहाई के लिए भारतीय पत्रकार भी दबाव बनाएं। तिसैनयागम को एलटीटीई से पैसे लेकर लिखने के आरोप में 20 साल कैद की सज़ा सुनाई गई है। यह अभिव्यक्ति की आज़ादी का मसला है और इसका पुरजोर विरोध होना चाहिए। उनकी बात सही है। तिसैनयागम भले ही भारत के वाशिंदे नहीं हैं। मगर हैं तो हमारी और आपकी तरह एक पत्रकार ही। 2006 और 2007 में उन्होंने दो लेख लिखे थे। जिसमें श्रीलंका सरकार की नीयत पर सवाल उठाया गया था। उन्होंने यह कहा था कि रसद को श्रीलंकाई सेना हथियार के तौर पर इस्तेमाल कर रही है। तमिल बहुल इलाकों में रसद ले जाने से रोका जा रहा है। जिसके बाद श्रीलंका सरकार ने उन्हें मार्च 2008 में गिरफ़्तार करा लिया। यह एक साज़िश है और इस साज़िश का विरोध करना चाहिए। आई एम नागार्जुन की अपील पर जनतंत्र आप सबसे इस मुहिम में शामिल होने की गुजारिश करता है। आप खुल कर अपनी प्रतिक्रिया दीजिए। हम आपकी प्रतिक्रिया को श्रीलंका सरकार के नुमाइंदे तक पहुंचाने की पूरी कोशिश करेंगे। – मॉडरेटर
आई एम नागार्जुन की प्रतिक्रियाप्रभाष जोशी और आलोक मेहता जैसे मुद्दों पर तो बहस बहुत हो रही है। लेकिन कभी-कभी ऐसे ज़रूरी मुद्दों पर भी बहस होनी चाहिए। ये मुद्दें सीधे तौर पर अभिव्यक्ति की आज़ादी और पत्रकारों की ज़िंदगी से जुड़े हैं। श्रीलंका सरकार ने जे एस तिसैनयागम को जानबूझ कर फंसाया है। उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई सोची समझी साज़िश का नतीजा है। जिस समय उन्होंने नॉर्थ ईस्टर्न मैगजीन में अपने लेख लिखे थे उस समय श्रीलंका में आतंकवाद निरोधी कानून नहीं था। ये कानून बाद में बनाया गया और उसे बैक डेट से लागू किया गया। फिर तिसैनयागम को उसके तहत नामजद किया गया। इससे जाहिर होता है कि श्रीलंका की सरकार बड़ी बेरहमी से प्रेस की आज़ादी को कुचल रही है। असहमति की आवाज़ों को दबा रही है।
श्रीलंका की इस तानाशाही रवैये के ख़िलाफ़ पूरी दुनिया में विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। इंटरनेशनल फेडेरेशन ऑफ जर्नलिस्ट्स ने अपना विरोध जता दिया है। अब रिपोर्टर्स विदआउट बॉरडर्स तिसैनयागम को पुरस्कार देने जा रहा है। कमेटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट्स ने भी तिसैनयागम की रिहाई की मांग की है। इसी साल मई में अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने भी इस मुद्दे पर तिसैनयागम का समर्थन किया था।
लेकिन भारत में इस मुद्दे पर ख़ामोशी है। न सरकार बोल रही है और न ही मीडिया। इसलिए मैं जनतंत्र से अपील करता हूं कि वो इस मुद्दे पर आगे बढ़ कर एक मुहिम शुरू करे। एक पीटिशन लाए। प्रभाष जोशी और आलोक मेहता पर तलवारें भांजने वाले लेखक उस पीटिशन पर खुल कर अपनी राय रखें। फिर उन सभी विचारों को श्रीलंका सरकार के नुमाइंदे के पास पहुंचाया जाए। श्रीलंका सरकार का अभी तक का जो रवैया है उसे देखते हुए बहुत से लोग कहेंगे कि ऐसे पीटिशन का क्या फायदा जब उस पर सुनवाई नहीं होगी। बात सही है। लेकिन यहां एक सवाल भी उठता है। सवाल कि सरकार सुने न सुने क्या हम मजलूमों का साथ देना बंद कर देंगे? इंसाफ़ नहीं मिलने की सूरत में क्या इंसाफ़ के लिए आवाज़ उठाना बंद कर देंगे? क्या हक़ों और उसूलों की लड़ाई सिर्फ़ सत्ता में बैठे लोगों का ध्यान खींचने के लिए लड़ी जाती है?
Recent Comments