इस वक़्त बड़े-बड़े मीडिया संस्थान मंदी से जूझ रहे हैं और लोगों को बेरोज़गार कर रहे हैं। इसी मीडिया का एक वर्ग ऐसा है जो छंटनी की प्रक्रिया से प्रभावित तो नहीं हुआ है लेकिन मंदी की मार ज़रूर झेल रहा है। वो तबका है स्ट्रिंगरों का। स्ट्रिंगर किसी मीडिया संस्थान के कर्मचारी नहीं होते। इसलिए उनके बेरोजगार होने का सवाल ही नहीं उठता। लेकिन मंदी ने उनकी रोजी रोटी पर भी संकट पैदा कर दिया है। अब सभी न्यूज़ चैनलों ने स्ट्रिंगरों से ख़बर लेना करीब-करीब बंद कर दिया है। अगर किसी स्ट्रिंगर से ख़बर मंगाई जाती है तो बहुत सोच-विचार के बाद। ऊपर से यह आदेश भी दे दिया गया है कि अगर किसी स्ट्रिंगर की ख़बर नहीं चली तो उसका स्पष्टीकरण तैयार रखें।
इसके पीछे एक सोच काम करती है। चैनल से लिए स्ट्रिंगरों से ख़बर मंगाने के बाद उन्हें पैसे देने पर लोगों को लगता है कि ये पैसा चैनल के बाहर दिया जा रहा है। मंदी के दौर में तो स्ट्रिंगर को पैसे देने के मतलब पैसे को पानी में बहाने के बराबर है। सीधे शब्दों में कहा जाए तो स्ट्रिंगर किसी भी चैनल के लिए हमेशा सौतेला होता है। इसलिए मंदी की सबसे पहली मार इसी सौतेले तबके पर पड़ी है। इलाहाबाद में इसका असर देखा जा सकता है। यहां सभी बड़े चैनलों की दुकान बंद सी हो गई है। सभी स्ट्रिंगर दिन भर चाय की दुकानों पर गप्प मारते हैं या फिर रिलायंस वेब वर्ल्ड में बैठ कर अपने अच्छे दिनों को याद करते हैं।
एक दौर वह भी था जब हम राष्ट्रीय न्यूज़ चैनलों के लिए 20-25 ख़बर आसानी से भेज दिया करते थे। एक महीने में 20-25 हज़ार रुपये की कमाई हो जाती थी। लेकिन अब बाज़ार मंदा है। हर किसी को रोजी रोटी की चिंता सता रही है।
मंदी के इस दौर में वही स्ट्रिंगर मस्त हैं जो अपनी अलग दुकान भी चलाते हैं। सभी जगह बड़ी संख्या में ऐसे स्ट्रिंगर मिल जाएंगे जो चार पहिया गाड़ी में घूमते हैं। कमर में रिवॉल्वर खोंसे चलते हैं। शानदार हवेलियों में रहते हैं। उनका असली काम कुछ और है और धौंस जमाने के लिए… चेहरा दिखाने के लिए स्ट्रिंगर बन गए हैं। लेकिन इलाहाबाद की पत्रकारिता का तेवर अलग है। यहां से कई ऐसे स्ट्रिंगर निकले जिन्होंने अपनी मेहनत, लगन और ईमानदारी से काफी लंबा सफर तय किया और तय कर रहे हैं। वो सभी फाकामस्ती को तैयार रहते हैं लेकिन ग़लत काम के लिए नहीं।
कुछ समय पहले आईबीएन 7 पर भूख पर स्पेशल शो बने थे। वो ख़बर इलाहाबाद के ही एक रिपोर्टर की थी। वो पहले स्ट्रिंगर थे और आज बेहतरीन रिपोर्टर हैं। हाल ही में रीता जोशी की मायावती पर टिप्पणी को लेकर काफी बवाल मचा था। लेकिन थोड़ी ही देर में मायावती का ठीक वैसा ही पुराना बयान टेलीविजन चैनलों पर छा गया। वो पुराना बयान इलाहाबाद की आर्काइव से ही निकला था।
लेकिन अफ़सोस आज मंदी ने इलाहाबाद के तमाम जुझारू पत्रकारों का जोश ठंडा कर दिया है। उनमें से कई उस वक़्त को कोस रहे हैं जब वो मीडिया में आए। कुछ का कहना है कि इससे बेहतर होता वो परचून की दुकान खोल लेते। लेकिन यहां भी एक दिक्कत है। मीडिया में काम करने के बाद जिस सम्मान और शोहरत के वो आदि हो चुके हैं, किसी और पेशे में वो मिलना मुमकिन नहीं। ऐसे में बस यही कहा जा सकता है कि न्यूज़ चैनल का ये काम स्ट्रिंगरों के लिए ऐसा निवाला है जिसे न निगलते बन रहा है न उगलते।
Deepak Gambhir
September 2, 2009 at 4:40 pm
Sir apne jo bhi likha hain woh sau pratishat sahi hain..Allahabad ke stringers ke haalat kuch aise hain ki woh chah kar bhi kuch nahi kar sakte recession ki maar ne unko jarur kamjor kar diya hain lekin woh apko hamesha field par milenge..Aaaj poori Media industry mein allahabad ka naam sabse pehle aata hain..kyonki yahi par lagan wale patrkaar apni karyashamta ke bal par uchya par baithe hain…bhale hi unse khbaare lena kam kar diya gaya ho ..lekin woh apko hamesha muskraye chehere se milenge..! Jo bhi khabare kai national channels par chali usne Allahabad ke stringers aur reporters ki sujh bujh ka parichay diya hain..Chahe woh abhi haal hi mein rita Bahuguna Joshi ke prakaran mei hua ho jab yahi ke reporters ki archive mein se woh mayawati ka bayan nikal kar aaya ho aur dhamaka kar diya ho khabar mein..! Bhale hi stringers ko koi bhi channel badi hikarat se dekhta ho lekin wahi hain jo asli yoddha kehlata hain…Apke is lekh se allahabad ke electronic media ko ek nayi urja mili hain…! Thxs..Sir 4 ur suuport….Deepak Gambhir,Allahabad..
ASHISH RAI
September 3, 2009 at 11:10 am
Thanks raj shakher ji,
For puttring the actul truth of present condition of all the stringers of Allahabad…
But.i think u should clear the actual meaning of stringer.BEFORE PUTING THIS ARTICAL ON JANTANTRA ..
THE ACTUAL MEANING OF STRINGER…
I n journalism, a stringer is a type of freelance journalist who contributes reports to a news organization on an on-going basis but is paid individually for each piece of published or broadcast work.
As freelancers, stringers do not receive a regular salary and the amount and type of work is typically voluntary. However, stringers have an ongoing relationship with one or more news organizations to provide content on particular topics or locations when the opportunities arise.
The term is typically confined to news industry jargon, and in print or in broadcast stringers are sometimes referred to as correspondents or contributors, while at other times they may not receive any public recognition for the work they contributed.
A reporter can “string” for a news organization in a number of different capacities and with varying degrees of regularity, and the relationship between the organization and the stringer is typically very loose. Larger news organizations often rely on stringers to quickly provide scene descriptions or quotes on breaking news stories when it would be difficult for a staff reporter to get to the locale. Stringers are heavily relied upon in this capacity by most television news organizations for video footage and interviews.
REGARDS
ASHISH RAI
STRINGER.
अशोक आशीष
September 4, 2009 at 9:49 am
ऐसा नहीं है कि मीडिया में ही सम्मान व सोहरत है और एक बार सम्मान और सोहरत पा लेने वाले पत्रकार दूसरा कुछ नहीं कर सकतें सिवा फांकाकशी के।
बहुत से पत्रकार हैं जो मीडिया में घुटन महसूस करने के बाद गैर सरकारी संगठनों के लिए काम कर रहे हैं अथवा विज्ञापन कंपनियों के कॉपी राइटर बने हुए हैं। वहां वे सम्मान से जी रहे हैं और आर्थिक रूप से मजबूत भी हैं। इन दोनों सेक्टरों में भी क्रिएटीविटी है।
यह सही है है कि मीडिया घराने स्ट्रींगरों के साथ सौतेला व्यवहार करते हैं, जबकि अपनी दुकानदारी भी उन्हीं के भरोसे चलाते हैं। इसमें कर्मचारी पत्रकारों का भी दोष कम नहीं। वे एक बार जहां स्ट्रींगर से स्टाफ बनें, उनका रंग-ढंग बदल जाता है और वे मालिकों की तरह व्यवहार करने लगते हैं। मानों स्ट्रींगर या स्वतंत्र पत्रकार होना कोई दोयम दर्जें का काम हो।
Manavendra pratap singh
September 5, 2009 at 11:37 pm
राजशेखर जी, आपने इलाहाबाद के मीडिया के बारे में जो लिखा वो ठीक है इलाहाबाद ने तमाम ऐसे नाम दिए जिन्होंने मीडिया में काफी बड़ा मुकाम हासिल किया और ये लोग हम सबके आदर्श है ..केवल इलाहाबाद की मीडिया ही नही यहाँ के लोग भी अपने विरोधी तेवर के कारण जाने जाते है, यहाँ लोगो के बीच एक कहावत भी चलती है की ” ये इलाहाबाद है यहाँ लोगो ने हनुमान जी को भी लेटा दिया है” दरअसल यहाँ संगम तट पर एक हनुमान मंदिर जिसमे हनुमान जी लेटे हुए है जिस वजह से उन्हें ‘लेटे हुए हनुमान जी’ कहा जाता है….कहने का मतलब ये है की यहाँ के मीडिया वाकई क्रांतिकारी है !