अमर उजाला के समूह संपादक शशि शेखर शुक्रवार से हिंदुस्तान की ज़िम्मेदारी संभालने जा रहे हैं। अमर उजाला ने उनकी अगुवाई में एक लंबा सफ़र तय किया। कई मौकों पर आदर्श भी प्रस्तुत किया है। हाल ही में चुनाव के दौरान जब बहुत से मीडिया संस्थान नेताओं के आगे-पीछे घूम रहे थे और पैकेज का खेल खेल रहे थे तो अमर उजाला ने इस राह पर चलने से इनकार कर दिया। यह एक साहसिक फ़ैसला रहा और इसके लिए अमर उजाला की तारीफ़ की जाती है। हिंदुस्तान में एडिटर इन चीफ की जिम्मेदारी संभाले से ठीक पहले शशि शेखर ने जनतंत्र से तमाम मुद्दों पर खुल कर बात की। अमर उजाला में मिले अनुभव साझा किये। अपनी ज़िंदगी और अपने डर पर बात की। इन सबके बीच जो सबसे अहम बात निकल कर आई वो यह कि हिंदुस्तान से कोई निकाला नहीं जाएगा। शशि शेखर हिंदुस्तान अकेले जा रहे हैं और फिलहाल कोई नई टीम ले जाने का इरादा नहीं है। आप उनका इंटरव्यू पढ़िए और अपनी प्रतिक्रिया दीजिए।
समरेंद्र - सबसे पहले तो नई जिम्मेदारी के लिए शुभकामनाएं और बधाई।
शशिशेखर – धन्यवाद।
समरेंद्र – हिंदुस्तान ज्वाइन करने के बाद आपका पहला काम क्या होगा?
शशि शेखर – हिंदुस्तान ज्वाइन करने के बाद मेरा पहला काम वहां के लोगों की शक्ति और सामर्थ्य का आकलन होगा। मैं मानता हूं कि जो लोग जहां काम कर रहे होते हैं, वो उस योग्य होते हैं। ये अजीब सी भ्रांति है और कुछ लोगों ने ऐसे प्रयोग किए भी हैं कि वो जहां गए तो पूरा काफिला लेकर गए। किसी सामंत की तरह, वहां जाकर स्थापित हो गए। अगर आप मेरा करियर उठा कर देखें तो “आज” अख़बार छोड़ कर मैं जब “आज तक” गया तो वहां आज अख़बार का कोई साथी नहीं आया। “आज तक” से यहां (अमर उजाला) पर आया तब भी जो लोग मेरे करीबी माने जाते थे, उन लोगों को नहीं रखा। यहां पर जो लोग थे उनको ही मैंने प्रमोट किया। आज सबसे अधिक यूनिट्स में वो लोग हैं जो “अमर उजाला” में छोटे पदों पर काम किया करते थे या अमर “उजाला” छोड़ कर चले गए थे। मैं यह मानता हूं कि वो “अमर उजाला” के लोग हैं। मैं चाहूंगा कि “हिंदुस्तान” में जाने के बाद हम सभी कह सकें कि हम हिंदुस्तानी हैं। पहला कदम यही होगा कि जो लोग वहां पर हैं उनके साथ मिल कर काम करें। जो मुझे आता है और जो उनको आता है, हम मिल कर एक बड़ी ताक़त बनें।
शशि शेखर का विदाई संदेश
जहां किसी ने चंद लम्हे बिताए हों उस जगह से खुद-ब-खुद एक रिश्ता कायम हो जाता है। फिर शशि शेखर ने तो अमर उजाला में सात साल बिताए हैं। उस संस्थान से उनका रिश्ता कितना मजबूत होगा इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। हिंदुस्तान में नई पारी शुरू करने से पहले अमर उजाला के समूह संपादक ने साथियों को विदाई संदेश भेजा। बहुत मार्मिक विदाई संदेश। इस संदेश का सार यही है कि ज़िंदगी सूदखोर महाजन की तरह है। वो बिना कीमत वसूले किसी को कुछ नहीं देती। … ((read more))
समरेंद्र – अभी हिंदुस्तान में डर का माहौल है। पुरानी परंपरा भी रही है कि जब भी सत्ता बदलती है तो सिपहसालार बदलते हैं तो क्या आप डर के माहौल को दूर करेंगे या सिपहसालार बदलेंगे।
शशि शेखर – मैंने आपसे कहा न कि मैं नए लोग लाने में यकीन नहीं रखता। जो लोग वहां पर सबसे पहले उनसे काम कराने का प्रयास करुंगा। लोग कहते हैं कि मैं तेज दौड़ता हूं। मैं तेज़ नहीं दौड़ता। मैं जिस चाल पर चलता हूं साल भर … 365 दिन चलता रहता हूं। मेरी कोशिश होगी कि सभी मेरे साथ चलें। मैं हड़बड़ी नहीं दिखाता और मैं लोगों को निकाले जाने के सख़्त ख़िलाफ़ हूं। लोगों को निकालना मेरे अपने सिद्धांतों के ख़िलाफ़ हैं। कभी-कभी लोगों को निकालना पड़ा है। लेकिन निकाले जाने वाले लोगों की संख्या और रखे जाने वाले लोगों की संख्या या फिर नाराज़ लोगों की संख्या और संतुष्ट लोगों की संख्या में तुलना की जाए तो निकाले गए और नाराज़ लोगों की संख्या आधा फीसदी भी नहीं होगी। आज हिंदी के कई ऐसे संपादक हैं जिन्हें मैंने ब्रेक दिया। उसकी एक वजह यह है कि ईश्वर ने मुझे 24 साल की उम्र में संपादक बना दिया तो बहुत से लोगों को काम देने का मौका मिला। शायद अकेला ऐसा आदमी हूं जो पिछले 25 साल से एक भी दिन के गतिरोध के बगैर संपादक बना हुआ है। मैं किसी बुजुर्ग पीढ़ी का नहीं हूं, लेकिन पूरी एक पीढ़ी तो संपादक के तौर पर ही गुजरी है।
समरेंद्र – मृणाल जी ने हिंदुस्तान में कॉरपोरेट कल्चर दिया। लेकिन उनके कई करीबी बताते हैं कि उनका काम करने का तरीका लोकतांत्रिक नहीं था। कर्मचारियों को ही मिलने के लिए अप्वाइंटमेंट लेनी पड़ती थी। कई बार ऐसा हुआ कि लोग मिल ही नहीं पाए। तो क्या आप इस माहौल को बदलने की कोशिश करेंगे।
शशि शेखर – पहली बात, यह कितना सच और कितना झूठ है मैं यह नहीं जानता। मृणाल जी एक बहुत सम्मानित व्यक्तित्व हैं। मुझे याद पड़ता है कि इंटर में मैंने उनकी एक कहानी पढ़ कर परीक्षा दी थी। और इंटर पास किए मुझे 32-33 साल हो गए। तो इतने सम्मानित व्यक्ति के लिए मैं कोई भी ऐसी बात कहना नहीं चाहता जो मैं नहीं जानता।
दूसरी बात, मृणाल जी के समय में हिंदुस्तान जितना बढ़ा। वो अपने आप में एक फेनोमेनॉन है। उनके बारे में कोई कुछ भी कहे… मैं यह मानता हूं कि वो तारीफ़ और सम्मान की हक़दार हैं।
तीसरी बात, जब भी कहीं विस्तार होता है कुछ लोग नाराज़ होते हैं तो कुछ खुश होते हैं। मुझे तो सैकड़ों ऐसे किस्से मालूम हैं जहां भाई-बहनों के बीच बात नहीं होती। मगर वो दुश्मन नहीं हैं। कभी उनमें ईष्या होती है, कभी कोई कष्ट होता है। जहां तक मृणाल जी के योगदान का सवाल है उसे कम करके नहीं आंका जा सकता। मुझे लगता है कि कुछ नारेबाजी, कुछ शोशेबाजी हम लोगों की आदत बन गई है। मीडिया में मेरे कई दोस्त अपनी प्रतिभा का कुछ सकारात्मक इस्तेमाल कर सकते हैं।समरेंद्र – हिंदुस्तान पर इस बार चुनाव के दौरान एक गंभीर आरोप लगा। पैसे लेकर विज्ञापनों को ख़बरों के तौर पर छापने का आरोप। अमर उजाला में आपने ऐसा नहीं होने दिया। मतलब हिंदुस्तान में काम करने के तरीके और अमर उजाला में काम करने के तरीके में ज़मीन आसमान का अंतर है। आप इसके बीच कैसे तालमेल बिठाएंगे?
शशि शेखर – जहां तक मुझे याद है मैं उस दिन बनारस में था जिस दिन हिंदुस्तान में पहली बार कुछ ऐसा छपा था। वो मुझे भी कुछ खटका था। लेकिन यह सच है कि अगले ही दिन मृणाल जी ने प्रथम पृष्ठ पर इसके लिए क्षमा मांगी थी। मैं उनको और पूरे एचटी मीडिया लिमिटेड को इतना साहसी मानता हूं कि उन्होंने अपनी ग़लती कबूल की।
दूसरी बात, तालमेल कैसे बिठाएंगे और माहौल में कैसे चलेंगे तो मैंने एक निश्चित माहौल में “आज” अख़बार में काम किया। देखते-देखते वो माहौल बदला। 93 तक वो देश के सबसे बड़े अख़बारों में से एक था। फिर वो कई वजहों से गिरने लगा। मैं तो 2000 तक इस उम्मीद में बैठा रहा कि आज नहीं तो कल हम सब सुधरेंगे। उसके मालिक को दोष दिया जाता है। लेकिन वहां बहुत से ऐसे लोग थे जो ऑफिस के पैसे पर क्लासिक सिगरेट पीते थे। शराब पीते थे। मैं उनसे आंख में आंसू भर-भर कर कहता था कि मित्रों जब … राजपूत राजाओं पर आक्रमण होता था और विदेशी राजा जीतते थे तो राजा लड़ते हुए मर जाते थे, रानियां जौहर कर लेती थीं। बलात्कार आम आमदी और औरत का होता था। लूटे आम आदमी जाते थे। तो ईश्वर के लिए सब मिल कर लड़ो। “अमर उजाला” में हमने कोशिश की। “अमर उजाला” के मालिकों की कृपा थी कि उन्होंने मुझे कुछ करने का मौका दिया। तो मैं कोशिश करूंगा और मुझे उम्मीद है कि वहां (हिंदुस्तान में) भी मुझे मौका मिलेगा। वहीं बैठे हुए लोग मेरा सहयोग करेंगे। मेरा अपना कोई निजी एजेंडा नहीं है। शशि शेखर अकेला ऐसा आदमी है जिसका सबकुछ बिल्कुल साफ है। इस तीस साल के करियर में लोगों ने मेरी कथित बदमिजाजियों की बात की है। लेकिन मुझे अब तक कोई अयोग्य नहीं बता पाया। मुझे कोई बेईमान नहीं बता पाया। मेरे ऊपर कोई दाग़ नहीं है। हो सकता है कि बद्तमीज होऊं, लेकिन क्या करूं अब पचास साल का होने को आया, मैं।
((शशि शेखर से इंटरव्यू के अगले हिस्से में बात होगी अमर उजाला में उनके अनुभव की। अख़बार के मालिकों और मैनेजमेंट के रवैये की। साथ की आपको उनकी निजी ज़िंदगी से जुड़े कुछ ऐसे वाकये भी पढ़ने को मिलेंगे जिनसे हर कोई बहुत कुछ सीख सकता है।))
sanju
September 3, 2009 at 11:44 pm
SHASHI JIJHARKHAND PAR JAROOR DHYAN DENGE. YAHA PAR BAHUT GARBAR HAI. JHARKHAND ME AAPKE YAHA NICHE SE UPAR TAK SIRF KAROBARI HI HAI.PATRAKAR NAHI. EK VYAKTI KE BARE ME TO PAHLE DIN PRABHAT KHABAR NE, DUSRE DIN TELEGRAPH NE FIR DAINIK JAGRAN NE BHI CHAPA. TURAT NAHI ROKA GAYA, TO C B I KI AUR KHABAR CHAPEGI. PAR AAPKO HH JOIN KARNE KE LIYE BADHAI.
आईएम नागार्जुन
September 4, 2009 at 12:17 am
सबसे पहले तो शशि शेखर को बधाई। यह जान कर अच्छा लगा कि वह हड़बड़ी नहीं दिखाते हैं और छंटनी उन्हें पसंद नहीं। हिंदुस्तान को ऐसे माहौल में उनके जैसे ही संपादक की ज़रूरत थी।
अशोक आशीष
September 4, 2009 at 10:33 am
शशि शेखर जी, बधाई। आपका पिछला जो रिकार्ड रहा है, मुझे उम्मीद है कि हिंदुस्तान के पत्रकारों और गैर पत्रकार कर्मचारिय़ों को लगेगा कि आप उनके हैं। और रही बात बदतमीजी की तो काम नहीं करने वाले और गुटबाजी करके संस्थान को डुबाने वालों को तो आप पहले भी बदतमीज ही लगते थे। अगर ऐसा आगे भी हो तो इसमे आश्चर्य नहीं।
शालीन महिला और योग्य पत्रकार मृणाल पांडेय के बारे में आप जैसे पत्रकार की ऐसी ही राय होने की अपेक्षा थी। समरेंद्र जी ने यह सही कहा है कि हिंदुस्तान के कुछ पत्रकार डरे हुए हैं। खासकर पहाड़ से नाता रखने वाले।
इसमें दोष मृणाल जी का है। इसे उनकी कमजोरी भी कह सकते हैं। ऐसी कमजोरी बड़े-बड़ों में होती है, जो अक्षम्य है। लेकिन ऐसा चलन में है। अब प्रभाष जोशी को ही देखिए ना। वह योग्य पत्रकार हैं। मैं उन्हें हिंदी पत्रकारिता का भीष्मपितामह मानने को तैयार हूं बहुत से पत्रकारों और लोगों की तरह। लेकिन उम्र के इस पड़ाव पर आकर उन्होंने खुद ही स्वीकार किया कि बाह्मण और ब्राह्मणवाद किस तरह श्रेष्ठ है। जनसत्ता के शुरूआती दिनों से दबी जुबान उन पर यही आरोप था। दुख है कि मृणाल जी पर ही कुछ हद तक क्षेत्रवाद और जातिवाद हावी रहा।
शशि शेखर जी, आप इस दोष से परे रहिए। देखिए ना, एक सर्वे है। पत्रकार अनिल चमड़िया और उनके सहयोगी पत्रकार ने मिल कर किया है। तथाकथित राष्ट्रीय अखबारों, चैनलों और पत्रिकाओं में सिर्फ 17 फीसदी महिलाएं और 3 फीसदी मुसलमान हैं। लेकिन सेकुलर होने दंभ तथा महिला अधिकारों की बातें भी इन्हीं प्लेटफार्मों से की जाती हैं।
ramesh singh
September 5, 2009 at 11:28 am
sashi ji, aap ko badhai, hindustan bihar ke muzaffarpur unit se jude buero office mai kuch aishe log hai jo 10 years se ek hi jagah per hai unka kya hoga. paex ke adhyakch bhi aap ke bettiah office mai reporter hai.
aap ka
ramesh singh,
kalibag/bettiah