Subscribe by Email

साधु की जात, मीडिया की बात यानी मृणाल-योगेंद्र संवाद

बेशक साधु की जाति न पूछें। लेकिन साधु के भेष में आने वाले हर व्यक्ति के बारे में इतनी जांच तो जरूर कर लें कि वह साधु है भी या नहीं, वह अपने जन्म के संयोग से ऊपर उठ पाया है या नहीं। अगर साधु के भेष में कोई गृहस्थ मिले तो उसके ज्ञान, कर्म और चरित्र पर निगाह रखें। अगर उसमें कोई खोट या पूर्वाग्रह पाएं और उसका कोई कारण न समझ आए तो फिर उसकी जात भी पूछ लें।”
- योगेंद्र यादव, दैनिक हिंदुस्तान, 11 जुलाई, 2006

लगभग तीन साल पहले जब देश में मंडल-2 लागू करने को लेकर हंगामा मचा हुआ था तो नोएडा फिल्म सिटी में CNBC TV18 के स्टूडियो में एक चर्चा हुई। एंकर करण थापर थे और चर्चा में शामिल थीं हिंदुस्तान टाइम्स की मालकिन शोभना भरतीया, पॉयोनियर के मालिक चंदन मित्रा और सीएसडीएस के फेलो प्रोफेसर योगेंद्र यादव। रिकॉर्डिंग के दौरान योगेंद्र यादव ने आरोप लगाया कि शोभना भरतीया के संस्थान से निकलने वाले हिंदी अखबार में ऊपर के सभी दस पदों पर एक ही जाति के लोग हैं। जाहिर है शोभना भरतीया ने इसका विरोध किया।

इसके चंद दिनों बाद हिंदुस्तान की तत्कालीन प्रधान संपादक मृणाल पांडे ने 16 जून 2006 को अखबार में एक लेख अपने नाम से लिखा। शीर्षक था जात न पूछो मीडिया की, पूछ लीजिए ज्ञान। इसके कुछ दिनों बाद (11 जुलाई 2006 को) हिंदुस्तान में योगेंद्र यादव का जवाब एक लेख की शक्ल में छपा। पेश है उस लेख के कुछ अंश-
————————-

“…एक छोटे से सर्वेक्षण की योजना बनी। स्वतंत्र पत्रकार अनिल चमड़िया और जीतेंद्र कुमार के साथ मिलकर मैंने दिल्ली के राष्ट्रीय मीडिया कहलाने वाले 37 बड़े अखबारों, पत्रिकाओं और टीवी चैनलों आदि के शीर्ष पदों पर आसन्न 315 पत्रकारों की सामाजिक पृष्ठभूमि का सर्वेक्षण करा डाला।

सर्वेक्षण के नतीजे चौंकाने वाले तो नहीं थे मगर बेहद दुखद थे। देश में क्या खबर बनेगी और क्या नहीं, इसका फैसला करने वाले इन 315 लोगों में से सिर्फ 17 फीसदी महिलाएं थीं। हिंदू 90 फीसदी हैं तो मुसलमान सिर्फ 3 फीसदी। शीर्ष के पदों में से 85 फीसदी सवर्ण पत्रकार हैं। देश की आबादी में इस वर्ग का हिस्सा महज 16 फीसदी है, जबकि 49 फीसदी तो केवल ब्राह्मण। इनमें से सिर्फ 4 फीसदी पिछड़ी जातियों से संबंध रखते हैं। इन 315 लोगों में से देश की आबादी के एक चौथाई हिस्से यानी दलित और आदिवासी समाज से संबंध रखने वाला एक भी पत्रकार नहीं है।

सर्वे की रिपोर्ट में हमने कहा कि भारतीय समाज की विविधता राष्ट्रीय मीडिया के शीर्षस्थ पत्रकारों में प्रतिबिंबित नहीं होती है। सिर्फ इतना ही न एक शब्द ज्यादा न एक शब्द कम। सोचा था कि मीडिया में कुछ आत्ममंथन होगा, कुछ स्वस्थ बहस होगी। लेकिन प्रतिक्रिया ठीक उल्टी हुई। चर्चा तो हुई, पर सर्वेक्षण के परिणामों पर नहीं बल्कि सर्वेक्षण करने वालों की नीयत पर। कहा गया कि सर्वेक्षण गंदे दिमाग की उपज है, मीडिया में जातिवादी जहर घोलने की साजिश है। भला हो मृणाल जी का, उन्होंने कानाफूसी की बजाए खुलकर अपनी राय और तर्क लिखे। कम से कम एक संवाद का रास्ता तो खुला।

संवाद कहीं अधिक सार्थक होता अगर वे सर्वेक्षण के आंकड़ों पर एक क्षण रुककर गौर करतीं। मृणाल जी जैसी संवेदनशील लेखिका मीडिया में महिलाओं, अल्पसंख्यकों, और पिछड़े-दलित आदिवासी समुदाय की अनुपस्थिति पर क्षोभ, दुख या चिंता व्यक्त करने पर एक भी शब्द जाया न करे तो सार्थक संवाद कैसे शुरू हो सकता है।…

आरक्षण पर आंदोलन और मीडिया कवरेज

क्या मीडिया ने दोनों पक्षों को समुचित जगह दी। मिसाल के तौर पर “दैनिक हिंदुस्तान” को ही लें। 6 अप्रैल से 18 जून के बीच इस अखबार ने आरक्षण पर संपादकीय और लेखों के अलावा 40 फोटो और 2772 कॉलम इंच समाचार छापे। संपादकीय और लेखों में निस्संदेह दोनों पक्षों को संतुलित स्थान मिला, लेकिन समाचारों में ये संतुलन गायब दिखा। अगर 1287 कॉलम इंच गैर-पक्षीय खबरों को छोड़ दिया जाए तो इस अखबार मे 1331 कॉलम इंच आरक्षण विरोधियों की गतिविधियों और बयानों को दिए, तो सिर्फ 154 कॉलम इंच आरक्षण समर्थकों की खबरों को। यानी एक पक्षीय खबरों का 90 फीसदी स्थान आरक्षण विरोध को मिला। 80 फीसदी फोटो आरक्षण विरोधी आंदोलन के छपे। मेडिकल इंस्टिट्यूट में चल रहा आरक्षण विरोधी धरना लगभग हर रोज प्रमुख खबर बना, लेकिन इसी इंस्टिट्यूट में हर रोज लंच के समय होने वाली आरक्षण समर्थित रैली की खबर तक नहीं छपी। क्या मृणाल जी इसे अपनी धंधई तटस्थता का नमूना मानेंगीं? अगर नहीं तो इस फिसलन को क्या समझा जाए? क्या इसे विशुद्ध संयोग माना जाए कि एक पक्षीय खबरों की 90 फीसदी जगह आरक्षण विरोध को देने वाले इस अखबार के सभी दस शीर्षस्थ पत्रकार एक ही जाति के अगड़े हैं?…

…’जात न पूछो मीडिया की’ के आव्हान का सहज आकर्षण ‘जात न पूछो साधु की’ वाली उक्ति से जुड़ा है। …बेशक साधु की जाति न पूछें। लेकिन साधु के भेष में आने वाले हर व्यक्ति के बारे में इतनी जांच तो जरूर कर लें कि वह साधु है भी या नहीं, वह अपने जन्म के संयोग से ऊपर उठ पाया है या नहीं। अगर साधु के भेष में कोई गृहस्थ मिले तो उसके ज्ञान, कर्म और चरित्र पर निगाह रखें। अगर उसमें कोई खोट या पूर्वाग्रह पाएं और उसका कोई कारण न समझ आए तो फिर उसकी जात भी पूछ लें।”

Share This Post

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*

You may use these HTML tags and attributes: <a href="" title=""> <abbr title=""> <acronym title=""> <b> <blockquote cite=""> <cite> <code> <del datetime=""> <em> <i> <q cite=""> <strike> <strong>